पद्मावत : नागमती संदेश खण्ड ( Padmavat : Nagmati Sandesh Khand )

(1)

फिरि-फिरि रोई, न कोई डोला। आधी राति विहंगम बोला ॥
तैं फिरि-फिरि दाघे सब पाँखी । केहि दुःख रैनि ने लावसि आँखी ॥
नागमती कारन के रोई। का सोवै जौं कंत बिछोई ॥ मन चित हुतें न बिसरं भरें। नेन कजल चखु रहे न मोरें ॥
कहिसि जाति हाँ सिंघल दीपा । तेहि सेवाति कहँ नैना सीपा ॥
जोगी होइ निसरा सो नाहू। तब हुत कहा संदेस न काहू ॥
निति पूछों सब जोगी जंगम कोइ निजु बात न कहै बिहंगम ॥

चारिउ चक्र उजारि भे, सकसि संदेसा टेकु ।
कहौँ बिरह दुःख आपन, बैठि सुनहि डँड एकु ॥ (1)

शब्दार्थ

  • फिरि-फिरि: करवटें बदल-बदल कर / बार-बार
  • डोला: जागा / हिला
  • विहंगम / बिहंगम: पक्षी
  • दाघे: जला दिए
  • पाँखी: पक्षी (या पंख)
  • रैनि: रात
  • लावसि आँखी: आँखें लगाना / नींद आना
  • कंत / नाहू: पति / स्वामी (राजा रत्नसेन)
  • बिछोई: बिछड़ गया है
  • बिसरं: भूलता है
  • चखु / नैना: आँखें
  • सेवाति: स्वाति नक्षत्र (जिसकी बूँद के लिए सीप तरसती है)
  • निसरा: निकल गया / प्रस्थान कर गया
  • जंगम: भ्रमणशील संन्यासी
  • निजु: निश्चित / प्रामाणिक
  • चारिउ चक्र: चारों दिशाएँ (समस्त संसार)
  • उजारि भे: उजड़ गए हैं / सूने हो गए हैं
  • टेकु: सहारा
  • डँड एकु: एक दंड (समय की माप, लगभग 24 मिनट) / कुछ पल

व्याख्या : मलिक मुहम्मद जायसी रचित ‘पद्मावत’ के ‘नागमती संदेश खंड’ से उद्धृत इन पंक्तियों में आधी रात के सन्नाटे में करवटें बदल-बदल कर रोती नागमती की पीड़ा से द्रवित होकर एक पक्षी उससे पूछता है कि तुम अपने संताप की आग से हम पक्षियों को क्यों जला रही हो और किस दुःख के कारण रात भर सोती नहीं हो; इसके उत्तर में नागमती अपना विरह-दुःख प्रकट करते हुए कहती है कि जिसका प्रियतम बिछड़ गया हो उसे नींद कैसे आ सकती है, क्योंकि वे मन से एक पल के लिए भी नहीं भुलाए जाते और निरंतर आँसू बहने के कारण मेरी आँखों में काजल भी नहीं टिक पाता। वह पक्षी को बताती है कि उसके पति सिंहलद्वीप जाने की बात कहकर योगी के वेश में घर से निकले थे, तब से मैं स्वाति नक्षत्र की बूँद रूपी अपने पति की प्रतीक्षा में आँखों को सीप बनाए बैठी हूँ, किंतु न तो किसी ने उनका कोई संदेश दिया और न ही नित्य भटकने वाले योगियों-संन्यासियों में से किसी ने उनके बारे में कोई निश्चित बात बताई। अंत में नागमती पक्षी से प्रार्थना करती है कि पति के बिना मेरे लिए चारों दिशाएँ (समस्त संसार) सूनी हो गई हैं, इसलिए हे पक्षी, यदि तुम मेरा संदेश पहुँचाकर मुझे सहारा दे सको, तो कुछ पल (एक दंड) ठहरकर मेरे विरह की व्यथा सुन लो।

(2)

तासौं दुःख कहिए, हो बीरा। जेहि सुनि कै लागैं पर पीरा ।।
को होइ भीवँ दँगवै परगाहा। को सिंघल पहुँचावै चाहा ।।
जहाँ सो कंत गए होइ जोगी। हौं किंगरी भै झुरौं बियोगी ।।
ओहूँ सिंगी पूरै, गुरु भेंटा। हौं भै भस्म, न आइ समेटा ।।
कथा जो कहै आइ पिय केरी। पाँवरि होउँ, जनम भरि चेरी ।।
ओहि के गुन सँवरत भै माला। अबहुँ न बहुरा उड़िगा छाला ।।
बिरह गुरुइ, खप्पर कै हिया। पवन अधार रहा होइ जिया ।।

हाड़ भए झुरि किंगरी, नसें भई सब ताँति ।
रो-रो तन धुनि उठै, कहेसु बिया एहि भाँति ।। (2)

शब्दार्थ:

  • बीरा: भाई (पक्षी को संबोधित)
  • पर पीरा: दूसरों की पीड़ा या दुःख
  • भीवँ: भीम (महाभारत के पात्र, शक्तिशाली रक्षक के रूप में)
  • दँगवै: पार लगाए / उबारे
  • परगाहा: अथाह विपत्ति या गहरा सागर
  • कंत: पति (राजा रत्नसेन)
  • किंगरी: योगियों द्वारा बजाया जाने वाला एक तंतु-वाद्य यंत्र
  • झुरौं: सूख रही हूँ
  • सिंगी: योगियों द्वारा बजाई जाने वाली सींग की नाद/बाँसुरी
  • पूरै: बजाई
  • भस्म: राख
  • पाँवरि: पैरों की जूती / चरणपादुका
  • चेरी: दासी / सेविका
  • सँवरत: स्मरण करते हुए / नाम जपते हुए
  • बहुरा: वापस लौटा
  • छाला: मृगछाला (जिसे योगी धारण करते हैं)
  • गुरुइ: भारी (विरह) या गुरु (मार्गदर्शक)
  • खप्पर: योगियों का भिक्षा-पात्र
  • हिया: हृदय
  • पवन अधार: हवा के सहारे
  • ताँति: तार (वाद्य यंत्र के)
  • धुनि: ध्वनि / स्वर / करुण पुकार
  • बिया: व्यथा / दुःख

व्याख्या: मलिक मुहम्मद जायसी रचित ‘पद्मावत’ के ‘नागमती संदेश खंड’ से ली गई इन पंक्तियों में नागमती पक्षी (विहंगम) को भाई कहकर संबोधित करते हुए कहती है कि हे भाई, अपना दुःख उसी से कहना चाहिए जो दूसरों की पीड़ा सुनकर उसे महसूस कर सके, अतः अब ऐसा कौन शक्तिशाली (भीम जैसा) रक्षक है जो मुझे इस अथाह विपत्ति-सागर से पार लगाए और स्वेच्छा से मेरा संदेश सिंहलद्वीप तक पहुँचाए। वह अपनी विरह-व्यथा का योगियों के प्रतीकों के माध्यम से मार्मिक वर्णन करते हुए कहती है कि जहाँ मेरे पति योगी होकर चले गए हैं, उनके वियोग में सूखकर मैं ‘किंगरी’ (वाद्य यंत्र) हो गई हूँ; उन्होंने तो वहाँ सींगी बजाकर अपने गुरु से भेंट कर ली, किंतु यहाँ मैं विरह की आग में जलकर भस्म हो गई और वे मेरी राख समेटने भी नहीं आए। नागमती आगे कहती है कि जो भी आकर मुझे मेरे प्रियतम का समाचार देगा, मैं जन्म भर के लिए उसके पैरों की जूती और दासी बन जाऊँगी; मैं उनके गुणों का स्मरण करते-करते सूखकर जपने वाली माला हो गई हूँ, किंतु जो मृगछाला पहनकर घर से चला गया वह प्रियतम अब तक लौटकर नहीं आया। मैंने इस भारी विरह को ही अपना गुरु मान लिया है, अपने हृदय को भिक्षा-पात्र (खप्पर) बना लिया है और अब मेरे प्राण केवल हवा पीकर ही (श्वासों के सहारे) टिके हुए हैं। अंत में अपनी दयनीय दशा का चित्रण करते हुए वह कहती है कि मेरी हड्डियाँ सूखकर किंगरी का ढाँचा बन गई हैं और शरीर की सारी नसें उस वाद्य यंत्र के तार (ताँत) बन गई हैं, जिनसे रोने पर निरंतर करुण ध्वनि उठती रहती है; इस प्रकार नागमती ने अपनी मर्मस्पर्शी विरह-व्यथा उस पक्षी के सामने प्रकट की।

(3)

रतनसेनि कै माइ सुरसती। गोपीचंद जसि मैनावती ।।        
आँधरि बूढ़ि सुतहि दुःख रोवा। जोबन रतन कहाँ भुँइ टोवा ।।
जोबन अहा लीन्ह सो काढ़ी। भै बिनु टेक करै को ठाढ़ी ।।
बिनु जोबन भौ आस पराई। कहाँ सपूत खाँभ होइ आई ।।
नैनन्ह दिस्टि त दिया बराहीं। घर अँधियार पूत जौं नाहीं ।।
को रे चलाव सरवन के ठाऊँ। टेक देहि ओहि टेकौं पाऊँ ।।
तुम्ह सरवन होइ काँवरि सजी। डारि लाइ सो काहे तजी ।।

सरवन सरवन कै ररि मुई सो, काँवरि डारहि लागि ।
तुम्ह बिनु पानि न लावे, दसरथ लावै आगि ।। (3)

शब्दार्थ:

  • सुरसती: राजा रत्नसेन की माता का नाम (सरस्वती)
  • मैनावती: राजा गोपीचंद की माता (जो पुत्र के वैराग्य लेने पर बहुत रोई थीं)
  • सुतहि: पुत्र के लिए
  • जोबन रतन: यौवन का रत्न (यहाँ वृद्धावस्था के एकमात्र सहारे, पुत्र रत्नसेन के लिए प्रयुक्त)
  • भुँइ: भूमि / ज़मीन
  • टोवा: टटोलती है
  • टेक: सहारा
  • ठाढ़ी: खड़ा करना
  • पराई: दूसरों पर (आश्रित)
  • खाँभ: खंभा / स्तंभ / मजबूत सहारा
  • दिस्टि: दृष्टि / रोशनी
  • बराहीं: जलता था
  • सरवन: श्रवण कुमार (मातृ-पितृ भक्त)
  • ठाऊँ: स्थान / जगह
  • काँवरि: काँवर / बहँगी (जिसमें श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता को तीर्थयात्रा कराई थी)
  • तजी: छोड़ दी / त्याग दी
  • ररि मुई: रटते-रटते (पुकारते हुए) मरणासन्न हो गई है
  • पानि न लावे: पानी नहीं पिलाता
  • दसरथ लावै आगि: (श्रवण को बाण मारने वाले) दशरथ की तरह वियोग ने शोक की आग लगा दी है

व्याख्या: मलिक मुहम्मद जायसी रचित ‘पद्मावत’ के ‘नागमती संदेश खंड’ की इन पंक्तियों में नागमती पक्षी के माध्यम से राजा रत्नसेन की वृद्ध माता ‘सुरसती’ की अत्यंत दयनीय और मर्मस्पर्शी दशा का वर्णन करते हुए कहती है कि वह अपने पुत्र के वियोग में गोपीचंद की माता मैनावती की तरह फूट-फूटकर रो रही है। वह अंधी और बूढ़ी माता अपने पुत्र-रत्न को खोजते हुए हाथों से जमीन टटोलती रहती है और विलाप करती है कि बुढ़ापे में उसका एकमात्र सहारा छिन गया है, जिसके बिना अब उसे थामकर खड़ा करने वाला कोई नहीं है और वह पूरी तरह दूसरों की मोहताज हो गई है। वह रोते हुए कहती है कि जब तक पुत्र रूपी दृष्टि पास थी, तब तक घर में दीपक जलता था, लेकिन पुत्र के बिना अब पूरा घर अंधकारमय हो गया है; अब उस श्रवण कुमार जैसे सुपुत्र का स्थान कौन लेगा जो स्तंभ बनकर मुझे सहारा देगा? वह अपने पुत्र को उलाहना देती है कि तुमने श्रवण कुमार बनकर मेरे लिए काँवर तो सजाई थी, किंतु मुझे उसमें बिठाकर बीच राह में ही बेसहारा क्यों छोड़ दिया; अब वह अंधी माता ‘श्रवण-श्रवण’ पुकारते हुए उस काँवर को पकड़े हुए मरणासन्न स्थिति में पहुँच गई है और कहती है कि हे पुत्र, तुम्हारे बिना अब मुझे कोई एक घूँट पानी पिलाने वाला भी नहीं बचा है, और ऐसा प्रतीत होता है मानो (श्रवण को तीर मारने वाले) दशरथ की तरह इस क्रूर वियोग ने ही मेरे हृदय में शोक की आग लगा दी है।

(4)

लै सो सँदेस बिंहगम चला। उठी आगि बिनसा सिंघला ।।
बिरह बजागि बीच को ठेघा । घूम जो उठे स्याम भए मेघा ।।
भरि गा गँगन लूकि तसि छूटी। होइ सब नखत गिरहिं भुइँ टूटी ।।
जहँ जहँ पुहुमी जरी भा रेहू। बिरह के दगध होइ जनि केहू ।।
राहु केतु, जरि लंका जरी। औ उड़ि चिनगि चाँद महँ परी ।।
जाइ बिंहगम समुँद डफारा। जरे माँछ पानी भा खारा।।
दाधे बन तरिवर, जल सीपा । जाइ नियर भा सिंघल दीपा ।

समुँद तीर एक तरिवर, जाइ बैठ तेहि रूख |
जब लगि कह न सँदेसरा, ना ओहि प्यास न भूख || (4)

शब्दार्थ:

  • बिहंगम: पक्षी
  • बिनसा: नष्ट हो गया / भस्म होने लगा
  • बजागि: वज्राग्नि (अत्यंत भयंकर आग)
  • ठेघा: रुका / सहा
  • घूम: धुआँ
  • स्याम: काले
  • मेघा: बादल
  • गँगन: आकाश
  • लूकि: लपटें / उल्का पिंड
  • तसि: वैसी ही
  • नखत: नक्षत्र / तारे
  • भुइँ: ज़मीन / धरती
  • पुहुमी: पृथ्वी / धरती
  • जरी: जली
  • रेहू: राख / क्षार (बंजर मिट्टी)
  • दगध: जला हुआ / भस्म
  • जनि: मत / न
  • चिनगि: चिनगारी
  • डफारा: पुकारा / दहाड़ा (या पार किया)
  • माँछ: मछलियाँ
  • दाधे: जल गए
  • तरिवर / रूख: पेड़ / वृक्ष

व्याख्या: मलिक मुहम्मद जायसी रचित ‘पद्मावत’ के ‘नागमती संदेश खंड’ की इन पंक्तियों में नागमती और माता सुरसती का विरह-संदेश लेकर उड़ने वाले पक्षी का अत्यंत अतिशयोक्तिपूर्ण और मार्मिक चित्रण किया गया है; कवि कहता है कि जब वह पक्षी नागमती का दुःखभरा संदेश लेकर उड़ा, तो ऐसा लगा मानो उसकी विरह-अग्नि से पूरा सिंहलद्वीप भस्म हो जाएगा। नागमती के विरह की वह वज्राग्नि इतनी भयंकर थी कि रास्ते में उसे कोई रोक या सह नहीं सका, और उस आग से जो धुआँ उठा, उसी से आसमान के बादल काले हो गए; वह विरह की आग आकाश तक फैल गई और उससे ऐसी भयंकर लपटें (उल्काएँ) छूटने लगीं कि सारे नक्षत्र टूट-टूटकर धरती पर गिरने लगे। उस आग की तपन से जहाँ-जहाँ की धरती जली, वहाँ की मिट्टी राख (रेह) हो गई; कवि कामना करता है कि ऐसी विरह की आग में कोई न जले, क्योंकि इसी आग से राहु-केतु जल गए, लंका भस्म हो गई और इसी की एक चिनगारी उड़कर चाँद में जा गिरी जिससे उसमें दाग़ पड़ गया। वह पक्षी उड़ते हुए समुद्र के पास पहुँचा तो उसके संदेश की गर्मी से समुद्र का पानी खारा हो गया, मछलियाँ जल गईं, जंगल के पेड़-पौधे और जल की सीपियाँ तक जल उठीं; इस प्रकार वह पक्षी सिंहलद्वीप के निकट जा पहुँचा। अंत में कवि बताता है कि सिंहलद्वीप पहुँचकर वह पक्षी समुद्र के किनारे एक पेड़ पर जा बैठा, और उसने यह प्रण कर रखा था कि जब तक वह नागमती का संदेश राजा रत्नसेन को नहीं सुना देगा, तब तक उसे न भूख लगेगी और न ही प्यास।

(5)

रतनसेनि बन करत अहेरा। कीन्ह ओहि तरुवर तर फेरा।।
सीतल बिरिछ समुद्र के तीरा। अति उतंग औ छाँह गंभीरा।।
तुरै बाँधि कै बैठु अकेला। औरु जो साथ करें सब खेला।।
देखेसि फरी जो तरुवर साखा । बैठि सुनहिं पाँखिन्ह कैं भाखा ।।
उन्ह महँ ओहि बिहंगम अहा। नागमती जासौं दुःख कहा ।।
पूँछहिं सबैं बिहंगम नामा। अहो मीत काहे तुम्ह स्यामा ।।
कहेसि मीत मासक दुइ भए । जंबू दीप तहाँ हम गए।।

नगर एक हम देखा, गढ़ चितउर ओहि नाउँ ।
सो दुःख कहौं कहाँ लगि, हम दाघे तेहि ठाऊँ ।। (5)

शब्दार्थ:

  • अहेरा: शिकार
  • तरुवर तर: पेड़ के नीचे
  • फेरा कीन्ह: चक्कर लगाया / आ पहुँचा
  • उतंग: बहुत ऊँचा
  • गंभीरा: घनी (छाया)
  • तुरै: घोड़ा
  • फरी: फली हुई / फलों से लदी हुई
  • पाँखिन्ह: पक्षियों की
  • भाखा: भाषा / बोली
  • बिहंगम: पक्षी
  • स्यामा: काला
  • मासक दुइ: लगभग दो महीने
  • जंबू दीप: जम्बूद्वीप (यहाँ भारतवर्ष के संदर्भ में)
  • दाघे: जल गए
  • ठाऊँ: स्थान / जगह

व्याख्या: मलिक मुहम्मद जायसी रचित ‘पद्मावत’ के ‘नागमती संदेश खंड’ की इन पंक्तियों में कवि बताता है कि राजा रत्नसेन वन में शिकार खेलते हुए समुद्र के किनारे उसी अत्यंत ऊँचे और घनी छाया वाले शीतल वृक्ष के नीचे आ पहुँचे, जहाँ नागमती का संदेशवाहक पक्षी बैठा था। राजा अपना घोड़ा बाँधकर वहाँ अकेले ही विश्राम करने लगे, जबकि उनके अन्य साथी इधर-उधर क्रीड़ा करने (घूमने) चले गए; राजा ने फलों से लदी उस वृक्ष की शाखाओं की ओर देखा और बैठे-बैठे पक्षियों की भाषा (बोलियाँ) सुनने लगे। उन पक्षियों के बीच वही पक्षी भी मौजूद था जिससे नागमती ने अपना विरह-दुःख कहा था और वहाँ के अन्य सभी पक्षी उससे उसका नाम तथा उसके काले रंग का कारण पूछते हुए कह रहे थे कि “हे मित्र! तुम इतने काले क्यों हो?” इसके उत्तर में उस पक्षी ने बताया कि हे मित्रों, लगभग दो महीने पहले मैं जम्बूद्वीप गया था, जहाँ मैंने एक नगर देखा जिसका नाम चित्तौड़गढ़ है; मैं वहाँ के दारुण दुःख का वर्णन कहाँ तक करूँ, मैं तो उसी स्थान पर (नागमती के) विरह की भयंकर आग की लपटों में झुलसकर काला पड़ गया हूँ।

(6)

जोगी होई निसरा जो राजा। सून नगर जानहुँ धुँध बाजा ।।
नागमती है ताकरि रानी। जरि बिरहैं, भै कोइलि बानी ।।
अब लगि जरि होइहि भै छारा । कहि न जाइ बिरहा कै झारा ।।
हिया फाट वह जबहिं कुहूकी। परे आँसु होइ होइ सब लूकी ।।
चहुँ खंड छिटकि परी वह आगी । धरती जरत गँगन कहँ लागी ।।
बिरह दवा अस को रे बुझावा। चहै लागि जरि हियरे धावा ।।
हौं पुनि तहाँ डहा दव लागा। तन भा स्याम, जीव ले भागा ।।

का तुम्ह हँसहु गरब के, करहु समुद्र महँ केलि ।
मति ओहि बिरहे बसि परहु, दहैं अगिनि जल मेलि ।। (6)

शब्दार्थ:

  • निसरा: निकल गया / प्रस्थान किया
  • सून: सूना / उजाड़
  • धुँध बाजा: अंधकार छा गया (या सूनेपन का डंका बज गया)
  • ताकरि: उसकी
  • छारा: राख / भस्म
  • झारा: आग की लपटें / ज्वाला का ताप
  • कुहूकी: कोयल की तरह दर्द भरी आवाज़ में रोना / विलाप करना
  • लूकी: उल्का-पिंड / आग की चिनगारी
  • चहुँ खंड: चारों दिशाओं में
  • दवा: दावानल (जंगल की भयंकर आग)
  • धावा: दौड़ती है / आक्रमण करती है
  • डहा: झुलस गया
  • दव: आग
  • स्याम: काला
  • गरब: गर्व / घमंड
  • केलि: जल-क्रीड़ा / खेल
  • मति: मत (निषेध)
  • दहैं: जला देगी
  • जल मेलि: जल के भीतर भी

व्याख्या: मलिक मुहम्मद जायसी रचित ‘पद्मावत’ के ‘नागमती संदेश खंड’ से ली गई इन पंक्तियों में वह संदेशवाहक पक्षी (विहंगम) राजा रत्नसेन के सामने वृक्ष पर बैठे अन्य पक्षियों को अपनी आपबीती और चित्तौड़ की दशा सुनाते हुए कहता है कि जब से वहाँ का राजा योगी बनकर निकला है, पूरा नगर सूना हो गया है और वहाँ शोक का अंधकार छा गया है। उस राजा की रानी नागमती विरह की आग में जलकर कोयल के समान काली हो गई है और अब तक तो वह जलकर राख भी हो चुकी होगी, क्योंकि उसके वियोग की ज्वाला का ताप शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता। जब वह विरह में तड़पकर कोयल की भाँति कुहकती (विलाप करती) है तो हृदय फट जाता है और उसकी आँखों से गिरने वाले आँसू आग की चिनगारियों (उल्काओं) में बदल जाते हैं; उसके विरह की वह आग चारों दिशाओं में फैल गई है जो धरती को जलाते हुए आकाश तक जा पहुँची है। पक्षी कहता है कि विरह के इस दावानल को भला कौन बुझा सकता है, यह तो सीधा हृदय पर धावा बोलती है; मैं भी उसी आग की चपेट में आकर झुलस गया, जिससे मेरा शरीर काला पड़ गया और मैं किसी तरह अपनी जान बचाकर वहाँ से भागा हूँ। अंत में वह पक्षी समुद्र में क्रीड़ा कर रहे अन्य जल-पक्षियों को चेतावनी देते हुए कहता है कि तुम लोग घमंड में हँसते हुए इस समुद्र में जो जल-क्रीड़ा कर रहे हो, कहीं भूल से भी उस विरह की आग की चपेट में मत आ जाना, अन्यथा वह इतनी भयंकर है कि तुम्हें इस अगाध जल के भीतर भी भस्म कर देगी।

(7)

सुनि चितउर राजै मन गुना । बिधि संदेश मैं कासौं सुना ।।
को तरिवर अस पँखी भेसा। नागमती कर कहै संदेसा ।।
को तूं मत मन चित्त बसेरू । देव की दानौ पौन पखेरू ।।
रुद्र ब्रह्म हरि बाचा तोही । सो निजु अंत बात कहु मोही ।।
कहाँ सो नागमती तुइँ देखी। कहेसु बिरह जस मतरन विसेखी ।।
हौं राजा सोई भा जोगी। जेहि कारन वह औसि बियोगी ।।
जस तूं पंखि होहुँ दिन भरऊँ। चहौं कबहुँ जाइ उड़ि परऊँ ।।

पंखि आँखि तेहि मारग, लागी दुनहुँ रहाहिं |
कोइ न संदेसी आवहिं, तेहि क सँदेस कहाहिं || (7)

शब्दार्थ:

  • मन गुना: मन ही मन विचार किया / सोचा
  • बिधि: हे विधाता / ईश्वर
  • कासौं: किससे
  • भेसा: वेश / रूप
  • मत मन चित्त बसेरू: मन-मस्तिष्क पर छा जाने वाला / रहस्यमयी या अंतर्यामी
  • देव की दानौ: तू देवता है या दानव
  • पौन पखेरू: हवा में उड़ने वाला (दिव्य) पक्षी
  • रुद्र ब्रह्म हरि: शिव, ब्रह्मा और विष्णु
  • बाचा तोही: तुझे सौगंध / कसम है
  • निजु अंत: वास्तविक / हृदय की सच्ची बात
  • मतरन विसेखी: मृत्यु से भी अधिक (मरण-बिसेखी) / अत्यंत मर्मभेदी
  • औसि: ऐसी / इस अवस्था में
  • भरऊँ: उड़ान भरूँ
  • दुनहुँ: दोनों (आँखें)
  • रहाहिं: रहती हैं / लगी हैं

व्याख्या: मलिक मुहम्मद जायसी रचित ‘पद्मावत’ के ‘नागमती संदेश खंड’ की इन पंक्तियों में पक्षी के मुख से अपनी पत्नी नागमती के विरह की मार्मिक कथा सुनकर राजा रत्नसेन मन ही मन आश्चर्यचकित होकर विचार करने लगे कि हे विधाता, आज मैंने यह संदेश किससे सुन लिया! वृक्ष पर पक्षी के वेश में यह कौन है जो नागमती का संदेश सुना रहा है? वे उस पक्षी से पूछते हैं कि हे मेरे मन-मस्तिष्क को विस्मित कर देने वाले रहस्यमयी प्राणी, तू कोई देवता है, दानव है या हवा में उड़ने वाला कोई दिव्य पक्षी? मैं तुझे ब्रह्मा, विष्णु और महेश (रुद्र) की सौगंध देता हूँ, तू मुझे सच-सच बता कि तूने उस नागमती को कहाँ देखा है जिसका मृत्यु से भी भयंकर विरह-दुःख तूने अभी सुनाया है? राजा अपना परिचय देते हुए कहते हैं कि मैं ही वह अभागा राजा हूँ जो योगी बनकर निकल आया था और जिसके कारण वह वियोग में ऐसी तड़प रही है; काश! मेरे पास भी तुम्हारी तरह पंख होते तो मैं भी अभी उड़ान भरकर सीधे उसी के पास जा पहुँचता। अंत में राजा अपनी विवशता और पीड़ा प्रकट करते हुए कहते हैं कि हे पक्षी! मेरी दोनों आँखें उसी के मार्ग की ओर लगी रहती हैं, किंतु वहाँ से कोई ऐसा संदेशवाहक नहीं आता जो मुझे उसका संदेश सुना सके, इसलिए अब तुम ही मुझे उसकी पूरी बात बताओ।

(8)

पूँछहि काह सँदेस वियोगू। जोगी भया न जानसि जोगू ।।
दहिने संख न सिंगी पूरे । बाएँ पूरी बादि दिन झूरे ।। तेलि बैल जस बाएँ फिरे। परा भैरा महँ सौंह न तिरै ।। तुरी और नाव दाहिन रथ हाँका। बाएँ फिरै कोंहार क चाका ।।
तोहि असि नाहीं पंख भुलाना। उड़े सो आदि लगत महँ जाना ।।
एक दीप का आवउँ तोरे। सब संसार पाव तर मोरे ।। दहिने फिर सो बस उजियारा । जस जब चाँद सुरुज औ तारा ।।

मुहमद बाइँ दिसि तजी, एक सरवर एक आँखि |
जब ते दाहिन होइ मिला, बोलु पपीहा पाँखि || (8)

शब्दार्थ:

  • दहिने / दाहिन: दाहिनी ओर / अनुकूल / शुभ दिशा (योग और दर्शन में सही मार्ग)
  • संख / सिंगी: योगियों के वाद्य (शंख और सींगी)
  • पूरे: बजाना / पूर्ण करना
  • बाएँ: बाईं ओर / प्रतिकूल / विपरीत दिशा
  • बादि: व्यर्थ / बेकार
  • झूरे: सूखना / नष्ट होना
  • भैरा / भँवर: भँवर / चक्कर (जल का भंवर)
  • सौंह न तिरै: सीधे पार नहीं उतरता
  • तुरी: घोड़ा
  • रथ हाँका: रथ चलाना
  • कोंहार क चाका: कुम्हार का चाक (पहिया)
  • पंख भुलाना: पंखों (सामर्थ्य) के भ्रम में भूल जाना
  • पाव तर: पैरों के नीचे (अधीन)
  • मुहमद: कवि मलिक मुहम्मद जायसी
  • सरवर: श्रवण (कान)
  • पपीहा पाँखि: पपीहा पक्षी (यहाँ कवि स्वयं को प्रेम-पुकार करने वाला पपीहा कहता है)

व्याख्या: मलिक मुहम्मद जायसी रचित ‘पद्मावत’ के ‘नागमती संदेश खंड’ की इन पंक्तियों में पक्षी राजा रत्नसेन को उपदेश देते हुए योग-साधना और जीवन के सही (दाहिने/अनुकूल) मार्ग का महत्त्व समझाता है। पक्षी राजा से कहता है कि तुम मुझसे वियोग का संदेश क्या पूछते हो, तुम तो योगी बनकर भी योग का सच्चा मर्म नहीं जानते; तुमने दाहिनी ओर से (सही मार्ग पर चलकर) शंख और सींगी नहीं बजाई, बल्कि बाईं ओर से (विपरीत मार्ग पर) चलकर अपने दिन व्यर्थ ही गँवा दिए। जो व्यक्ति बाईं ओर (उलटे मार्ग) पर चलता है, उसकी दशा कोल्हू के उस बैल जैसी हो जाती है जो जीवन भर उसी चक्कर में घूमता रहता है, या फिर वह भँवर में फँस जाता है और कभी सीधा पार नहीं उतर पाता। घोड़ा, नाव और रथ हमेशा दाहिनी ओर (सही दिशा में) हाँके जाते हैं, जबकि कुम्हार का चाक ही बाईं ओर (उलटा) घूमता है; इसलिए तुम अपने (योग या राजसत्ता के) भ्रम में मत भूलो, जो व्यक्ति सही दिशा में उड़ान भरता है, वही अपने लक्ष्य (अंत) तक पहुँचता है। पक्षी अपने सामर्थ्य का वर्णन करते हुए कहता है कि मैं तो एक द्वीप से आया हूँ, लेकिन मेरे पंखों की शक्ति से सारा संसार मेरे पैरों के नीचे है; जो दाहिनी ओर (सत्य और प्रेम के मार्ग पर) चलता है, उसी का संसार उज्ज्वल होता है, जैसे चंद्रमा, सूर्य और तारे सही दिशा में चलकर ही प्रकाश फैलाते हैं। अंत में कवि मुहम्मद जायसी अपना दार्शनिक निष्कर्ष देते हुए कहते हैं कि मैंने भी (सांसारिक मोह-माया रूपी) बाईं दिशा, एक कान और एक आँख को त्याग दिया है (कवि एक आँख और एक कान से हीन थे), और जब से मैं दाहिनी ओर (ईश्वर और सच्चे प्रेम के मार्ग) से जुड़ा हूँ, तब से यह पपीहा रूपी कवि निरंतर उसी प्रेम की पुकार कर रहा है।

(9)

हौं ध्रुव अचल सो दाहिन लावा। फिरि सुमेरु चितउर गढ़ आवा ।।
देखउँ तोरे मँदिल घमोई। माता तोरि आँधरि भै रोई ।। जस सरवन बिनु अंधी अंधा। तस ररि मुई, तोहि चित बँधा ।।
कहेसि मरौं, अब काँवरि रेंई। सरवन नाहिं, पानि को देई ।।
गई पिआस लागि तेहि साथाँ । पानि दिहें दसरथ के हाथों । ।
पानि न पियै, आगि पै चाहा। तोहि अस पूत जरम अस लाहा ।।
भागीरथी होई करु फेरा। जाइ सँवारू मरन कै बेरा ।।

तूँ सबूत मनि ताकरि, अस परदेस न लेहि |
अब ताई मुई होइहि, मुएहुँ जाइ गति देहि || (9)

शब्दार्थ:

  • ध्रुव अचल: ध्रुव तारे के समान स्थिर या दृढ़ निश्चय
  • दाहिन लावा: दाहिनी ओर रखकर (प्रदक्षिणा करके) / अनुकूल मार्ग पर चलकर
  • सुमेरु: सुमेरु पर्वत
  • मँदिल: मंदिर / महल
  • घमोई: घमोई नामक घास (अर्थात् महल सूना और उजाड़ हो गया है, जहाँ घास उग आई है)
  • ररि मुई: रो-रोकर मरणासन्न हो गई
  • रेंई: रखी है (काँवर)
  • साथाँ: साथ
  • लाहा: लाभ / फल
  • भागीरथी: भगीरथ (जिन्होंने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाया था)
  • फेरा करु: वापस लौट चलो
  • बेरा: समय / वेला
  • सबूत: सपूत (अच्छा पुत्र)
  • मनि: मणि / रत्न
  • ताकरि: उसका (माता का)
  • गति देहि: अंतिम संस्कार करके सद्गति या मोक्ष प्रदान करना

व्याख्या: मलिक मुहम्मद जायसी रचित ‘पद्मावत’ के ‘नागमती संदेश खंड’ की इन पंक्तियों में पक्षी राजा रत्नसेन को उनके महल और उनकी वृद्ध माता की अत्यंत कारुणिक दशा का वर्णन सुनाते हुए कहता है कि मैं ध्रुव तारे की भाँति दृढ़ निश्चय करके और सुमेरु पर्वत की प्रदक्षिणा (अनुकूल मार्ग का अनुसरण) करके चित्तौड़गढ़ पहुँचा। मैंने वहाँ जाकर देखा कि तुम्हारे महल में घास-फूस उग आई है (वह पूरी तरह उजाड़ हो गया है) और तुम्हारी माता तुम्हारे वियोग में रो-रोकर अंधी हो गई है; वह श्रवण कुमार के अंधे माता-पिता की तरह तुम्हारे ही ध्यान में रोते-रोते मरणासन्न अवस्था में पहुँच गई है। वह विलाप करती है कि उसका श्रवण (पुत्र) अब नहीं है, तो बेकार रखी उस काँवर में बिठाकर उसे कौन ले जाएगा और कौन उसे पानी पिलाएगा; यदि (श्रवण को मारने वाले) राजा दशरथ की तरह कोई अन्य व्यक्ति उसे पानी भी दे, तो वह उसे नहीं पीती, बल्कि वह तो अब अपने पुत्र के हाथों से केवल चिता की आग (अंतिम संस्कार) ही चाहती है और सोचती है कि तुम्हारे जैसे पुत्र को जन्म देने का उसे यही दुःखद फल मिला है। पक्षी राजा से आग्रह करता है कि हे राजा, अब तुम भगीरथ (जिन्होंने पूर्वजों का उद्धार किया था) बनकर वापस लौट चलो और अपनी माता के अंतिम समय को सँवारो; तुम अपनी माता के इकलौते सपूत और अनमोल रत्न हो, तुम्हें इस तरह परदेस में भटकना शोभा नहीं देता, अब तक तो शायद वह मर भी चुकी होगी, इसलिए अब जाकर कम से कम उसका अंतिम संस्कार करके उसे सद्गति (मोक्ष) ही प्रदान कर दो।

(10)

नागमती दुःख विरह अपारा। धरती सरग जरै तेहि झारा ।।
नगर कोट घर बाहिर सूना। नौजि होइ घर पुरुख बिहूना ।।
तू काँवरू परा बस लोना। भूला जोग, छरा जनु टोना ।।
ओहि तोहि कारन मरि मे बारा। रही नाग होइ पवन अधारा।।
कह चील्हन पिय पहँ लै, खाहू। माँसु न, कया जो रूचें काहू ।।
बिरह मंजूर, नाग वह नारी तूं मंजार करु बेगि गोहारी।।
माँसु गरा, पाँजर होइ परी। जोगी अबहुँ पहुँचु ले जरी ।।

देखि बिरह दुःख ताकर, मैं सो तजा बनवास ।
आऐंड भागि समुंद टट, तबहुं न छाँड़े पास।। (10)

शब्दार्थ:

  • अपारा: असीम / जिसका कोई पार न हो
  • सरग: स्वर्ग / आकाश
  • झारा: लपटें / ताप / गर्मी
  • नौजि: ऐसा कभी न हो / ईश्वर न करे
  • बिहूना: के बिना / हीन
  • काँवरू: कामरूप देश (असम, जो जादू-टोने के लिए प्रसिद्ध माना जाता था)
  • लोना: लोना चमारी (कामरूप की एक प्रसिद्ध लोक-जादूगरनी) / वशीकरण
  • छरा: छल लिया / धोखा दिया
  • मरि मे बारा: जल-जलकर मर रही है
  • पवन अधारा: केवल हवा के सहारे जीवित रहना (मान्यता है कि साँप हवा पीकर जीते हैं)
  • चील्हन: चीलों को (मांसाहारी पक्षियों को)
  • कया: काया / शरीर
  • मंजूर (मयूर): मोर (साँप का भक्षक/शत्रु)
  • नाग: नागिन (यहाँ नागमती)
  • मंजार / गरुड़: रक्षक (कुछ संस्करणों में यहाँ गरुड़ या मोर बनकर रक्षा करने का संदर्भ है)
  • गोहारी: रक्षा के लिए पुकार / सहायता
  • गरा: गल गया / समाप्त हो गया
  • पाँजर: अस्थिपंजर / कंकाल
  • जरी: जड़ी-बूटी / संजीवनी (योगी लोग जड़ी-बूटी रखते हैं)

व्याख्या: मलिक मुहम्मद जायसी रचित ‘पद्मावत’ के ‘नागमती संदेश खंड’ की इन पंक्तियों में पक्षी राजा रत्नसेन को उलाहना देते हुए नागमती की विरह-दशा का वर्णन करता है। वह कहता है कि नागमती का वियोग-दुःख असीम है और उसकी ज्वाला से धरती तथा आकाश दोनों जल रहे हैं; तुम्हारे बिना उसके लिए नगर, किला, घर-आँगन सब सूना हो गया है, विधाता करे कि किसी भी स्त्री का घर उसके पति (पुरुष) के बिना इस तरह उजाड़ न हो। पक्षी राजा पर व्यंग्य करते हुए कहता है कि तुम तो जैसे कामरूप देश की जादूगरनी (लोना चमारी) के जादू-टोने के वशीभूत हो गए हो, जिसने तुम्हें छल लिया है और तुम अपना वास्तविक योग-मार्ग भूलकर वहीं के हो गए हो। तुम्हारे कारण वह बेचारी जल-जलकर मर रही है और नागिन की तरह केवल हवा पीकर जीवित है; उसकी स्थिति इतनी दयनीय हो गई है कि वह चीलों (पक्षियों) से कहती है कि तुम मेरे इस शरीर को मेरे प्रियतम के पास ले चलो और वहीं ले जाकर खाओ, यद्यपि अब इसमें माँस नहीं बचा है फिर भी यह काया जिसे अच्छी लगे, खा ले। पक्षी रूपक बाँधते हुए कहता है कि विरह रूपी मोर उस नागमती रूपी नागिन को खाए जा रहा है, इसलिए हे राजा, तुम जल्दी आकर उसकी रक्षा करो; वियोग में गलकर उसका सारा माँस समाप्त हो गया है और वह केवल कंकाल (अस्थिपंजर) मात्र रह गई है, अतः एक योगी होने के नाते तुम अब कोई प्राणरक्षक जड़ी-बूटी (संजीवनी) लेकर शीघ्र उसके पास पहुँचो। अंत में वह पक्षी अपनी स्थिति बताता है कि नागमती के विरह का ऐसा भयंकर संताप देखकर ही मैंने जंगल का अपना निवास छोड़ दिया और अपनी जान बचाकर समुद्र के किनारे भाग आया, किंतु विरह की उस आग ने यहाँ भी मेरा पीछा नहीं छोड़ा है।

(11)

अस परजरा बिरह कर कठा। मेघ स्याम भै धुआँ जो उठा।।
दाघे राहु, केतु गा दाधा। सूरज जरा, चाँद जरि आधा ।।
औ सब नखत तराई जरहीं। टूटहिं लूक, धरनि महं परहीं ।।
जरी सो धरती ठाँवहि ठाँवाँ। ढंक परास जरे तेहि ठावाँ ।।
बिरह साँस तस निकसै झारा । धिकि धिकि परबत होहिं अंगारा ।।
भंवर पतंग जरे औ नागा। कोइलि, भुंजइल और सब कागा ।।
बन पंछी सब जिउ लै उड़े। जल पंछी जरि जल मइँ बुड़े ।।

हँहूँ जरत तहँ निकसा, समुँद बुझाएउ आइ ।
समुद्रौ जरा खार भा पानी, घूम रहा जग छाइ ।। (11)

शब्दार्थ:

  • परजरा: प्रज्वलित हुआ / भयंकर रूप से जला
  • कठा: काठ / लकड़ी या ईंधन
  • स्याम: काले
  • दाघे / दाधा / जरा: जल गए
  • नखत: नक्षत्र
  • तराई: तारे
  • लूक: उल्का-पिंड / टूटता हुआ तारा या आग का गोला
  • धरनि: धरती
  • ठाँवहि ठाँवाँ: जगह-जगह
  • ढंक परास: ढाक और पलाश के पेड़ (इनके फूल लाल होते हैं, कवि ने माना है कि ये विरह की आग से जलकर लाल हुए हैं)
  • झारा: ज्वाला / आग की लपटें
  • धिकि धिकि: धधक-धधक कर
  • भुंजइल: भुजंगा (एक प्रकार का काला पक्षी)
  • कागा: कौए
  • हँहूँ: मैं भी
  • खार: खारा / नमकीन
  • घूम: धुआँ

व्याख्या: मलिक मुहम्मद जायसी रचित ‘पद्मावत’ के ‘नागमती संदेश खंड’ की इन पंक्तियों में संदेशवाहक पक्षी राजा रत्नसेन के सामने नागमती के विरह-ताप का अत्यंत अतिशयोक्तिपूर्ण और मार्मिक वर्णन करता है। पक्षी बताता है कि नागमती का विरह रूपी काठ (ईंधन) कुछ इस तरह प्रज्वलित हुआ है कि उससे उठे धुएँ के कारण आसमान के सारे बादल काले पड़ गए; उसी विरह की भयंकर आग में राहु-केतु जल गए, सूरज झुलस गया और चाँद जलकर आधा ही रह गया। आकाश में सारे नक्षत्र और तारे उसी आग में जल रहे हैं और उल्का-पिंड (लूक) बनकर धरती पर टूट-टूटकर गिर रहे हैं, जिससे जगह-जगह की धरती जल उठी है और ढाक-पलाश के पेड़ उसी आग की चपेट में आकर (लाल रंग के) हो गए हैं। नागमती की विरह-भरी साँसों से ऐसी लपटें निकलती हैं कि बड़े-बड़े पर्वत धधक कर अंगारे बन गए हैं, और उसी आग में झुलसने के कारण भँवरे, पतिंगे, नाग, कोयल, भुजंगा और कौए काले पड़ गए हैं। उस आग की भयानकता को देखकर जंगल के पक्षी तो अपनी जान बचाकर उड़ गए, लेकिन जल में रहने वाले पक्षी जलकर पानी में डूब गए; पक्षी अंत में अपनी दशा बताते हुए कहता है कि मैं भी उस आग में जलने लगा था, किंतु किसी तरह वहाँ से जान बचाकर निकला और समुद्र के पास आकर अपनी जलन बुझाई, लेकिन मेरे भीतर बसी उस विरह-अग्नि की तपन से समुद्र भी जलने लगा जिससे उसका पानी खारा हो गया और उस आग का धुआँ अब सारे संसार में छा गया है।

(12)

राजैं कहा, रे सरग सँदेसी। उतरि आउ, मोहि मिलु, सहदेसी।।
पावँ टेकि तोहि लावौ हियरे। प्रेम सँदेस कहौ होइ नियरे ।।
कहा बिहंगम जो बनबासी। कित गिरिही तें होइ उदासी।।
जेहि तरिवर तर तुम अस कोऊ । कोकिल काग बराबरि दोऊ ।।
धरती महँ विख चारा परा । हारिल जानि पुहुमि परिहरा ।।
फिरौं बियोगी डारहि डारा । करौं चलै कहँ पंख सँवारा ।।
जियन की घरी घटत निति जाहीं। साँसहि जिऊ है, देवसन्ह नाहीं ।।

जौं लहि फेरि मुकुति है, पैरां न पिंजर माँह |
जाउँ बेगि थरि आपनि है, है जहां बिंझ बनाँह || (12)

शब्दार्थ:

  • सरग सँदेसी: स्वर्ग से (देवता के समान) संदेश लाने वाले
  • सहदेसी: स्वदेशी / अपने देश (स्वदेश) का निवासी
  • हियरे: हृदय से
  • नियरे: निकट / पास
  • गिरिही: गृहस्थ
  • उदासी: विरक्त / संन्यासी (यहाँ पक्षी का भाव है कि गृहस्थ के निकट आने पर विरक्ति या खतरा हो सकता है)
  • विख चारा: विष (ज़हर) मिला हुआ चुग्गा या दाना (यहाँ सांसारिक मोह-माया या खतरे का प्रतीक)
  • हारिल: हरियल पक्षी (जो हमेशा अपने पैरों में लकड़ी का तिनका पकड़े रहता है और माना जाता है कि वह ज़मीन पर पैर नहीं रखता)
  • पुहुमि: पृथ्वी / ज़मीन
  • परिहरा: त्याग दिया / छोड़ दिया
  • सँवारा: तैयार करना / फड़फड़ाना
  • घरी: घड़ियाँ / समय
  • देवसन्ह: दिनों की (अर्थात् जीवन अब दिनों में नहीं, साँसों में बचा है)
  • मुकुति: मुक्ति / आज़ादी
  • पिंजर माँह: पिंजरे में
  • थरि: स्थान / ठिकाना
  • बिंझ बनाँह: विंध्याचल का वन / सघन जंगल

व्याख्या: मलिक मुहम्मद जायसी रचित ‘पद्मावत’ के ‘नागमती संदेश खंड’ की इन पंक्तियों में पक्षी की बातें सुनकर राजा रत्नसेन भावुक हो उठते हैं और उससे कहते हैं कि हे देवदूत के समान मेरे ही देश (चित्तौड़) से यह संदेश लाने वाले मित्र! तुम पेड़ से नीचे उतरो और मुझसे मिलो, मैं तुम्हारे चरण स्पर्श करके तुम्हें गले से लगाना चाहता हूँ, तुम मेरे निकट आकर वह प्रेम-संदेश मुझे विस्तार से सुनाओ। राजा की यह बात सुनकर वनवासी पक्षी उन्हें सावधान करते हुए कहता है कि मैं तो एक विरक्त पक्षी हूँ, भला मुझ जैसे वनवासी का तुम्हारे जैसे राजा (गृहस्थ) से क्या संबंध; जिस पेड़ के नीचे तुम्हारे जैसा राजा बैठा हो, वहाँ कौए और कोयल (शत्रु और मित्र या सामान्य और विशिष्ट) का भेद समाप्त हो जाता है (अर्थात् राजा के निकट आना किसी भी पक्षी के लिए सुरक्षित नहीं है)। पक्षी अपनी सतर्कता का कारण बताते हुए कहता है कि इस धरती पर हर जगह धोखे का विषैला दाना बिखरा पड़ा है, इसीलिए हरियल पक्षी ने ज़मीन पर पैर रखना ही छोड़ दिया है; मैं भी एक वियोगी की तरह डाल-डाल भटकता हूँ और हर समय उड़ने के लिए अपने पंख तैयार रखता हूँ, क्योंकि जीवन का समय लगातार घट रहा है और अब मेरे प्राण दिनों के भरोसे नहीं, केवल साँसों के सहारे टिके हैं। अंत में पक्षी राजा से स्पष्ट कहता है कि जब तक मैं मुक्त हूँ, तब तक मैं उड़ सकता हूँ, मैं तुम्हारे प्रेम-जाल में फँसकर पिंजरे में कैद नहीं होना चाहता; इसलिए अब मैं शीघ्र ही विंध्याचल के घने जंगलों में स्थित अपने ठिकाने की ओर प्रस्थान कर जाऊँगा।

(13)

कहि सो सँदेस बिहंगम चला। आगि लाइ सगरिउ सिंघला ||
घरी एक राजैं गोहरावा । भा अलोप, पुनि दिस्टि न आवा।।
पंखी नाउँ न देखौं पाँखी। राजा रोइ फिरा कै साँखी ।।
जस हेरत यह पंखि हेराना। दिनेक हमहुँ अस करब पयाना ।।
जौं लगि प्रान पिंड एक ठाऊँ। एक बेर चितउर गढ़ जाऊँ ।।
आवा भँवर मँदिल जहँ केवा। जीउ साथ लै गएउ परेवा ।।
तन सिंघल, मन चितउर बसा। जिउ बिसँभर जनु नागिनि डसा ।।

जेति नारि हँसि पूँछे, अमिअ बचन जिमि निंत |
रस उतरा सो चढ़ा बिख, ना ओहि चिंत न मिंत || (13)

शब्दार्थ:

  • सगरिउ: संपूर्ण / सारा
  • गोहरावा: पुकारा / आवाज़ दी
  • अलोप: अदृश्य / गायब
  • साँखी: गवाही / साक्षी (यहाँ अपनी व्यथा का गवाह मानकर रोने के अर्थ में)
  • हेरत: खोजते हुए / देखते-देखते
  • हेराना: खो गया / विलुप्त हो गया
  • पयाना: प्रस्थान / कूच (मृत्यु के संदर्भ में)
  • ठाऊँ: स्थान / जगह (अर्थात् जब तक प्राण शरीर में हैं)
  • बेर: बार
  • मँदिल: मंदिर / महल
  • केवा: केवड़ा (यहाँ रानी पद्मावती का प्रतीक)
  • परेवा: कबूतर / पक्षी
  • बिसँभर: बेसुध / अचेत (विष के प्रभाव से)
  • अमिअ: अमृत
  • जिमि: जैसे
  • निंत: नित्य / हमेशा
  • बिख: विष / ज़हर
  • चिंत न मिंत: न चिंता (चेतना) रही न मित्र (किसी की पहचान)

व्याख्या: मलिक मुहम्मद जायसी रचित ‘पद्मावत’ के ‘नागमती संदेश खंड’ के इस अंतिम पद्यांश में राजा रत्नसेन और नागमती के विरह-संदेशवाहक पक्षी के प्रस्थान का मार्मिक चित्रण किया गया है। राजा को संदेश सुनाकर और पूरे सिंहलद्वीप को उस विरह की अग्नि से झुलसाकर वह पक्षी वहाँ से उड़ चला। राजा ने कुछ पल (एक घड़ी) तक उसे पुकारा, लेकिन वह पक्षी उनकी नज़रों से ऐसा ओझल हुआ कि फिर दोबारा दिखाई नहीं दिया। राजा रत्नसेन उस पक्षी का नाम लेकर रोते रहे और उसे अपनी व्यथा का साक्षी मानकर पुकारते रहे; उन्होंने सोचा कि जिस प्रकार देखते-ही-देखते यह पक्षी आँखों से ओझल हो गया, वैसे ही एक दिन हमें भी इस संसार से प्रस्थान (मृत्यु) कर जाना है। अतः राजा ने निश्चय किया कि जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, मैं एक बार लौटकर अपने चित्तौड़गढ़ अवश्य जाऊँगा। राजा (रूपी भँवरा) उस महल (सिंहलद्वीप) में तो आ गया था जहाँ पद्मावती (रूपी केवड़ा) थी, लेकिन उनके प्राण तो वह पक्षी (नागमती का संदेशवाहक) अपने साथ ही ले उड़ा। अब राजा की स्थिति ऐसी हो गई कि उनका शरीर तो सिंहलद्वीप में था, लेकिन मन चित्तौड़ पहुँच गया था; नागमती के विरह-संदेश ने उन्हें ऐसा बेसुध कर दिया मानो किसी नागिन ने उन्हें डँस लिया हो। अंत में कवि बताता है कि सिंहलद्वीप की स्त्रियाँ जब भी नित्य हँसकर अमृत जैसे मीठे वचनों से राजा से कुछ पूछती हैं, तो उन्हें अब उस (प्रेम और रूप के) रस में कोई आनंद नहीं आता, बल्कि उन पर तो नागमती के विरह का विष चढ़ गया है, जिसके प्रभाव में आकर राजा सुध-बुध खो बैठे हैं और अब उन्हें न तो किसी बात की चिंता (चेतना) है और न ही वे किसी मित्र को पहचान पा रहे हैं।

(14)

बरिस एक तेहि सिंघल रहे। भोग बेरास कीन्ह जस चहे ।।
भा उदास जिउ सुना सँदेसू। सँवरि चला मन चितउर देसू ।।
कँवल उदासी देखा भँवरा । थिर न रहे मालति मन सँवरा ।।
जोगी और मन पौन परावा। कत ये रहै जौं चित्त उँचावा ।।
जौं जिय काढ़ि देह इन्ह कोई। जोगी भँवर न आपन होई ।।
तजा कँवल मालति हियँ घाली । अब कत थिर आछै अलि आली ।।
गंध्रपसेनि आए सुनि बारा। कस जिउ भएउ उदास तुम्हारा ।।

मैं तुम्हीं जिउ लावा, दै नैनन्ह महँ बास |
जौं तुम्ह होहु उदासी, तौ यह काकर कविलास || (14)

शब्दार्थ:

  • बरिस एक: एक वर्ष
  • भोग बेरास: भोग-विलास / सुख-सुविधाएँ
  • सँदेसू: संदेश (नागमती का)
  • सँवरि: स्मरण करके / याद करके
  • कँवल: कमल (यहाँ रानी पद्मावती का प्रतीक)
  • भँवरा / अलि: भ्रमर (यहाँ राजा रत्नसेन का प्रतीक)
  • मालति: मालती का फूल (यहाँ नागमती का प्रतीक)
  • पौन परावा: हवा की तरह चंचल / पराया
  • उँचावा: उचट गया / विरक्त हो गया
  • काढ़ि: निकालकर
  • हियँ घाली: हृदय में रखकर / बसाकर
  • थिर आछै: स्थिर रह सकता है / टिक सकता है
  • गंध्रपसेनि: गंधर्वसेन (पद्मावती के पिता और सिंहलद्वीप के राजा)
  • बारा: समाचार / बात
  • बास: निवास / जगह
  • काकर: किसका
  • कविलास: कैलाश / स्वर्ग (सिंहल द्वीप रूपी स्वर्ग)

व्याख्या: मलिक मुहम्मद जायसी रचित ‘पद्मावत’ (यहाँ से ‘चित्तौड़ वापसी खंड’ का आरंभ माना जाता है) की इन पंक्तियों में नागमती का संदेश सुनने के बाद राजा रत्नसेन की मनोदशा और उनके चित्तौड़ लौटने की व्याकुलता का मार्मिक वर्णन है। राजा रत्नसेन ने सिंहलद्वीप में एक वर्ष तक रहकर इच्छानुसार सारे सुख और भोग-विलास प्राप्त किए, किंतु जैसे ही उन्होंने (पक्षी के माध्यम से) नागमती का विरह-संदेश सुना, उनका मन उदास हो गया और चित्तौड़ देश की याद आते ही उनका मन स्वदेश लौटने के लिए मचल उठा। कमल रूपी पद्मावती ने देखा कि भँवरा रूपी राजा अब उदास है और मालती रूपी नागमती को मन में बसा लेने के कारण अब वह यहाँ स्थिर नहीं रह पा रहा है। कवि कहते हैं कि योगी का मन और पवन (हवा) हमेशा चंचल (पराए) होते हैं, यदि इनका मन एक बार कहीं से उचट जाए, तो कोई अपने प्राण निकालकर भी दे दे, फिर भी ये योगी और भँवरे किसी के सगे (पूर्णतः वश में) नहीं होते; भँवरे (राजा) ने हृदय में मालती (नागमती) को बसा लिया है और कमल (पद्मावती) को छोड़ने का मन बना लिया है, ऐसे में वह अब यहाँ कैसे टिक सकता है! दामाद (राजा रत्नसेन) की इस उदासी का समाचार सुनकर सिंहलद्वीप के राजा गंधर्वसेन उनके पास आए और बोले कि तुम्हारा मन इतना उदास क्यों हो गया है? मैंने तो तुम्हें अपनी आँखों में बसाकर अपने प्राणों से भी जोड़ा है (प्राणों से भी अधिक प्रेम दिया है); यदि तुम ही यहाँ इस तरह उदास रहोगे, तो फिर मेरे लिए यह सिंहलद्वीप रूपी कैलाश (स्वर्ग) भला किस काम का रह जाएगा!

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