विप्रलब्धा ( Vipralabdha ) : डॉ धर्मवीर भारती
बुझी हुई राख, टूटे हुए गीत, डूबे हुए चांद, रीते हुए पात्र, बीते हुए क्षण-सा – मेरा यह जिस्म कल तक जो जादू था, सूरज था, वेग था तुम्हारे आश्लेष में आज वह जूड़े से गिरे हुए बेले-सा टूटा है, म्लान है | दुगना सुनसान है बीते हुए उत्सव-सा, उठे हुए मेले-सा | (1) मेरा … Read more