पद 1
संवरौं आदि एक करतारू । जेइं जिउ दीन्ह कीन्ह संसारू ।1।
कीन्हेसि प्रथम जोति परगासू । कीन्हेसि तेहिं पिरीति कबिलासू ।2।
कीन्हेसि अगिनि पवन जल खेहा । कीन्हेसि बहुतइ रंग उरेहा ।3।
कीन्हेसि धरती सरग पतारू । कीन्हेसि बरन बरन अवतारू ।4।
कीन्हेसि सात दीप ब्रांडा । कीन्हेसि भुवन चौदहउ खंडा ।5।
कीन्हेसि दिन दिनअर ससि राती । कीन्हेसि नखत तराइन पांती ।6।
कीन्हेसि धूप सीउ औ छाहां । कीन्हेसि मेघ बीजु तेहि माहां ।7।
कीन्ह सबइ अस जाकर दोसरहि छाज न काहु। पहिलेहिं तेहिक नाउं लइ कथा कहौं अवगाहु ॥ (1)
व्याख्या: सृष्टि के रचयिता का स्मरण करते हुए कविवर जायसी कहते हैं कि मैं रचना के आरम्भ में उस एक आदि-कर्ता का स्मरण करता हूँ जिसने हमें प्राण प्रदान किए हैं और इस सृष्टि की रचना की है। उस आदि-कर्ता ने सर्वप्रथम ज्योति का प्रकाश किया था और प्रेम के वशीभूत होकर कैलाश/स्वर्ग की रचना की थी। उसी आदि सृष्टा ने अग्नि, पवन, जल और पृथ्वी तत्वों की रचना की तथा इन तत्वों के संयोग से अनेकानेक प्रकार की भौतिक वस्तुओं का निर्माण किया। उसी ने पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल की रचना की है। उसने भांति-भांति की वस्तुएं निर्मित कीं। उसने दिवस, सूर्य, चन्द्रमा, रात्रि तथा नक्षत्रों और तारागणों की पंक्तियों की रचना की है। उसी ने धूप, शीतलता, छाया, बादल और मेघों में बिजली की रचना की है। उसने सात द्वीपों, ब्रह्माण्ड, चौदह भुवनों और नव खण्डों की रचना की है। जिस कर्ता ने इस प्रकार की विविधतामयी सृष्टि की रचना की है, उस आदि-कर्ता का स्मरण करके ही मैं अपनी कथा-रचना में प्रवृत्त हो रहा हूँ।
पद 2
कीन्हेसि हेवं समुंद्र अपारा । कीन्हेसि मेरु खिखिंद पहारा ।1।
कीन्हेसि नदी नार औं झरना । कीन्हेसि मगर मंछ बहु बरना ।2।
कीन्हेसि सीप मोंति बहु भरे । कीन्हेसि बहुतइ नग निरमरे ।3।
कीन्हेसि बनखंड औ जरि मूरी । कीन्हेसि तरिवर तार खजूरी ।4।
कीन्हेसि साउज आरन रहहीं । कीन्हेसि पंखि उड़हि जहं चहहीं ।5।
कीन्हेसि बरन सेत और स्यामा । कीन्हेसि भूख नींद बिसरामा ।6।
कीन्हेसि पान फूल बहु भोगू । कीन्हेसि बहु ओषद बहु रोगू ।7।
निमिख न लाग कर ओहि सबइ कीन्ह पल एक। गगन अंतरिख राखा बाज खंभ बिनु टेक ॥ (2)
व्याख्या: उस करतार ने सात असीम सागरों, सुमेरु और किष्किन्धा नामक पर्वत श्रेणियों की रचना की। उसने नदी, नाले और झरनों तथा मगरमच्छों व विविध मछलियों को बनाया। उसने सीपियां बनाईं और उनके अंदर मोतियों को भरा तथा निर्मल रत्नों की रचना की। उसने वन-समूहों, जड़ी-बूटियों, ताड़, खजूर और वृक्षों को बनाया। जंगलों में रहने वाले जंगली पशुओं और स्वेच्छा से उड़ने वाले पक्षियों की रचना भी उसी ने की। काले और सफेद रंग, भूख, नींद, विश्राम, पान, फूल, भोग की सामग्री, औषधियां तथा रोग सब उसी के बनाए हुए हैं। इस प्रकार की विविधतापूर्ण सृष्टि बनाने में उसे एक क्षण का समय भी नहीं लगा, उसने पल भर में यह सृष्टि रच दी। उसी के प्रताप से आकाश बिना किसी खम्भे या सहारे के अंतरिक्ष में टिका हुआ है।
पद 3
कीन्हेसि अगर कस्तुरी बेना । कीन्हेसि भीवंसेन औ चेना ।1।
कीन्हेसि नाग मुखहि विष बसा । कीन्हेसि मंत्र हरइ जेहिं डसा ।2।
कीन्हेसि अमिअ जिअन जेहि पाएं । कीन्हेसि विष जो मीचु तेहि खाएं ।3।
कीन्हेसि ऊखि मीठि रस भरी । कीन्हेसि करुड़ बेलि बहु फरी ।4।
कीन्हेसि मधु लावइ लइ माखी । कीन्हेसि भंवर पतंग औ पांखी ।5।
कीन्हेसि लोवा उंदुर चांटी । कीन्हेसि बहुत रहहिं खनि मांटी ।6।
कीन्हेसि राकस भूत परेता । कीन्हेसि भोकस देव दयंता ।7।
कीन्हेसि सहस अठारह बरन बरन उपराजि। भुगुति दिहेसि पुनि सब कहं सकल साजना साजि ॥ (3)
व्याख्या: उस करतार ने अगर, कस्तूरी, खस, भीमसेनी तथा चीनी कपूरों की रचना की। जहाँ उसने सर्पों के मुख में विष बसाया, वहीं ऐसा मंत्र भी बनाया जिससे विष को उतारा जा सके। उसने जीवन देने वाला अमृत बनाया और मृत्यु देने वाला विष भी बनाया। उसने रस से भरी मीठी ईख (गन्ना) बनाई और कड़वे फलों वाली बेलें भी बनाईं। उसने शहद संचित करने वाली मक्खियों, भौरों, पतंगों और पक्षियों की रचना की। लोमड़ी, चूहे, चींटियाँ और मिट्टी खोदकर बिलों में रहने वाले जीव भी उसी ने बनाए। राक्षस, भूत, प्रेत, देव और दानव सब उसी के द्वारा रचे गए हैं। उसने अठारह हजार प्रकार के जीवों की उत्पत्ति की और सभी के लिए भोग-सामग्री की व्यवस्था की।
पद 4
कीन्हेसि मानुस दिहिस बड़ाई । कीन्हेसि अन्न भुगुति तेहि पाई ।1।
कीन्हेसि राजा भूजहिं राजू । कीन्हेसि हस्ति घोर तिन्ह साजू ।2।
कीन्हेसि तिन्ह कंह बहुत बेरासू । कीन्हेसि कोइ ठाकुर कोइ दासू ।3।
कीन्हेसि दरब गरब जेहिं होई । कीन्हेसि लोभ अघाड़ न कोई ।4।
कीन्हेसि जिअन सदा सब चहा । कीन्हेसि मीचु न कोई रहा ।5।
कीन्हेसि सुख औ कोड अनंदू । कीन्हेसि दुख चिन्ता औ दंदू ।6।
कीन्हेसि कोइ भिखारि कोइ धनी । कीन्हेसि संपति बिपति पुन घनी ।7।
कीन्हेसि कोइ निभरोसी कीन्हेसि कोड़ बरिआर। छार हुते सब कीन्हेसि पुनि कीन्हेसि सब छार ॥ (4)
व्याख्या: करतार ने मनुष्य को बनाया और उसे बड़प्पन व प्रतिष्ठा दी। उसके भोजन के लिए अन्न की रचना की। उसने राजाओं को बनाया जो राज्य भोगते हैं तथा उनके लिए हाथी, घोड़े व साजो-सामान बनाए। उसने विलास के साधन बनाए और किसी को स्वामी तो किसी को दास बनाया। उसने धन बनाया जिससे गर्व उत्पन्न होता है और ऐसी लोभ-वृत्ति बनाई जिससे कोई तृप्त नहीं होता। उसने जीवन बनाया जिसकी सब चाह रखते हैं और मृत्यु भी बनाई जिससे कोई नहीं बच सकता। उसने सुख, आनन्द, दुःख, चिन्ता और द्वंद्व बनाए। उसने किसी को धनी तो किसी को भिखारी बनाया, तथा संपत्ति और विपत्ति की रचना की। उसने सबको मिट्टी से बनाया है और अंत में सबको मिट्टी में ही मिला देता है।
पद 5
धनपति उहइ जेहिक संसारू । सबहि देइ नित घट न भंडारू ।1।
जावंत जगति हस्ति औ चांटा । सब कहं भुगुति रात दिनबांटा ।2।
ताकरि दिस्टि सबहिं उपराहीं । मित्र सत्रु कोइ बिसरइ नाहीं ।3।
पंखि पतंग न बिसरइ कोई । परगट गुपुत जहां लगि होई ।4।
भोग भुगुति बहु भांति उपाइ । सबहि खियावइ आपु न खाई ।5।
ताकर इहइ सो खाना पिअना । सब कहं देइ भुगुति औ जिअना ।6।
सबहिं आस ताकरि हर स्वांसा । ओह न काहु कइ आस निरासा ।7।
जुग जुग देत घटा नहिं उभै हाथ तस कीन्ह। अउर जो देहिं जगत महं सो सब ताकर दीन्ह ॥ (5)
व्याख्या: सच्चा धनपति वही परमेश्वर है जिसका यह संपूर्ण संसार है। वह नित्य सबको देता है, फिर भी उसका भंडार घटता नहीं। चींटी से लेकर हाथी तक, वह रात-दिन सभी को भोजन बांटता है। उसकी दृष्टि सभी पर रहती है; वह मित्र हो या शत्रु, किसी को नहीं भूलता। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सभी जीवों का वह ध्यान रखता है। वह सबको खिलाता है किन्तु स्वयं कुछ नहीं खाता; सभी को जीवन और भोजन देना ही उसका खाना-पीना है। सभी जीवों को हर सांस में उसी की आशा रहती है। वह युगों-युगों से दोनों हाथों से बांट रहा है फिर भी उसका कुछ कम नहीं हुआ। संसार में जो अन्य लोग दान देते हैं, वह भी सब उसी का दिया हुआ है।
पद 6
आदि सोइ बरनौं बड़ राजा । आदिहं अंत राज जेहि छाजा ।1।
सदा सरबदा राज करेई । औ जेहिं चहइ राज तेहिं देई ।2।
छत्रहि अछत निछत्रहि छावा । दोसर नाहिं जो सरबरि पावा ।3।
परबत ढाह देख सब लोगू । चांटिहि करइ हस्ति कर जोगू ।4।
बज्रहि तिन कै मारि उड़ाई । तिनहि बज्र की देइ बड़ाई ।5।
ताकर कीन्ह न जानइ कोई । करै सोई जो मन चित होई ।6।
काहू भोग भुगुति सुख सारा । काहू भीख भवन दुख भारा ।7।
सबइ नास्ति वह अस्थिर अइस साय जेहिं केर। एक साजइ अउ भांजइ चहइ संवारइ फेर || (6)
व्याख्या: मैं सर्वप्रथम उस महान राजा (ईश्वर) का वर्णन करता हूँ जिसका राज्य आदि से अंत तक सुशोभित है। वह सदैव राज्य करता है और जिसे चाहता है उसे राज्य दे देता है। वह राजा को छिन्न-भिन्न कर देता है और राजा-विहीन को छत्रधारी बना देता है; उसकी बराबरी करने वाला कोई नहीं है। वह देखते ही देखते पर्वतों को गिरा देता है और चींटी को हाथी से लड़ने योग्य बना देता है। वह वज्र को तिनका बनाकर उड़ा देता है और तिनके को वज्र जैसी कठोरता व बड़प्पन दे देता है। उसके कार्यों का भेद कोई नहीं जानता, वह वही करता है जो उसकी इच्छा में होता है। वह किसी को सुख-वैभव देता है तो किसी को दर-दर की भीख और दुःखों का भार देता है। यह संसार नश्वर है और केवल वही स्थिर है; वह सृष्टि की रचना करता है, नष्ट करता है और फिर संवार देता है।
पद 7
अलख अरूप अबरन सो करता । वह सब सों सब ओहि सों बरता ।1।
परगट गुपुत सो सरब बियापी । धरमी चीन्ह चीन्ह नहिं पापी ।2।
ना ओहि पूत न पिता न माता । ना ओहि कुटुंब न कोइ संग नाता ।3।
जना न काहु न कोई ओई जना । जहं लगि सब ताकर सिरजना ।4।
ओइं सब कीन्ह जहां लगि कोई । वह न कीन्ह काहू कर होई ।5।
हुत पहिलेई औ सब है सोई । पुनि सो रहहि रहिहि नहिं कोई ।6।
अउर जो होइ सो बाउर अंधा । दिन हुड़ चार भरड़ करि धंधा ।7।
जो ओइं चहा सो कीन्हेसि करइ जो चाहइ कीन्ह। बरजनहार न कोई सबइ चहड़ जिअ दीन्ह ॥ (7)
व्याख्या: वह कर्ता अदृश्य , निराकार और वर्णहीन है, फिर भी सब उसी से संचालित हैं। वह सर्वव्यापी है, जिसे केवल धर्मात्मा पहचानते हैं, पापी नहीं। न उसका कोई पुत्र है, न माता-पिता और न ही कोई कुटुंब या रिश्तेदार। न उसने किसी को जन्म दिया, न किसी ने उसे जन्म दिया; यह समस्त संसार उसी की रचना है। उसने सब कुछ बनाया, लेकिन उसे किसी ने नहीं बनाया। वह सबसे पहले भी था, अब भी है और अंत में भी वही रहेगा, बाकी सब मिट जाएंगे। जो स्वयं को कुछ और समझता है वह मूर्ख और अंधा है, जो दो-चार दिन का धंधा करके समाप्त हो जाएगा। उसने जो चाहा वही किया और जो चाहेगा वही करेगा, उसे रोकने वाला कोई नहीं है।
पद 8
एहि बिधि चीन्हहू करहु गिआनू । जस पुरान मंह लिखा बखानू ।1।
जीउ नाहिं पर जिआइ गुसाईं । कर नाहीं पै करइ सबाई ।2।
जीभ नाहिं पै सब किछु बोला । तन नाहीं जो डोलाव सो डोला ।3।
कान नाहिं पै सब किछ सुना । हिअ नाहीं गुनना सब गुना ।4।
नैन नाहिं पै सब किछु देखा । कवन भांति अस जाइ बिसेखा ।5।
ना कोई है ओहि के रूपा । न ओहि काहु अस तइस अनूपा ।6।
ना ओहि ठाऊं न ओहि बिन ठाऊं । रूप रेख बिनु निरमल नाऊं ।7।
ना वह मिला न बेहरा अइस रहा भरपूरि। दिस्टिवंत कहं नीअरे अंध मुरुख कहं दूरि ॥ (8)
व्याख्या: शास्त्रों में जैसा वर्णन है, उसी विधि से उस परमात्मा को पहचानो और ज्ञान प्राप्त करो। उसका अपना कोई जीव (प्राण) नहीं है फिर भी वह सबको जीवित रखता है। उसके हाथ नहीं हैं फिर भी वह सब कार्य करता है। जीभ न होने पर भी सब कुछ बोलता है, शरीर न होने पर भी सर्वत्र विचरता है। कान न होने पर भी सब सुनता है, हृदय न होने पर भी सब कुछ समझता है। आंखें न होने पर भी सब कुछ देखता है। उसके समान अनुपम रूप वाला कोई नहीं है। उसका कोई एक विशेष स्थान नहीं है, फिर भी कोई स्थान उसके बिना खाली नहीं है। वह न तो किसी में पूरी तरह मिला है और न ही अलग है, वह सर्वत्र व्याप्त है। वह ज्ञानियों के अत्यंत निकट है और अज्ञानी-मूर्खों के लिए बहुत दूर है।
पद 9
अउर जो दीन्हेसि रतन अमोला । ताकर मरम न जानइ भोला ।1।
दीन्हेसि रसना औ रस भोगू । दीन्हेसि दसन जो बिहंसइ जोगू ।2।
दीन्हेसि जग देखइ कहं नैना । दीन्हेसि स्त्रवन सुनइ कहं बैना ।3।
दीन्हेसि कंठ बोल जेहि माहां । दीन्हेसि कर पल्लौ बर बांहा ।4।
दीन्हेसि चरन अनूप चलाहीं । सोई जान जेहि दीन्हेसि नाहीं ।5।
जोबन मरम जान पै बूढ़ा । मिला न तरुनापा जब ढूंढा ।6।
सुख कर मरम न जानइ राजा । दुखी जान जा कहं दुख बाजा ।7।
कया क मरम जान पै रोगी भोगी रहइ निचिंत। सब कर मरम गोसाईं जानइ जो घट घट महं निंत ॥ (9)
व्याख्या: परमात्मा ने जो अनमोल रत्न (अंग) दिए हैं, यह अज्ञानी मनुष्य उनका मर्म नहीं समझता। उसने स्वाद लेने के लिए जीभ दी और हंसने के लिए सुंदर दांत दिए। संसार देखने के लिए आंखें दीं और बातें सुनने के लिए कान दिए। बोलने के लिए कंठ दिया और कार्य करने के लिए सुंदर हाथ-भुजाएं दीं। चलने के लिए सुंदर पैर दिए, जिनका महत्व वही जानता है जिसके पास पैर नहीं हैं। जवानी का असली मर्म बूढ़ा जानता है जो ढूंढने पर भी जवानी वापस नहीं पाता। सुख का मर्म भोगी राजा नहीं, बल्कि दुखी व्यक्ति जानता है। स्वस्थ शरीर का मर्म रोगी समझता है, भोगी तो निश्चिंत रहता है। वह ईश्वर सबके हृदय में नित्य निवास करता है और सभी का रहस्य जानता है।
पद 10
अति अपार करता कर करना । बरनि न कोई पारइ बरना ।1।
सात सरग जौं कागर करई । धरती सात समुंद मसि भरई ।2।
जावंत जग साखा बन ढांखा । जावंत केस रोवं पंखि पांखा ।3।
जावंत रेह खेह जहं ताईं । मेघ बूंद औ गगन तराईं ।4।
सब लिखनी कइ लिखि संसारू । लिखिन जाइ गति समुंद अपारू ।5।
एत कीन्ह सब गुन परगटा । अबहूं समुंद बूंद नहिं घटा ।6।
अइस जानि मन गरब न होई । गरब करइ मन बाउर सोई ।7।
बड़ गुनवंत गोसाईं चहइ सो होइ तेहि बेगि। औ अस गुनी संवारइ जो गुन करइ अनेग ॥ (10)
व्याख्या: उस कर्ता की लीला अत्यंत अपार है, जिसका वर्णन कोई नहीं कर सकता। यदि सातों आकाशों को कागज, सातों समुद्रों को स्याही, वनों की समस्त शाखाओं, बालों, रोमों, पक्षियों के पंखों, धूल-राख के कणों, बादलों की बूंदों और तारों को कलम बना लिया जाए और पूरा संसार लिखने लगे, तब भी उस ईश्वर के गुणों का अंत नहीं लिखा जा सकता। उसने इतने गुण प्रकट किए हैं फिर भी उसके गुण-समुद्र से एक बूंद भी कम नहीं हुई। यह जानकर किसी को मन में घमंड नहीं करना चाहिए, घमंड करने वाला मूर्ख है। वह स्वामी अत्यंत गुणवान है, जो चाहता है वह तुरंत हो जाता है और वह गुणीजनों को संवारता है।
पद 11
कीन्हेसि पुरुष एक निरमरा । नाउं मुहम्मद पूनिउं करा ।1।
प्रथम जोति बिधि तेहि के साजी । ओ तेहि प्रीति सिस्टि उपराजी ।2।
दीपक लेसि जगत कहं दीन्हा । भा निरमल जग मारग चीन्हा ।3।
जौं न होत अम पुरुष उज्यारा । सूझि न परत पंथ अंधियारा ।4।
दोसरई ठांव दई ओइं लिखे । भए धरमी जो पाढ़ित सिखे ।5।
जगत बसीठ दई ओई कीन्हे । दोउ जग तरा नाउं ओहि लीन्हे ।6।
जेहं नहिं लीन्ह जरम सो नाऊं । ताकहं कीन्ह नरक महं ठाउं ।7।
गुन अवगुन बिधि पूंछत होइहि लेख अउ जोख। ओन्ह बिनउब आगे होइ करब जगत कर मोख ॥ (11)
व्याख्या: उस ईश्वर ने मुहम्मद नाम के एक निष्पाप (निर्मल) पुरुष की रचना की जो पूर्णिमा के चांद के समान कलावान थे। विधाता ने सबसे पहले उन्हीं की ज्योति रचाई और उनके प्रति प्रेम के कारण ही इस सृष्टि का निर्माण किया। ईश्वर ने उन्हें संसार के लिए दीपक बनाकर भेजा, जिससे लोगों को सही मार्ग दिखाई दिया। यदि उनका प्रकाश न होता तो अंधकार में सही रास्ता न दिखता। ईश्वर ने अपने बाद दूसरा स्थान उन्हीं का लिखा; जिन्होंने उनका उपदेश सीखा वे धर्मात्मा बने। ईश्वर ने उन्हें संसार में अपना पैगम्बर (दूत) बनाया; उनका नाम लेने से दोनों लोक तर जाते हैं और जिसने नाम नहीं लिया उसने नरक में स्थान पाया। कयामत के दिन जब ईश्वर पाप-पुण्य का हिसाब पूछेगा, तब वे पैगम्बर आगे आकर प्रार्थना करेंगे और संसार को मुक्ति दिलाएंगे।
पद 12
चारि मीत जो मुहमद ठाउं । चहुंक दुहूं जग निरमर नाऊं ।1।
अबाबकर सिद्दीक सयाने । पहिलइं सिदिक दीन ओइं आने ।2।
पुनि जो उमर खिताब सुहाए । भा जग अदल दीन जौं आए ।3।
पुनि उसमान पंडित बड़ गुनी । लिखा पुरान जो आयत सुनी ।4।
चौथइं अली सिंघ बरियारू । सौंह न कोई रहा जुझारू ।5।
चारिउ एक मतइं एक बाता । एक पंथ औं एक संघाता ।6।
बचन जो एक सुनाएन्हि सांचा । भए परवान दुहूं जग बांचा ।7।
जो पुरान बिधि पठवा सोई पढ़त गिरंथ। अउर जो भूले आवत ते सुनि लागत तेहि पंथ ॥ (12)
व्याख्या: मुहम्मद साहब के चार मित्र (खलीफा) हुए, जिनका नाम दोनों लोकों में निर्मल है। पहले चतुर अबूबकर सिद्दीक थे, जिन्होंने सबसे पहले सत्य धर्म की प्रतिष्ठा की। दूसरे उमर हुए, जिनके आने से संसार में न्याय और धर्म फैला। तीसरे विद्वान व गुणवान उस्मान थे, जिन्होंने सुनी हुई आयतों से कुरान ग्रंथ को लिपिबद्ध किया। चौथे शेर के समान बलवान अली थे, जिनके सामने युद्ध में कोई न टिक पाता था। ये चारों एक ही मत, एक विचार और एक संगठन के थे। उन्होंने जो सत्य वचन (कलमा) सुनाया, वही दोनों लोकों में प्रामाणिक माना गया। ईश्वर द्वारा भेजे गए इस ग्रंथ को लोग पढ़ते हैं और भटके हुए लोग भी इसे सुनकर सही मार्ग पर आ जाते हैं।
पद 13
सेरसाहि ढिल्ली सुलतानू । चारिउ खंड तपइ जस भानू ।1।
ओही छाज छात औ पाटू । सब राजा भुइँ धरहिं लिलाटू ।2।
जाति सूर औ खांडइ सूरा । औ बुधिवंत सबइ गुन पूरा ।3।
सूर नवाई नवउ खंड भई । सातउ दीप दुनी सब नई ।4।
तंह लगि राज खरग बर लीन्हा । इसकंदर जुलकरां जो कीन्हा ।5।
हाथ सुलेमा केरि अंगूठी । जग कहं जिअन दीन्ह तेहि मूठी ।6।
औ अति गरू पुहुमिपतिभारी । टेकि पुहुमि सब सिस्टि संभारी ।7।
दीन असीस मुहम्मद करहु जुगहि जुग राज। पातसाह तुम्ह जग के जग तुम्हार मुहताज ॥ (13)
व्याख्या: शेरशाह दिल्ली का सुल्तान है, जिसका तेज चारों दिशाओं में सूर्य की भांति चमक रहा है। छत्र और सिंहासन उसी पर शोभा देते हैं और सभी राजा उसके सामने मस्तक झुकाते हैं। वह जाति से सूर और तलवार का धनी शूरवीर है, साथ ही बुद्धिमान और सर्वगुण संपन्न है। उसने नौ खण्डों और सात द्वीपों वाली पृथ्वी के वीरों को नमा दिया है। उसने अपनी तलवार के बल पर सिकंदर जैसी विजय प्राप्त की है। उसके हाथ में दानी सुलेमान जैसी अंगूठी है, वह अपनी मुट्ठी से संसार को दान और जीवन देता है। वह अत्यंत महान राजा है जिसने पूरी पृथ्वी और प्रजा को संभाल रखा है। कवि जायसी उसे आशीर्वाद देते हैं कि हे बादशाह! तुम युगों-युगों तक राज्य करो, तुम जगत के स्वामी हो और संसार तुम्हारा आश्रित है।
पद 14
बरनौं सूर पुहुमिपति राजा । पुहुमि न भार सहइ जो साजा ।1।
हय गय सेन चलइ जग पूरी । परबत टूटि उड़हिं होइ धूरी ।2।
रेनु रइनि होइ रबिहि गरासा । मानुस पंखि लेहिं फिरि बासा ।3।
ऊपर होइ छावइ महि मंडा । षट खंड धरति अष्ट ब्रांडा ।4।
डोलइ गगन इन्द्र डरि कांपा । बासुकि जाइ पतारहि चांपा ।5।
मेरु धसमसइ समुंद सुखाई । बन खंड टूटि खेह मिलि जाई ।6।
अगिलहि काहिं पानि खर बांटा । पछिलेहि काहिं न कांदहु आंटा ।7।
जो गढ़ नए न काऊ चलत होहिं सत चूर। जबहि चढ़इ पुहुमीपति सेरसाहि जगसूर ॥ (14)
व्याख्या: मैं राजा शेरशाह का वर्णन करता हूँ, जिसकी विशाल सेना का भार पृथ्वी भी नहीं सह पाती। जब उसकी हाथी-घोड़ों की सेना चलती है, तो पर्वत टूटकर धूल बन जाते हैं। सेना की धूल से दिन में रात जैसा अंधेरा छा जाता है, सूर्य ढंक जाता है और मनुष्य व पक्षी शाम समझकर विश्राम करने लगते हैं। धूल उड़कर आकाश में छा जाती है, जिससे इंद्र कांपने लगता है और शेषनाग (वासुकि) पाताल में जा छिपता है। सुमेरु पर्वत हिलने लगता है, समुद्र का पानी सूखने लगता है और जंगल टूटकर मिट्टी में मिल जाते हैं। सेना के आगे चलने वालों को तो पानी मिल जाता है, पर पीछे आने वालों के लिए कीचड़ भी नहीं बचता। जो किले कभी किसी से नहीं झुके थे, शेरशाह के चढ़ाई करते ही वे शत-शत टुकड़ों में चूर-चूर हो जाते हैं।
पद 15
अदल कहौं जस प्रिथिमी होई । चांटहि चलत न दुखवइ कोई ।1।
नौसेरवां जो आदिल कहा । साहि अदल सरि सोउ न अहा ।2।
अदल कीन्ह उप्पर की नाईं । भइ अहान सिगरी दुनिआईं ।3।
परी नाथ कोइ छुअइ ना पारा । मारग मानुस सोन उछारा ।4।
गडव सिंघ रंगहिं एक बाटा । अउ पानि पिअहिं एक घाटा ।5।
नीर खीर छानइ दरबारा । दूध पानि सो करइ निरारा ।6।
धरम निआउ चलइ सत भाषा । दूबर बरिअ दुनहुं सम राखा ।7।
सब पिरथिमी असीसइ जोरि जोरि कै हाथ। गांग जउंन जौ लहि जल तौ लहि अम्मर माथ ॥ (15)
व्याख्या: अब मैं शेरशाह के न्याय का वर्णन करता हूँ। उसके राज्य में इतना आतंक व अनुशासन है कि कोई चलती चींटी को भी कष्ट नहीं देता। प्रसिद्ध न्यायप्रिय नौशेरवां भी उसके न्याय की बराबरी नहीं कर सकता। उसने उमर खलीफा की भांति न्याय किया है जिसकी प्रशंसा पूरी दुनिया कर रही है। रास्ते में गिरी नथ (गहने) को कोई छूने का साहस नहीं करता और लोग रास्ते में सोना उछालते हुए निर्भय घूमते हैं। उसके राज्य में गाय और शेर एक ही रास्ते पर चलते हैं और एक ही घाट पर पानी पीते हैं। उसके दरबार में दूध का दूध और पानी का पानी निष्पक्ष रूप से किया जाता है। धर्म और सत्य के अनुसार न्याय होता है तथा निर्बल और बलवान दोनों को समान समझा जाता है। पूरी प्रजा हाथ जोड़कर आशीर्वाद देती है कि जब तक गंगा-यमुना में जल रहे, सुल्तान का मस्तक अमर रहे।
पद 16
पुनि रुपवंत बखानौं काहा । जावंत जगत सबइ मुख चाहा ।1।
ससि चौदसि जो दइअ संवारा । तेहूं चाहि रूप उंजियारा ।2।
पाप जाइ जौं दरसन दीसा । जग जोहारि कइ देइ असीसा ।3।
जइस भान जग ऊपर तपा । सबइ रूप ओहि आगें छपा ।4।
भा अस सूर पुरुष निरमरा । सूर चाहि दह आगरि करा ।5।
सौंह दिस्टि कइ हेरि न जाई । जेई देखा सो रहा सिर नाई ।6।
रूप सवाई दिन दिन चढ़ा । बिधि सरूप जग ऊपर गढ़ा ।7।
रूपवंत मनि माथे चंद्र घाट वह बाढ़ि। मेदिनि दरस लुभानी अस्तुति बिनवइ ठाढ़ि ॥ (16)
व्याख्या: अब मैं उसके रूप-सौंदर्य का वर्णन क्या करूँ! सारा संसार उसका मुख देखना चाहता है। चौदहवीं के चंद्रमा से भी अधिक उज्ज्वल उसका सौंदर्य है। उसके दर्शन करने मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं, लोग उसे प्रणाम करते हैं और वह उन्हें आशीर्वाद देता है। जैसे सूर्य के सामने सब प्रकाश फीके पड़ जाते हैं, वैसे ही उसके तेज के आगे सबका रूप छिप जाता है। वह ऐसा निर्मल शूरवीर है जिसके गुण सूर्य की कलाओं से भी दस गुना अधिक हैं। उसके तेज के सामने आँख उठाकर नहीं देखा जा सकता, जो देखता है उसका सिर झुक जाता है। उसका सौंदर्य दिनों-दिन बढ़ता ही जाता है। वह रूपवानों के मस्तक की मणि है; चंद्रमा घटता-बढ़ता है पर उसका सौंदर्य केवल बढ़ता है। संपूर्ण पृथ्वी उसके दर्शनों के लिए लालायित होकर प्रार्थना करती है।
पद 17
पुनि दातार दइअ बड़ कीन्हा । अस जग दान न काहूं दीन्हा ।1।
बलि औ बिक्रम दानि बड़ अहे । हेतिम करन तिआगी कहे ।2।
सेरसाह सरि पूज न कोऊ । समुंद सुमेर घटहिं नित दोऊ ।3।
दान डांक बाजड़ दरबारा । कीरति गई समुद्रहं पारा ।4।
कंचन बरिस सोर जग भएऊ । दारिद भागि देसंतर गएऊ ।5।
जौं कोइ जाइ एक बेर मांगा । जरमहु होइ न भूखा नांगा ।6।
दस असुमेध जग्गि जेइं कीन्हा । दान पुन्नि सरि सेउ न दीन्हा ।7।
अइस दानि जग उपना सेरसाहि सुलतान। ना अस भएउ न होइहि ना कोइ देइ अस दान ॥ (17)
व्याख्या: ईश्वर ने शेरशाह को महान दानी बनाया है, जैसा दान संसार में किसी ने नहीं दिया। राजा बलि, विक्रमादित्य, हातिम ताई और कर्ण जैसे त्यागी भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते। समुद्र और सुमेरु पर्वत भी घट सकते हैं, पर शेरशाह का दान-भंडार नहीं घटता। उसके दरबार में दान का डंका बजता है और उसकी कीर्ति समुद्र पार तक फैली है। उसके द्वारा स्वर्ण-वर्षा (अत्यधिक दान) का शोर पूरे जग में है, जिससे दरिद्रता देश छोड़कर भाग गई है। जो एक बार उससे मांग लेता है, वह जीवन भर भूखा-नंगा नहीं रहता। दस अश्वमेध यज्ञ करने वाला भी उसके दान-पुण्य की बराबरी नहीं कर सकता। ऐसा दानी न कोई पहले हुआ है और न आगे होगा।
पद 18
सैयद असरफ पीर पिआरा । तिन्ह मोहिं पंथ दीन्ह उजियारा ।1।
लेसा हिएं पेम कर दिया । उठी जोति भा निरमल हिया ।2।
मारग हुत अंधियार असूझा । भा अंजोर सब जाना बूझा ।3।
खार समुद्र पाप मोर मेला । बोहित धरम लीन्ह कइ चेला ।4।
उन्ह मोर करिअ पोढ़ कर गहा । पाएऊं तीर घाट जो अहा ।5।
जा कहं अइस होहिं कंड़हारा । तुरित बेगि सो पावइ पारा ।6।
दस्तगीर गाढ़े के साथी । जहं अवगाह देहिं तहं हाथी ।7।
जहांगीर ओइ चिस्ती निहकलंक जस चांद। ओइ मखदूम जगत के हौं उन्हके घर बांद ॥ (18)
व्याख्या: मेरे प्रिय गुरु सैयद अशरफ ने मुझे ज्ञान का उज्ज्वल मार्ग दिखाया है। उन्होंने मेरे हृदय में प्रेम का दीपक जलाया जिससे उठने वाले प्रकाश से मेरा हृदय निर्मल हो गया। जो मार्ग पहले अंधकारमय और कठिन था, अब प्रकाश होने से सब समझ में आने लगा है। पापों के खारे समुद्र में डूबते हुए मुझे उन्होंने धर्म रूपी जहाज पर अपना शिष्य बनाकर चढ़ा लिया। उन्होंने मजबूत हाथों से पतवार संभाली जिससे मुझे किनारा मिल गया। जिसका ऐसा कर्णधार (नाव खेने वाला) हो, वह तुरंत पार उतर जाता है। वे संकट के समय हाथ थामने वाले साथी हैं, जहाँ गहरा जल होता है वहाँ अपना हाथ बढ़ा देते हैं। चिश्ती वंश के वे जहांगीर चंद्रमा की तरह निष्कलंक हैं। वे संसार के स्वामी हैं और मैं उनके घर का सेवक (दास) हूँ।
पद 19
उन्ह घर रतन एक निरमरा । हाजी सेख सभागई भरा ।1।
तिन्ह घर दुइ दीपक उजियारे । पंथ देइ कहं दइअ संवारे ।2।
सेख मुबारक पूनिऊं करा । सेख कमाल जगत निरमरा ।3।
दुऔ अचल धुव डोलहिं नाहीं । मेरु खिखिंद तिनहुँ उपराहीं ।4।
दीन्ह जोति औ रूप गुसाईं । कीन्ह खांभ दुहुं जगत की ताईं ।5।
दुहूं खम्भ टेकी सब मही । दुहुं के भार सिस्टि थिर रही ।6।
जिन्ह दरसे औ परसे पाया । पाप हरा निरमल भौ काया ।7।
महमद तहां निचिंत पथ जेहि संग मुरसिद पीर। जेहि रे नाव करिआ औ खेवक बेग पाव सो तीर ॥ (19)
व्याख्या: सैयद अशरफ के वंश में हाजी शेख नामक भाग्यशाली और निर्मल रत्न हुए। उनके घर दो पुत्र रूपी दीपक उत्पन्न हुए जिन्हें ईश्वर ने संसार को मार्ग दिखाने के लिए रचा था। एक पूर्णिमा के चांद जैसे शेख मुबारक और दूसरे संसार में निर्मल चरित्र वाले शेख कमाल। दोनों ध्रुवतारे की भांति अचल हैं और सुमेरु व किष्किन्धा पर्वत से भी ऊंचे हैं। ईश्वर ने उन्हें ज्ञान की ज्योति और रूप देकर संसार के दो स्तंभ बनाया। इन दोनों स्तंभों पर पूरी पृथ्वी टिकी हुई है। जिन्होंने इनके दर्शन किए और चरण छुए, उनके पाप दूर हो गए और काया निर्मल हो गई। जायसी कहते हैं कि जिसके साथ ऐसे मार्गदर्शक गुरु हों, उसका साधना-मार्ग चिंतामुक्त हो जाता है; जिसकी नाव में पतवार और मल्लाह दोनों हों, वह शीघ्र ही किनारे पहुँच जाता है।
पद 20
गुरु मोहदी खेवक मैं सेवा । चलै उताइल जिन्ह कर खेवा ।1।
अगुआ भएउ सेख बुरहानू । पंथ लाइ जेहिं दीन्ह गिआनू ।2।
अलहदाद भल तिन्ह कर गुरू । दीन दुनिअ रोसन सुरखुरू ।3।
सैयद महम्मद के ओइ चेला । सिद्ध पुरुष संगम जेहिं खेला ।4।
दानिआल गुरु पंथ लखाए । हजरति ख्वाज खिजिर तिन्ह पाए ।5।
भए परसन ओहि हजरति ख्वाजे । लइ मेरए जहं सैयद राजे ।6।
उन्ह सौं मैं पाई जब करनी । उघरी जीभ प्रेम कबि बरनी ।7।
ओइ सो गुरु हौं चेला निति बिनबौं भा चेर। उन्ह हुति देखइ पावौं दरस गोसाईं केर ॥ (20)
व्याख्या: गुरु मुहीउद्दीन (मोहदी) मेरी जीवन-नाव के मल्लाह हैं और मैं उनका सेवक हूँ; जिनके खेने से नाव तेज़ी से चलती है। उनके गुरु शेख बुरहान थे जिन्होंने सन्मार्ग का ज्ञान दिया। उनके गुरु अलहाद थे जो धर्म और संसार में तेजस्वी सिद्ध पुरुष थे। वे सैयद मोहम्मद के शिष्य थे जिनके लिए ईश्वर-मिलन खेल के समान था। उनके गुरु दानियाल थे और उन्हें ख्वाजा खिज्र प्राप्त हुए थे। ख्वाजा खिज्र ने प्रसन्न होकर उन्हें सैयद राजे से मिलाया था। ऐसी महान गुरु-परंपरा वाले अपने गुरु मुहीउद्दीन से जब मुझे साधना की क्षमता मिली, तब मेरी वाणी खुली और मैंने इस प्रेम-काव्य का वर्णन किया। वे मेरे गुरु हैं, मैं उनका शिष्य बनकर नित्य प्रार्थना करता हूँ और उन्हीं के माध्यम से ईश्वर के दर्शन की उम्मीद रखता हूँ।
पद 21
एक नैन कबि मुहमद गुनी । सोइ बिमोहा जेई कबि सुनी ।1।
चांद जइस जग बिधि औतारा । दीन्ह कलंक कीन्ह उजिआरा ।2।
जग सूझा एकइ नैनाहां । उवा सूक अस नखतन्ह माहां ।3।
जौं लहि अंबहि डाभ न होई । तौ लहि सुगंध बसाइ न सोई ।4।
कीन्ह समुद्र पानि जौं खारा । तौ अति भएउ असूझ अपारा ।5।
जौं सुमेरु तिरसूल बिनासा । भा कंचनगिरि लाग अकासा ।6।
जौं लहि घरी कलंक न परा । कांच होइ नहिं कंचन करा ।7।
एक नैन जस दरपन औ तेहि निरमल भाउ। सब रुपवंत पांव गहि मुख जोवहिं कइ चाउ ॥ (21)
व्याख्या: कवि जायसी एक आंख के होते हुए भी अत्यंत गुणवान हैं; जिसने भी उनकी कविता सुनी वही मोहित हो गया। विधाता ने उन्हें संसार में चंद्रमा की तरह बनाया—जैसे चंद्रमा में दाग है पर वह उजाला करता है, वैसे ही कवि में एक आंख का दोष है पर वे अपनी कविता से ज्ञान फैलाते हैं। उन्होंने एक ही आंख से पूरे संसार को समझ लिया है और वे कवियों के बीच शुक्र तारे के समान चमकते हैं। जब तक आम में मंजरी/चेंप नहीं आता तब तक उसमें सुगंध नहीं आती। समुद्र का पानी खारा है, इसीलिए वह अगाध और अपार है। सुमेरु पर्वत शिव के त्रिशूल से नष्ट हुआ तभी वह सोने का होकर आकाश को छू सका। जब तक कच्चे सोने को तपाने वाले पात्र में न डाला जाए, वह खरा सोना नहीं बनता। जायसी की एक आंख दर्पण के समान स्वच्छ और निर्मल भाव वाली है, इसलिए बड़े-बड़े रूपवान लोग भी उनके चरण छूकर प्रेम से उनका मुख देखते हैं।
पद 22
चारि मीत कबि मुहमद पाए । जोरि मिताई सरि पहुंचाए ।1।
यूसुफ मलिक पंडित औ ग्यानी । पहिलै भेद बात उन्ह जानी ।2।
पुनि सलार कांदन मति माहां । खांडै दान उभै निति बाहां ।3।
मियां सलोने सिंघ अपारू । बीर खेत रन खरग जुझारू ।4।
सेख बड़े बड़ सिद्ध बखाने । कइ अदेस सिद्धन्ह बड़ माने ।5।
चारिउ चतुरदसौ गुन पढ़े । औ संग जोग गोसाईं गढ़े ।6।
बिरिख जो आछहिं चंदन पासां । चंदन होहिं बेधि तेहि बासां ।7।
मुहमद चारिउ मीत मिलि भए जो एकइ चित्त। एहि जग साथ जो निबहा ओहि जग बिछुरन कित्त ॥ (22)
व्याख्या: कवि जायसी कहते हैं कि मुझे चार श्रेष्ठ मित्र मिले हैं, जिनसे मित्रता करके मैंने उन्हें अपने समान बना लिया है। पहले यूसुफ मलिक हैं जो पंडित व ज्ञानी हैं और जिन्होंने सबसे पहले मेरे भेद/हृदय को समझा। दूसरे बुद्धिमान सलार हैं जिनकी भुजाएं दान देने और तलवार चलाने के लिए हमेशा तत्पर रहती हैं। तीसरे सलोने मियां हैं जो शेर के समान वीर और युद्ध क्षेत्र में खड्ग चलाने वाले योद्धा हैं। चौथे बड़े शेख जी हैं जो ऐसे सिद्ध पुरुष हैं जिन्हें अन्य सिद्ध भी प्रणाम करते हैं। ये चारों चौदह विद्याओं में निपुण हैं। चंदन के पास रहने वाले वृक्ष जैसे चंदन की सुंगध से महक जाते हैं, वैसे ही इनकी संगति है। जायसी कहते हैं कि ये चारों मित्र मिलकर एकचित्त हो गए हैं; जिन्होंने इस लोक में साथ निभाया है, वे परलोक में भी अलग नहीं हो सकते।
पद 23
जाएस नगर धरम अस्थानू । तहवां यह कबि कीन्ह बखानू ।1।
औ बिनती पंडितन्ह सों भजा । टूट संवारेहु मेरएहु सजा ।2।
हौं सब कबिन्ह केर पछिलगा । किछु कहि चला तबल दइ डगा ।3।
हिअ भंडार नग आहि जो पूंजी । खोली जीभ तारा कै कुंजी ।4।
रतन पदारथ बोलइ बोला । सुरस पेम मधु भरिअ अमोला ।5।
जेहि के बोल बिरह के घाया । कहु तेहि भूख कहां तेहि छाया ।6।
फेरे भेस रहइ भा तपा । धूरि लपेटा मानिक छपा ।7।
मुहमद कबि जो प्रेम का ना तन रकत न मांसु। जेईई मुख देखा तेइं हंसा सुना तो आए आंसु ॥ (23)
व्याख्या: जायस नगर एक पवित्र धार्मिक स्थान है, वहीं रहकर इस कवि ने इस ग्रंथ का वर्णन किया है। मैं विद्वानों से प्रार्थना करता हूँ कि यदि कोई त्रुटि (भूल) हो तो उसे सुधारकर मुझे दंड देने के बजाय संभालें। मैं तो पूर्ववर्ती कवियों का अनुगामी हूँ और उन्हीं की प्रेरणा से कदम बढ़ा रहा हूँ। मेरे हृदय रूपी भंडार में जो ज्ञान-रत्न थे, उन्हें मेरी जीभ रूपी चाबी ने ताला खोलकर प्रकट कर दिया है। मैंने रत्नसेन और पद्मावती की अमूल्य व सरस प्रेम कथा कही है। जिसे प्रेम और विरह की चोट लगती है, उसे न भूख लगती है और न ही छाया की चिंता रहती है; वह वैरागी होकर धूल में छिपे माणिक की तरह हो जाता है। जायसी कहते हैं कि जो प्रेम का कवि है, उसके शरीर में विरह के कारण रक्त और मांस नहीं बचता। जिसने मेरा (कुरूप) मुख देखा वह हंस पड़ा, पर जिसने मेरी कविता सुनी उसके आंखों में आंसू आ गए।
पद 24
सन सै सैंतालिस अहै । कथा अरंभ बैन कबि कहै ।1।
सिंघल दीप पदुमिनी रानी । रतनसेनि चितउर गढ़ आनी ।2।
अलाउदीं ढिल्ली सुलतानू । राघौ चेतन कीन्ह बखानू ।3।
सुना साहि गढ़ छेंका आई । हिन्दू तुरकहिं भई लराई ।4।
आदि अंत जसि कथ्था अहै । लिखि भाषा चौपाई कहै ।5।
कबि बिआस रस कौंला पूरी । दूरिहि निअर निअर भा दूरी ।6।
निअरहि दूरि फूल संग कांटा । दूरि जो निअरैं जस गुर चांटा ।7।
भंवर आइ बनखंड हुति लेहि कंवल कै बास। दादुर बास न पावहिं भलेहिं जो आछहिं पास ॥ (24)
व्याख्या: कवि कहता है कि हिजरी सन् 927/947 में मैंने इस कथा का आरम्भ किया था। सिंहलद्वीप की रानी पद्मावती को चित्तौड़गढ़ का राजा रत्नसेन चित्तौड़ लाया। दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन के सामने राघव चेतन ने पद्मावती के रूप का वर्णन किया। यह सुनकर सुल्तान ने चित्तौड़गढ़ का घेराव किया और हिंदू-मुसलमानों में भारी युद्ध हुआ। इस संपूर्ण कथा को मैं अवधी भाषा में दोहा-चौपाई छंदों में लिख रहा हूँ। जो इस कथा के रस को समझते हैं, वे दूर होते हुए भी पास हैं और जो रस नहीं समझते, वे पास होते हुए भी दूर हैं। जैसे फूल के पास रहकर भी कांटा उसका रस नहीं जानता, जबकि दूर से आकर चींटी गुड़ से लिपट जाती है। भौंरा जंगलों से उड़कर कमल की सुगंध लेने आता है, जबकि कमल के पास रहने वाला मेंढक उसकी सुगंध से वंचित ही रहता है।
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