पद्मावत : मानसरोदक खण्ड ( मूल व व्याख्या / Padmavat : Mansarodak Khand ( Mool Evam Vyakhya )

पद 1

मूल:
एक देवस कौनिउं तिथि आई । मानसरोदक चली अन्हाई ।
पद्मावति सब सखीं बोलाइ । जनु फुलवारि सबै चलि आईं ।
कोइ चंपा कोइ कुंद सहेलीं । कोइ सुकेत करना रस बेलीं ।
कोइ सुगुलाल सुदरसन राती । कोई बकौरि बकचुन विहंसाती ।
कोई सु बोलसरि पुहुपावती । कोइ जाही जूही सेवती ।5।
कोइ सोनजरद जेउं केसरि । कोइ सिंगारहार नागेसरि ।
कोइ कूजा सदबरग चंबेली । कोइ कदम पुरस रस बेली ।
चलीं सबै मालति संग फूले कंवल कमोद।
बेधि रहे gन गंध्रप बास परिमलामोद ॥
(1)

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियों सूफी काव्य धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा लिखित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘मानसरोदक खण्ड’ से ली गई हैं | प्रस्तुत पंक्तियों में जायसी ने पद्मावती की सखियों सहित मानसरोवर में स्नान के लिए जाने का वर्णन किया है | इसमें वे पद्मावती को मालती मानते हैं तथा अन्य सखियों को अन्य प्रकार के पुष्प |

व्याख्या : एक दिन कोई अथवा पूर्णमाशी की तिथि आई। पद्मावती मानसरोवर में स्नान करने के लिए गई। उसने अपनी सभी सखियों को बुलाया। वे सभी इस प्रकार चली आई मानो फुलवारी ही आ गई हो। इन सखियों में कोई चंपा के पुष्प की भांति थी तो कोई कुंद की तरह थी। अन्य सखियों में से कोई केतकी, कोई करना और कोई रसबेली की भांति थी। उनमें से कोई श्रेष्ठ गुलाल और सुदर्शन-पुष्प जैसे लाल रंग की तो कोई गुलाब के गुच्छों की तरह खिली हुई थी। कोई मौलश्री की भांति थी तो कोई जाही, यूथिका और श्वेत गुलाब की भांति थी। उनमें से कोई सखी सोनजरद के पुष्पवत् थी तो कोई केसर के समान थी। कोई हरसिंगार और कोई नागकेसर की भांति थी। कोई कूजा जैसी थी और कोई सदबरगा या चमेली जैसी थी। कोई कदम्ब-पुष्प की भांति थी तो कोई सुन्दर रसबेली जैसी थी। वे सभी सखियां मालती रूपी पद्मावती के साथ इस प्रकार चलीं मानो कमल के साथ कमलिनियां हों। उनकी सुगन्धि की अधिकता के कारण गंधों के समूह भी प्रसन्न हो रहे थे।

पद 2

मूल:
खेलत मानसरोवर गईं । जाइ पालि पर ठाढ़ी भईं ।
देखि सरोवर रहसहिं केली । पदमावति सौं कहहिं सलेली ।
ऐ रानी मन देखु बिचारी । एहि नैहर रहना दिन चारी ।
जौ लहि अहै पिता कर राजू । खेलि लेहु जौं खेलहु आजू ।
पुनि सासुर हम गौनब काली । कित हम कित एह सरवर पाली ।
कित आवन पुनि अपने हाथां । कित मिलिकै खेलब एक साथा ।
सासु नंनद बोलिन्ह जिउ लेहीं । दारुन ससुर न आवै देहीं ।
पिउ पिआर सब ऊपर सो पुनि करै दहं काह।
कहुं सुख राखै की दुःख दहुं कस जरम निबाह ॥
(2)

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियों सूफी काव्य धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा लिखित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘मानसरोदक खण्ड’ से ली गई हैं | प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से जायसी ने जीवात्मा रूपी सखियों के जगत रूपी मायके में आनंद बनाने का वर्णन किया है |

व्याख्या : पद्मावती और उसकी सखियां क्रीड़ाएं करती हुईं मानसरोवर पहुंच गईं और जाकर उसके बांध पर खड़ी हो गईं। तालाब को देखकर आनन्दपूर्वक क्रीड़ाएं करने लगीं और सखियां पद्मावती से कहने लगीं, कि हे रानी ! तुम अपने मन में सोचकर देख लो। इस मायके में तो हमें चार दिन अर्थात् थोड़े से समय तक रहना है। जब तक पिता के शासन में हो तभी तक जो कुछ भी क्रीड़ाएं करनी हैं कर लो। बाद में तो हमारे ससुराल जाने का समय आ जाएगा तब न जाने कहां तो हम होंगी और कहां यह तालाब का किनारा होगा। तब तो आना भी अपने वश की बात नहीं रहेगी, अतः हम सब मिलकर कहां खेल पाएंगी। हमारी सास और ननदें अपनी कठिन कड़वी बातों से हमारी जान खाया करेंगी और निष्ठुर श्वसुर हमको आने नहीं देगा।
हां इन सबके ऊपर प्यारा पति अवश्य होगा किन्तु न जाने वह भी कैसा होगा। ज्ञात नहीं है कि वह सुख से रखेगा अथवा दुख से। ज्ञात नहीं हमारे जीवन का निर्वाह किस प्रकार होगा?

पद 3

मूल:
सरवर तीर पदुमिनीं आईं । खोंपा छोरि केस मोकराईं ।
ससि मुख अंग मलैगिरि रानी । नागन्ह झांपि लीन्ह अरघानी ।
ओनए मेघ परी जग छाहां । ससि की सरन लीन्ह जनु राहां ।
छपि गै दिनहि भानु कै दसा । लै निसि नखत चांद परगसा ।
भूलि चकोर दिस्टि तहं लावा । मेघ घटा महं चांद दिखावा ।
दसन दामिनी कोकिल भाषीं । भौंहें धनुक गगन लै राखीं ।
नैन खंजन दुइ केलि करेहीं । कुच नारंग मधुकर रस लेहीं ।
सरवर रूप बिमोहा हिएं हिलोर करेइ।
पाय छुवै मकु पावौं तेहि मिसु लहरें देइ ॥
(3)

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियों सूफी काव्य धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा लिखित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘मानसरोदक खण्ड’ से ली गई हैं | प्रस्तुत पंक्तियों में पद्मावती के अलौकिक सौंदर्य का वर्णन है |

व्याख्या : वे पद्मिनी स्त्रियां तालाब के किनारे पर आ गईं। वहां उन्होंने अपने केशराशि के जूड़े खोलकर अपने केशों को बिखरा दिया। पद्मावती का मुख मयंक के समान था जबकि उनके शरीरांगों से चन्दन की जैसी गन्ध आती थी। उसके कानों के चारों ओर फैले बाल ऐसे प्रतीत होते थे मानो सर्पों ने सुगन्धि के कारण मलयगिरी को ढांप लिया हो। केशों रूपी बादलों के उमड़ने पर संसार में उनकी छाया पड़ने लगी, वे ऐसे प्रतीत होते थे मानो राहु ने चन्द्रमा की शरण ली हो। दिन में ही सूर्य छिप गया और ऐसा प्रतीत होने लगा कि तारागणों को साथ लेकर चांद आया है। चकोर भूलकर उस ओर ही दृष्टि लगाने लगा (चकोर चन्द्रमा की ओर देखा करता है।) क्योंकि उसे मेघों के मध्य पद्मावती का मुख रूपी चन्द्रमा दिखाई दे रहा था। पद्मावती के दांत बिजली की तरह चमक रहे थे जबकि उसकी बोली कोयल जैसी मधुर थी। उसके भंवों रूपी धनुष आकाश की ओर उठे हुए थे अर्थात् इन्द्रधनुष जैसी प्रतीत होती थीं। उसके नेत्र ऐसे प्रतीत होते थे मानो दो खंजन पक्षी क्रीड़ा कर रहे हों। उसके कुच नारंगियों जैसे थे जबकि उनके अग्रभाग की श्यामला भ्रमरों जैसी थी ऐसा प्रतीत होता था मानो नारंगियों पर बैठे हुए भ्रमर रसपान कर रहे हैं।
पद्मावती के ऐसे सौन्दर्य को देखकर मानसरोवर मोहित हो उठा। उसके हृदय में कामना की लहरें उठने लगीं। उसमें इस उद्देश्य से लहरें उठने लगीं कि मानों इस बहाने से उनके चरणों को स्पर्श कर सकूं। अभिप्राय यह है कि पद्मावती के चरणों को स्पर्श करने की कामना से उसमें लहरें तरंगित होने लगीं।

पद 4

मूल:
धरीं तीर सब छीप क सारीं । सरवर महं पैठीं सब बारी ।
पाएं नीर जानु सब बेलीं । हुलसी करहिं काम कै केलीं ।
नवल बसंत संवारहि करीं । होइ परगट चाहहिं रस भरीं ।
करिल केस बिसहर बिस भरे । लहरें लेहि कंवल मुख धरे ।
उठे कोंप जनु दारिवं दाखा । भई ओनंत प्रेम कै साखा ।
सरवर नहिं समाइ संसारा । चांद नहाइ पैठ लिए तारा ।
धनि सो नीर ससि तरईं उईं । अब कत दिस्टि कंवल औ कुईं ।
चकई बिछुरि पुकौरै कहां मिलहु हो नांह।
एक चांद निसि सरग पर दिन दोसर जल मांह ॥
(4)

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियों सूफी काव्य धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा लिखित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘मानसरोदक खण्ड’ से ली गई हैं | प्रस्तुत पंक्तियों में पद्मावती का अपनी साथियों के साथ मानसरोवर में स्नान करने का चित्रण है |

व्याख्या : उन बालाओं ने अपनी छपी हुई साड़ियां तालाब के किनारे रख दीं और स्नान करने के लिए तालाब में प्रविष्ट हो गईं। तालाब में प्रवेश करके वे ऐसे प्रसन्न हुईं जैसे लताओं को जल मिल गया हो और वे प्रसन्न होकर काम-क्रीड़ाएं करने लगीं। वे सभी नवीन वसन्त के द्वारा संभाली हुई कलियों के समान थीं। उन कली-रूपी बालाओं के छोटे-छोटे उरोज यह प्रकट करते थे मानो उनकी आयु के नये वसन्त ने कलियों को पैदा कर दिया हो और अब वे कलियां रस से परिपूर्ण होकर पूर्ण यौवन के रूप में प्रकट होना चाहती हों। उनके लम्बे और काले केश ऐसे प्रतीत होते थे मानो विषैले सांप हों। केशों के मध्य घिरा हुआ पद्मावती का मुख ऐसा प्रतीत होता था मानो सर्पों ने अपने मुख में कमल को पकड़ रखा हो और अब लहराते फिर रहे हों। पद्मावती के या उन बालाओं के अधर ऐसे लगते हैं मानो अनार और दाख को कोमल कोंपलें निकल रही हों। किंचित् झुकी हुई बालाएं ऐसी प्रतीत होती थीं मानो प्रेम की शाखा झुक गई हो। उन बालाओं को पाकर सरोवर की प्रसन्नता की सीमा नहीं थी क्योंकि पद्मावती रूपी चन्द्रमा उसमें अपने सखियों रूपी नक्षत्रों को लेकर स्नान कर रहा था। वह जल धन्य है जहां चन्द्रमा और नक्षत्र उत्पन्न हो गए हैं। चन्द्रमा और तारों के निकलने पर अब वहां कमल और कमिलिनी कहां दिखाई दे सकते थे।
चकवे से बिछुड़ी हुई चकवी पुकारने लगी कि हे प्रियतम तुम कहां हो, मैं तुमसे कहां और कैसे मिलूं ? कारण यह है कि एक चांद तो रात के आकाश में दिखाई देता है जबकि दूसरा चन्द्रमा दिन में जल के अन्दर है- अर्थात जब सदैव रात ही रहेगी और दिन नहीं निकलेगा तो हमारा मिलन हो ही कैसे सकता है।

पद 5

मूल:
लागीं केलि करै मंझ नीरा । हंस लजाइ बैठ होइ तीरा ।
पद्मावति कौतुक करि राखी । तुम्ह ससि होहु तराइन साखी ।
बादि मेलि कै खेल पसारा । हारु देड़ जौं खेलत हारा ।
संवरहि सांवरि गोरिहिं गोरी । आपनि आपनि लीन्हि सो जोरी ।
आजू खेल खेलहु एक साथा । हारु न होइ पराएं हाथा ।
आजुहि खेल बहुरि कित होई । खेल गएं कत खेलै कोई ।
धनि सो खेल खेलहिं रस पेमा । रौताई औ कूसल खेमा ।
मुहमद बारि परेम की जेउं भावै तेउं खेल।
तीलहि फूलहि संग जेऊं होइ फुलाएल तेल ॥
(5)

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियों सूफी काव्य धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा लिखित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘मानसरोदक खण्ड’ से ली गई हैं | इन पंक्तियों में पद्मावती की सखियों की जल-क्रीड़ा का वर्णन है |

व्याख्या : कवि कहता है कि वे सखियां जल में क्रीड़ा करने लगीं। उनकी सुन्दर चाल को देखकर हंस भी लज्जित होकर किनारे बैठ गया। सखियों ने पद्मावती को कौतुक (खेल) देखने वाली करके रखा और कहा कि तुम शशि के रूप में हम तारों रूपी सखियों की साक्षी बनकर रहो। तदनन्तर उन्होंने बाजी लगाकर खेल आरंभ किया कि जो खेलते हुए हारेगी उसे अपना हार देना पड़ेगा। सखियों में से गोरी सखियों ने गोरी सखियों को और सांवली सखियों ने सांवलियों को अपनी जोड़ी के लिए चुन लिया। समझ बूझकर एक साथ खेल खेलो जिससे कि अपना हार किसी दूसरे के हाथ न जा सके। आज अच्छी तरह खेल लो क्योंकि पुनः यह खेल खेलने को कहां मिलेगा। खेल के समाप्त हो जाने पर फिर कोई कहां खेलता है। वह खेल धन्य है जो प्रेम रस से परिपूर्ण होता है। उसमें प्रभुता और कुशल क्षेम दोनों बातें एक साथ उपलब्ध होती हैं।
कवि मुहम्मद (जायसी) कहते हैं कि प्रेम के क्षेत्र में जैसा भावे वैसा खेल खेलिए उससे आनन्दोपलब्धि ही होती है। जिस प्रकार सुगन्धित पुष्पों के साथ मिलने वाले तिलों का तेल सुगन्धित हो जाता है उसी प्रकार प्रेम की बाजी में कष्ट मिलने पर उसका अन्तिम परिणाम सुखदायक ही होता है।

पद 6

मूल:
सखी एक तेइं खेल न जाना । चित अचेत भइ हार गंवावा ।
कंवल डार गहि भै बेकरारा । कासों पुकारौं आपन हारा ।
कत खेलै आइउं एहि साथां । हार गंवाइ चलिउं सैं हाथां ।
घर पैठत पूंछब एहि हारू । कौनु उतर पाउबि पैसारू ।
नैन सीप आंसुन्ह तस भरे । जानहु मोति गिरहिं सब ढरे ।
सखिन्ह कहा भोरी कोकिला । कौनु पानि जेहि पौनु न मिला ।
हारु गंवाइ सो औसेहिं रोवा । हेरि हेराइ लेहु जौं खोवा ।
लागीं सब मिलि हेरै बूड़ि बूड़ि एक साथ।
कोई उठी मोंति लै घोंघा काहू हाथ ॥
(6)

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियों सूफी काव्य धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा लिखित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘मानसरोदक खण्ड’ से ली गई हैं | इन पंक्तियों में एक सखी की असावधानी से हार खो जाने और उसे खोजने का वर्णन है |

व्याख्या : उनमें से एक सखी को खेलना नहीं आता था। वह हृदय से असावधान हो गई अतः उसका हार खो गया और वह चित्त से बेसुध हो गई। वह कमल की नाल को पकड़कर व्याकुलतापूर्वक रोने लगी कि मैं अपना हार किससे मांगू ? मैं इनके साथ खेलने ही क्यों आई थी कि स्वयं अपने ही हाथों से अपना हार गंवा चली हूं। मुझसे घर में प्रवेश करने के समय इस हार के विषय में पूछा जाएगा तो मैं क्या उत्तर दूंगी। मैं क्या उत्तर देकर घर में प्रवेश पा सकूंगी। उसके सीपियों जैसे नेत्रों से आंसू ढुलकने लगे। वे ऐसे प्रतीत होते थे मानो मोती गिर रहे हों। सखियों ने कहा कि अरी भोरी कोकिल! ऐसा कौन-सा पानी (वर्षा) होता है जिसमें पवन (अंधड़) न मिला होता हो अर्थात् ऐसा कौन-सा सुख है जिसमें दुःख न मिला होता हो ? खेल के आनन्द के साथ यह दुःख भी उस प्रकार मिला हुआ था। जिसका हार खो जाता है, वह ऐसे ही रोया करता है। इसमें रोने की कौन-सी बात है, हार को स्वयं भी खोजो और हमसे भी खोज करवा लो।
सभी सखियां एक साथ डुबकी लगा लगाकर उस हार को खोजने लगीं। उनमें से किसी के हाथ मोती लगा जबकि किसी के हाथ घोंघा मात्र लगे और वह घोंघा लेकर ही जल के ऊपर आई।

पद 7

मूल:
कहा मानसर चहा सो पाई । पारस रूप इहां लगि आई ।
भा निरमर तेन्ह पायन परसें । पावा रूप रूप के दरसें ।
मलै समीर बास तन आई । भा सीतल गै तपनि बुझाई ।
न जनौं कौनु पौन लै आवा । पुन्नि दसा भै पाप गंवावा ।
ततखन हार बेगि उतिराना । पावा सखिन्ह चंद बिहंसाना ।
बिगसे कुमुद देखि ससि रेखा । भै तेहिं रूप जहां जो देखा ।
पाए रूप रूप जस चहे । ससि मुख सब दरपन होइ रहे ।
नैन जो देखे कंवल भए निरमर नीर सरीर।
हंसत जो देखे हंस भए दसन जोति नग हीर ॥
(7)

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियों सूफी काव्य धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा लिखित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘मानसरोदक खण्ड’ से ली गई हैं | पद्मावती के चरणों का स्पर्श बातें ही सरोवर हार को प्रकट कर देता है इस तथ्य के साथ कवि ने पद्मावती के दैवी रूप का वर्णन किया है |

व्याख्या : मानसरोवर ने कहा (सोचा) कि मेरी जो इच्छा थी वह पूर्ण हो गई है। पारस रूपी पद्मावती स्वयं चलकर यहां मेरे पास आ गई है। मैं उसके चरणों का स्पर्श करके निर्मल हो गया हूं और मुझे उसके सौन्दर्य को देखकर स्वयं भी सुन्दरता की उपलब्धि हो गई है। उसके शरीर से मुझे मलयगिरि से आने वाली चन्दन जैसी की गन्ध आई है, जिससे मेरे शरीर का ताप शांत हो गया है और मै शीतल हो गया हूं। ज्ञात नहीं वह कौन सी वायु चली है जो पद्मावती को यहां तक ले आई है यह मेरे लिए पुण्य की दशा का स्वरूप है अथवा मेरे पुण्यों का प्रताप है। इस दर्शन और चरणों का स्पर्श करके मेरे सम्पूर्ण पाप नष्ट हो गए हैं। यह सोचते हुए सरोवर ने उस हार को तत्क्षण ही पानी से ऊपर तैरा दिया, जिसे सखियों ने प्राप्त कर दिया और पद्मावती रूपी चन्द्रमा मुस्कारा उठा। चन्द्रमा रूपी पद्मावती की मुस्कान को देखकर सखियां रूपी कलियां खिल उठीं। उस पद्मावती ने जिस किसी की ओर भी देखा वह पद्मावती जैसे रूप का ही हो गया। अन्य वस्तुओं का उसने जैसा भी रूप चाहा वैसा ही रूप हो गया। ऐसा लगता था मानो चन्द्रमुखी पद्मावती के वे सब दर्पण थे – अर्थात् दर्पण में व्यक्ति जैसे अपना प्रतिबिम्ब देखता है उसी प्रकार पद्मावती भी विविध पदार्थों में अपने शरीरांगों की परछाईं या प्रतिबिम्ब देख रही थी।
पद्मावती के नेत्रों का प्रतिबिम्ब मानसरोवर के जल में कमलों के रूप में दिखाई दे रहा था, उसका निर्मल शरीर मानो सरोवर में प्रतिबिम्बित निर्मल जल था। उसकी हंसी ही मानो प्रतिबिम्बित होने वाले हंस थे और उसके दांतों का प्रतिबिम्ब ही मानो नग और हीरे थे।

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