वे आँखें ( सुमित्रानंदन पंत )
अंधकार की गुहा सरीखी उन आँखों से डरता है मन, भरा दूर तक उनमें दारुण दैन्य दुख का नीरव रोदन! वह स्वाधीन किसान रहा, अभिमान भरा आँखों में इसका, छोड़ उसे मँझधार आज संसार कगार सदृश बह खिसका | 1️⃣ व्याख्या — प्रस्तुत काव्यांश में, कवि पंत जी के द्वारा भारतीय कृषकों के शोषण व … Read more