
(1)
तिरती है समीर-सागर पर
अस्थिर सुख पर दुःख की छाया-
जग के दग्ध हृदय पर
निर्दय विप्लव की प्लावित माया-
यह तेरी रण-तरी
भरी आकांक्षाओं से,
घन, भेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुर
उर में पृथ्वी के, आशाओं से
नवजीवन की, ऊँचा कर सिर,
ताक रहे है, ऐ विप्लव के बादल!
फिर-फिर!
प्रसंग – प्रस्तुत काव्यांश हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक में संकलित ‘बादल राग’ नामक कविता से दिया गया है जो उनके काव्य संग्रह ‘परिमल’ ( 1930) में संकलित हैं | इसके रचयिता छायावाद के प्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी हैं | इसमें कवि निराला ने प्रगतिवादी स्वर में दलित, पीड़ित, शोषित और उपेक्षित वर्ग के शोषण से व्यथित हो बादल को क्रांति का दूत मानकर क्रांति का आह्वान किया है |
व्याख्या – कवि बादलों को संबोधित करता हुआ कहता है कि हे बादल ! तू समीर रूपी सागर पर ठीक उसी तरह से तैरता रहता है जिस प्रकार से अस्थिर सुख पर दुख की छाया मंडराती रहती है | तू इस संसार के पीड़ित लोगों के हृदय में निर्दयी क्रांति की माया के समान आच्छादित रहता है अर्थात पीड़ित लोगों के हृदय में उनके दुःखों के लिये उत्तरदायी व्यवस्था के विरुद्ध रोष पनपता रहता है | यह बादल तेरी युद्ध की नौका उन दलित-पीड़ित लोगों की आकांक्षाओं भरी हुई है अर्थात क्रांति के आगमन पर उन लोगों के मन में अपने दुखों के निवारण की भावना बलवती हो जाती है और वे सुख-समृद्धि के सपने देखने हैं | हे क्रांति के दूत बादल ! तुम्हारे नगाड़े की गर्जना से सावधान होकर पीड़ित लोग ठीक उसी प्रकार अपना सिर ऊंचा करके नवजीवन की आशाओं से भरकर तुम्हारी ओर ताकने लगते हैं जिस प्रकार पृथ्वी के ह्रदय में सोए हुए अंकुर बादल के आगमन पर नवजीवन की आशाओं से भर जाते हैं और अंकुरित होकर, ऊंचा सिर करके बादलों की ओर ताकते हुए प्रतीत होते हैं | कहने का भाव यह है कि क्रांति के आगमन पर दलित, शोषित, पीड़ित लोगों के मन में नई आकांक्षाओं का जन्म होता है, वे भी यह आशा करने लगते हैं कि अब उनके दुखों का निवारण हो जाएगा, उन्हें भी उन्नति के के समान अवसर मिलेंगे और उनका जीवन भी खुशियों से भर जाएगा |
(2)
बार-बार गर्जन
वर्षण है मूसलधार,
हृदय थाम लेता संसार,
सुन-सुन घोर वज्र हुँकार।
अशनि-पात से शायित उन्नत शत-शत वीर,
क्षत-विक्षत हत अचल-शरीर,
गगन-स्पर्शी स्पर्द्धा-धीर।
हँसते है छोटे पौधे लघुभार-
शस्य अपार,
हिल-हिल
खिल-खिल,
हाथ मिलाते,
तुझे बुलाते,
विप्लव-रव से छोटे ही है शोभा पाते।
प्रसंग — पूर्ववत |
व्याख्या — हे क्रांति के दत बादल ! तेरे बार-बार गर्जन करने तथा धारासार वर्षण से सारा संसार भय से अपना कलेजा थाम लेता है | तेरी वज्र के समान हुंकार को सुनकर सब लोग आतंकित हो जाते हैं | भीषण तड़ित पात से गगन को छूने की स्पर्धा में लगे हुए ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों के कठोर शरीर क्षत-विक्षत हो जाते हैं अर्थात क्रांति रूपी तड़ित पात होने पर उन्नति के शिखर पर पहुंचने वाले सैकड़ों वीर मिट्टी में मिल जाते हैं | लेकिन छोटे व हलके पौधे उसी प्रकार से हंसते-मुस्कुराते रहते हैं | उन पर बादलों की विनाश लीला का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है बल्कि वे उससे और अधिक विकसित होते हैं | वे और अधिक हरियाली युक्त हो जाते हैं | ऐसा प्रतीत होता है मानो छोटे-छोटे पौधे हिल-हिलकर, खिल-खिलकर और हाथ हिलाते हुए तुझे आने का निमंत्रण दे रहे हैं | वस्तुतः क्रांति के उथल-पुथल के शोर से छोटे लोग ही शोभा पाते हैं |
(3)
अट्टालिका नही है रे
आतंक-भवन,
सदा पंक पर ही होता
जल-विप्लव प्लावन,
क्षुद्र प्रफुल्ल जलज से
सदा छलकता नीर,
रोग-शोक में भी हँसता है
शैशव का सुकुमार शरीर।
रुद्ध कोष, है क्षुब्ध तोष,
अंगना-अंग से लिपटे भी
आतंक-अंक पर काँप रहे हैं
धनी, वज्र-गर्जन से, बादल!
त्रस्त नयन-मुख ढाँप रहे है।
जीर्ण बाहु, है शीर्ण शरीर
तुझे बुलाता कृषक अधीर,
ऐ विप्लव के वीर!
चूस लिया है उसका सार,
हाड़ मात्र ही है आधार,
ऐ जीवन के पारावार !
प्रसंग — पूर्ववत |
व्याख्या — कवि बादल को संबोधित करते हुए कहता है कि हे क्रांति के दूत बादल ! तेरे आगमन पर ऊंचे-ऊंचे भवन आतंक-भवन में परिवर्तित हो जाते हैं अर्थात उनमें रहने वाले धनी लोग भय से कांपने लगते हैं | जल ( बाढ़ ) की विनाश लीला का प्रभाव हमेशा कीचड़ पर होता है | जब भयंकर बाढ़ आती है तो कीचड़ में उथल-पुथल मच जाती है लेकिन छोटे प्रसन्नचित्त कमल से उसी प्रकार से नीर छलकता रहता है अर्थात क्षुद्र कमल उस भयंकर बाढ़ से अप्रभावित होता है | ठीक इसी प्रकार से एक शिशु रोग-शोक की अवस्था में भी हंसता रहता है | कहने का भाव यह है कि छोटे लोग जीवन की आपदाओं से भयभीत नहीं होते | दूसरी तरफ क्रांति के आगमन पर धनी लोगों के कोष अवरुद्ध हो जाते हैं, उनका संतोष उनसे छिन जाता है और वे अपनी सुंदर पत्नियों के अंगों से लिपटे हुए भी इस प्रकार काँप रहे होते हैं मानो वे अपनी पत्नी की गोद में नहीं बल्कि आतंक की गोद में बैठे हों | वे बादलों की भीषण गर्जना से भयभीत होकर अपनी आंखें मीचे हुए हैं और मुंह छिपाए हुए हैं |अंत में कवि कहता है कि हे क्रांति के दूत बादल ! जीर्ण भुजाओं वाला और दुर्बल शरीर वाला कृषक अधीर होकर तुझे बुला रहा है | धनी शोषक वर्ग के द्वारा उसका सार तत्व चूस लिया गया है और मात्र हड्डियां ही उसके जीवन का आधार रह गई हैं | हे जीवन के सागर ! क्रांति दूत बादल तुम यथाशीघ्र आकर दलित, शोषित वर्ग के दुःखों का निवारण कर उन्हें पुनर्जीवन प्रदान करो |
अभ्यास के प्रश्न ( बादल राग : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला )
(1) ‘अस्थिर सुख पर दुख की छाया’ पंक्ति में दुख की छाया किसे कहा गया है और क्यों?
उत्तर — ‘अस्थिर सुख पर दुख की छाया’ पंक्ति में ‘दुख की छाया’ अनिष्ट का प्रतीक है? प्रस्तुत कविता में ‘दुख की छाया’ क्रांति की आशंका के लिए प्रयोग हुआ है | सुविधा संपन्न पूंजीपति लोगों के पास सुख के अनेक साधन होते हैं परंतु उनका यह सुख अस्थिर होता है क्योंकि उन्हें हमेशा क्रांति की आशंका सताती रहती है | जब भी कहीं क्रांति होती है तो उससे निर्धन वर्ग पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि क्रांति के आगमन से उनके जीवन में सुख के संचार की संभावना बलवती हो जाती है लेकिन शोषक धनी वर्ग मिट्टी में मिल जाता है, उनका वैभव छिन जाता है |
(2) ‘अशनि-पात से शापित उन्नत शत-शत वीर’ पंक्ति में किसकी ओर संकेत किया गया है?
उत्तर — ‘अशनि-पात से शापित उन्नत शत-शत वीर’ पंक्ति में शोषक पूंजीपति वर्ग की ओर संकेत किया गया है | इस पंक्ति के माध्यम इस तथ्य को स्पष्ट किया गया है कि जब क्रांति का आगमन होता है तो धनी पूंजीपति वर्ग मिट्टी में मिल जाता है | जिस प्रकार बादलों के द्वारा किए गए अशनि पात से बड़े-बड़े भूधर मिट्टी में मिल जाते हैं उसी प्रकार पूंजीपति वर्ग भी क्रांति के आगमन से मिट्टी में मिल जाते हैं अर्थात उनका धन-वैभव और प्रभाव समाप्त हो जाता है |
(3) ‘विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते’ पंक्ति में ‘विप्लव-रव’ से क्या तात्पर्य है? ‘छोटे ही हैं शोभा पाते’ ऐसा क्यों कहा गया है?
उत्तर — ‘विप्लव-रव’ से तात्पर्य है – क्रांति की गर्जना | ‘विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते’ इसलिए कहा गया है क्योंकि जब भी क्रांति का आगमन होता है उससे छोटे लोगों का ही उद्धार होता है | दलित, पीड़ित और शोषित वर्ग के लोगों के जीवन में सुखद परिवर्तन की संभावना बलवती हो जाती है जबकि धनी शोषक वर्ग मिट्टी में मिल जाता है उनका धन-वैभव और प्रभाव समाप्त हो जाता है |
(4) बादलों के आगमन से प्रकृति में होने वाले किन-किन परिवर्तनों को कविता रेखांकित करती है?
उत्तर — बादलों के आगमन से प्रकृति में अनेक परिवर्तन होते हैं | तेज हवाएं चलने लगती हैं, बादल गरजने लगते हैं | बादलों में बिजली चमकने लगती है, तड़ित-पात के कारण भयंकर गर्जना होती है | मूसलाधार वर्षा होने लगती है | अशनि पात और भयंकर बाढ़ के कारण बड़े-बड़े भूधर और बड़ी-बड़ी अट्टालिकाऐं मिट्टी में मिल जाती हैं | पृथ्वी के गर्भ में दबे प्रसुप्त बीज अंकुर के रूप में प्रस्फुटित हो जाते हैं | छोटे पौधे प्रसन्नता से खिल उठते हैं और ऐसा लगता है मानो हाथ हिला-हिला कर बादलों को बुला रहे हों |
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