फागुन की शाम ( Fagun Ki Sham ) : डॉ धर्मवीर भारती
घाट के रस्ते उस बँसवट से इक पीली सी चिड़िया उसका कुछ अच्छा-सा नाम है ! मुझे पुकारे ! ताना मारे, भर आयें आँखड़ियाँ ! उन्मन, ये फागुन की शाम है ! (1) घाट की सीढ़ी तोड़-फोड़ कर बन-तुलसा उग आयीं झुरमुट से छन जल पर पड़ती सूरज की परछाईं तोतापंखी किरनों में हिलती बांसों … Read more