पद 1
चरन-कमल बंदौ हरि-राई।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधै कों सब कछु दरसाई।।
बहिरौ सुनै, गूँग पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराई।
सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौ तिहिं पाई।।
शब्दार्थ
- बंदौ: वंदना करता हूँ।
- हरि-राई: भगवान श्रीकृष्ण।
- पंगु: लंगड़ा व्यक्ति।
- लंघै: लांघ जाता है, पार कर लेता है।
- दरसाई: दिखाई देने लगता है।
- रंक: अत्यंत गरीब या दरिद्र व्यक्ति।
- छत्र धराई: सिर पर राजछत्र धारण करके (राजा बनकर)।
- तिहिं पाई: उनके (प्रभु के) चरणों की।
प्रसंग : यह पद डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा संपादित ‘सूरसागर सार’ के ‘विनय तथा भक्ति’ खंड का प्रथम पद है। इसमें महाकवि सूरदास ने अपने आराध्य भगवान श्रीकृष्ण के चरण-कमलों की वंदना करते हुए उनकी असीम कृपा और महिमा का वर्णन किया है।
व्याख्या : महाकवि सूरदास जी अपने आराध्य भगवान श्रीकृष्ण के कमल रूपी चरणों की वंदना करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु, आपके चरणों का प्रभाव अत्यंत महिमामयी है और मैं इनकी बार-बार वंदना करता हूँ। इन चरणों की कृपा से असंभव कार्य भी पूरी तरह से संभव हो जाते हैं। प्रभु की असीम कृपा से एक लंगड़ा व्यक्ति विशाल पर्वत को आसानी से लांघ सकता है, जन्म से अंधे व्यक्ति को भी इस संसार का सब कुछ स्पष्ट दिखाई देने लगता है, बहरा मनुष्य फिर से सुनने लगता है और गूँगा व्यक्ति भी पुनः बोलने लगता है। ईश्वर की कृपा का ही प्रताप है कि एक अत्यंत दरिद्र और कंगाल व्यक्ति भी सिर पर राजछत्र धारण कर सम्राट बन जाता है। सूरदास जी अंत में कहते हैं कि उनके स्वामी भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत दयालु और करुणामय हैं, इसलिए वे ऐसे सर्वशक्तिमान प्रभु के चरणों में बार-बार प्रणाम करते हैं।
पद 2
अविगत गति कछु कहति न आवै।
ज्यौं गूँगै मीठे फल कौ रस अंतर्गत ही भावै॥
परम स्वाद सबही जु निरन्तर अमित तोष उपजावै।
मन बानी कों अगम अगोचर सो जानै जो पावै॥
रूप रेख गुन जाति जुगुति बिनु निरालंब कित धावै।
सब बिधि अगम बिचारहिं तातें सूर सगुन लीला पद गावै॥
प्रसंग : यह पद डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा संपादित ‘सूरसागर सार’ के ‘विनय तथा भक्ति’ खंड का दूसरा पद है। इसमें महाकवि सूरदास ने निर्गुण ब्रह्म (निराकार ईश्वर) की उपासना को अत्यंत कठिन बताते हुए सगुण ईश्वर (श्रीकृष्ण) की भक्ति और उपासना को सहज तथा श्रेष्ठ बताया है।
शब्दार्थ
- अविगत: अज्ञात, निराकार ब्रह्म (जिसका स्वरूप जाना न जा सके)।
- गति: दशा या स्थिति।
- अंतर्गत: हृदय में, मन ही मन।
- अमित तोष: असीमित संतोष या परमानंद।
- अगम: जहाँ पहुँचा न जा सके (पहुँच से बाहर)।
- अगोचर: जो इंद्रियों (नेत्रों आदि) से दिखाई न दे।
- जुगुति: युक्ति या उपाय।
- कित धावै: कहाँ भटकता फिरे (दौड़े)।
- निरालंब: बिना किसी आधार (आश्रय) के।
व्याख्या : महाकवि सूरदास जी कहते हैं कि निराकार (निर्गुण) ब्रह्म की स्थिति और स्वरूप के विषय में शब्दों में कुछ भी कहते नहीं बनता। जिस प्रकार कोई गूँगा व्यक्ति मीठे फल को खाने के बाद उसके दिव्य स्वाद का आनंद केवल अपने मन ही मन में अनुभव कर सकता है, उसे वाणी से व्यक्त नहीं कर सकता, ठीक उसी प्रकार निर्गुण ब्रह्म की अनुभूति भी अवर्णनीय है। यद्यपि उस ईश्वर की प्राप्ति का परमानंद भक्त को निरंतर असीम संतोष प्रदान करता है, परंतु वह निराकार ब्रह्म मन और वाणी की पहुँच से सर्वथा बाहर है और इंद्रियों से भी परे है; उसे वही जान सकता है जिसने उसे प्राप्त कर लिया हो। उस निर्गुण ईश्वर का न तो कोई रूप है, न कोई आकृति (पहचान), न ही उसकी कोई जाति है और न ही उसे प्राप्त करने की कोई निश्चित युक्ति है। वह आकार, गुण, जाति तथा तर्क से सर्वथा रहित है। ऐसे में बिना किसी आधार के भक्त का मन उस निर्गुण ब्रह्म के ध्यान में कहाँ-कहाँ दौड़ता फिरे? इसलिए, सूरदास जी कहते हैं कि उस निर्गुण ईश्वर को विचार की दृष्टि से सब प्रकार से अपनी पहुँच के बाहर (अगम) जानकर ही वे अपने प्रभु श्रीकृष्ण के सगुण रूप की लीलाओं का गान करते हैं।
पद 3
वासुदेव की बड़ी बड़ाई।
जगत पिता, जगदीस, जगत-गुरु, निज भक्तनि की सहत ढिठाई।
भृगु कौ चरन राखि उर ऊपर, बोले बचन सकल-सुखदाई।
सिब-विरंचि मारन कौं धाए, यह गति काहू देव न पाई।
बिनु-बदले उपकार करत हैं, स्वारथ बिना करत मित्राई।
रावन अरि कौ अनुज विभीषन, ताकौं मिले भरत की नाईं।
बकी कपट करि मारन आई, सो हरि जू बैकुंठ पठाई।
बिनु दीन्हें ही देत सूर प्रभु, ऐसे हैं जदुनाथ गुसाईं ||
शब्दार्थ
- बड़ाई: महत्ता।
- जगदीस: सम्पूर्ण संसार के स्वामी।
- ढिठाई: धृष्टता या उद्दंडता।
- उर: हृदय।
- सिब-विरंचि: शिव और ब्रह्मा।
- गति: सहनशीलता की वह अवस्था।
- बिनु-बदले: प्रतिफल की इच्छा के बिना।
- अरि: शत्रु।
- अनुज: छोटे भाई।
- बकी: पूतना राक्षसी (जो कपट रूप धारण करके आई थी)।
- बैकुंठ पठाई: स्वर्ग भेज दिया।
- गुसाईं: स्वामी।
प्रसंग : यह पद डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा संपादित ‘सूरसागर सार’ के ‘विनय तथा भक्ति’ (भक्तवत्सलता) खंड का तीसरा पद है। इसमें महाकवि सूरदास ने भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण) की अपार महिमा, उदारता और अपने भक्तों के प्रति उनकी असीम क्षमाशीलता (भक्तवत्सलता) का वर्णन किया है।
व्याख्या : सूरदास जी कहते हैं कि भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण) की महत्ता अवर्णनीय है। वे सम्पूर्ण संसार के पिता, स्वामी तथा गुरु हैं और अपने भक्तों की धृष्टता को सहज ही सहन कर लेते हैं। भृगु के चरणों के आघात को अपने हृदय पर सहन कर उन्होंने सबको आनन्दित करने वाले वचनों का ही प्रयोग किया। इस प्रकार की सहनशीलता के अभाव में शिव और ब्रह्मा अपना अपमान करने वाले भृगु को मारने दौड़े; इस प्रकार की गति (सहनशीलता) कोई भी देवता नहीं प्राप्त कर सका। प्रभु प्रतिफल की इच्छा के बिना वे उपकार करते हैं तथा स्वार्थ रहित सौहार्द्र का भाव रखते हैं। उनकी इस उदारता का एक अन्य प्रमाण यह है कि शत्रु रावण के छोटे भाई विभीषण से वे भरत की भाँति (भाई के समान निश्छल रूप से) गले मिले। बकी (पूतना) कपट रूप धारण करके भगवान को मारने आयी थी, उसे उन्होंने कृपा करके स्वर्ग भेज दिया। सूरदास जी कहते हैं कि उनके प्रभु भक्तों से बिना कुछ प्राप्त किये ही उन्हें बहुत कुछ दे डालते हैं; यदुवंशियों में श्रेष्ठ श्रीकृष्ण इस प्रकार के उदार तथा महान स्वामी हैं।
पद 9
जैसैं तुम गज कौ पाउँ छड़ायौ।
अपने जन कौं दुखित जानि कै पाउँ पियादे धायौ।
जहँ जहँ गाढ़ परी भक्तनि कौं तहँ तहँ आपु जनायौ।
भक्ति हेत प्रहलाद उबार्यौ, द्रौपदि-चीर बढ़ायौ।
प्रीति जानि हरि गए विदुर कैं, नामदेव-घर छायौ।
सूरदास द्विज दीन सुदामा, तिहिं दारिद्र नसायौ॥
शब्दार्थ
- गज: हाथी।
- पाउँ पियादे धायौ: पैदल ही दौड़ पड़े।
- गाढ़ परी: विपत्ति पड़ी।
- आपु जनायौ: स्वयं को प्रकट किया (उपस्थित हुए)।
- चीर: वस्त्र (साड़ी)।
- छायौ: छप्पर छाया (घर बनाया)।
- द्विज: ब्राह्मण।
- दारिद्र नसायौ: दरिद्रता या गरीबी नष्ट कर दी।
प्रसंग : यह पद ‘सूरसागर सार’ के ‘विनय तथा भक्ति’ खंड का छठा पद है। इसमें महाकवि सूरदास ने भगवान की भक्तवत्सलता का वर्णन किया है और बताया है कि प्रभु अपने भक्तों का संकट दूर करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।
व्याख्या : सूरदास जी कहते हैं कि हे प्रभु! जिस प्रकार आपने ग्राह (मगरमच्छ) से गजराज (हाथी) के पैर को छुड़ाकर उसकी रक्षा की थी, और अपने उस भक्त को संकट में जानकर आप बिना वाहन के पैदल ही उसकी सहायता के लिए दौड़ पड़े थे, वैसे ही जहाँ-जहाँ आपके भक्तों पर विपत्ति आई, वहाँ-वहाँ आपने प्रकट होकर उनकी रक्षा की। आपने अपनी भक्ति के कारण ही भक्त प्रह्लाद की रक्षा की और द्रौपदी का चीर (वस्त्र) बढ़ाकर उसकी लाज बचाई। अपने प्रति निश्छल प्रेम को जानकर ही आप विदुर के घर गए और आपने ही भक्त नामदेव का छप्पर छाया था। सूरदास जी कहते हैं कि सुदामा एक निर्धन ब्राह्मण था, किंतु आपने उसकी भी सारी दरिद्रता नष्ट कर दी।
पद 12
हरि, तेरौ भजन कियौ न जाइ।
कह करौं, तेरी प्रबल माया देति मन भरमाइ।
जबै आवौं, साधु-संगति कछुक मन ठहराइ।
ज्यौं गयंद अन्हाइ सरिता, बहुरि वहै सुभाइ।
वेष धरि धरि हर्यौ पर-धन, साधु-साधु कहाइ।
जैसे नटवा लोभ-कारन करत स्वाँग बनाइ।
करौं जतन, न भजौं तुमकौं, कछुक मन उपजाइ।
सूर प्रभु की सबल माया, देति मोहि भुलाइ |
शब्दार्थ
- भरमाइ: भ्रमित कर देती है।
- ठहराइ: स्थिर होता है।
- गयंद: गजेन्द्र (हाथी)।
- अन्हाइ: स्नान करना।
- सरिता: नदी।
- बहुरि: फिर से।
- सुभाइ: स्वभाव।
- हर्यौ: लूटा (हरण किया)।
- नटवा: नट।
- स्वाँग बनाइ: सजकर स्वाँग रचना या अभिनय करना।
- जतन: चेष्टा करना या तत्पर होना।
- सबल: बलवती (प्रबल)।
प्रसंग : यह पद ‘सूरसागर सार’ के ‘विनय तथा भक्ति’ खंड का 12वाँ पद है। इसमें महाकवि सूरदास जी ने भगवान की माया को अत्यंत प्रबल बताते हुए वर्णन किया है कि सांसारिक माया के भ्रम के कारण मन स्थिर नहीं रह पाता, जिससे प्रभु का भजन करना अत्यंत कठिन हो जाता है।
व्याख्या : सूरदास जी कहते हैं कि हे भगवान! मुझसे आपका भजन किया ही नहीं जाता। मैं क्या करूँ, आपकी प्रबल माया मेरे मन को भ्रमित कर देती है। जब मैं सत्संग में आता हूँ तो मेरा मन कुछ स्थिर अवश्य होता है, किन्तु बाद में उसका फिर वही पहले वाला (चंचलता का) स्वभाव हो जाता है। यह स्थिति बिल्कुल वैसी ही है जैसे गजेन्द्र (हाथी) नदी में स्नान तो करता है, किन्तु बाहर आकर फिर से अपनी सूँड़ से अपने अंगों पर धूल डालने का अपना पुराना स्वभाव ग्रहण कर लेता है। मैंने साधु-सन्तों का वेश धारण कर-करके और स्वयं को सन्त कहला कर दूसरों का धन उसी प्रकार लूटा है, जिस प्रकार कोई नट केवल धन-प्राप्ति (लोभ) के लिए सजकर अनेक प्रकार के स्वाँग रचता है (अभिनय करता है)। मैं आपके भजन के लिए तत्पर तो होता हूँ (यत्न करता हूँ), किन्तु आपका भजन कर नहीं पाता; क्योंकि ऐसा करने की चेष्टा करते हुए मन में सांसारिक मोह के कुछ और ही भाव उत्पन्न हो जाते हैं। सूरदास जी अंत में कहते हैं कि प्रभु की यह माया बड़ी ही बलवती है, जो मुझे निरन्तर भुलावे में डाल देती है।
पद 14
हमारे निर्धन के धन राम।
चोर न लेत, घटत नहिं कबहुँ, आवत गाढ़ें काम।
जल नहिं बूड़त, अगिनि न दाहत, है ऐसी हरि नाम।
बैकुंठनाथ सकल सुख-दाता, सूरदास-सुख-धाम ॥
शब्दार्थ
- गाढ़ें: कठिन समय या विपत्ति में।
- बूड़त: डूबता है।
- दाहत: जलाता है।
- बैकुंठनाथ: बैकुंठधाम के स्वामी (विष्णु भगवान)।
- सुख-धाम: सुखों के भंडार।
प्रसंग : यह पद ‘सूरसागर सार’ के ‘विनय तथा भक्ति’ (नाम महिमा) खंड का 14वाँ पद है। इसमें महाकवि सूरदास जी ने भगवान के नाम (राम नाम) की अपार महिमा का वर्णन किया है और इसे ऐसा अविनाशी धन बताया है जो कठिन परिस्थितियों में भी भक्त का साथ नहीं छोड़ता।
व्याख्या : सूरदास जी कहते हैं कि हम निर्धनों के लिए राम (भगवान) का नाम ही हमारी सबसे बड़ी संपत्ति या धन है। यह एक ऐसा अनमोल धन है जिसे कोई चोर चुरा नहीं सकता, यह खर्च करने पर भी कभी घटता नहीं है, और विपत्ति के समय (गाढ़ें) यही सबसे अधिक काम आता है। भगवान का नाम ऐसा धन है जो जल में नहीं डूबता और न ही उसे आग जला सकती है। सूरदास जी अंत में कहते हैं कि बैकुंठधाम के स्वामी भगवान विष्णु सब प्रकार के सुखों को देने वाले हैं तथा वे ही सूरदास के सुखों के भंडार (धाम) हैं।
पद 16
जो सुख होत गुपालहिं गाएँ।
सो सुख होत न जप-तप कीन्हें, कोटिक तीरथ न्हाएँ।
दिएँ लेत नहिं चारि पदारथ, चरन-कमल चित लाएँ।
तीनि लोक तृन-सम करि लेखत, नंद-नंदन उर आएँ।
बंसीबट, बृन्दावन, जमुना, तजि बैकुंठ न जावैं।
सूरदास हरि कौ सुमिरन करि, बहुरि न भव-जल आवैं ॥
शब्दार्थ
- गुपालहिं गाएँ: भगवान श्रीकृष्ण (गोपाल) का गुणगान या भजन करने से।
- कोटिक: करोड़ों।
- न्हाएँ: स्नान करने से।
- चारि पदारथ: चार पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष)।
- चित लाएँ: मन या ध्यान लगाने वाले भक्त।
- तृन-सम: तिनके के समान (अत्यंत तुच्छ)।
- लेखत: मानते हैं या समझते हैं।
- नंद-नंदन: नंद के पुत्र (श्रीकृष्ण)।
- उर आएँ: हृदय में बस जाने पर।
- तजि: छोड़कर।
- बहुरि: फिर से / दोबारा।
- भव-जल: संसार रूपी सागर (जन्म-मरण का चक्र)।
प्रसंग : यह पद डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा संपादित ‘सूरसागर सार’ के ‘विनय तथा भक्ति’ खंड का 16वाँ पद है। इसमें महाकवि सूरदास ने भगवान श्रीकृष्ण के भजन, नाम-स्मरण और अनन्य भक्ति से प्राप्त होने वाले अलौकिक आनंद को सांसारिक जप, तप और तीर्थाटन से अत्यंत श्रेष्ठ बताया है।
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण (गोपाल) का गुणगान करने और उनका भजन करने से जिस परम सुख व आनंद की प्राप्ति होती है, वह असीम सुख कठोर जप-तप करने और करोड़ों तीर्थों में स्नान करने से भी प्राप्त नहीं होता। जो अनन्य भक्त अपने चित्त को प्रभु के चरण-कमलों में लगा लेते हैं, वे भगवान द्वारा स्वयं दिए जाने पर भी चारों पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) को स्वीकार नहीं करते, क्योंकि उनके लिए प्रभु की भक्ति ही सर्वोपरि है। जब नंदकुमार श्रीकृष्ण भक्त के हृदय में आकर बस जाते हैं, तो वह भक्त तीनों लोकों के विशाल वैभव और सुखों को भी एक तिनके के समान तुच्छ समझने लगता है। ब्रज के प्रति अपना अनन्य प्रेम दर्शाते हुए कवि कहते हैं कि प्रभु के सच्चे भक्त बंसीवट, पावन वृन्दावन और यमुना नदी के तट को छोड़कर भगवान के परमधाम ‘बैकुंठ’ भी जाना पसंद नहीं करते। सूरदास जी कहते हैं कि भगवान श्रीहरि का सच्चे मन से स्मरण करने वाले भक्त इस जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं और उन्हें पुनः इस संसार रूपी भव-सागर में नहीं आना पड़ता।
पद 18
अब कैं राखि लेहु भगवान।
हौं अनाथ बैठ्यो द्रुम-डरिया, पारधि साधे बान !
ताकें डर मैं भाज्यौ चाहत, ऊपर ढुक्यौ सचान।
दुहूँ भाँति दुख भयो आनि यह, कौन उबारै प्रान ?
सुमिरत ही अहि डस्यो पारधी, कर छूट्यो संधान।
सूरदास सर लग्यौं सचानहिं, जय जय कृपानिधान ॥
शब्दार्थ
- अब कैं: इस बार।
- राखि लेहु: बचा लीजिये (रक्षा कीजिए)।
- हौं: मैं।
- द्रुम-डरिया: वृक्ष की शाखा पर।
- पारधि (पारधी): बधिक या शिकारी।
- साधे बान: बाण का संधान किया है (निशाना लगाया है)।
- भाज्यौ: भागना।
- ढुक्यौ: ताक लगाए हुए है।
- सचान: बाज पक्षी।
- दुहूँ भाँति: दोनों ओर से।
- अहि: साँप।
- कर: हाथ।
- संधान (सर): संधान किया हुआ बाण।
प्रसंग : यह पद डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा संपादित ‘सूरसागर सार’ के ‘विनय तथा भक्ति’ खंड का 18वाँ पद है। इसमें महाकवि सूरदास जी ने एक घोर संकट में पड़े अनाथ पक्षी (जीवात्मा) के माध्यम से भगवान की कृपालुता और शरणागत की रक्षा करने वाले उनके स्वभाव का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है।
व्याख्या : महाकवि सूरदास जी कहते हैं कि घोर संकट में पड़ा हुआ एक पक्षी प्रार्थना करता है कि हे भगवान्! इस बार (इस संकट से) मुझे बचा लीजिये। मैं अनाथ हूँ और वृक्ष की शाखा पर बैठा हूँ, नीचे से बधिक (शिकारी) ने मुझे मारने के लिए मेरे ऊपर बाण का संधान किया है (निशाना लगाया है)। मैं उसके भय से उड़कर भागना चाहता हूँ, किन्तु ऊपर बाज पक्षी मेरे लिए ताक लगाए हुए है। इस प्रकार मेरे प्राणों पर दोनों ओर से भारी संकट आ पड़ा है, अब कौन मेरे प्राणों की रक्षा करे? पक्षी द्वारा इस प्रकार भगवान् का स्मरण करते ही एक चमत्कार हुआ और व्याध (शिकारी) को एक साँप ने डस लिया। साँप के डसते ही शिकारी के हाथ से चढ़ा हुआ बाण छूट गया और वह बाण सीधा जाकर ऊपर मँडरा रहे बाज को जा लगा। इस प्रकार भगवान की कृपा से पक्षी दोनों संकटों से बच गया। सूरदास जी अंत में कहते हैं कि ऐसे कृपालु भगवान् की जय हो, जय हो!
पद 20
तुम बिनु भूलोइ भूली डोलत।
लालच लागि कोटि देवन के, फिरत कपाटनि खोलत।
जब लगि सरबस दीजै उनकौं, तबहीं लगि यह प्रीति।
फल मांगत फिरि जात मुकर ह्वै, यह देवन की रीति।
एकनि कौं जिय-बलि दै पूजे, पूजत नैंकु न तूठे।
तब पहिचानि-सबनि कौं छाँड़े नख-सिख लौं सब झूठे।
कंचन मनि तजि काँचहिं सैंतत, या माया के लीन्हे।
चारि पदारथ हूँ को दाता, सु तौ विसर्जन कीन्हे।
तुम कृतज्ञ, करुनामय, केसव, अखिल लोक के नायक।
सूरदास हम दृढ़ करि पकरे, अब ये चरन सहायक ||
शब्दार्थ
- मुकर ह्वै: मुकर जाते हैं या देने को तैयार नहीं होते।
- जिय-बलि: जीवों की बलि।
- तूठे: सन्तुष्ट हुए।
- नख-सिख लौं: नख से शिख तक (पूरी तरह से)।
- कंचन मनि: स्वर्ण तथा मणि (भगवान के प्रतीक रूप में)।
- काँचहिं: काँच को (अन्य देवताओं के प्रतीक रूप में)।
- सैंतत: समेटता रहा।
- विसर्जन कीन्हे: परित्याग कर दिया।
- कृतज्ञ: भक्तों का उपकार मानने वाले (मनसा, वाचा, कर्मणा की हुई बातों को जानने वाले)।
- अखिल: सम्पूर्ण।
- दृढ़ करि पकरे: दृढ़तापूर्वक पकड़ा है।
प्रसंग : यह पद ‘सूरसागर सार’ के ‘विनय तथा भक्ति’ खंड का 20वाँ पद है। इसमें महाकवि सूरदास जी ने अन्य देवी-देवताओं की सकाम उपासना को निरर्थक (काँच के समान) बताते हुए एकमात्र भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति को ही श्रेष्ठ (स्वर्ण के समान) और मोक्षदायक बताया है।
व्याख्या : सूरदास जी कहते हैं कि हे प्रभु! प्राणी जब तक आपकी शरण में नहीं आता, तब तक वह निरंतर भ्रम में पड़ा हुआ भटकता रहता है और लोभ-वश करोड़ों देवताओं के दरवाजे खटखटाता फिरता है। जब तक उन देवताओं को अपना सर्वस्व देते रहो, तभी तक उनका प्रेम रहता है, किन्तु फल की याचना करने पर वे मुकर जाते हैं; यही देवताओं का नियम है कि वे केवल लेना जानते हैं, देना नहीं। कुछ देवताओं की जीवों की बलि देकर भी पूजा की गई, किन्तु पूजा करने से वे बिल्कुल सन्तुष्ट नहीं हुए। इस प्रकार सभी देवों को पहचान कर मैंने उन्हें छोड़ दिया क्योंकि वे नख से शिख तक झूठे हैं। सूरदास जी कहते हैं कि इस माया के वश में होकर मैं भगवान रूपी स्वर्ण तथा मणि का त्याग करके अन्य देवों रूपी काँच को ही समेटता रहा, और चारों पदार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के दाता भगवान का परित्याग कर दिया। हे केशव! आप ही कृपालु, सम्पूर्ण लोक के स्वामी और कृतज्ञ (भक्तों का उपकार मानने वाले) हैं। इसलिए हमने भगवान के चरणों को दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया है, और अब ये ही चरण हमारे एकमात्र सहारे हैं।
पद 21
आजु हौं एक-एक करि टरिहौं।
कै तुमहीं, कै हमहीं माधौ, अपने भरोसैं लरिहौं।
हौं तो पतित सात पीढ़िनि कौ, पतितै ह्वै निस्तरिहौं।
अब हौं उघरि नच्यौ चाहत हौं, बिरद बिन करिहौं।
कत अपनी परतीति नसावत, मैं पायौ हरि हीरा।
सूर पतित तबहीं उठिहै प्रभु, जब हँसि दैहो बीरा ॥
शब्दार्थ
- एक-एक करि टरिहौं: निपटारा करके ही मानूंगा (डटा रहूँगा)।
- लरिहौं: मुकाबला करूँगा।
- सात पीढ़िनि कौ: सात पीढ़ियों का (खानदानी)।
- निस्तरिहौं: उद्धार पाऊँगा (भव-सागर से पार होऊँगा)।
- उघरि नच्यौ चाहत हौं: निरावरण होकर (निर्लज्ज होकर) नाचना चाहता हूँ।
- बिरद: कीर्ति (पतित-पावन होने का यश)।
- परतीति: विश्वास।
- नसावत: नष्ट कर रहे हो।
- हरि हीरा: न टूटने वाला विश्वास रूपी हरि-हीरा।
- बीरा: बीड़ा (चुनौती या संकल्प स्वीकार करने का प्रतीक)।
प्रसंग : यह पद डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा संपादित ‘सूरसागर सार’ के ‘विनय तथा भक्ति’ खंड का 21वाँ पद है। इसमें महाकवि सूरदास जी ने भगवान श्रीकृष्ण से भक्त के अधिकार और हठ के साथ अपने उद्धार की बात कही है। भक्त भगवान की ‘पतित-पावन’ (पापियों का उद्धार करने वाले) कीर्ति को चुनौती देते हुए हठ करता है कि प्रभु को उसका उद्धार करना ही पड़ेगा।
व्याख्या : सूरदास जी कहते हैं कि हे प्रभु! आज मैं यह निपटारा करके ही मानूंगा कि हम दोनों में किसकी जीत होती है। हे माधव! मैं अपने पतित (पापी) होने के भरोसे आपसे मुकाबला करूँगा; या तो मैं ही पतित रह जाऊँगा, या तुम ही पतित-पावन रह जाओगे। मैं तो सात पीढ़ियों का खानदानी पतित हूँ और पतित रहकर ही आपके द्वारा इस भव-सागर से उद्धार पाऊँगा। अब मैं निरावरण (निर्लज्ज) होकर नाचना चाहता हूँ, जिससे मैं आपको आपके ‘बिरुद’ (पतित-पावनता की कीर्ति) से विहीन कर दूँगा। हे हरि! मेरा उद्धार न करके आप भक्त-समाज में व्याप्त अपना विश्वास क्यों नष्ट कर रहे हैं? मैंने तो आपकी पतित-पावनता में अटूट विश्वास रूपी ‘हरि हीरा’ पा लिया है। सूरदास जी अंत में कहते हैं कि हे प्रभु! यह पतित सूरदास आपके द्वार से तभी उठेगा जब आप हँसकर उसे बीड़ा देंगे (अर्थात् मेरी चुनौती स्वीकार करके मेरा उद्धार करेंगे)।
पद 22
प्रभु, हौं सब पतितनि कौ टीकौ।
और पतित सब दिवस चारि के, हौं तौ जनमत ही कौ।
बधिक अजामिल, गनिका, तारी और पूतना ही कौ।
मोहिं छांड़ि तुम और उधारे, मिटै सूल क्यौं जी कौ।
कोउ न समरथ अघ करिवे कौं, खैंचि कहत हौं लीकौ।
मरियत लाज सूर पतितनि मे, मोहूँ तैं को नीकौ ॥
शब्दार्थ
- टीकौ: सिरमौर या सबसे बड़ा।
- दिवस चारि के: थोड़े दिनों के।
- तारी: उद्धार किया (तारा)।
- सूल: शूल (कसक या पीड़ा)।
- जी कौ: हृदय की।
- अघ करिवे कौं: पाप करने में।
- खैंचि कहत हौं लीकौ: लकीर खींच कर (दावे के साथ) कह रहा हूँ।
- नीकौ: अच्छा या बढ़कर।
प्रसंग : यह पद डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा संपादित ‘सूरसागर सार’ के ‘विनय तथा भक्ति’ खंड का 22वाँ पद है। इसमें महाकवि सूरदास जी ने स्वयं को सबसे बड़ा पापी घोषित करते हुए, भगवान श्रीकृष्ण से अपने उद्धार की प्रार्थना की है। यह पद भक्त के उस अधिकार को दर्शाता है जिसमें वह अपने पापों को प्रभु की कृपा पाने की सबसे बड़ी योग्यता मानता है।
व्याख्या : सूरदास जी कहते हैं कि हे प्रभु! मैं सब पापियों में सबसे बड़ा पापी (सिरमौर) हूँ। संसार के अन्य पापी तो केवल चार दिन (थोड़े समय) के पापी हैं, किन्तु मैं तो जन्म से ही पापी हूँ। आपने तो बधिक (शिकारी), अजामिल, गणिका (वेश्या) और पूतना तक का उद्धार कर दिया। आपने मुझे छोड़कर अन्य सभी पापियों का उद्धार कर दिया, तो फिर मेरे हृदय की यह पीड़ा (कसक) कैसे मिटेगी? मैं दावे के साथ लकीर खींच कर कह रहा हूँ कि मेरे बराबर पाप करने की सामर्थ्य किसी अन्य में नहीं है। सूरदास जी कहते हैं कि मैं तो इस लज्जा के मारे मरा जा रहा हूँ कि क्या पापियों में भी कोई मुझसे बढ़कर है जो (पाप के आधार पर) मुझसे पहले आपके द्वारा तारे जाने का अधिकारी हो गया?
पद 23
अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल।
काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ विषय की माल।
महामोह के नूपुर बाजत, निंदा-सब्द-रसाल।
भ्रम-भोयौ मन भयौ पखावज, चलत असंगत चाल।
तृष्णा नाद करति घट भीतर, नाना विधि दै ताल।
माया को कटि फेंटा बाँध्यौ, लोभ-तिलक दियौ भाल।
कोटिक कला काछि दिखराई, जल-थल सुधि नहिं काल।
सूरदास की सबै अविद्या, दूरि करौ नँदलाल ॥
शब्दार्थ
- चोलना: जामा या वस्त्र।
- विषय की माल: विषय-वासनाओं की माला।
- रसाल: रसीला (आनंदप्रद)।
- भ्रम-भोयौ: भ्रम रूपी भोयन (आटा जो पखावज पर ध्वनि में ठनक उत्पन्न करने के लिए लगाया जाता है)।
- पखावज: मृदंग (एक वाद्य यंत्र)।
- असंगत चाल: बेमेल गति या कुमार्ग।
- घट भीतर: शरीर के अन्दर।
- कटि फेंटा: कमर में फेंट या कमरबंद।
- भाल: मस्तक या माथा।
- काछि दिखराई: स्वांग रचकर दिखाई या वेश बनाकर नाचा।
- अविद्या: अज्ञान या अविद्या।
प्रसंग : यह पद डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा संपादित ‘सूरसागर सार’ के ‘विनय तथा भक्ति’ खंड का 23वाँ पद है। इसमें महाकवि सूरदास जी ने सांसारिक माया-मोह और विषय-वासनाओं से ग्रस्त अपने जीवन को एक नर्तक (नृत्य करने वाले) के रूपक के माध्यम से प्रस्तुत किया है और भगवान श्रीकृष्ण से इस अज्ञानता (अविद्या) को दूर करने की प्रार्थना की है।
व्याख्या : सूरदास जी कहते हैं कि हे गोपाल! माया के वश में होकर मैं संसार में बहुत नाच चुका हूँ। मैंने नर्तक के साज के रूप में काम तथा क्रोध का जामा (वस्त्र) पहन लिया है और अपने कंठ (गले) में विषय-वासनाओं की माला पहन रखी है। मेरे पैरों में महामोह के नूपुर (घुँघरू) बजते हैं, जिनसे निन्दा का रसीला शब्द निकलता है (जो माया से भ्रमित होने के कारण मुझे आनंदप्रद जान पड़ते हैं)। भ्रम रूपी भोयन से लेपित मेरा मन रूपी पखावज (मृदंग) बन गया है, जिसकी ताल पर मैं असंगत (बेमेल) गति से नाचता रहा हूँ। मेरे शरीर के अन्दर तृष्णा रूपी नाद उत्पन्न होता है, जो अनेक प्रकार के ताल देता है। मैंने अपनी कमर में माया रूपी फेंटा (कमरबंद) बाँध लिया है तथा मस्तक पर लोभ का तिलक लगा रखा है। इस प्रकार माया के वशीभूत होकर मैंने जल तथा स्थल में स्मरणातीत काल से करोड़ों कलाएँ (स्वांग) करके दिखाई हैं। सूरदास जी अंत में प्रार्थना करते हैं कि हे नंदलाल (श्रीकृष्ण)! मेरी इस सम्पूर्ण अविद्या (अज्ञानता) को दूर कर दीजिए, ताकि मैं इस मायावी नृत्य से मुक्त हो सकूँ।
पद 24
हमारे प्रभु, औगुन चित न धरौ।
समदरसी है नाम तुम्हारौ, सोई पार करौ।
इक लोहा पूजा मैं राखत, इक घर बधिक परौ।
सो दुबिधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरौ।
एक नदिया इक नार कहावत, मैलौ नीर भरौ।
जब मिल गए तब एक बरन ह्वै, गङ्गा नाम परौ।
तन माया, ज्यौं ब्रह्म कहावत, सूर सु मिल विगरौ।
कै इनको निरधार कीजियै, कै प्रन जात टरौ ॥
शब्दार्थ
- औगुन: दोष या अवगुण।
- चित न धरौ: ध्यान न दें (मन में न रखें)।
- समदरसी: समान दृष्टि रखने वाला (भेदभाव न करने वाला)।
- बधिक: कसाई या पशु वध करने वाला।
- दुबिधा: भेद-भाव या अंतर।
- पारस: वह कल्पित पत्थर जिसके स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है।
- कंचन खरौ: शुद्ध सोना।
- नार: नाला।
- मैलौ नीर: गंदा पानी।
- एक बरन ह्वै: एकाकार होना (एक रंग या रूप का होना)।
- विगरौ: बिगड़ गया है।
- निरधार कीजियै: न्याय कीजिए (उद्धार कीजिए)।
- प्रन टरौ: प्रतिज्ञा (प्रण) टल जाना या टूट जाना।
प्रसंग : यह पद डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा संपादित ‘सूरसागर सार’ के ‘विनय तथा भक्ति’ खंड का 24वाँ पद है। इसमें महाकवि सूरदास जी ने भगवान की ‘समदर्शी’ (सभी को समान दृष्टि से देखने वाली) महिमा का उल्लेख करते हुए, उनसे अपने दोषों की उपेक्षा कर भवसागर से पार उतारने की प्रार्थना की है।
व्याख्या : सूरदास जी कहते हैं कि हे प्रभु, हमारे दोषों (अवगुणों) पर आप ध्यान न दें। आपका नाम समदर्शी है, इसलिए अपनी इस विशेषता का ध्यान रखते हुए हमें भवसागर से पार कर दीजिए। जिस प्रकार एक लोहा पूजा गृह में रखा जाता है तथा दूसरा कसाई (बधिक) के घर में पड़ा रहता है (जिससे वह पशु-वध करता है), किन्तु पारस पत्थर उनमें कोई भेद-भाव नहीं रखता और दोनों को स्पर्श करके समान रूप से शुद्ध सोना बना देता है। इसी प्रकार, अच्छे जल से भरी एक नदी तथा मैले जल से भरा एक नाला दोनों मिलकर गंगा में एकाकार हो जाते हैं तो उनका नाम अभिन्न रूप से गंगा पड़ जाता है। सूरदास जी कहते हैं कि शरीर माया तथा जीव ब्रह्म कहा जाता है, वह उसमें मिलकर बाहरी दोष से बिगड़ गया है। हे प्रभु, उपर्युक्त न्याय के अनुसार या तो इनका (शरीर और जीव का) न्याय कीजिए (और इन्हें शुद्ध कीजिए) या नहीं तो आपका समदर्शिता तथा पतित पावनता का प्रण टला जाता है।
पद 25
मेरो मन अनत कहां सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज को पच्छी, फिर जहाज पर आवै।
कमल-नैन कों छांड़ि महातम, और देव कों ध्यावै।
परम गंग कों छांड़ि पियासो, दुरमति कूप खनावै।
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्यों करील-फल भावै।
सूरदास-प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै ॥
शब्दार्थ
- अनत: अन्यत्र (दूसरी जगह)।
- पच्छी: पक्षी।
- कमल-नैन: कमल के समान नेत्रों वाले (भगवान श्रीकृष्ण)।
- महातम: माहात्म्य (महिमा)।
- गंग: गंगा नदी।
- दुरमति: दुर्बुद्धि (मूर्ख व्यक्ति)।
- कूप खनावै: कुआँ खुदवाए।
- मधुकर: भौंरा।
- अंबुज-रस: कमल का रस (मकरंद)।
- करील-फल: करील (एक कँटीली झाड़ी) का कसैला या कड़वा फल।
- कामधेनु: स्वर्ग की वह गाय जो सब इच्छाएँ पूरी करती है।
- तजि: छोड़कर (परित्याग करके)।
- छेरी: बकरी।
प्रसंग : यह पद डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा संपादित ‘सूरसागर सार’ के ‘विनय तथा भक्ति’ (भगवदाश्रय) खंड का 25वाँ पद है। इसमें महाकवि सूरदास जी ने भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपनी अनन्य (एकनिष्ठ) भक्ति का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है और बताया है कि उनके आराध्य को छोड़कर मन कहीं और सुख प्राप्त नहीं कर सकता।
व्याख्या : सूरदास जी कहते हैं कि मेरा मन भगवान श्रीकृष्ण को छोड़कर अन्यत्र कहीं भी सुख प्राप्त नहीं कर सकता। जैसे बीच समुद्र में फँसे हुए जहाज पर से उड़ा हुआ पक्षी अन्यत्र कोई आश्रय न प्राप्त कर सकने के कारण उड़कर पुनः उसी जहाज पर वापस आ जाता है, वैसे ही कमल-नेत्र भगवान् श्रीकृष्ण का माहात्म्य (महिमा) छोड़कर अन्य देवताओं का ध्यान कौन करे? कोई दुर्बुद्धि (मूर्ख) व्यक्ति ही होगा जो परम पवित्र गंगा का परित्याग करके अपनी प्यास बुझाने के लिए कुआँ खोदने जाएगा। जिस भौरे ने कमल के मकरंद (रस) का स्वाद पा लिया है, उसे करील के कसैले (कड़वे) फल क्यों अच्छे लगेंगे? सूरदास जी अंत में कहते हैं कि सर्वसुखदाता प्रभु रूपी कामधेनु का परित्याग करके तुच्छ बकरी को कौन दुहने जाएगा; अर्थात् श्रीकृष्ण को छोड़कर अन्य किसी देव की उपासना करना व्यर्थ है।
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