गोरखबानी : संपादक – पीतांबर दत्त बढ़थ्वाल ( निर्धारित पदों की व्याख्या DU MA HINDI )

सबदी

पद संख्या 1

​बसती न सुन्न्य सुन्न्य न बसती अगम अगोचर ऐसा।

गगन-सिषर महिं बालक बोलै ताका नाँव धरहुगे कैसै/कैसा ।।

​शब्दार्थ :

  • ​बसती: बस्ती / भाव / दृश्यमान संसार।
  • ​सुन्न्य: शून्य / अभाव / निराकार स्थिति।
  • ​अगम अगोचर: जो इंद्रियों और मन की पहुँच से परे हो।
  • ​गगन-सिषर: आकाश-मंडल या गगन-शिखर (सहस्रार चक्र)।
  • ​बालक: निष्पाप बालक रूपी चैतन्य या परमात्मा।
  • ​नाँव धरहुगे कैसै: उसका कोई निश्चित नाम किस प्रकार रखा जा सकता है।

​व्याख्या: प्रस्तुत पद पीतांबर दत्त बर्थवाल द्वारा संकलित एवं संपादित ‘गोरख-बानी’ के अंतर्गत ‘सबदी’ प्रकरण से उद्धृत है। इस पद में गुरु गोरखनाथ ने उस परम तत्त्व (परमात्मा) के अलौकिक और निराकार स्वरूप का वर्णन किया है जो वाणी और बुद्धि की सीमा से परे है। गोरखनाथ कहते हैं कि वह परम सत्य न तो केवल ‘बस्ती’ यानी संसार रूप में सीमित है और न ही केवल ‘शून्य’ है, क्योंकि वह अगम और अगोचर है। वह तो गगन-मंडल या सहस्रार चक्र रूपी शिखर पर एक निष्पाप बालक के समान विराजमान होकर बोल रहा है, किंतु वह सभी नाम, रूप और उपाधियों से पूरी तरह परे है, इसलिए यह सोचना होगा कि उसका कोई विशेष नाम किस प्रकार रखा जा सकता है। 

पद संख्या 4

​वेद कतेब न षाणी वांग्री। सब ढंकी तलि आंगी /आंग्री।।

गगनि सिषर महिं सबद् प्रकास्या। तहाँ बुझै आलष बिनांगी / बिनांग्री ।।

​शब्दार्थ :

  • ​वेद कतेब: वेद और कुरान/किताबें।
  • ​न षाणी वांग्री: वाणी की पहुँच से परे या वर्णन से बाहर।
  • ​सब ढंकी तलि आंग्री: वह समस्त संसार और ज्ञान उस परब्रह्म की उंगली के नीचे ढंका हुआ (नियंत्रित) है।
  • ​गगनि सिषर महिं: गगन-मंडल या सहस्रार शिखर पर।
  • ​सबद् प्रकास्या: दिव्य शब्द का प्रकाश होता है।
  • ​तहाँ बुझै आलष बिनांगी / बिनांग्री : उस अलग और निराकार प्रभु को कोई विरला ही समझ पाता है।

​व्याख्या: प्रस्तुत पद पीतांबर दत्त बर्थवाल द्वारा संकलित एवं संपादित ‘गोरख-बानी’ के अंतर्गत ‘सबदी’ प्रकरण से उद्धृत है। इस पद में गुरु गोरखनाथ बताते हैं कि परम सत्य वेदों, किताबों (कतेब) और सामान्य वाणी की सीमा से पूरी तरह परे है, क्योंकि यह संपूर्ण सृष्टि उसी महाशक्ति के अधीन है। जब योगी साधना करते हुए गगन-शिखर (सहस्रार चक्र) पर पहुँचता है, तब वहाँ दिव्य शब्द का प्रकाश प्रकट होता है। उस अलख और निराकार ब्रह्म के इस रहस्य को कोई गुरुमुख और ज्ञानी साधक ही भली-भांति समझ सकता है। 

पद संख्या 5

अलष बिनांगीं दोइ दीपक रचिलै तीन भवन इक जोती।

तास बिचारत त्रिभवन सूझै चुणिल्यो माणिक मोती।।

शब्दार्थ :

  • अलष बिनांगीं: अलक्ष्य और निराकार ब्रह्म।
  • दोइ दीपक रचिलै : दो दीपकों (व्यक्त और अव्यक्त रूप) की रचना की है।
  • तीन भवन इक जोती: तीनों लोकों में उसी एक ही परमात्मा की ज्योति व्याप्त है।
  • तास बिचारत: उस ज्योति या तत्त्व का विचार करने से।
  • त्रिभवन सूझै : तीनों लोक सूने या शून्य रूप में प्रतीत होने लगते हैं।
  • चुणिल्यो माणिक मोती: हंस रूपी जीव उस ज्ञान रूपी माणिक-मोती को चुगता है।

व्याख्या: प्रस्तुत पद पीतांबर दत्त बर्थवाल द्वारा संपादित ‘गोरख-बानी’ के अंतर्गत ‘सबदी’ प्रकरण से उद्धृत है। इस पद में गोरखनाथ कहते हैं कि उस अलक्ष्य और निराकार परब्रह्म ने दो दीपकों (सविकल्प और निर्विकल्प रूप) की रचना की है, और संपूर्ण तीनों लोकों में उसी एक परमात्मा की ज्योति जगमगा रही है। उस परम तत्त्व का विचार करने पर तीनों लोक शून्य रूप प्रतीत होने लगते हैं और साधक रूपी हंस उस दिव्य ज्ञान रूपी माणिक-मोतियों को ग्रहण करता है।

पद संख्या 6

मूल पाठ:

वेदे न सास्त्रे कतेवे न कुरांणे पुस्तके न बंध्या जाई।

ते पद जाणां बिरला जोगी और दुनी सब धंधै लाई।।

शब्दार्थ :

  • वेदे न सास्त्रे: वेदों और शास्त्रों में।
  • कतेवे न कुरांणे : कुरान या अन्य धर्म-किताबों में।
  • पुस्तके न बंध्या जाई: पुस्तकों के द्वारा वह सीमाबद्ध नहीं किया जा सकता।
  • ते पद जाणां बिरला जोगी : उस परम पद को कोई विरला योगी ही जानता है।
  • और दुनी सब धंधै लाई: बाकी सारी दुनिया सांसारिक धंधों और माया में लगी हुई है।

व्याख्या: प्रस्तुत पद ‘गोरख-बानी’ के ‘सबदी’ प्रकरण से लिया गया है। इस पद में गुरु गोरखनाथ स्पष्ट करते हैं कि परम सत्य को वेदों, शास्त्रों, कुरान या किसी भी पुस्तक के माध्यम से पूरी तरह बांधा नहीं जा सकता, क्योंकि वह किताबों की सीमा से परे है। उस अगाध पद या सत्य को कोई बिरला और ज्ञानी योगी ही जान पाता है, जबकि सामान्य दुनिया माया और सांसारिक झंझटों में ही उलटी रहती है।

पद संख्या 7

हसिबा षेलिबा रहिबा रंग। काम क्रोध न करिबा संग।

हसिवा षेलिबा गाइबा गीत। दिढ करि राषि आपणां चीत।।

शब्दार्थ :

  • हसिबा षेलिबा रहिबा रंग: सदा प्रसन्नचित्त और सहज आनंद में रहना चाहिए।
  • काम क्रोध न करिबा संग: मन में काम और क्रोध को कभी स्थान नहीं देना चाहिए।
  • हसिवा षेलिबा गाइबा गीत: जीवन में आनंद और मस्ती के साथ रहना चाहिए।
  • दिढ करि राषि आपणां चीत: किंतु अपने चित्त को पूरी तरह दृढ़ और संयमित रखना चाहिए।

व्याख्या: प्रस्तुत पद ‘गोरख-बानी’ के ‘सबदी’ प्रकरण से उद्धृत है। इस पद में गोरखनाथ योगियों के लिए व्यावहारिक आचरण का उपदेश देते हुए कहते हैं कि साधक को जीवन में सदा हंसते-खेलते और सहज आनंद में रहना चाहिए, परंतु अपने मन से काम और क्रोध का त्याग कर देना चाहिए। हँसना, खेलना और साधना के गीत गाना सब ठीक है, बशर्ते साधक अपने चित्त को दृढ़ और विचलित न होने दे।

पद संख्या 8

हसिबा षेलिबा धरिबा ध्यांन। अहर्निसि कथिबा ब्रह्म गियांन।

हसै षेलै न करै मन भंग। ते निहचल सदा नाथ कै संग।।

शब्दार्थ :

  • हसिबा षेलिबा: हँसना और खेलना (आनंदित रहना)।
  • धरिबा ध्यांन: ध्यान धरना या एकाग्र होना।
  • अहर्निसि: अहोरात्र / दिन-रात।
  • कथिबा ब्रह्म गियांन: ब्रह्म ज्ञान की चर्चा या कथन करना।
  • मन भंग: मन का विचलित होना।
  • निहचल: निश्चल या स्थिर।

व्याख्या: प्रस्तुत पद ‘गोरख-बानी’ के ‘सबदी’ प्रकरण से उद्धृत है। इस पद में गोरखनाथ कहते हैं कि योगियों को हँसना-खेलना चाहिए और साथ ही ध्यान भी धरना चाहिए। उन्हें दिन-रात ब्रह्म ज्ञान की चर्चा करनी चाहिए। जो लोग हँसते-खेलते हुए भी अपने मन को विचलित नहीं होने देते (संयम रखते हैं), वे हमेशा निश्चल होकर परम नाथ (परमात्मा) के साथ रमण करते हैं।

पद संख्या 9

महंमद महंमद न करि काजी महंमद का बिषम बिचारं।

महंमद हाथि करद जे होती लोहै घड़ी न सारं।।

शब्दार्थ :

  • काजी: काजी (इस्लामी धर्मगुरु या न्यायाधीश)।
  • बिषम बिचारं: गंभीर और कठिन विचार।
  • करद: छुरी या कटार।
  • लोहै घड़ी न सारं: वह लोहे या इस्पात की गढ़ी हुई नहीं थी।

व्याख्या: प्रस्तुत पद ‘गोरख-बानी’ के ‘सबदी’ प्रकरण से लिया गया है। इसमें गुरु गोरखनाथ काजी को संबोधित करते हुए कहते हैं कि केवल ‘मोहम्मद-मोहम्मद’ मत रटो, क्योंकि मोहम्मद के विचार बहुत गंभीर और गहरे हैं। उनके हाथ में जो छुरी (करद) थी, वह साधारण लोहे या इस्पात की बनी हुई भौतिक छुरी नहीं थी जिससे जीवों की हत्या की जाती है, बल्कि वह ज्ञान और शब्द की छुरी थी।

पद संख्या 10

सबदैँ मारी सबदैँ जिलाई ऐसा महंमद पीरं।

ताकै भरमि न भूलौ काजी सो बल नहीं सरीरं।।

शब्दार्थ :

  • सबदैँ मारी सबदैँ जिलाई: शब्द से ही मारना और शब्द से ही जिलाना (आध्यात्मिक पुनर्जन्म देना)।
  • महंमद पीरं: मोहम्मद पैगंबर।
  • भरमि न भूलौ : भ्रम में मत भूलो।
  • सो बल नहीं सरीरं: वह शरीर का या बाह्य बल नहीं है।

व्याख्या: प्रस्तुत पद ‘गोरख-बानी’ के ‘सबदी’ प्रकरण से उद्धृत है। गोरखनाथ कहते हैं कि सच्चे पीर मोहम्मद ऐसे थे जिन्होंने अपने उपदेश या शब्द से शिष्यों की भौतिकता और वासनाओं को समाप्त किया (शब्द से मारा) और उन्हें आध्यात्मिक जीवन प्रदान किया (शब्द से जिलाया)। हे काजी! तुम इस आन्तरिक रहस्य को समझो और उनके संबंध में किसी भ्रम में मत भूलो, क्योंकि यह कोई शारीरिक बल या बाहरी हिंसा नहीं है।

पद संख्या 11

नाथ कहंतां सब जग नाथ्या गोरष कहतां गोई।

कलमा का गुर महंमद होता पह्लै मुवा सोई।।

शब्दार्थ :

  • नाथ कहंतां: ‘नाथ’ कहते-कहते।
  • सब जग नाथ्या : सारा संसार थक गया या उलझ गया।
  • गोरष कहतां गोई: ‘गोरख’ कहते-कहते बात गुप्त या रहस्यमय हो गई।
  • कलमा का गुर: कलमा पढ़ाने वाले गुरु।
  • महंमद : मुहम्मद पैगंबर।
  • पह्लै मुवा सोई: जो पहले ही (अहंकार और भौतिकता से) मर चुका था (अर्थात जिसने अपनी वासनाओं का त्याग कर दिया था)।

व्याख्या: प्रस्तुत पद पीतांबर दत्त बर्थवाल द्वारा संकलित एवं संपादित ‘गोरख-बानी’ के अंतर्गत ‘सबदी’ प्रकरण से उद्धृत है। इस पद में गुरु गोरखनाथ नाम और उपाधियों के मोह का खंडन करते हुए कहते हैं कि केवल मुंह से ‘नाथ’ या ‘गोरख’ कहते-कहते सारा संसार थक गया है, किंतु वास्तविक रहस्य छिपा ही रह जाता है। कलमा का उपदेश देने वाले और इस्लाम के गुरु स्वयं मुहम्मद पैगंबर थे, जिन्होंने पहले ही अपनी सांसारिक वासनाओं और अहंकार का पूरी तरह त्याग कर दिया था (जो भीतर से मृत हो चुके थे)। इसका आशय यह है कि बाहरी नामों के जाप से कुछ नहीं होता, जब तक साधक आंतरिक रूप से अपनी आसक्तियों को समाप्त नहीं करता।

पद संख्या 16

अह निसि मन लै उनमन रहै, गम की छांड़ि अगम की कहै।

छाड़ै आसा रहै निरास, कहै ब्रह्या हूँ ताका दास।।

शब्दार्थ :

  • अह निसि: अहर्निस / दिन-रात।
  • उनमन रहै: उन्मनी अवस्था में रहना (मन को सांसारिक विकारों से ऊपर उठाना)।
  • गम की छांड़ि: ग्म (संसार या दृश्यमान जगत) की बातों को छोड़कर।
  • अगम की कहै: अगम (परम तत्त्व या आध्यात्मिक क्षेत्र) की चर्चा करना।
  • छाड़ै आसा: सभी प्रकार की सांसारिक आशाओं का त्याग करना।
  • निरास: आशारहित / अनासक्त।
  • ब्रह्या हूँ ताका दास: ब्रह्मा भी ऐसे योगी का दास होने की बात कहते हैं।

व्याख्या: प्रस्तुत पद पीतांबर दत्त बर्थवाल द्वारा संकलित एवं संपादित ‘गोरख-बानी’ के अंतर्गत ‘सबदी’ प्रकरण से उद्धृत है। इस पद में गुरु गोरखनाथ सच्चे योगी के लक्षणों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि जो साधक दिन-रात अपने मन को उन्मनी अवस्था मेंलीन रखता है, वह सांसारिक प्रपंचों को छोड़कर केवल अगम और परम तत्त्व की बातें करता है। जो समस्त प्रकार की कामनाओं और आशाओं को छोड़कर पूरी तरह अनासक्त (निरास) रहता है, उसकी महिमा इतनी अधिक होती है कि स्वयं ब्रह्माजी भी उसके दास बन जाते हैं।

पद संख्या 19

धन जोवन की करै न आस, चित्त न राषै कामनि पास।

नाद बिंद जाकै घटि जरै, ताकी सेवा पारबती करै।।

शब्दार्थ :

  • धन जोवन की करै न आस: धन और यौवन की कोई लालसा या आशा न रखना।
  • कामनि पास: स्त्री के पास या मोह में चित्त को न रखना।
  • नाद बिंद जाकै घटि जरै: जिसके शरीर में नाद और बिंदु (प्राण और साधना की ऊर्ध्वगामी ऊर्जा) परिपक्व होकर स्थित रहते हैं।
  • पारबती करै: माता पार्वती भी जिसकी सेवा करती हैं।

व्याख्या: प्रस्तुत पद ‘गोरख-बानी’ के ‘सबदी’ प्रकरण से लिया गया है। इस पद में गोरखनाथ हठयोग की उच्च साधना और संयमी जीवन का महत्त्व बताते हैं। वे कहते हैं कि जो योगी धन और जवानी के मोह की कोई इच्छा नहीं रखता और स्त्री के प्रति आसक्ति से अपने चित्त को दूर रखता है, जिसकी साधना में प्राण और ऊर्जा (नाद और बिंदु) शरीर के भीतर ही साधित और स्थिर हो जाते हैं, उस सिद्ध योगी की महिमा इतनी महान होती है कि स्वयं आदिशक्ति माता पार्वती भी उसकी सेवा करती हैं।

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