सूरसागर सार : संo डॉ धीरेन्द्र वर्मा ( निर्धारित पदों की व्याख्या MA Hindi DU)
पद 1 चरन-कमल बंदौ हरि-राई। जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधै कों सब कछु दरसाई।। बहिरौ सुनै, गूँग पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराई। सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौ तिहिं पाई।। शब्दार्थ प्रसंग : यह पद डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा संपादित ‘सूरसागर सार’ के ‘विनय तथा भक्ति’ खंड का प्रथम पद है। इसमें महाकवि … Read more