ब्राह्मण
पद 1
ब्रम्हेंहि म जानन्तहि भेउ। एवइ पढिअउ ए च्चउवेउ।।
मट्ठी (पाणि कुस लई पठन्तं। घरहिं बइसी अगुग्गि हुणन्तं।।
शब्दार्थ :
- ब्रम्हेंहि: ब्रह्म (परमात्मा या मूल सत्य) को।
- म जानन्तहि: न जानते हुए / बिना जाने।
- भेउ: भेद या रहस्य को।
- एवइ: इस प्रकार / व्यर्थ ही।
- पढिअउ: पढ़ा है।
- च्चउवेउ: चतुर्वेदी (चारों वेदों को जानने वाला)।
- मट्ठी (पाणि): हाथ में मिट्टी या जल लेकर।
- कुस लई: कुश (पवित्र घास) लेकर।
- पठन्तं: पाठ करते हैं।
- घरहिं बइसी: घर में ही बैठकर।
- अगुग्गि हुणन्तं: अग्नि में हवन करते हैं।
व्याख्या: प्रस्तुत पद हिंदी के प्रथम कवि सरहपा द्वारा रचित ‘दोहकोष’ के ‘षट् दर्शन-खंडन’ प्रसंग से लिया गया है। इसमें कवि बाह्य आडंबरों, पाखंडों और केवल ऊपरी ज्ञान का कड़ा विरोध करते हुए कहते हैं कि जो मनुष्य ब्रह्म के वास्तविक और आंतरिक भेद को नहीं जानता, वह केवल व्यर्थ ही चारों वेदों का अध्ययन करके खुद को ‘चतुर्वेदी’ कहलवाता है। ये पाखंडी ब्राह्मण हाथ में कुश और जल लेकर तथा घर में ही बैठकर पाखंडपूर्ण तरीके से अग्नि में हवन करते हैं, जबकि इनके मन में ईश्वर या सत्य का कोई सच्चा ज्ञान नहीं होता। कवि का आशय यह है कि बाहरी अनुष्ठान, मंत्रोच्चार और हवन तब तक अर्थहीन हैं जब तक साधक अपने भीतर के ब्रह्म और सहज स्वभाव को नहीं पहचानता।
पद 2
कज्जे विरहिअ हुअवह होमें। अक्खिअ डहाविअ कडुअँै घूमें।।
एकदण्डि त्रिदण्डी भववै(र) बेसें। विणुुआ होइअइ हंस उएसें।।
शब्दार्थ :
- कज्जे विरहिअ: प्रयोजन या सरोकार से रहित / बिना किसी सच्चे उद्देश्य के।
- हुअवह होमें: अग्नि में हवन करते हैं।
- अक्खिअ डहाविअ: आँखों को जला लेते हैं।
- कडुअँै घूमें: कड़वे या तीखे धुएँ से।
- एकदण्डि त्रिदण्डी: एक दंडा या त्रिदण्ड धारण करने वाले संन्यासी।
- भववै(र) बेसें: भगवा वेश धारण करते हैं।
- विणुुआ होइअइ: विष्णु या ज्ञानी होने का ढोंग करते हैं।
- हंस उएसें: हंस रूपी उपदेश देने वाले (यानी ज्ञानी होने का दिखावा करने वाले)।
व्याख्या: प्रस्तुत पद हिंदी के प्रथम कवि सरहपा द्वारा रचित ‘दोहकोष’ के ‘षट् दर्शन-खंडन’ प्रसंग से उद्धृत है। इसमें कवि ब्राह्मणों और ढोंगी साधुओं द्वारा किए जाने वाले बाहरी पाखंडों पर तीखा प्रहार करते हुए कहते हैं कि ये लोग बिना किसी वास्तविक प्रयोजन या आध्यात्मिक उद्देश्य के केवल दिखावे के लिए अग्नि में हवन करते हैं, जिससे हवन के कड़वे और तीखे धुएँ से उनकी अपनी आँखें ही जलती रहती हैं। ये लोग समाज में एकदंडी, त्रिदंडी और भगवा वस्त्रों का वेश धारण कर अपने आपको बड़ा ज्ञानी या संत होने का ढोंग करते हैं, जबकि इनका यह सारा आचरण केवल बाहरी दिखावा और आडंबर मात्र होता है। कवि का तात्पर्य यह है कि ऊपरी वेशभूषा और अनुष्ठान से मुक्ति नहीं मिलती, जब तक मन शुद्ध और सहज न हो।
चित्त
दोहा संख्या 24
बज्जइ कम्मेण जणो कम्मविमुक्केण होइ मणमुक्को।
मणमोक्खेण अणुअरं पाविज्जइ परम (णि)व्वाणं।।
शब्दार्थ :
- बज्जइ: बँधा हुआ है / बंधता है।
- कम्मेण: कर्म से।
- जणो: मनुष्य।
- कम्मविमुक्केण: कर्मों से मुक्त होने पर।
- होइ: होता है।
- मणमुक्को: मन से मुक्त / मानसिक बंधनों से मुक्त।
- मणमोक्खेण: मन की मुक्ति से / चित्त के विकारों से मुक्त होने पर।
- अणुअरं: अनंतर / उसके बाद।
- पाविज्जइ: प्राप्त होता है।
- परम (णि)व्वाणं: परम निर्वाण (मोक्ष/परम शांति)।
व्याख्या: प्रस्तुत पद आचार्य राहुल सांकृत्यायन द्वारा संपादित ‘दोहकोष’ के अंतर्गत ‘चित्त’ प्रकरण से लिया गया है। इसमें सरहपा ने कर्म और मन की मुक्ति के रहस्य को स्पष्ट करते हुए कहा है कि यह मनुष्य अपने कर्मों के बंधनों में जकड़ा हुआ है, और जब वह कर्मों के बंधनों से मुक्त होता है, तभी उसका मन भी सभी प्रकार की आसक्तियों और बंधनों से मुक्त हो जाता है। जब चित्त या मन पूरी तरह से विकारों से मुक्त हो जाता है, तो उसके पश्चात साधक को परम निर्वाण (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।
दोहा संख्या 25
अक्खर बाडा सजलू जगु, नाहि णिरक्खर कोइ।
ताव से’ अक्खर घोलिअइ, जाव णिरक्खर होइ।।
शब्दार्थ :
- अक्खर: अक्षर / वर्ण / शब्द / साक्षरता या नाम-रूप की दुनिया।
- बाडा: घिरा हुआ / व्याप्त।
- सजलू: सहित / भरा हुआ।
- जगु: संसार।
- नाहि: नहीं है।
- णिरक्खर: निरक्षर / अक्षर से परे (निराकार, निर्विकल्प, सहज स्थिति)।
- ताव: तब तक।
- से’: उसे / उस अक्षर को।
- घोलिअइ: घोला जाता है / उच्चारण किया जाता है / अभ्यास किया जाता है।
- जाव: जब तक।
- होइ: होता है (या निरक्षर अवस्था प्राप्त न हो जाए)।
व्याख्या: प्रस्तुत पद ‘दोहकोष’ के ‘चित्त’ प्रकरण से उद्धृत है। इस दोहे में सरहपा ने अक्षर (शब्द/वर्ण/नाम-रूप) और निरक्षर (अक्षरतीत/परम सत्य) की दार्शनिक स्थिति को समझाया है। कवि कहते हैं कि यह संपूर्ण संसार अक्षरों (शब्दों, वेदों, शास्त्रों और नाम-रूपों) से घिरा हुआ है, और इस दुनिया में ऐसा कोई भी नहीं है जो अक्षरों से परे हो। तात्पर्य यह है कि जब तक साधक ‘अक्षर’ (शब्द-जाल या बाह्य साधना) में उलझा रहता है, तब तक उसे साधना करनी पड़ती है, और अक्षरों का अभ्यास या मंथन तभी तक किया जाना चाहिए जब तक कि वह ‘निरक्षर’ यानी अक्षरतीत सहज अवस्था (परमात्मा या शून्य स्वरूप) को प्राप्त न कर ले।
सहज, महासुख
पद संख्या 43
मन्त ण तन्त ण घेअ ण धारण। सब्बवि रे बढ़ वि(ब्)भम-कारण।।
असमल चीअ म ज्ञाणें खरडह। सुह अच्छन्ते म अप्पण४ झगडह।।
शब्दार्थ :
- मन्त ण तन्त ण: न कोई मंत्र है और न तंत्र।
- घेअ ण धारण: न ही ध्यान है और न धारणा।
- सब्बवि रे: यह सब ही।
- बढ़ वि(ब्)भम-कारण: बड़े भ्रम या संभ्रम (भ्रम में डालने वाले) के कारण हैं।
- असमल: निर्मल / मैलरहित या सहज।
- चीअ: चित्त।
- म ज्ञाणें खरडह: ज्ञान के द्वारा मत मथिए या खरोंचिए।
- सुह अच्छन्ते: सुख के विद्यमान रहते / सहज आनंद के रहते।
- म अप्पण४ झगडह: अपने मन या आत्मा से मत झगड़िए।
व्याख्या: प्रस्तुत पद आचार्य राहुल सांकृत्यायन द्वारा संपादित ‘दोहकोष’ के अंतर्गत ‘सहज, महासुख’ प्रकरण से लिया गया है। इस पद में सरहपा ने बाहरी मंत्र, तंत्र, ध्यान और धारणा जैसी रूढ़ियों का खंडन करते हुए सहज साधना पर बल दिया है। कवि कहते हैं कि न तो कोई विशेष मंत्र है, न तंत्र, और न ही ध्यान-धारणा की आवश्यकता है, क्योंकि ये सभी बाहरी उपाय मनुष्य को केवल भ्रम में डालने वाले कारण मात्र हैं। इसलिए अपने निर्मल चित्त को बाहरी ज्ञान के पाखंडों से मत उलझाइए और जब सहज सुख भीतर ही विद्यमान है, तो व्यर्थ ही अपने मन या आत्मा के साथ संघर्ष या झगड़ा मत कीजिए।
पद संख्या 44
गुरु-वअग-अमिअ-रस, धर्वाहं ण पिविअउ जहिँ।
बहु सात्थात्थ-मरुत्थलिहिं, तिसिअ मरिब्बो त्तेहिं।।
शब्दार्थ :
- गुरु-वअग-अमिअ-रस: गुरु के वचनों का अमृत रूपी रस।
- धर्वाहं ण पिविअउ जहिँ: जिस मनुष्य ने दौड़कर या प्रेमपूर्वक नहीं पिया।
- बहु सात्थात्थ-मरुत्थलिहिं: अनेक प्रकार के शास्त्रार्थ रूपी मरुस्थल (रेगिस्तान) में।
- तिसिअ मरिब्बो त्तेहिं: वह प्यासा ही मर जाता है।
व्याख्या: प्रस्तुत पद आचार्य राहुल सांकृत्यायन द्वारा संपादित ‘दोहकोष’ के अंतर्गत ‘सहज, महासुख’ प्रकरण से उद्धृत है। इस पद में सिद्ध सरहपा ने गुरु के उपदेश और कोरे शास्त्रार्थ के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा है कि जो साधक गुरु के वचनों रूपी अमृत रस का पान नहीं करता, वह केवल कोरे शास्त्रार्थ और ज्ञान-चर्चा रूपी मरुस्थल में भटककर प्यासा ही मर जाता है। अर्थात, बाहरी और शुष्क शास्त्र-अध्ययन या बौद्धिक बहस से मुक्ति नहीं मिलती, उसके लिए गुरु के सहज वचनों का आंतरिक अनुभव आवश्यक है।
परमपद
पद संख्या 49
मूल पाठ:
जहि मण पवण ण संचरइ, रवि-ससि णाहिं पवेस।
तहिं बढ चित्त विसाम करु, सरहें कहिअ उएस।।
शब्दार्थ :
- जहि: जहाँ।
- मण पवण ण संचरइ: मन और प्राण (श्वास-प्रश्वास) का संचरण या आवागमन नहीं होता।
- रवि-ससि णाहिं पवेस: सूर्य और चंद्रमा (इडा-पिंगला नाड़ी या द्वैत भाव) का प्रवेश नहीं होता।
- तहिं बढ: वहाँ हे वढ़ (हे मन/चित्त)।
- चित्त विसाम करु: अपने चित्त को विश्राम कराओ / शांत करो।
- सरहें कहिअ उएस: सरहपा का ऐसा ही उपदेश है।
व्याख्या: प्रस्तुत पद आचार्य राहुल सांकृत्यायन द्वारा संपादित ‘दोहकोष’ के अंतर्गत ‘परमपद’ प्रकरण से उद्धृत है। इस पद में सिद्ध सरहपा ने उस परम सहज और शून्य अवस्था का वर्णन किया है जहाँ मन, प्राण (पवन) तथा सूर्य-चंद्रमा (द्वैत भाव) की कोई पहुँच नहीं होती। कवि अज्ञानी या संसारी मन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे चित्त! तू उस अद्वैत, परम शांत और निराकार स्थिति में जाकर विश्राम कर, यही सरहपा का मुख्य उपदेश है।
देह ही तीर्थ
पद संख्या 96
एथु से सरसाइ सोवणाह, एथु से गङ्गासाअरु।
वाराणसि पआग एथु, से चान्द-दिवाअरु।।
शब्दार्थ:
- एथु से: यहीं पर है।
- सरसाइ: सौराष्ट्र।
- सोवणाह: सोमनाथ।
- गङ्गासाअरु: गंगा-सागर।
- वाराणसि: वाराणसी (काशी)।
- पआग: प्रयाग।
- चान्द-दिवाअरु: चंद्रमा और सूर्य।
व्याख्या: प्रस्तुत पद आचार्य राहुल सांकृत्यायन द्वारा संपादित ‘दोहकोष’ के अंतर्गत ‘देह ही तीर्थ’ प्रकरण से उद्धृत है। इस पद में सिद्ध सरहपा ने बाह्य तीर्थाटन का खंडन करते हुए कहा है कि साधक के शरीर के भीतर ही समस्त तीर्थ और पवित्र स्थल विद्यमान हैं। यहीं सौराष्ट्र और सोमनाथ हैं, यहीं गंगा-सागर, वाराणसी और प्रयाग जैसे पवित्र तीर्थ हैं, तथा यहीं शरीर के भीतर चंद्रमा और सूर्य रूपी नाड़ियाँ (इडा-पिंगला) भीि स्थित हैं। अतः बाहरी तीर्थों में भटकने के बजाय अपने शरीर और मन में ही ईश्वर को खोजना चाहिए।
पद संख्या 97
खेत्त पिट्ठ उअप्पिट्ठ, एथु मह भमिअ समिट्डउ।
देहासरिस तित्थ, मह सुणउ ण दिठ्ठउ।।
शब्दार्थ :
- खेत्त: क्षेत्र (तीर्थक्षेत्र)।
- पिट्ठ: पीठ या स्थान।
- उअप्पिट्ठ: उपपीठ।
- भमिअ समिट्डउ: घूम-घूम कर थक गया।
- देहासरिस: देह के समान।
- तित्थ: तीर्थ।
- सुणउ ण दिठ्ठउ: न तो कभी सुना और न ही देखा।
व्याख्या: प्रस्तुत पद ‘दोहकोष’ के ‘देह ही तीर्थ’ प्रकरण से लिया गया है। इसमें कवि कहते हैं कि मैं देश-विदेश के विभिन्न तीर्थ क्षेत्रों, पीठों और उपपीठों में घूम-घूम कर थक गया हूँ, अर्थात् मैंने सभी बाहरी तीर्थों की यात्रा करके देख ली है। परंतु इस संपूर्ण ब्रह्मांड में इस काया (शरीर) के समान पवित्र और विलक्षण अन्य कोई दूसरा तीर्थ न तो मैंने कभी कहीं सुना है और न ही अपनी आँखों से देखा है। वास्तविक तीर्थ साधक का अपना शरीर ही है।
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