कक्षा 12 की हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘वितान भाग 2’ में संकलित ”जूझ” ( आनंद यादव )का सारांश अभ्यास के प्रश्नों सहित |
‘जूझ’ ( आनंद यादव ) का मूल पाठ download करें 👇
जूझ ( सारांश )
“जूझ” पाठ में लेखक आनंद यादव ने अपने बचपन में पढ़ाई के संघर्ष को बताया है । लेखक के पिता ने लेखक की पढ़ाई छुड़ा दी है । विद्यालय न जाने के कारण लेखक पाँचवी कक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया है । लेखक के पिता चाहते हैं कि वह पढ़ाई-लिखाई छोड़कर खेती-बाड़ी में हाथ बँटाए । परन्तु लेखक का मन विद्यालय जाने के लिए तड़पता है । वह इसलिए अपनी माँ से बात करता है । लेखक की माँ गाँव के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति दत्ताजी राव देसाई से निवेदन करती हैं कि वे लेखक के पिता को समझाएँ कि वे अपने पुत्र को विद्यालय जाने दें । दत्ताजी राव देसाई के समझाने पर लेखक के पिता उसे विद्यालय भेजने के लिए तैयार हो जाते हैं, लेकिन वे लेखक के सामने यह शर्त रखते हैं विद्यालय जाने से पहले और विद्यालय से आने के बाद उसे खेत में काम करना होगा और जानवरों को चराना होगा ।
लेखक जब विद्यालय की पाँचवी कक्षा में जाता है तो देखता है कि उसके साथ के सभी विद्यार्थी पास होकर अगली
कक्षा में चले गए हैं, वह अपने आपको अपरिचित विद्यार्थियों के बीच पाता है ।
कक्षा का एक बालक चह्वाण उसके साथ शरारत भी करता है । इन सब घटनाओं से लेखक का मन उदास हो जाता
है । पर आने वाले दिनों में लेखक बड़ी मेहनत से पढ़ता है । इस कारण से लेखक पर सभी शिक्षक प्रसन्न रहते हैं और वसंत पाटिल नामक होशियार लड़का उसका मित्र बन जाता है । विद्यालय में लेखक सबसे अधिक प्रभावित होता है अपने मराठी के अध्यापक न. वा. सौंदलगेकर से । न.वा. सौंदलगेकर को मराठी कविता की बहुत अच्छी समझ है तथा वे स्वयं भी कविता लिखते हैं । वे मराठी के अलावा अंग्रेजी, हिन्दी और संस्कृत भाषा की कविताओं के बारे में भी जानते हैं । उनके पढ़ाने का ढंग भी बड़ा प्रभावी है । वे बड़े ही अच्छे ढंग से गाकर कविता पढ़ाते और समझाते हैं । उनसे प्रभावित होकर लेखक की कविताओं की ओर रुचि बड़ती जाती है । लेखक उन्हीं के अंदाज में कविता गाने का अभ्यास करता है और तुकबंदी करके छोटी-छोटी कविताएँ लिखने लगता है । पहले लेखक को खेतों में पानी देते समय अथवा जानवरों को चराते समय अकेलापन बुरा लगता था, पर अब लेखक को अकेलापन अच्छा लगाने लगा है क्योंकि वह अब अकेलेपन में कविताओं को गाने का अभ्यास करता है । वह कई बार खेत में या भैंस चराते समय कागज़ आदि न होने पर पत्थर, लकड़ी के तख्ते या भैंस की पीठ पर ही कविता लिखना शुरू कर देता है । लेखक कविताएँ लिखकर अपने मराठी शिक्षक श्री न.वा. सौंदलगेकर को दिखाता है । लेखक उनसे मराठी कविताओं के संग्रह लेकर पढ़ने लगता है, जिससे उसकी भाषा परिष्कृत हो जाती है । साथ ही वह उनसे कविता की भाषा, छंद और अलंकार पर भी चर्चा प्रारंभ करता है ।
अभ्यास के प्रश्न ( जूझ : आनंद यादव )
प्रश्न 1 – ‘जूझ’ शीर्षक के औचित्य पर विचार करते हुए यह स्पष्ट करें कि क्या यह शीर्षक कथा नायक की किसी केंद्रीय चारित्रिक विशेषता को उजागर करता है?
उत्तर – कहानी या किसी रचना का शीर्षक बहुत मायने रखता है। क्योंकि शीर्षक को देखकर ही पाठक को अंदाजा हो जाता है कि वह रचना या कहानी किस सन्दर्भ में है और किसी भी रचना का मुख्य भाव शीर्षक से ही व्यक्त होता है। इस पाठ का शीर्षक ‘जूझ’ है और जूझ का अर्थ होता है जुझना या संघर्ष। इस कहानी में कहानी के मुख्य पात्र आनंद ने पाठशाला जाने व् पढ़ाई करने के लिए बहुत संघर्ष किया। उसका पिता उसको पाठशाला जाने से मना कर देता है और खेतों का काम संभालने के लिए कहता है। इसके बावजूद, कहानी नायक आनंद अपनी माँ को मना कर दादा व देसाई सरकार के सामने अपना पक्ष रखता है ताकि वे उसके पिता को मना सके। आनंद का पिता किसी भी हाल में उसे पाठशाला नहीं भेजना चाहता था अतः वह उस पर कई तरह के आरोप लगता है परन्तु अपने ऊपर लगे आरोपों का आनंद अच्छे से उत्तर देता है। जब दादा व देसाई सरकार उसे आगे बढ़ने के लिए कुछ कठिन शर्तें बताते हैं तो वह वह हर कठिन शर्त मानता है। पाठशाला में भी वह नए माहौल में ढलने, कविता रचने आदि के लिए बहुत संघर्ष करता है। अत: यह शीर्षक सर्वथा उपयुक्त है। इस कहानी के मुख्य पात्र में संघर्ष की प्रवृत्ति है। इस प्रकार यह शीर्षक कथा-नायक की केंद्रीय चारित्रिक विशेषता को उजागर करता है।
प्रश्न 2 – स्वयं कविता रच लेने का आत्मविश्वास लेखक के मन में कैसे पैदा हुआ?
उत्तर – लेखक के मराठी के मास्टर स्वयं कविता करते थे और अनेक मराठी कवियों के काव्य-संग्रह उनके घर में थे। वह भाव छंद और लय के साथ कविताओं का पाठ करता था। वे उन कवियों के चरित्र और उनके संस्मरण बच्चों को बताया करते थे। इसके कारण ये कवि लोग लेखक को ‘आदमी’ ही लगने लगे थे। इसलिए लेखक को भी यह विश्वास हुआ कि वह भी कविता कर सकता है। मास्टर के दरवाजे पर मालती की बेल पर मास्टर ने एक कविता लिखी थी। वह कविता और वह लता लेखक ने दोनों ही देखी थी। इसके कारण लेखक को भी लगता था कि अपने आसपास, अपने गाँव में, अपने खेतों में, कितने ही ऐसे दृश्य हैं जिन पर वह कविता बना सकता है। लेखक भैंस चराते-चराते, फसलों पर, जंगली फूलों पर तुकबंदी करने लगा। उन्हें जोर से गुनगुनाता भी था और अपनी बनाई कवितायेँ मास्टर को दिखाने भी लगा। मास्टर कविता लिखने में लेखक का मार्गदर्शन भी किया करते थे।
प्रश्न 3 – श्री सौंदलगेकर के अध्यापन की उन विशेषताओं को रेखांकित करें जिन्होंने कविताओं के प्रति लेखक के मन में रुचि जगाई?
उत्तर – लेखक के एक मराठी मास्टर जिनका नाम न.वा.सौंदलगेकर था। वे कविता बहुत ही अच्छे ढंग से पढ़ाते थे। पहले तो वे एकाध कविता को गाकर सुनाते थे-फिर बैठे-बैठे अभिनय के साथ कविता के भाव बच्चों को समझाते थे। वे स्वयं भी कविता की रचना करते थे। कभी कक्षा में कोई अपनी कविता याद आती तो वे सुना देते। लेखक उनके द्वारा सुनाई व् अभिनय की गई कविताओं को ध्यान से सुनता व् देखता था। लेखक अपनी आँखों और कानों का पूरा ध्यान लगाकर मास्टर के हाव-भाव, ध्वनि, गति, चाल और रस को ग्रहण करता था। और उन सभी कविताओं को सुबह-शाम खेत पर पानी लगाते हुए या जानवरों को चराते हुए अकेले में खुले गले से मास्टर के ही हाव-भाव, यति-गति और आरोह-अवरोह के अनुसार गाता था। लेखक ने अनेक कविताओं को अपनी खुद की चाल में गाना शुरू किया। लेखक भैंस चराते-चराते, फसलों पर, जंगली फूलों पर तुकबंदी करने लगा। उन्हें जोर से गुनगुनाता भी था और अपनी बनाई कवितायेँ मास्टर को दिखाने भी लगा। मास्टर कविता लिखने में लेखक का मार्गदर्शन भी किया करते थे। वे लेखक को बताते कि कवि की भाषा कैसी होनी चाहिए, संस्कृत भाषा का उपयोग कविता के लिए किस तरह होता है, छंद की जाति कैसे पहचानें, उसका लयक्रम कैसे देखें, अलंकारों में सूक्ष्म बातें कैसी होती हैं, अलंकारों का भी एक शास्त्र होता है, कवि को शुद्ध लेखन करना क्यों जरूरी होता है, शुद्ध लेखन के नियम क्या हैं, आदि। श्री सौंदलगेकर की इन्हीं विशेषताओं के कारण कविताओं के प्रति लेखक के मन में रुचि जाग गई।
प्रश्न 4 – कविता के प्रति लगाव से पहले और उसके बाद अकेलेपन के प्रति लेखक की धारणा में क्या बदलाव आया?
उत्तर – पहले जानवरों को चराते हुए, पानी लगाते हुए, दूसरे काम करते हुए, लेखगक को अकेलापन बहुत खटकता था। उसे किसी के साथ बोलते हुए, गपशप करते हुए, हँसी-मजाक करते हुए काम करना अच्छा लगता था। लेकिन अब उलटा लेखक को अकेले रहना अच्छा लगता था क्योंकि अकेले में वह कविता ऊँची आवाज़ में गा सकता था और किसी भी तरह का अभिनय कर सकता था। लेखक ने अनेक कविताओं को अपनी खुद की चाल में गाना शुरू किया।
प्रश्न 5 – आपके खयाल से पढ़ाई-लिखाई के संबंध में लेखक और दत्ताजी राव का रवैया सही था या लेखक के पिता का? तर्क सहित उत्तर दें।
उत्तर – हमारी दृष्टि से पढ़ाई-लिखाई के संबंध में लेखक और दत्ता जी राव का रवैया सही था। लेखक इसलिए पढ़ना चाहता था क्योंकि उसे लगता था कि खेती से उनका गुजारा नहीं हो पाएगा। इसका कारण यह भी था कि उसके दादा के समय में जितनी खेती सफल थी अब उसके पिता के समय में नहीं रह गई थी। लेखक चाहता था कि वह पढ़-लिख कर कोई नौकरी कर ले जिससे चार पैसे उसके हाथ में रहेंगे। यह विचार उसके मन में चलता रहता था। दत्ता जी राव का रवैया भी सही है। उन्होंने लेखक की पढ़ाई छुड़वाने के लिए लेखक के पिता को धमकाया तथा लेखक को पाठशाला भिजवाया। यहाँ तक कि वे खुद लेखक की पढ़ाई का खर्चा उठाने को तैयार थे। इसके विपरीत, लेखक के पिता का रवैया एकदम अनुचित था। वह खेती के काम को ज्यादा बढ़िया समझता था तथा स्वयं आज़ादी से घूम सके इसके लिए बच्चे व् पत्नी को खेती के काम में झोंक रखा था। वह एक आदर्श पिता बिलकुल नहीं था।
प्रश्न 6 – दत्ताजी राव से पिता पर दबाव डलवाने के लिए लेखक और उसकी माँ को एक झूठ का सहारा लेना पड़ा। यदि झूठ का सहारा न लेना पड़ता तो आगे का घटनाक्रम क्या होता? अनुमान लगाएँ।
उत्तर – लेखक को पता था कि खेती से उनका गुजारा नहीं हो पाएगा और उसका पिता उसे पढ़ाई करने नहीं देगा। इसलिए उन्हें दत्ता जी राव का सहारा लेना पड़ा और थोड़ा झूठ भी सच में मिला कर बताना पड़ा। यदि वे झूठ का सहारा न लेते तो लेखक आजीवन अनपढ़ ही रह जाता और वह जीवनभर खेतों में कोल्हू के बैल की तरह काम करता रहता। उसे केवल भैंसे चराना अथवा खेती करने के और कोई काम न आता। वह दिन-भर खेतों पर काम करता और शाम को घर लौट आता। उसका पिता ऐसे ही आजादी से घुमा करता। लेखक के नौकरी करने व् पैसे कमाने के सारे सपने टूट जाते। बिना झूठ का सहारा लिए उसकी प्रतिभा कभी भी न चमक पाती। केवल एक झूठ ने लेखक के जीवन को एक नयी दिशा दी।
यह भी देखें :
हिंदी ( कक्षा 12) ( आरोह व वितान ) ( पूरा सिलेबस एक साथ )
आरोह भाग 2 ( काव्य खंड )
▪️आत्मपरिचय ( Aatm Parichay ) : हरिवंश राय बच्चन
▪️दिन जल्दी-जल्दी ढलता है ( हरिवंश राय बच्चन )
▪️कविता के बहाने ( कुंवर नारायण )
▪️बात सीधी थी पर ( कुंवर नारायण )
▪️कैमरे में बंद अपाहिज ( रघुवीर सहाय )
▪️सहर्ष स्वीकारा है ( गजानन माधव मुक्तिबोध )
▪️उषा ( Usha ) शमशेर बहादुर सिंह
▪️बादल राग ( Badal Raag ) ( सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ): व्याख्या व प्रतिपाद्य
▪️बादल राग : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ( Badal Raag : Suryakant Tripathi Nirala )
▪️लक्ष्मण मूर्छा और राम का विलाप ( Lakshman Murcha Aur Ram Ka Vilap ) : तुलसीदास
▪️रुबाइयाँ ( Rubaiyan ) : फिराक गोरखपुरी
▪️छोटा मेरा खेत ( उमाशंकर जोशी )
▪️बगुलों के पंख ( Bagulon Ke Pankh ) : उमाशंकर जोशी
आरोह भाग 2 ( गद्य खंड )
▪️बाजार दर्शन : जैनेंद्र कुमार ( Bajar Darshan : Jainendra Kumar )
▪️काले मेघा पानी दे : धर्मवीर भारती ( Kale Megha Pani De : Dharmveer Bharti )
▪️पहलवान की ढोलक : फणीश्वरनाथ रेणु
▪️चार्ली चैप्लिन यानी हम सब : विष्णु खरे
▪️नमक : रज़िया सज्जाद ज़हीर ( Namak : Razia Sajjad Zaheer )
▪️शिरीष के फूल : हजारी प्रसाद द्विवेदी ( Shirish Ke Phool : Hajari Prasad Dwivedi )
▪️बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ( Baba Saheb Bheemrav Ambedkar )
वितान भाग 2 ( कक्षा 12)
▪️सिल्वर वैडिंग ( मनोहर श्याम जोशी )/ Silver Wedding ( Manohar Shayam Joshi )
▪️अतीत में दबे पाँव ( ओम थानवी )