कक्षा 12 की हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘वितान भाग 2’ में संकलित ”सिल्वर वैडिंग” ( मनोहर श्याम जोशी ) का सारांश अभ्यास के प्रश्नों सहित |
सिल्वर वैडिंग के लेखक मनोहर श्याम जोशी हैं। इस कहानी के जरिये उन्होंने दो पीढ़ियों के बीच के अंतराल के अंतर्द्वंद को दर्शाया हैं। यानि यह कहानी दो पीढ़ियों के विचारों व जीने के तौर तरीकों के अंतर को स्पष्ट करती है।
सिल्वर वैडिंग ( मनोहर श्याम जोशी ) का मूल पाठ यहाँ से download करें 👇
सिल्वर वैडिंग ( सारांश )
कहानी के मुख्य पात्र यशोधर बाबू पुराने ख्यालात के व्यक्ति हैं जो अपने परंपरागत मूल्यों , आदर्शों और अपने संस्कारों को जीवित रखना चाहते है मगर उनके बच्चे नए जमाने के हिसाब से जीवन जीने में विश्वास करते है।
उनकी पत्नी भी समय के साथ साथ अपने आप को बदल कर आधुनिक तौर तरीके अपना चुकी हैं। लेकिन यशोधर बाबू अपने आप को बदलने को राजी नही है और यही बात उनके व परिजनों के बीच टकराव की वजह बन जाती हैं।
यशोधर पंत एक सरकारी दफ्तर में सेक्शन ऑफिसर के पद पर तैनात थे और दिल्ली के गोल मार्केट में रहते थे। वो पुरानी मान्यताओं व विचारधारा को मानने वाले सीधे सरल व्यक्ति थे । मगर उनके परिवार के सभी सदस्य आधुनिक जीवन शैली अपना चुके थे।
यहां तक कि उनकी पत्नी जो कभी पूर्ण रूप से उन्हीं की तरह संस्कारी थी। अब उसने भी बच्चों की मर्जी के अनुसार आधुनिक तौर तरीके अपना लिए थे और मॉडर्न बन चुकी थी । इसी कारण यशोधर बाबू का अपने परिवार वालों के साथ मतभेद चलता रहता था।
यशोधर बाबू अपनी मॉडर्न पत्नी का “शायनल बुढ़िया” , “चटाई का लहंगा” और “बूढ़ी मुँह मुंहासे लोग करे तमाशे” कहकर मजाक बनाते थे। यशोधर बाबू के तीन बेटे और एक बेटी थी। सबसे बड़ा बेटा भूषण पंद्रह सौ रुपए प्रति माह के वेतन पर एक विज्ञापन कंपनी में काम करता था।
दूसरा बेटा आई.ए.स की तैयारी कर रहा था और तीसरा बेटा स्कॉलरशिप लेकर अमेरिका जा चुका था। बेटी डाक्टरी की पढ़ाई के लिए अमेरिका जाना चाहती थी। इसीलिए वह विवाह के लिए तैयार नहीं थी।
कहानी की शुरुआत करते हुए लेखक कहते हैं कि यशोधर बाबू अपने दफ्तर में बैठे हुए अपनी घड़ी को देखते हैं जो उस वक्त ठीक शाम के 5 बजकर 25 मिनट बजा रही थी। अपनी घड़ी को 5 मिनट सुस्त बताते हुए वो जैसे ही दफ्तर से घर जाने के लिए उठ खड़े हुए तो दफ्तर के एक कर्मचारी चड्ढा ने उनकी घड़ी पर व्यंग्य कसते हुए उनसे डिजिटल घड़ी लेने की बात की।
उसकी बात का जबाब देते हुए यशोधर बाबू उसे बताते हैं कि यह घड़ी उन्हें शादी में उपहार स्वरूप मिली थी । इसीलिए उन्हें यह बेहद प्रिय हैं। बातों – बातों में उनके दफ्तरवालों को यह पता लग जाता हैं कि उनकी शादी 6 फरवरी 1947 को हुई थी और आज उनकी सिल्वर वेडिंग है।
वो यशोधर बाबू से पार्टी मांगने लगते हैं। यशोधरा बाबू 30 रूपये उन्हें पार्टी के लिए देते तो हैं मगर खुद उस चाय पार्टी में शामिल होने के बजाय अपने घर को निकल पड़ते हैं।
अचानक यशोधरा बाबू को किशन दा की याद आती है जो ऑफिस में चाय- पानी पीने , गप्पें लड़ाने को समय की बर्बादी मानते थे। वो किशन दा की कही हुई सभी बातों का अनुसरण किया करते थे। उनको ही अपना मार्गदर्शक व आदर्श मानते थे।
जब यशोधरा बाबू मैट्रिक पास कर दिल्ली आये थे तो किशन दा ने ही उन्हें अपने घर में शरण दी थी। सरकारी नौकरी करने के लिए उस समय उनकी उम्र कम थी। इसीलिए उन्होंने उन्हें कुछ समय के लिए अपने घर में रसोईया बना दिया था। और बाद में उन्हें अपने ही ऑफिस में नौकरी दिलवा दी।
यशोधर बाबू के जीवन व चरित्र निर्माण में किशन दा का बहुत बड़ा योगदान रहा। उन्होंने किशन दा से ही ऑफिस में रहने व कार्य करने के तौर तरीके सीखे थे ।
किशन दा आजीवन अविवाहित रहे। उनका जीवन बहुत ही सरल व सादगी भरा था। वो धार्मिक व परोपकारी व्यक्ति थे। वो अपने आदर्शों पर चलते थे व समाज सेवा का कार्य करते थे। वो सभी के मार्गदर्शक थे।
वो पहाड़ से नौकरी के लिए आने वाले लोगों के रहने – खाने की अपने घर में ही व्यवस्था करते थे। उनकी नौकरी ढूंढने में भी मदद करते थे। वो अपनी सभ्यता व संस्कृति से प्रेम करते थे। यशोधर बाबू ने उनसे यह सब सीखा और उनका अपने जीवन में अनुसरण किया।
यशोधर बाबू की एक निश्चित दिनचर्या थी। वो पैदल ही घर से ऑफिस जाते और शाम को पाँच बजे ऑफिस के बाद सबसे पहले बिडला मंदिर जाते थे। फिर पार्क में बैठकर प्रवचन सुनते थे। उसके बाद सब्जी मंडी जाकर सब्जी खरीद कर पैदल ही घर पहुंचते थे। इस तरह पाँच बजे ऑफिस से निकल कर आठ बजे के बाद ही वो अपने घर पहुंचते थे।
हालाँकि वो अब ऑफिस पैदल ही जाने लगे थे लेकिन पहले साइकिल से जाते थे। उनके बच्चे अब बड़े हो चुके थे जिन्हें उनका साइकिल से ऑफिस जाना पसंद नहीं था। स्कूटर उन्हें पसंद नहीं था और कार वो खरीद नहीं सकते थे। इसीलिए उन्होंने पैदल ही जाना – आना शुरू कर दिया था।
आज भी वो रोज की तरह दफ्तर से पहले सीधे बिड़ला मंदिर की तरफ जा रहे थे कि रास्ते में अचानक उनकी नजर उस क्वार्टर पर पड़ी जिसमें कभी किशन दा रहा करते थे। उस क्वार्टर को तोड़कर वहाँ तीन मंजिला मकान बना दिया था। उनके बच्चे भी चाहते थे कि वो भी अब अपने पद के अनुसार बड़ा मकान ले लें लेकिन उनको वही जगह पसंद थी। इसीलिए वहां से कहीं और नहीं जाना चाहते थे।
यशोधर बाबू व उनके बच्चों के बीच अक्सर विचारों का टकराव चलता रहता था। ऐसे में कभी -कभी वो सोचते थे कि काश किशन दा की तरह वो भी अविवाहित रहते और समाज सेवा में अपना जीवन लगा देते हैं।
लेकिन फिर उन्हें उनके रिटायरमेंट के बाद का समय याद आता है। जब किशन दा को किसी ने सहारा नहीं दिया और वो गांव चले गये जहाँ उनकी एक साल के बाद मृत्यु हो गई। इस प्रकार यशोधर बाबू के मन के भीतर विचारों का अंतर्द्वंद चलता रहा था।
यशोधर बाबू का मंदिर जाना , धार्मिक कार्यों में भाग लेना , प्रवचन सुनना आदि उनके परिवार वालों को पसंद नहीं था। उनके बच्चे अक्सर उनसे कहते थे कि अभी वो इतने बूढ़े नहीं हुए कि मंदिर जाकर प्रवचन सुनें।
यशोधर बाबू मंदिर जाने के बाद प्रवचन सुनने तो बैठ गये लेकिन आज उनका प्रवचन में बिल्कुल भी मन नहीं लग रहा था। उनके दिमाग में कई तरह के ख्याल आ और जा रहे थे। इसीलिए वो प्रवचन से उठकर सब्जी मंडी की तरफ निकल पड़े । तभी उन्हें याद आया कि उनके बेटे बाजार से सामान लाने के लिए नौकर रखने को कहते हैं मगर खुद जाना पसंद नहीं करते हैं।
उनका बड़ा बेटा तो उन्हें अपना वेतन तक नहीं देता है। अपने पैसों व अपनी मर्जी से घर का सामान खुद ही खरीद कर लाता है और फिर सबको उस सामान का रौब दिखाता है। सब्जी मंडी से सब्जी लेकर जब यशोधर बाबू घर पहुंचे तो देखा कि उनका बेटा उनके घर के बाहर अपने बॉस को विदा कर रहा था और घर से अन्य लोग भी विदा ले रहे थे। घर में पार्टी चल रही थी।
पहले तो उन्हें कुछ समझ नहीं आया। बाद में भूषण ने उन्हें शिकायत करते हुए बताया कि उनके घर में उनकी “सिल्वर वेडिंग” की पार्टी चल रही है और वो ही इतनी देर से आ रहे हैं। यह सब सुनकर यशोधर बाबू को बहुत दुख हुआ क्योंकि किसी ने भी उन्हें पार्टी के आयोजन के बारे में कुछ नहीं बताया था ।
वैसे भी उन्हें पार्टी वगैर बिल्कुल पसंद नहीं थी मगर बच्चों के बहुत आग्रह करने पर उन्होंने केक तो काटा लेकिन केक में अंडा होने व संध्या पूजा करने का बहाना बनाकर खाया नहीं। और वो वहाँ से उठकर संध्या पूजा करने चले गए। और तब तक पूजा स्थल पर ही बैठे रहे जबतक सारे मेहमान घर से विदा नही हुए।
मेहमानों के चले जाने के बाद पत्नी के बुलाने पर जब वो बैठक में आये तो उनके बड़े बेटे ने उन्हें ऊनी ड्रेसिंग गाउन गिफ्ट किया और कहा कि वो उसे ही पहन कर कल से सुबह दूध लेने जाया करें। लेकिन यशोधर बाबू यह सोच रहे थे कि काश !! उनका बेटा उन्हें ड्रेसिंग गाउन देने के बजाय उनसे कहता कि कल से वह उनकी जगह दूध लेकर आया करेगा।
अभ्यास के प्रश्न ( सिल्वर वैडिंग )
प्रश्न 1 – यशोधर बाबू की पत्नी समय के साथ ढल सकने में सफल होती है, लेकिन यशोधर बाबू असफल रहते हैं। ऐसा क्यों? चर्चा कीजिए।
उत्तर – यशोधर बाबू के माता–पिता का देहांत उनके बचपन में ही हो गया था। वे बचपन से ही जिम्मेदारियों के बोझ से लद गए थे। उनका पालन–पोषण उनकी विधवा बुआ ने किया था। अपनी मैट्रिक होने के बाद जब वे दिल्ली आए तब किशन दा जैसे कुंआरे के पास रहे। इस तरह बचपन से युवा अवस्था तक वे हमेशा पुरानी विचारधारा के लोगों के साथ रहे, पले और बढ़े। अत: उनके मन पर पुरानी परंपराओं का ऐसा रंग चढ़ा की वे उन परम्पराओं को छोड़ नहीं सके। सबसे अधिक प्रभाव उन पर किशन दा के सिद्धांतों का हुआ। इन सब कारणों के कारण यशोधर बाबू समय के साथ बदलने में असफल रहते हैं। परन्तु इसके विपरीत दूसरी तरफ, उनकी पत्नी भले ही पुराने संस्कारों की थीं। और वे एक संयुक्त परिवार में आई थीं जहाँ उन्हें कभी सुखद अनुभव नहीं हुआ। उनकी इच्छाएँ अतृप्त रहीं। उन्हें जबरदस्ती उन रीति रिवाजों को अपनाना पड़ता था जो किसी बुजुर्ग महिला के लिए थे। वे हमेशा मातृ सुलभ प्रेम के कारण अपनी संतानों का पक्ष लेती हैं और अपनी बेटी के कहने पर समय के साथ बदलने का निर्णय लेती हैं। कहीं न कहीं उनके मन में पहले से ही पुरानी परम्पराओं के प्रति रोष था जिस कारण वह समय के साथ ढल सकने में सफल होती है।
प्रश्न 2 – पाठ में ‘जो हुआ होगा’ वाक्य की आप कितनी अर्थ छवियाँ खोज सकते/सकती हैं?
उत्तर – ‘जो हुआ होगा’ वाक्यांश का प्रयोग किशनदा की मृत्यु के संदर्भ में होता है। यशोधर ने किशनदा के बरादरी में किसी से उनकी मृत्यु का कारण पूछा तो उसने जवाब दिया– जो हुआ होगा अर्थात् क्या हुआ, पता नहीं। इस वाक्य की अनेक छवियाँ बनती हैं :
▪️पहला अर्थ खुद कहानीकार ने बताया है कि पता नहीं, क्या हुआ।
▪️दूसरा अर्थ यह है कि किशनदा हमेशा अकेले रहे। उन्होंने विवाह नहीं किया। जीवन के अंतिम क्षणों में भी किसी ने उन्हें सहारा नहीं दिया, जबकि उन्होंने हमेशा से सभी को आश्रय दिया था। इस कारण उनके मन में जीने की इच्छा समाप्त हो गई होगी। क्योंकि कहानीकार ने भी जिक्र किया है कि अंतिम क्षणों में वे बुझते ही चले जा रहे थे।
▪️तीसरा अर्थ समाज की मानसिकता है। जो किशनदा जैसे व्यक्ति का समाज के लिए कोई महत्त्व नहीं समझती। क्योंकि वे हमेशा सामाजिक नियमों के विरोध में रहे। इस कारण समाज ने भी उन्हें दरकिनार कर दिया।
प्रश्न 3 – ‘समहाउ इंप्रापर’ वाक्यांश का प्रयोग यशोधर बाबू लगभग हर वाक्य के प्रारंभ में तकिया कलाम की तरह करते हैं? इस वाक्यांश का उनके व्यक्तित्व और कहानी के कथ्य से क्या संबंध बनता है?
उत्तर – यशोधर बाबू ‘समहाउ इंप्रॉपर’ वाक्यांश का प्रयोग तकिया कलाम की तरह करते हैं। उन्हें जब भी कुछ अनुचित लगता या उन्हें किसी में कोई कमियाँ नजरआती तो वे इस वाक्यांश का प्रयोग करते थे। पाठ में अनेक स्थानों पर ‘समहाउ इंप्रॉपर’ वाक्यांश का प्रयोग हुआ है। जैसे –
▪️जब दफ़्तर में उनकी सिल्वर वैडिंग का वाक्य हुआ।
▪️जब उन्हें अपने साधारण पुत्र को असाधारण वेतन मिलने पर शंका हुई।
▪️ जब उनके अपनों से उन्हें परायेपन का व्यवहार मिलने लगा।
▪️जब उनके बड़े पुत्र द्वारा वेतन उनके हाथ में नहीं दिया गया |
इन सभी जगहों पर इस वाक्यांश के प्रयोग से यशोधर बाबू के व्यक्तित्व के बारे में पता चलता है कि वे जमाने के हिसाब से अप्रासंगिक हो गए हैं। यह पीढ़ियों के अंतराल को दर्शाता है। वे अपनी पीढ़ी में ही अटक कर रह गए हैं और अपने परिवार को भी उसी तरह रखने का प्रयास करते हैं।
प्रश्न 4 – यशोधर बाबू की कहानी को दिशा देने में किशनदा की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। आपके जीवन को दिशा देने में किसका महत्त्वपूर्ण योगदान है और कैसे?
उत्तर – जिस तरह यशोधर बाबू की कहानी को दिशा देने में किशनदा की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। उसी तरह हमारे जीवन में भी कई महत्वपूर्ण व्यक्ति होते हैं जिनसे हम अपने जीवन की सही राह पहचानने योग्य बनते हैं। मेरे जीवन को दिशा देने में सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान मेरे माता–पिता व् गुरुओं का रहा है। उन्होंने हमेशा मुझे मेरे कठिन समय में सही राह दिखाई है। माता–पिता के बाद गुरु ही ऐसे व्यक्ति होते हैं जो सभी के जीवन में मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं। अपने माता–पिता व् गुरुओं की बात को जो व्यक्ति हमेशा याद रखते हैं वे जीवन के किसी भी मोड़ पर कठिनाइयों का सामना करने के लिए तैयार रहते हैं।
प्रश्न 5 – वर्तमान समय में परिवार की संरचना, स्वरूप से जुड़े आपके अनुभव इस कहानी से कहाँ तक सामंजस्य बिठा पाते हैं?
उत्तर – वर्तमान समय में परिवार की संरचना, स्वरूप इस कहानी में दर्शाए गए परिवार के स्वरूप व संरचना आज भी लगभग हर परिवार में पाई जाती है। संयुक्त परिवार आज के समय में लगभग समाप्त हो गए है। पुरानी पीढ़ी की बातों, रीति रिवाज या सलाह, नयी पीढ़ी को कुछ ख़ास महत्वपूर्ण नहीं लगती। जहाँ एक और पुराने बुजुर्ग परंपराओं के निर्वाह में विश्वास रखते हैं, वहीँ दूसरी ओर युवा पीढ़ी हर समय कुछ नया करने में विश्वास करती है। युवा पीढ़ी पुराने रीति रिवाजों को बंधन के सिवा कुछ नहीं समझती। यशोधर बाबू की तरह आज के कई मध्यवर्गीय पिता विवश हैं। वह अपने बच्चों के किसी विषय पर अपना निर्णय नहीं दे सकता। आज के आधुनिक युग में जहाँ यदि पिता बच्चों को कुछ रीति–रिवाज़ समझाना भी चाहे तो माताएँ बच्चों के समर्थन में खड़ी नजर आती हैं। आज बच्चे अपने दोस्तों के साथ पार्टी करने में अधिक खुश रहते हैं। वे आधुनिक जीवन शैली को ही सब कुछ मानते हैं। लड़कियाँ फ़ैशन के अनुसार वस्त्र पहनती हैं। कहानी में यशोधर बाबू की लड़की उसी का प्रतिनिधि है। अत: यह कहना गलत नहीं होगा कि यह कहानी आज लगभग हर परिवार से सामंजस्य बिठाती है।
प्रश्न 6 – निम्नलिखित में से किसे आप कहानी की मूल संवेदना कहेंगे/कहेंगी और क्यों?
(क) हाशिए पर धकेले जाते मानवीय मूल्य
(ख) पीढ़ी अंतराल
(ग) पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव।
उत्तर – हमारी समझ में पीढ़ी अंतराल ही ‘सिल्वर वैडिंग’ शीर्षक कहानी की मूल संवेदना है। क्योंकि यशोधर बाबू और उसके बच्चों में एक पीढ़ी का अंतराल है। जहाँ यशोधर बाबू पुरानी परम्पराओं में जकड़े हुए हैं वहीँ उनके बच्चे उन परम्पराओं को कोई महत्त्व नहीं देते। इसी कारण यशोधर बाबू अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पाते हैं। यशोधर बाबू के विचार पूरी तरह से पुराने हैं जो नयी पीढ़ी के साथ कहीं भी तालमेल नहीं रखते। पीढ़ी का अंतराल और उनके विचारों का अंतराल यशोधर बाबू और उनके परिवार के सदस्यों में वैचारिक अलगाव पैदा कर देता है।
प्रश्न 7 – अपने घर और विद्यालय के आस–पास हो रहे उन बदलावों के बारे में लिखें जो सुविधाजनक और आधुनिक होते हुए भी बुजुर्गों को अच्छे नहीं लगते। अच्छा न लगने के क्या कारण होंगे?
उत्तर – हमारे घर व विद्यालय के आस–पास निम्नलिखित बदलाव हो रहे हैं जो बुजुर्गों को अच्छे नहीं लगते –
▪️युवाओं द्वारा मोबाइल का अत्यधिक प्रयोग करना।
▪️युवाओं द्वारा व्यायाम को कोई महत्त्व न देना व् देरी से सोना व् देरी से उठना।
▪️युवाओं द्वारा पैदल न चलकर तीव्र गति से चलाते हुए मोटर–साइकिल या स्कूटर का प्रयोग करना।
▪️लड़कियों द्वारा आधुनिक कपड़ों को अधिक महत्त्व देना।
▪️लड़के–लड़कियों का पार्क में घूमना व् सिनेमा देखना।
बुजुर्ग पीढ़ी को ये सभी परिवर्तन अच्छे नहीं लगते। उन्हें लगता है कि युवा पीढ़ी हमारी संस्कृति के खिलाफ़ हैं। कुछ सुविधाओं को वे स्वास्थ्य की दृष्टि से खराब मानते हैं तो कुछ उनकी परंपरा को खत्म कर रहे हैं। उनका मानना है कि महिलाओं व लड़कियों को अपनी सभ्यता व संस्कृति के अनुसार आचरण करना चाहिए।
प्रश्न 8 – यशोधर बाबू के बारे में आपकी क्या धारणा बनती है? दिए गए तीन कथनों में से आप जिसके समर्थन में हैं, अपने अनुभवों और सोच के आधार पर उसके लिए तर्क दीजिए
(क) यशोधर बाबू के विचार पूरी तरह से पुराने हैं और वे सहानुभूति के पात्र नहीं है।
(ख) यशोधर बाबू में एक तरह का द्वंद्व है जिसके कारण नया उन्हें कभी–कभी खींचता तो है पर पुराना छोड़ता नहीं। इसलिए उन्हें सहानुभूति के साथ देखने की जरूरत है।
(ग) यशोधर बाबू एक आदर्श व्यक्तित्व हैं और नई पीढ़ी द्वारा उनके विचारों को अपनाना ही उचित है।
उत्तर – यशोधर बाबू के बारे में हमारी यही धारणा बनती है कि यशोधर बाबू में एक तरह का द्वंद्व है जिसके कारण नया उन्हें कभी–कभी खींचता है पर पुराना छोड़ता नहीं, इसलिए उन्हें सहानुभूति के साथ देखने की जरूरत है। एक ओर यह सही है कि वे सिद्धांतवादी हैं परन्तु वे व्यावहारिक पक्ष भी अच्छी तरह समझते है। परन्तु सिद्धांत और व्यवहार के इस द्वंद्व में यशोधर बाबू कुछ भी निर्णय लेने में असमर्थ हैं। अपने बच्चों की तरक्की देखकर उन्हें कई बार तो पत्नी और बच्चों का व्यवहार अच्छा लगता है परन्तु दूसरे ही क्षण वे अपने सिद्धांत की ओर खींचे चले जाते हैं। इस द्वंद्व के साथ जीने के लिए वे मजबूर हैं क्योंकि चाह कर भी वे अपने आपको आधुनिकता में नहीं ढाल पा रहे हैं। उनका दफ्तरी जीवन जहाँ सिद्धांतवादी है वहीं पारिवारिक जीवन व्यवहारवादी। दोनों में सामंजस्य बिठा पाना उनके लिए लगभग असंभव है। इसलिए उन्हें सहानुभूति के साथ देखने की जरूरत है।
यह भी देखें :
हिंदी ( कक्षा 12) ( आरोह व वितान ) ( पूरा सिलेबस एक साथ )
आरोह भाग 2 ( काव्य खंड )
▪️आत्मपरिचय ( Aatm Parichay ) : हरिवंश राय बच्चन
▪️दिन जल्दी-जल्दी ढलता है ( हरिवंश राय बच्चन )
▪️कविता के बहाने ( कुंवर नारायण )
▪️बात सीधी थी पर ( कुंवर नारायण )
▪️कैमरे में बंद अपाहिज ( रघुवीर सहाय )
▪️सहर्ष स्वीकारा है ( गजानन माधव मुक्तिबोध )
▪️उषा ( Usha ) शमशेर बहादुर सिंह
▪️बादल राग : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ( Badal Raag : Suryakant Tripathi Nirala )
▪️बादल राग ( Badal Raag ) ( सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ): व्याख्या व प्रतिपाद्य
▪️लक्ष्मण मूर्छा और राम का विलाप ( Lakshman Murcha Aur Ram Ka Vilap ) : तुलसीदास
▪️रुबाइयाँ ( Rubaiyan ) : फिराक गोरखपुरी
▪️छोटा मेरा खेत ( उमाशंकर जोशी )
▪️बगुलों के पंख ( Bagulon Ke Pankh ) : उमाशंकर जोशी
आरोह भाग 2 ( गद्य खंड )
▪️बाजार दर्शन : जैनेंद्र कुमार ( Bajar Darshan : Jainendra Kumar )
▪️काले मेघा पानी दे : धर्मवीर भारती ( Kale Megha Pani De : Dharmveer Bharti )
▪️पहलवान की ढोलक : फणीश्वरनाथ रेणु
▪️चार्ली चैप्लिन यानी हम सब : विष्णु खरे
▪️नमक : रज़िया सज्जाद ज़हीर ( Namak : Razia Sajjad Zaheer )
▪️शिरीष के फूल : हजारी प्रसाद द्विवेदी ( Shirish Ke Phool : Hajari Prasad Dwivedi )
▪️बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ( Baba Saheb Bheemrav Ambedkar )
वितान भाग 2 ( कक्षा 12)
▪️सिल्वर वैडिंग ( मनोहर श्याम जोशी )/ Silver Wedding ( Manohar Shayam Joshi )
▪️अतीत में दबे पाँव ( ओम थानवी )