आत्महत्या के विरुद्ध ( Atmhatya Ke Virudh ) : रघुवीर सहाय
जब से मैंने यह कविता लिखी है कट रहे जंगल के छोर पर राजमार्ग के समीप सब दिन मरे पड़े मिलते हैं नौजवान लाश का हुलिया सुन कोई जानता नहीं कौन था मान लिया जाता है कैसे मरा होगा मरने का कारण अब थोड़े ही शेष है हुलिया भी संक्षिप्त होता जा रहा है जितने … Read more