सामान्य अर्थ में भाषा और वाक् में कोई विशेष अंतर नहीं हैं | आरम्भ में भाषा के लिये ही वाक् शब्द का प्रयोग किया जाता था | लेकिन कालांतर में भाषा और वाक् को दो भिन्न अर्थो में प्रयोग किया जाने लगा |
भाषा — अतः भाषा वह साधन है जिसके माध्यम से मनुष्य अपने विचारों को दूसरों के सामने प्रकट करता है तथा दूसरों के विचारों को समझता है | अर्थात भाषा वैचारिक अभिव्यक्ति का माध्यम है |
भाषा ‘भाष’ धातु से बना है जिसका अर्थ है – बोलना | अतः वाणी के माध्यम से भावाभिव्यक्ति ही भाषा है |
वाक् — ‘वाक्’ का अर्थ ‘वाणी’ से है | मानव मुख से उच्चरित धवनियाँ ही ‘वाक्’ हैं | अतः वाक् भी भावाभिव्यक्ति का माध्यम है |
पाश्चात्य भाषाविद सस्यूर प्रथम व्यक्ति हुए जिन्होंने भाषा और वाक् के भेद को स्पष्ट किया | सस्यूर ने भाषा और वाक् में निम्नलिखित अंतर बताया —
(1) भाषा एक व्यवस्था है जबकि वाक् उसका उच्चरित या लिखित व्यक्त रूप |
(2) भाषा अपने बोलने वाले समाज के मस्तिष्क में होती है जबकि वाक् व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त ध्वनिगत रूप होता है | अतः भाषा का स्वरूप सामजिक और वाक् का स्वरूप वैयक्तिक होता है |
(3) भाषा की सत्ता मानसिक होती है जबकि वाक् की सत्ता भौतिक |
(4) भाषा वाक् का समष्टिगत रूप है तो वाक् भाषा का व्यक्तिगत रूप |
(5) भाषा अमूर्त होती है तो वाक् मूर्त |
(6) भाषा पूर्वनिर्धारित व पूर्व-व्यवस्थित होती है जबकि वाक् तात्कालिक होती है जिसका व्यवस्थित स्वरूप नहीं होता |
संक्षिप्ततः स्यूर ने दोनों को ही वास्तविक माना है लेकिन सस्यूर के अनुसार दोनों की वास्तविकता में अंतर होता है। भाषा की वास्तविकता मस्तिष्क में है, तो वाक् की भौतिक जगत में | सस्यूर द्वारा चिह्नित ये अंतर आगे भी भाषाविज्ञान के क्षेत्र में विकसित होने वाले नए-नए सम्प्रदायों में किसी न किसी रूप में स्वीकृत हुए। कोपेनहैगन सम्प्रदाय ने भाषा को अमूर्त तथा वाक् को मूर्त कहा। प्राग सम्प्रदाय ने स्वनिम की सत्ता ‘भाषा’ में तथा उपस्वन की सत्ता ‘वाक्’ में मानी है | चामस्की के अनुसार भावाभिव्यक्ति का समाज द्वारा अपेक्षित रूप भाषा है जबकि व्यक्ति द्वारा व्यक्त रूप वाक् है |
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