पद्मावत : सिंहलद्वीप वर्णन खण्ड ( मूल एवं व्याख्या / Padmavat : Sinhaldvip Varnan Khand ( Mool Evam Vyakhya )

पद 1

सिंघल दीप कथा अब गावों । और सो पदुमिनी बरिन सुनावों।
बरन क दरपन भांति बिसेखा । जेहि जस रूप सो तैसेड़ देखा।
धिन, सो दीप जहं दीपक नारी । और सो पदुमिनी दड़अ अवतारी।
सात दीप बरनहिं सब लोगू । एकौ दीप न ओहि सरि जोगू।
दिया दीप नहिं तस उजियारा । सरां दीप सरि होड़ ना पारा।
जंबू दीप कहाँ तस नाहीं । पूज न लंक दीप परिछाहीं।।।
दीप कुसस्थल आरन परा । दीप महुस्थल मानुस हरा।
सब संसार परथमैं आए सातों दीप।
एकौ दीप न उत्तिम सिंघल दीप समीप। (1)

व्याख्या : अब मैं सिंहलद्वीप की कथा का गायन (वर्णन) करता हूं और पद्मिनी का वर्णन सुनाता हूं (जिसका इससे पूर्ववर्ती काव्यांश में उल्लेख किया गया है)। काव्य-वर्णन की विशेषता दर्पण की भांति होती है, उसमें जिसका जैसा रूप होता है, वह उसमें वैसा रूप देख सकता है। अर्थात् प्रत्येक पाठक अपनी भावनाओं के अनुरूप काव्य-वर्णन का भिन्न-भिन्न अर्थ ग्रहण कर सकता है। वह सिंहलद्वीप धन्य है जहां सौन्दर्य का दीपक की भांति प्रकाश विकीर्ण करने वाली नारिया है और ईश्वर ने उन्हें पद्मिनी जाति का बनाया है अथवा जहां ईश्वर ने पद्मिनी (पद्मावती ) को जन्म दिया है। लोग सात द्वीपों का वर्णन किया करते हैं किन्तु उसके समान एक भी द्वीप नहीं है। दिया नामक द्वीप में उसके समान प्रकाश नहीं है। सरन द्वीप भी उसकी समता करने में असमर्थ है। यदि उसके समान जम्बू द्वीप को बताऊं तो कहना पड़ता है कि वह भी उसके तुल्य नहीं है। लंकाद्वीप उसकी परछाई की भी समता नहीं कर सकता। कुशा या कुशास्थल नामक द्वीप जंगल में है जबकि मरुस्थल नामक द्वीप जनशून्य होने के कारण उसकी बराबरी नहीं कर सकता।

इस संसार में सर्वप्रथम इन्हीं सातों द्वीपों को माना जाता था या इन्हीं द्वीपों की रचना की गई थी, किन्तु इनमें से एक भी द्वीप सिंहलद्वीप के समान उत्तम नहीं है – सिंहलद्वीप अनुपमेय है।

पद 2


गंध्रपसेन सुगंध नरेनू। सो राजा यह ताकर देसू।
लंका सुना जो रावन राजू। तेहू चाहि बड़ ताकर साजू।
छप्पन कोटि कटक दर साजा। सबै छत्रपति ओरंगन्ह राजा।
सोरह सहस घोर घोरसारा। सावंकरन बालका तुखारा।।।
सात सहस हस्ती सिंघली। जिमि कबिलास एरापति बली।
असुपती क सिरमौर कहावा। गजपती क आंकूस गज नावा।
नरपति क कहाव नरिंदू। भुआपती क जग दोसर इंदू।
अड़स चक्कूवै राजा चहूं खंड भै होइ ।
सबै आड़ सिर नावहि सरबिर करै न कोइ । (2)

व्याख्या : उस सिंहलद्वीप का नरेश गंधर्वसेन बड़ा ही यशस्वी राजा है। वह यहां का नरेश है और यह उसका देश है। लंका में जो रावण का राज्य सुना जाता है, गंधर्वसेन का राज्य उससे भी बढ़कर था। उसके यहां छप्पन करोड़ सेना थी और वह सब सिंहासनस्थ नरेशों का भी राजा अर्थात् चक्रवर्ती राजा था। उसकी अश्वशाला में सोलह हजार बलवान घोड़े थे, जो या तो श्यामकर्ण जाति के थे अथवा तुषार देश के थे। (आचार्य शुक्ल ने इस पाँक्त का पाठान्तर ‘स्वामकरण अरु बांक तुखारा’ ग्रहण किया है), उसके सात हजार सिंहली हाथी थे, जो स्वर्ग के हाथी ऐरावत के समान बलशाली थे। वह अश्वपति राजाओं में सर्वश्रेष्ठ था और ऐसे राजाओं को जो अपने यहां बहुत से हाथी रखते थे अपने समक्ष ऐसे झुकने को विवश कर देता था जैसे – अंकुश के सामने हाथी झुक जाता है। वह नरपतियों में नरेन्द्र कहलाता था और भूपतियों के लिए संसार में दूसरे इन्द्र के समान था।

वह ऐसा चक्रवर्ती नरेश था कि उसका आतंक चारों खण्डों में परिव्याप्त रहता था। देश-देशान्तर के सभी नरेश उसके सामने आकर सिर झुकाते थे और कोई भी उसकी समता नहीं कर सकता था।

पद 3

जबहि दीप निअरावा जाई । जनु कबिलास निअर भा आई।
घन अंबराउं लाग चहुं पासा । उठै पुहुमि हुति लाग अकासा।
तरिवर सबै मलै गिरि लाए । भै जग छांह रैनि होइ छाए।
मलै समीर सोहाई छाहां । जेठ जाड़ लागै तेहि माहां।
ओही छांह रैनि होइ आवै । हरिअर सबै अकास दिखावै।
पंथिक जाँ पहुंचै सहि घामू । दुख बिसरै सुख होइ बिसरामू।
जिन्ह वह पाई छांह अनूपा । बहुरि न आइ सही यह धूपा।
अस अंबराउं सघन घन बरनि न पारौं अंत।
फूलै फरै छहूं रितु जानहू सदा बसंत। (3)

व्याख्या : जब द्वीप के समीप आए तो ऐसा लगता है कि कैलाश समीप आ गया है। चारों ओर घनी अमराइयां लगी हैं। वह इतनी विशाल हैं कि ऐसा लगता है मानो पृथ्वी से उठकर आकश को स्पर्श करना चाहती हों। वहां के सब वृक्ष ऐसे सुरभित हैं मानो मलय गिरि से लाए गए हों। उनकी छाया इतनी सघन है कि संसार में उन्हीं के कारण रात्रि होती है। उस छाया में मलय वायु सुहावनी लगती है। वहां जेठ के महीने में भी जाड़ा रहता है। उस छाया में रात्रि सी हो आती है अर्थात् सघन छाया के कारण रात्रि जैसा अंधकार रहता है और वृक्षों की हरीतिमा के कारण आकाश भी हरा दिखाई पड़ता है। वहां जो कोई भी मुसाफिर धूप सहकर पहुंचता है वह अपने ताप-जन्य दुःख को भूलकर आराम पा जाता है। जिस को एक बार वह छाया उपलब्ध हो जाती है, उसे फिर यहां आकर धूप नहीं सहन करनी पड़ती है।

वह आम का बाग इतना सघन है कि उसका वर्णन का अन्त नहीं पाया जा सकता – उसकी सघनता वर्णनातीत है। वह छहों ऋतुओं में पुष्पित-फलित होता है और वहां सदैव वसन्त ऋतु ही छायी रहती है।

पद 4

फरे आंब अति सघन सुहाए । औ जस फरे अधिक सिर नाए ।
कटहर डार पाँड सों पाके । बड्हर सोउ अनूप अति ताके।
खिरनी पाकि खांड असि मीठी । जांबु जो पाकि भंवर असि डीठी ।
नरिअर फरे फरी खुरहुरी । फुरी जानु इन्द्रासन पुरी ।
पुनि महु चुवैसो अधिक मिठासू । मधु जस मीठ पुहुप जस बासू ।
और खजहजा आव न नाकं । देखा सब रावन अंबराकं ।
लाग सबै जस अंबित साखा । रहै लोभाइ सोइ जोइ चाखा ।
गुआ सुपारी जायफर सब फर फरे अपूरि ।
आस पास घनि इंबिली औ घन तार खजूरि । (4)

व्याख्या : वहां के आमों के अत्यधिक सघन बाग फलों से युक्त हैं और वे जिनती अधिक मात्रा में फले हुए हैं उनकी डालियों के फल उतने ही अधिक झुके हुए हैं। कटहल के वृक्ष शाखाओं से लेकर तनों तक फलों से लदे हुए थे। वहां के बड़हल के फल भी इस प्रकार अनोखे थे। खिरनियां पक्कर खांड जैसी मीठी हो गई थीं और जागुनों का रंग पकने पर भौरों जैसा काला प्रतीत होता था। वहां के बागों में नारियल के वृक्ष और खुरहरी की बेलें भी फलों से युक्त थीं और वे बाग शोभा में इन्द्र-कानन जैसे प्रतीत होते थे। वहां के वृक्षों से जो पके हुए महुए चू रहे थे वे अत्यधिक मीठे थे। उनमें से पुष्पों जैसी सुगन्ध आती थी जबकि वे शहद जैसे मीठे थे। वहां पर और भी इतनी प्रकार की मेवाएं थीं कि उनके नाम तक नहीं याद आते। इतने प्रकार के फल और मेवाएं तो रावण के ही बाग में देखी जा सकती हैं। शाखाओं पर लगे हुए फल और मेवाएं अमृत जैसी मीठी थीं। उन्हें जो भी चख लेता था, उनके प्रति वही मोहित हो उठता था।

वहां पर गुआ नामक सुपारी, जायफल आदि नाना प्रकार के बहुत से फल लगे हुए थे। इन बागों के आस-पास इमली, ताड़ और खजूर के घने वृक्ष लगे हुए थे।

पद 5

बसहिं पंसि बोलहिं बहु भाषा । करहिं हुलास देखि कै साखा ।।
भोर होत बासहिं चुहचुही । बोलहिं पांडुक एकै तुही ।।
सारौ सुवां सो रहचह करहीं । गिरहिं परेवा औ करबरहीं ।।
पित पित लागे करैं पपीहा । तुही तुही कह गुडूरू खीहा ।।
कुहू कुहू कोइल करि राखा । औ भिंगराज बोल बहु भाषा ।।
दही दही कै महरि पुकारा । हारिल बिनवै आपनि हारा ।।
कुहकहिं मोर सोहावन लागा । होइ कोराहर बोलहिं कागा ।।
जावंत पंसि कहै सब बैठे भरि अंबराउं।
आपनि आपनि भाषा लेहिं दइअ कर नाउं।। (5)

व्याख्या : सिंहलद्वीप के बागों में नाना प्रकार के पक्षी बसते और तरह-तरह की बोलियां बोलते हैं। वहां के वृक्षों की हरी-भरी और फलों से लदी शाखाओं को देखकर के उल्लास व्यक्त करते हैं। प्रभात होते ही चुहचुही बोलने लगती हैं। पांडुक पक्षी ‘एकै तुही’ की ध्वनि निकालता है। मैना और तोता चहचहाते हैं। लोटन कबूतर जमीन पर धूल में लोटते और गुटरगूं कहते हैं। पपीहा पक्षी पिउ-पिउ की बोली बोलता है जबकि गुडूरू पक्षी तुही-तुही की ध्वनि करता हुआ खीझता है। कोयल कुहू-कुहू की बोली बोलती है जबकि भृंगराज पक्षी बहुत सी बोलियां बोलता है। महरी (ग्वालिन) चिड़िया दही-दही की आवाज लगाती है और हारिल अपनी हालत का निवेदन करता है। कूहुकते हुए मोर बड़े ही मनभावने प्रतीत होते हैं। कौए बोलते हैं तो उनकी आवज में कोलाहल होने लगता है।

कवि कहता है कि मैंने उपर्युक्त जिन पश्चियों का नामोल्लेख किया है वे सब अमराई अर्थात् जहां बहुत से बाग लगे हुए हैं, में बैठे रहते हैं और अपनी-अपनी भाषा में उस ईश्वर के नाम का जाप करते रहते हैं।

पद 6

पैग पैग पर कुआं बावरी । साजी बैठक औ पांवरी।
औरु कुठ बहु ठांवहिं ठांक । सब तीरथ औ तिन्हके नाकं।
मढ़ मंडप चहुं पास संवारे । जपा तपा सब आसन मारे।
कोइ रिखेस्वर कोइ सन्यासी । कोइ रामजन कोइ मसवासी।
कोई ब्रह्मचर्ज पंथ लागे । कोइ दिगम्बर आछहिं नांगे।
कोइ सरसुती सिद्ध कोइ जोगी । कोइ निरास पंथ बैठ बियोगी ।
कोइ महेंसुर जंगम जती । कोइ एक परखै देबी सती।
सेवरा खेवरा बानपरस्ती सिध साधक अवधूता ।
आसर मारि बैठ सब जारि आतमा भूता। (6)

व्याख्या : सिंहलद्वीप में कदम-कदम पर कुएँ, बावड़ियाँ, बैठकें और सीढ़ियाँ हैं। अनेक कुंड, तीर्थ और उनके नाम हैं। चारों ओर मठ-मंडप सजे हैं; जप-तप करने वाले साधु आसन लगाए बैठे हैं। कोई ऋषीश्वर, कोई संन्यासी, कोई रामभक्त, कोई मासोपवासी, कोई ब्रह्मचारी, कोई दिगंबर, कोई सरस्वती-साधक, कोई योगी, कोई विरागी, कोई महेश्वर-उपासक, कोई जंगम, कोई यति, कोई शक्ति-उपासक है। श्वेताम्बर, क्षपणक, वानप्रस्थ, सिद्ध, साधक और अवधूत आदि साधना में लीन हैं।

पद 7

मानसरोदक देखिअ काहा । भरा समुद्र अस अति अवगाहा ।
पानि मोति अस निरमर तासू । अंबित बानि कपूर सुबासू ।
लंक दीप कै सिला अनाई । बांधा सरवर घाट बनाई ।
खंड खंड सीढ़ी भई गरेरी । उतरहिं चढ़हिं लोग चहूं फेरी ।
फूला कंवल रहा होइ राता । सहस सहस परंखुरिरह कर छाता ।
उलथहिं सीप मोति उतिराहीं । चुनहिं हंस औ कलेल कराहीं ।
कनक परंख पैरहिं अति लोने । जानहु चित्र संवारे सोने ।
ऊपर पाल चहूं दिसि अंबित फर सब रूख ।
देखि रूप सरवर कर गइ पिआस औ भूख । (7)

व्याख्या : मानसरोवर अथाह और समुद्र-सा विस्तृत है। उसका जल मोती-सा निर्मल, अमृत-सा मीठा और कपूर-सी सुगंध वाला है। घाट लंकाद्वीप की शिलाओं से बनाए गए हैं; घुमावदार सीढ़ियों पर लोग चारों ओर उतरते-चढ़ते हैं। उसमें लाल कमल खिले हैं। सीप उलटने से मोती तैरने लगते हैं, हंस उन्हें चुगते-क्रीड़ा करते हैं। सुनहरे पंखों वाले सुंदर पक्षी भी तैरते हैं। ऊपर किनारों पर अमृत-तुल्य फलों वाले वृक्ष हैं। सरोवर का रूप देखकर भूख-प्यास मिट जाती है।

पद 8

पानि भरइ आवहि परिहारीं । रूप सुरूप पदमिनी नारीं।।
पदुम गंध तेन्ह अंग बसाहीं । भंवर लागि तेन्ह संग फिराहीं।।
लंक सिंघिनी सारंग नैनी । हंसगामिनी कोकिल बैनी।।।
आंवहि हुँड सो पांतिहि पांती । गवन सोहाइ सो भांतिहि भांती।।
केस मेघावरि सिर ता पाई । चमकहि दसन बीजु की नाई।।
कनक कलस मुख चंद दिपाहीं । रहस कोड सो आवहि जाहीं।।
जासों वै हेरहि चख नारा । बांक नैन जनु हनहि कटारी।।
मानहु मैन मुरति सब अछरी बरन अनूप।
जेन्हिकी ये पनिहारी सो रानी केहि रूप। (8)

व्याख्या : मानसरोवर पर जल भरने आने वाली पनिहारियाँ पद्मिनी जाति की स्त्रियाँ हैं। उनके अंगों में कमल-गंध बसती है, इसलिए भंवर उनके संग फिरते हैं। उनकी कटि सिंहनी-सी, नेत्र मृगी-से, गति हंस-सी और वाणी कोकिल-सी मधुर है। वे झुंड में पंक्ति बनाकर आती-जाती हैं। केश मेघ-से, दाँत बिजली-से चमकीले, मुख चंद्र-सा और शरीर पर स्वर्ण-कलश-सी शोभा है। उनके तिरछे कटाक्ष कटारी-से लगते हैं। वे सब कामदेव की मूर्ति और अप्सराओं-सी सुंदर हैं। जिसकी ऐसी पनिहारियाँ हों, उसकी रानियाँ कैसी सुंदर होंगी।

पद 9

ताल तलावरि बरिन न जाहीं । सूझइ वार पार तेन्ह नाहीं ।।
फूले कुमुद केत उजिआरे । जानहुं उए गगन महं तारे।
उतरहिं मेघ चढहिं लै पानी । चमकहिं मंछ बीजु की बानी।
पैरहिं पंखि सो संगहि संगा । सेत पीत राते बहु रंगा।
चकई चकवा केलि कराहीं । निसि बिछुरहिं औ दिनहिं मिलाहीं।
कुरलहिं सारस भरे हुलासा । जिअन हमार मुआहिं एक पासा।
केंवा सोन ढेक बग लेदी । रहे अपूरि मीन जल भेदी।
नग अमोल तेन्ह तालन्ह दिनहिं बरहिं जनु दीप।
जो मरजिआ होइ तहं सो पावइ वह सीप।। (9)

व्याख्या : सिंहलद्वीप में इतने ताल-तलैये हैं कि उनका वर्णन नहीं हो सकता। उनमें कुमुद और श्वेत कमल खिले हैं, जो आकाश में तारों-से लगते हैं। बादल उतरकर जल भरकर ऊपर चढ़ जाते हैं। मछलियाँ बिजली-सी चमकती हैं। श्वेत, पीले, लाल रंग के पक्षी साथ तैरते हैं। चकवा-चकवी क्रीड़ा करते हैं, रात में बिछुड़कर दिन में मिलते हैं। सारस उल्लास से कूकते हैं। केवा, सोन, ढेक, बग, लेदी और मीन आदि जलजीव भरे हैं। बहुमूल्य नग दिन के दीपक-से चमकते हैं। गोताखोर ही उन सीपों को पाते हैं जिनमें मोती होते हैं।

पद 10

पुिन जो लाग बहु अंबित वारी । फरीं अनूप होइ रखवारी।
नवरंग नीबू सुरंग जंभीरा । अगै बादाम बद अंजीरा।।
गलगल तुरंज सदाफर फरे । नारंग अति राते रस भरे।।
किसमिस सेब फरे नौ पाता । दारिवं दाख देखि मन राता।
लागि सोहाई हरपारेउरी । ओनइ रही केरन्ह की घउरी।।
फरे तूत कमरख औ निउंजी । राय करौंदा बैरि चिरउंजी।।
संखदराउ छोहारा डीठे । औरु खजहजा खाटे मीठे।।
पानी देहिं खंडवानी कूअहि खांड बहु मेलि।
लागीं घरी रहट की सींचहिं अंबित बेलि।। (10)

व्याख्या : ताल-तलैयों के आस-पास अमृत-तुल्य मीठे फलों की वाटिकाएँ हैं, जो फलों से लदी और रखवाली युक्त हैं। वहाँ नींबू, जंभीर, बादाम, बेदाना, अंजीर, गलगल, चकोतरा, शरीफा, नारंगी, किशमिश, सेब, अनार, दाख, हरपारेउरी, केला, शहतूत, कमरख, लीची, रायकरौंदा, छुहारा और खजहजा आदि फल हैं। कुओं के जल में खांड घोलकर मीठे जल से सिंचाई की जाती है; रहटों की घड़ियों से अमृत-बेलियों को सींचा जाता है।

पद 11

पुिन फुलवारी लागि चहुं पासा । विवरख बेथि चंदन भै बासा।।
बहुत फूल फूली घन बेली । केवरा चंपा कुंद चंबेली।।
सुरंग गुलाल कदम औ कूजा । सुगंध बकौरी गंधप पूजा।।
नागेसरि सदबरग नेवारी । औ सिंगारहार फुलवारी।।
सोन जरद फूली सेवती । रूप मंजरी औ मालती।।
जाही जूही बकचुन लावा । पूछप सुदरसन लाग सोहावा।
बोलसिरी बेइलि औ करना । सबहि फूल फूले बहू बरना।
तेन्ह सिर फूल चढ़हि वै जेन्ह माथें मिन भागु।
आछहि सदा सुगंध भे जनु बसंत औ फाग।। (11)

व्याख्या : चारों ओर फुलवारियाँ हैं; वृक्षों में चंदन की सुगंध व्याप्त है। घनी लताएँ—केवड़ा, चंपा, कुंद, चमेली—फूलों से फूली हैं। लाल गुलाब, कदंब, कूजा, गुलबकावली, नागकेसर, गेंदा, नेवारी, हारसिंगार, सेवती, रूपमंजरी, मालती, जूही, सुदर्शन, मौलश्री, बेला, करना आदि नाना रंगों के फूल खिले हैं। ये फूल उन्हीं के सिर पर चढ़ते हैं जिनके भाग्य में सौभाग्य है। सर्वत्र सुगंध रहती है, मानो सदा वसंत और फाग हो।

पद 12

सिंघल नगर देखु पुनि बसा । धनि राजा असि जाकरि दसा ।।
कंची पंवरी कंच अवासा । जनु कबिलास इन्द्र कर बासा ।।
राक राक सब घर घर सुखी । जो देखिअ सो हंसता मुखी ।।
रचि रचि राखे चंदन चौरा । पोते अगर मेद औ केवरा ।।
सब चौपारिन्द चंदन खंभा । ओठंघि सभापति बैठे सभा ।।
जनहू सभा देवतन्द्र कै जुरी । परी द्विरिट इन्द्रासन पुरी ।।
सबै गुनी पंडित और ग्याता । संसकिरत सबके मुख बाता ।।
ऑहिक पंथ सवांरहिं जस सिवलोक अनूप।
घर घर नारि पदुमिनी मोहहिं दरसन रूप । (12)

व्याख्या : सिंहल नगर सुंदरता से बसा है। जिस राजा की ऐसी स्थिति है, वह धन्य है। यहाँ कंचे महल, सीढ़ियाँ और द्वार हैं, जो कैलास/इंद्रपुरी-से लगते हैं। राजा-रंक सब सुखी और प्रसन्न हैं। चंदन के चबूतरे अगर, मेद और गोरोचन से सुवासित हैं। चौपालों में चंदन के स्तंभ हैं; सभापति पीठ टिकाकर बैठते हैं। सभा देवसभा-सी और नगर इंद्रपुरी-सा लगता है। निवासी गुणी, पंडित और ज्ञानी हैं; सबके मुख से संस्कृत बातें निकलती हैं। घर-घर पद्मिनी नारियाँ हैं, जिनका रूप मन मोह लेता है।

पद 13

पुनि देखिअ सिंघल की हाटा । नवौ निद्धि लछिमी सब बाटा।।
कनक हाट सब कूंहकूंह लीपी । बैठ महाजन सिंघल दीपी।
रचे हंथोड़ा रूपई ढारी । चित्र कटाउ अनेग संवारी।
रतन पदारथ मानिक मोती । हीर पंवार सो अनबन जोती।
सोन रूप सब भएउ पसारा । धवलसिरी पोतहिं घर बारा।
और कपूर बेना कस्तूरी । चंदन अगर रहा भरिपूरी।
जेड़ं न हाट एहि लीन्ह बेसाहा । ताकहं आन हाट कित लाहा।
कोई करै बेसाहना काहू केर बिकाइ।
कोई चला लाभ सौं कोई मूर गवांइ।। (13)

व्याख्या : सिंहल नगर के बाजार देखने योग्य हैं। मार्गों में नव निधियाँ और लक्ष्मी-सा वैभव दिखता है। सोने-चांदी के बाजार कुंकुम से लिपे हैं, जहाँ सिंहलद्वीप के महाजन बैठते हैं। वे चांदी ढालकर कड़े बनाते और चित्र-कटाउ सजाते हैं। रत्न, माणिक, मोती, हीरा, पन्ना अद्भुत ज्योति फैलाते हैं। सोना-चांदी का व्यापक प्रसार है; घर-द्वार श्वेत रोली से पुते हैं। कपूर, खस, कस्तूरी, चंदन, अगर की सुगंध भरी है। जिसने यहाँ व्यापार नहीं किया, उसे और कहाँ लाभ होगा? कोई लाभ कमाता है, कोई मूलधन गँवा बैठता है।

पद 14

पुनि सिंगार हाट धनि देसा । कड़ सिंगार तहं बैठी बेसा ।
मुख तंबोर तन चीर कुसुंभी । कानन्ह कनक जराक खुंभी । ।
हाथ बीन सुनि मिरिग भुलाहीं । नर मोहहिं सुनि पैगु न जाहीं । ।
भाँह धनुक तहं नैन अहेरी । मारहिं बान सान सौं फेरी । ।
अलक कपोल डोल हंसि देहीं । लाड़ कटाख मारि जिज लेहीं । ।
कच्च कंचुक जानहं जुग सारी । अंचल देहिं सुभावहिं ढारी । ।
केत खेलार हारि तेन्ह पासा । हाथ झारि होइ चलहिं निरासा । ।
चेटक लाड़ हरहिं मन जौ लहि गथ है फेंट।
सांठि नाठि उठि भए बटाक ना पहिचान न भेंट। ।। (14)

व्याख्या : सिंहल नगर का शृंगार-हाट/वेश्या-बाजार धन्य है। वेश्याएँ शृंगार करके बैठी हैं; मुख में तंबाकू, शरीर पर कुसुंभी वस्त्र, कानों में स्वर्ण-जड़ित खुंभी। हाथ में वीणा लेकर इतनी मधुर गाती हैं कि मृग भूल जाते हैं, मनुष्य एक कदम आगे नहीं बढ़ पाते। भौंहें धनुष-सी, नेत्र अहेरी-से; कटाक्ष बाण-से मारते हैं। कपोलों पर अलक डोलती हैं; हँसकर कटाक्षों से जीवन ले लेती हैं। कंचुक में कसे उरोज दो गोटों-से; आंचल ढलका देती हैं। कितने ही जुआरी पासा खेलकर हारकर निराश लौटते हैं। जब तक गांठ में धन है, तब तक जादू-प्रेम; धन नष्ट होते ही वे राहगीर-सा व्यवहार करती हैं।

पद 15

लै लै बैठ फूल फुलहारी । पान अपूरब धरे संवारी ।।
सांशा सबै बैठु लै गांधी । बहुल कपूर खिरौरी बांधी ।।
कतहूं पंडित पढ़हि पुरानू । धरम पंथ कर करहिं बखानू ।।
कतहूं कथा कहैं कछु कोई । कतहूं नाच कोड भलि होई ।।
कतहूं छरहटा पेखन लावा । कतहूं पाखंड काठ नचावा ।।
कतहूं नाद सबद होइ भला । कतहूं नाटक चेटक कला ।।
कतहूं काहु ठग बिद्या लाई । कतहूं लेहिं मानुस बौराई ।।
चरपट चोर धूत गंठिछोरा मिले रहहिं तेहि नांच।
जो तेहि नांच सजग भा अगुमन गथ ताकर पै बांच।। (15)

व्याख्या : बाजार में मालिनें फूल लेकर बैठी हैं और अनोखे पान सजाती हैं। गंधी लोग सुगंधियाँ, कपूर और कत्थे की सुगंधित टिकियाँ रखते हैं। कहीं पंडित पुराण पढ़ते हैं, धर्म-पंथ का बखान करते हैं; कहीं कथा, नाच-कूद, तमाशा, कठपुतली, गायन, नाटक और जादू होता है। कहीं ठगी-विद्या से लोगों को ठगा जाता है, कहीं बावला बनाकर लूटा जाता है। चालाक, चोर, धूत और गिरहकट मिलकर दर्शकों की पूंजी हर लेते हैं। जो पहले से सजग रहता है, उसकी पूंजी बच जाती है।

पद 16

पुनि अञ्जुअ सिंघल गढ् पासा । का बरनौं जस लाग अकासा।।
तरहिं कुटुंम बासुकि कै पीठी । कपर इन्द्रलोक पर डीठी।।
परा खोह चहुंदिस तस बांका । कांपै जांघि जाइ नहिं झांका।।
अगम असूझ देखि डर खाई । परै सो सप्त पतारन्ह जाई।।
नव पंवरी बांकी नव खंडा । नवहुं जो चढै जाइ ब्रह्मंडा।।
कंचन कोट जरे कौसीसा । नखतन्ह भरा बीजु अस दीसा।।
लंका चाहि कंच गढ् ताका । निराखि न जाइ दिस्टि मन थाका।।
हि अ न समाइ दिस्टि नहिं पहुंचै जानहु ठाढ् सुमेरु।
कहं लगि कहौं उंचाई ताकरि कहं लगि बरनौं फेरु।। (16)

व्याख्या : सिंहलगढ़ आकाश-स्पर्शी है। उसकी नींव वासुकी और कच्छप की पीठ पर है, ऊपर इंद्रलोक तक पहुँचती है। चारों ओर बांकी खाई है; उसमें गिरने पर सातवें पाताल पहुँचने का भय लगता है। नौ पौड़ियाँ और नौ खंड हैं; जो इन्हें चढ़ जाता है, वह ब्रह्मांड पहुँच जाता है। यह स्वर्ण-कोट है, जिसमें नग-शौशे जड़े हैं; नक्षत्रों से भरी बिजली-सा दिखता है। यह लंका से भी अधिक ऊँचा है। उसकी ऊँचाई देखी नहीं जाती; दृष्टि और मन थक जाते हैं। वह सुमेरु-सा अवर्णनीय है।

पद 18

जबहिं घरी पूजी वह मारा । घरी घरी घरिआर पुकारा।
परा जो डांड जगत सब डांडा । का निचिंत मांटी कर भांडा।
तुम्ह तेहि चाक चढे होइ कांचे । आएहू फिरै न थिर होई बांचे।
घरी जो भरै घटै तुम आऊ । का निचिंत सोवहि रे बटाऊ।
पहरहि पहर गजर निति होई । हिआ निसोगा जाग न सोई।
मुहमद जीवन जल भरन रहंट घरी की रीति।
घरी सो आई ज्यों भरी ढरी जनम गा बीति।। (18)

व्याख्या : नव द्वारों के बाद दशम द्वार/ब्रह्मरंध्र है। वहाँ राजा का घंटा और घड़ियाल बजता है। घड़ी पूरी होते ही डंडा पड़ता है—मानो संसार को एक घड़ी से दंडित कर दिया गया। मनुष्य मिट्टी के बर्तन-सा नश्वर है। तुम कुम्हार के चाक पर कच्ची मिट्टी-से चढ़े हो; यहाँ स्थिर नहीं रह सकते। ज्यों-ज्यों घड़ी भरती है, आयु घटती जाती है। हे पथिक, तू निश्चिंत होकर क्यों सोता है? प्रत्येक पहर गजर बजता है, फिर भी तेरा हृदय नहीं जागता। जीवन रहट की घरियों-सा आता-जाता है।

पद 19

गढ़ पर नीर खीर दुइ नदी । पानी भरहिं जैसे दुरुपदी।।
औरु कूंड एक मोंतीचूरू । पानी अंबित कीच कपूरू।।
ओहि क पानि राजा पै पिया । बिरिथ होइ नहिं जौ लहि जिआ।।
कंचन बिरिख एक तेहि पासा । जस कलपतर इंद्र कबिलासा।।
मूल पतार सरग ओहि साखा । अमर बेलि को पाव को चाखा।।
चांद पात औ फूल तराई । होइ उजिआर नगर जहं ताई।।
वह फर पावै तपि कै कोई । बिरिथ खाइ नव जोबन होई।।
राजा भए भिखारी सुनि वह अंबित भोग।
जेइं पाबा सो अमर भा ना किछु व्यािथ न रोग।। (19)

व्याख्या : गढ़ पर नीर और क्षीर की दो नदियाँ हैं—इडा और पिंगला। मोतीचूर नामक कुंड है, जिसका जल अमृत-तुल्य और कीच कपूर-सा है। उसका जल राजा पीता है; जीवित रहते युद्ध नहीं होता। उसके पास कंचन-वृक्ष है, जो इंद्र के कल्पतरु-सा है। उसकी जड़ पाताल में, शाखाएँ स्वर्ग तक; अमर बेली को कोई विरला पाता/चखता है। चंद्र पत्ते और तारे फूल हैं; उससे नगर प्रकाशित रहता है। फल तपस्या से मिलता है; वृद्ध भी खाए तो नवयौवन पाता है। अमृत-भोग सुनकर राजा भिखारी हो गए; पाने वाला अमर हो जाता है, उसे रोग-व्याधि नहीं सताते।

पद 20

गद् पर बसहिं चारि गद्यपती । असुपति गजपति औ नरपती ।।
सब क धौरहर सोने साजा । औ अपने अपने घर राजा ।।
रूपवंत धनवंत सभागे । परस पखान पंवरि तेन्ह लागे ।।
भोग बेरास सदा सब माना । दुख चिंता कोठ जरम न जाना ।।
मंदिर मंदिर सब के चौपारी । बैठि कुंवर सब खेलहिं सारी ।।
पांसा ढरे खेल भलि होई । खरग दान सरि पूज न कोई ।।
भाट बरनि कहि कीरति भली । पावहिं हस्ति घोर सिंघली ।।
मंदिर मंदिर फुलवारी चोवा चंदन बास।
निसि दिन रहै बसंत भा छहूं रितु बारह मास।। (20)

व्याख्या : गढ़ में चार गढ़पति—अश्वपति, गजपति, नरपति आदि रहते हैं। सबके सोने के महल हैं और वे अपने-अपने घर के राजा हैं। वे रूपवान, धनवान और भाग्यवान हैं; पारस-पत्थर के स्पर्श से सुंदर बने हैं। उन्हें भोग-विलास सदा प्राप्त है; दुख-चिंता का नाम नहीं। भवन-भवन में चौपालें हैं; कुंवर सारी/पासा खेलते हैं। खड्ग-दान में कोई बराबरी नहीं कर सकता। भाट कीर्ति गाते हैं और हाथी-घोड़े पाते हैं। फुलवारियों में चोवा-चंदन की सुगंध रहती है; मानो छहों ऋतु, बारह मास सदा वसंत रहता है।

पद 21

पुनि चलि देखा राज दुआरू । महिं घूंबिअ पाइअ नहिं बारू।।
हस्ति सिंघली बांधे बारा । जनु सजीव सब ठाढ़ पहारा।।
कवनौ सेत पीत रतनारे । कवनौ हरे धूम औ कारे।।
बरनहि बरन गगन जस मेघा । औ तिन्ह गगन पीठ जनु ठेंगा।।
सिंघल के बरने सिंघली । एकेक चाहि सो एकेक बली।।
गिरि पहार पब्बै गहि पेलहिं । बिरिख उपारि झारिमुख मेलहिं।।
यात निमत सब गरजहिं बांधे । निसि दिन रहहिं महाउत कांधे।।
धरती भार न अंगवै पावं धरत उठ हालि।
कुरम टूट फन फाटे तिन्ह हस्तिन्ह की चालि।। (21)

व्याख्या : राजद्वार ऐसा है कि पृथ्वी पर घूमकर भी नहीं मिल सकता। वहाँ सिंहली हाथी बंधे हैं—सजीव पर्वत-से लगते हैं। कोई श्वेत, पीत, लाल, हरा, धूप-वर्ण या काला है; रंग मेघों-से हैं। ऊँचाई ऐसी कि मानो आकाश को पीठ पर टिकाया हो। एक-से-एक बलवान। वे गिरि-पर्वत ठेल देते और वृक्ष उखाड़कर मुख में दबा लेते हैं। मदोन्मत्त या मदहीन सब गरजते हैं; महावत कंधों पर रहते हैं। उनके भार से पृथ्वी हिल उठती है; कच्छप की पीठ टूट जाती और शेषनाग के फन फट जाते हैं।

पद 22

पुनि बांधे रजबार तुरंगा । का बरनौं जस उन्हके रंगा ।।
लील समृद् चाल जग जानै । हांसुल भंवर किआह बखानै।।
हरे कूरंग महुआ बहुभांती । गरं कोकाह बोलाह सो पांती ।।
तीख तुखार चांड औ बांके । तरपहिं तबहि तायन बिनु हांके।।
मन तें अगुमन डोलहिं बागा । देत उसास गगन सिर लागा ।।
पावहिं सांस समृद् पर धावहिं । बृड् न पावं पार होड आवहिं ।।
थिर न रहहिं रिस लोह चबाहीं । भांजहिं पूंछि सीस उपराहीं ।।
अस तुखार सब देखे जनु मन के रथवाह ।।
नैन पलक पहुंचावहिं जहं पहंचा कोउ चाह ।। (22)

व्याख्या : राजद्वार पर तुखारी घोड़े बंधे हैं। उनके रंग—नीले, बादामी, कुम्मैत, मुश्की, कोकाह, हरे, लाल, महुआ-रंग, सफेद गर्दन-पूंछ वाले—अवर्णनीय हैं। तीक्ष्ण, प्रचंड और बलवान घोड़े बिना चाबुक हांके दौड़ने को व्यग्र रहते हैं। बाग हिलाते ही मन से भी तेज दौड़ते हैं और सिर आकाश से लगाते हैं। संकेत पाकर समुद्र पार कर जाते हैं; जल में नहीं डूबते। वे स्थिर नहीं रहते, क्रोध में लगाम चबाते हैं, पूंछ सिर पर मोड़ लेते हैं। वे मन-रथ के वाहक-से लगते हैं; पलक झपकते ही इच्छित स्थान पर पहुँचा देते हैं।

पद 23

राजसभा पुिन दीख बईठी । इंद्रसभा जनु परि गइ डीठी।।
धिन राजा अस सभा संवारी । जानहु फूलि रही फुलवारी।।
मुकुटबंध सब बैठे राजा । दर निसान निति जेन्ह के बाजा।।
रूपवंत मिन दिधै लिलाटा । मांथें छात बैठ सब पाटा।।
मानहु कंवल सरोवर फूलै । सगा क रूप देखि मन भूलै।।
पान कपूर मेद कस्तूरी । सुगंध बास भरि रही अपूरी।।
मांझ कंच इंद्रासन साजा । गंधबसेनि बैठ जहं राजा।।
छत्र गगन लहि ताकर सूर तवै जसु आपु।
सभा कंवल जिमि बिगसे मांथे बड़ परतापु।। (23)

व्याख्या : राजसभा बैठी दिखती है—मानो इंद्रसभा दृष्टि में आ गई। ऐसी सुसज्जित सभा वाला राजा धन्य है; वह फुलवारी-सी खिली लगती है। सभी नरेश मुकुट बाँधकर बैठे हैं; द्वारों पर नगाड़े बजते हैं। वे रूपवान हैं, मस्तक पर मणि/छत्र और सिंहासन हैं। सभा कमल-सरोवर-सी शोभती है। पान, कपूर, मेद, कस्तूरी की सुगंध भरी है। मध्य में ऊँचा इंद्रासन है, जिस पर गंधर्वसेन बैठा है। उसका छत्र आकाश तक है और वह सूर्य-सा तेजस्वी है। सभा के सदस्य कमल-से प्रमुदित हैं।

पद 24

साजा राज मंदिर कबिलासू । सोने कर सब पहुंमि अकासू ।।
सातखंड धौराहर साजा । उहैं संवारि सकैं अस राजा ।।
हीरा ईंट कपूर गिलावा । अौ नग लाइ सरग लै लावा ।।
जांवत सबै उरेह उरेहे । भांति भांति नग लाग उबेहे ।।
भा कटाव सब अनबन भांति । चित्र होत गा पांतिहि पांती ।।
लाग खंभ मनि मानिक जरे । जनहू दिया दिन आछत बरे ।।
देखि धौरहर कर उंजियारा । छपि गे चांद सूर अौ तारा ।।
सुने सात बैकुंठ जस तस साजे खंड सात।
बेहर बेहर भाउ तेन्ह खंड खंड ऊपर जाता।। (24)

व्याख्या : राजमंदिर कैलास-सा सजा है; फर्श, दीवार और छत सब स्वर्ण-निर्मित हैं। उसका धवलगृह सातखंडा है; ऐसा राजा ही उसे सँवार सकता है। हीरे की ईंटें, कपूर का गारा और नग जड़कर वह गगनचुंबी बनाया गया है। उसमें नाना चित्र, नक्काशी और रत्न-जड़ित स्तंभ हैं; मणि-माणिक ऐसे चमकते हैं मानो दिन में दीपक जल रहे हों। उस धवलगृह की चमक देखकर चांद, सूर्य और तारे फीके पड़ गए हैं। सात बैकुंठों-से सात खंड सुशोभित हैं; ऊपर-ऊपर पृथक भाग दिखाई देते हैं।

पद 25

बरनौं राजमंदिर रनिवासू। अछरिन्द भरा जानु कबिलासू।।
सोरह सहस पदुमिनी रानी। एक एक तें रूप बखानीं।
अति सुरूप औ अति सुकुवारा। पान फूल के रहहिं अधारा।
तिन्द ऊपर चंपावति रानी। महा सुरूप पाट परधानी।
पाट बैसि रह किए सिंगारू । सब रानी ओहि करहिं जोहारू।
निति नव रंग सुरंगम सोई। प्रथमै बैस न सरबिर कोई।
सकल दीप महं चुनि चुनि आनी। तेन्ह महं दीपक बारह बानी।
कुअंरि बतीसौ लक्खनी अस सब मांह अनूप।
जांवत सिंघल दीपइ सबै बखानइ रूप।। (25)

व्याख्या : रनिवास अप्सराओं से भरा कैलास-सा है। उसमें सोलह हजार पद्मिनी रानियाँ हैं, एक-से-एक सुंदर। वे अत्यंत सुकुमार और पान-फूल पर रहने वाली हैं। सबके ऊपर चंपावती पटरानी है, जो अत्यंत सुंदर और प्रधान है। वह शृंगार करके सिंहासन पर बैठती है; सब रानियाँ उसे प्रणाम करती हैं। उसका रूप नित्य नव रंग में शोभता है; यौवनारंभ की अवस्था में उसकी बराबरी कोई नहीं। सब द्वीपों से चुनकर लाई गई रानियों में चंपावती बारह-बानी सोने-सी चमकती है। वह बत्तीस लक्षणों से युक्त है; सिंहलद्वीप के सब लोग उसका रूप बखानते हैं।

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