पद्मावत : नागमती वियोग खण्ड ( Padmavat : Nagmati Viyog Khand )

(1)

नागमती चितउर पंथ हेरा। पिउ जो गए फिरि कीन्ह न फेरा।।
नागरि नारि काहु बस परा । ते बियोहि मो सौं चितु हरा ।।
सुवा काल होइ लेइगा पीऊ। पिऊ नहिं जात, जा बरु जीऊ ।।
भएउ नरायन बाँवन करा। राज करत राजा बलि छरा ।।
करन वान लीन्हेउ कै छंदू। विप्र रूप धरि झिलमिल इन्दू ।।
मानत भोग गोपी चंद भोगी। लै अपसवा जलंधर जोगी ।।
लेइ कान्हहि भा अकरूर अलोपी । कठिन बिछोह जिअहिं किमि गोपी?

सारस जोरी किमि हरी मारि गएउ किन खग्गि ।
झुरि झुरि पांजरि धनि भई बिरह कै लागी अग्गि ।

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — कवि कहता है कि उधर चित्तौड़ में नागमती रत्नसेन के आने के मार्ग की ओर देखती हुई उसके लौटने की प्रतीक्षा करती रहती थीं और सोचती रहती थीं कि मेरे प्रियतम यहाँ से एक बार क्या गए कि उन्होंने लौटकर आने का नाम तक नहीं लिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि वे किसी चतुर नारी के वशीभूत हो गए हैं और उसने उनको मोहित करके, उनके हृदय को मेरी ओर से अपहृत कर लिया है | वह तोता (हीरामन) मेरे लिए काल तुल्य बनकर मेरे प्रियतम को मुझसे विलग करके अपने साथ ले गया है। उस तोते को मेरे प्रियतम को नहीं ले जाना चाहिए था चाहे उसके स्थान पर वह मेरी जान ले लेता। वह तोता तो मेरे प्रति उसी प्रकार छली सिद्ध हुआ है, जैसे राजा बलि के साथ वामन ने छल किया था। उसने इन्द्र की भांति छल करते हुए कर्ण से उसके अमोघ बाणों को छलपूर्वक लेने के तुल्य मेरे पति को छलपूर्वक मुझसे अलग कर दिया ||

जैसे महाभारत के युद्ध में कर्ण को संत्रस्त देखकर इन्द्र प्रसत्र हुआ था, वह भी उसी प्रकार प्रसत्र हो रहा होगा। राजा गोपीचन्द राजसी वैभवों के उपभोग में निमग्न रहते थे, किन्तु जिस प्रकार उनको जालंधर योगी अपने साथ ले गए थे, उसी प्रकार राजसी भोगों में लिप्त मेरे प्राणेश्वर को हीरामन ले गया है। वह तोता मेरे प्रियतम को अपने साथ ले जाकर उसी प्रकार विलुप्त हो गया है, जैसे श्रीकृष्ण को अक्रूर अपने साथ मधुरा ले गए थे और अब मुझ विरहिणी का जीवित रहना उसी प्रकार दुष्कर हो गया है, जैसे कृष्ण के वियोग में गोपियों का जीवन दूभर हो गया था।

नागमती अंतर्विलाप-सा करते हुए कहने लगी कि अरे तोते। तूने हमारी सारसों की जैसी जोड़ी को भंग किया है, इससे अच्छा तो यह रहता कि तू खड्‌ग द्वारा मेरी हत्या कर देता। अब तो मेरी काया में ऐसी विरहाग्नि सुलगी रहती रहती है कि उसमें जलकर मेरा शरीर झूर-झूर हो उठा हैं।

(2)

पिउ वियोग अस बाउर जीऊ। पपिहा तस बौले पिउ पीऊ ।।
अधिक काम दगधै सो रामा। हरि जिउ लै सो गएउ पिय नामा ।।
विरह बान तस लाग न डोली । रकत पसीज भीजि तन चोली । ।
सखि हिय हेरि हार मैन मारी। हहरि परान तजै अब नारी ।।
खिन एक आव पेट मँह स्वासा। खिनई-जाइ सब होहि निरासा ।।
पौनु डोलावहिं सींचहि चोला । पहरक समुझि नारि मुख बोला ।।
प्रान पयान होत केइँ राखा । को मिलाव चात्रिक के भाखा ।।

आह जो मारी बिरह की, आगि उठी तेहि हाँक ।
हँस जो रहा सरीर मँह, पाँख जरे तन थाक ।।

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — कवि कहता है कि अपने प्राणेश्वर के वियोग में पद्मावती बावली-सी हो गई और उसके मुख से सदैव पपीहे की भांति पिउ-पिउ की ध्वनि निकलने लगी । उस रमणी को काम अत्यधिक पीड़ित करने लगा। हीरामन मानो उसके प्रियतम के रूप में उसके प्राणों को ही अपहृत कर ले गया था। उसे ऐसा विरह-रूपी वाण लगा हुआ था कि वह हिल-डुल भी नहीं सकती थी और रक्त के पसीजने के कारण उसकी चोली सदैव गीली रहती थी। उसको देखकर सखियां सोचने लगी कि अब यह नारी कामदेव द्वारा परास्त की जा चुकी है और यह अब कांप-कांपकर अपने प्राण छोड़ देगी। उसे एक क्षण के लिए श्वास आता था और उसके उदर में स्पन्दन होता था, किन्तु क्षण भर में ही वह श्वास निकल जाता था जिससे उसकी समस्त सखियां निराश हो उठती थीं। उसको बेहोश हुई देखकर सखियां उस पर पंखे से हवा करते हुए, उसकी चोली पर जल छिड़कने लगीं, तब कहीं जाकर एक प्रहर के बाद नागमती कुछ सचेत हुई और यह समझते हुए कि मैं अपनी पेरशान सखियों से घिरी हुई हूँ , उसके मुख से कुछ शब्द निकले। वह कहने लगी कि अपने प्राणेश्वर के वियोग में मेरे उड़ते हुए प्राण-पखेरुओं को किसने और क्यों उड़ने से रोक दिया है। अब मुझ चातकी का प्रियतम-रूपी मेघ से कौन सम्मिलन करायेगा?

कवि कहता है कि विरहिणी नागमती ने जब आह भरी तो उसकी आह के साथ-साथ आग निकलने लगी। उस विरहाग्नि के कारण नागमती के शरीर में जो जीवात्मा रूपी हंस विद्यमान था उसके पंख जल उठे जिससे उड़ नहीं सका | उसका आत्मा-रूपी हंस पंख जल जाने के कारण उड़ने में असमर्थ होकर उसके शरीर में ही रहा गया अर्थात इस असहनीय विरह-वेदना के पश्चात भी उसके प्राण शेष रहे |

(3)

पाट महादेइ हिएँ न हारू। समुझि जीउ चित चेतु सँभारू ||
भँवर कँवल सँग होइ न परावा। सँवरि नेह मालति पहँ आवा।।
पीउ सेवाति सौं जैस पिरीती। टेकु पियास बाँधु जिय थीती ।।
धरती जैस गँगन के नेहा। पलटि भरे बरखा रितु मेहा ।।
पुनि बसंत रितु आव नवेली । सो रस सो मधुकर सी बेली।।
जनि अस जीउ करसि तूं नारी। दहि तरिवर पुनि उठहिं सँभारी।
दिन दस जल सूखा का नंसा। पुनि सोइ सरवर सोई हँसा ।।


मिलहिं जो बिछुरै साजन गहि गहि भेंट गहंत ।
तपनि मिरिगसिरा जै सहहिं ते अदरा पलुहंत ।।

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — नागमती को आश्वासन देते हुए उसकी सखियां कहने लगी कि हे रानी। आप इस प्रकार हिम्मत मत हारिए अपितु हृदय में सोच-विचार कर अपने चैतन्य की रक्षा कीजिए अर्थात् अपने होशहवास मत खोइये। हे महारानी आप यह विश्वास रखिए कि जिस प्रकार भ्रमर कमल के समीप जाकर भी अंततः मालती के प्रेम का स्मरण करके उसके समीप लौट आता है उसी प्रकार आपके प्राणेश्वर भी पद्मावती-रूपी कमल के पास जाकर भी अंततः आपके समीप लौट आएंगे। प्रियतम रूपी स्वाति-नक्षत्र के प्रति आपका जैसा दृढ़ प्रेम-भाव है, उसको ध्यान में रखते हुए अपनी काम-पिपासा को वशवर्तिनी रखिए, और प्रियतम के लौटने की आशा का सहारा लेकर अपने हृदय में धैर्य धारण रखिए। जिस प्रकार पृथ्वी आकाश के प्रेम भाव में निमग्न रहती है तो आकाश उसको वर्षा ऋतु में जल से ओत-प्रोत कर देता है उस पर स्नेह की वर्षा करता है, उसी प्रकार तुम भी अंततः स्व-पति का स्नेह प्राप्त करोगी। इसी प्रकार तुम्हारे जीवन में पुनः वहीं वसन्त ऋतु आएगी, जिसमें समस्त प्रकार के सुख-भोंग होंगे, और तुम्हारे पति-रूप भ्रमर द्वारा लता-रूप तुम्हारा मकरन्द पान किया जाएगा। हे महारानी ! आप अपना हृदय इस प्रकार क्यों दुखी और खुट्टा कर रही हैं। आप यह सोचकर धैर्य क्यों नहीं रखती कि ग्रीष्म ऋतु में दग्ध हुए वृक्ष वसन्त ऋतु के आगमन से पुनः हरे हो उठते हैं उनमें नयी-नयी कोंपल फूट पड़ती हैं। यदि दस दिवस तक जल सूख भी जाता है, अर्थात् यदि आपका स्व-पति से कुछ दिनों के लिए मिलन नहीं भी हो पाता है, तो क्या हुआ, क्योंकि बाद में तो वही सरोवर और वे ही हंस होंगे अर्थात् मिलन के क्षण आएंगे ।

हे महारानी ! आप इस तथ्य को भी विस्मृत मत कीजिए कि वियोग के पश्चात् मिलन की आशा बहुत अधिक बढ़ जाया करती है और बिछुड़े हुए पति बड़े ही उल्लासपूर्वक मिलते और आलिंगन करते हैं | वे ही आर्द्रा नक्षत्र की घोर वर्षा में पल्लवित पुष्पित हुआ करते हैं जो मृगशिरा नक्षत्र के ताप को सहन करते हैं।

(4)

चढ़ा आसाढ़ गगन घन गाजा। साजा बिरह दुंद दल बाजा ।
धूम स्याम घौर घन धाए। सेत धुजा बगु पाँति देखाए । ।
खरग बीज चमके चहुँ ओरा। बूंद बान बरसहिं घन घोरा ।।
अद्रा लाग बीज भुइँ लेई । मोहि पिय बिनु को आदर देई ।।
औनाई घटा आई चहुँ फेरी । कँत उबारु मदन हौं धेरी ।।
दादुर मोर कोकिला पीऊ। गिरै बीजु घट रहे न जीऊ ।।
पुख नक्षत्र सिर ऊपर आवा। हाँ बिनु नाहँ मँदिरा को छावा।।

जिन्ह घर कंता ते सुखी तिन्ह गारौ अरु गर्व ।
कंत पियारा बाहिरे हम सुख भूला सर्व ।।

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — आसाढ़ का महीना आया तो आकाश में बादलों की गर्जन होने लगी, जो नागमती को ऐसी प्रतीत हुई कि विरह ने युद्ध की तैयारी की है और उसकी सेना ने कूच का नगाड़ा बजाया है। धुमैले, काले और भूरे रंग के बादल आकाश में दौड़ने लगे और उनमें उड़ती हुई बगुलों की पंक्तियाँ उनकी ध्वजाओं जैसी प्रतीत होने लगीं। खड्ग रूपी बिजली चारों ओर चमकने लगी और वर्षा की बूंद रूपी बाणों की घनघोर वर्षा होने लगी। आर्द्रा नक्षत्र के लगते ही बिजली चमककर भूमि को छूने लगी। नागमती सोचने लगी कि ऐसे विरहोत्तेजक वातावरण में प्रियतम की अनुपस्थिति में मुझको कौन समादर देगा अर्थात् मेरी कुछ भी पूछ नहीं रही है जबकि पति के यहां होने पर ऐसे उन्मादक वातावरण में अवश्य ही काम के लिए मेरी मनुहार करते। चारों ओर उमड़ी हुई घटाएं पृथ्वी पर झुकी-सी प्रतीत होती हैं, जिन्हें देखकर मेरी कामोत्तेजना और भी अधिक बढ़ उठी है। हे प्राणनाथ! आप शीघ्र ही आकर मेरी रक्षा कीजिए क्योंकि मुझको कामदेव की सेना ने घेरा हुआ है। मेंढ़क, मयूर और कोयल के शब्द तो मुझे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो मेरे हृदय को बीध डाल रहे हैं, और मेरे प्राण निकले जा रहे हैं। अब तो पुष्प नक्षत्र सिर पर आ गया है जो इस बात का द्योतक है कि और भी अधिक वर्षा होगी। मेरे तो पति भी यहां नहीं हैं अतः मेरे भवन पर छप्पर कौन छवाएगा।

विरह-वेदना में रुदन करते हुए नागमती कहती है — हे प्राणेश्वर जिन स्त्रियों के पति उनके घर में हैं वे गर्व और गौरव की भावना से अभिभूत हैं, जबकि आपके परदेश में होने के कारण मैं अपने समस्त प्रकार के सुखों को भी भूल चुकी हूँ |

(5)

सावन बरिस मेंह अतिवानी। भरनि भरइ हौं बिरह झुरानी ।
लागु पुनर्वसु पीऊ न देखा। भै बाउरि कहँ कंत सरेखा ।।
रकत के आँसू परे भुइँ टूटी। रेंगि चली जनु बीर बहूटी।।
सरिवन्ह रचा पिउ सँग हिंडोला । हरियर भुइँ कुसुँभि तन चोला ।।
हिय हिंडोला जस डोलै मोरा। विरह झुलाइ देह झकौरा ।।
बाट असूझ अथाह गंभीरा। जिउ बाउर भा भवै भँभीरा ।।
जग जल बूड़ि जहाँ लगि ताकी। मोर नाव खेंवक बिनु थाकी ।।

परवत समुंद अगम बिच बन बेहड़ घन ढंख |
किमि करि भेटौं कँत तोहि ना मोहि पाँव न पंख ।।

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — बारहमास-वर्णन के अंतर्गत विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन करते हुए जायसी कहते हैं कि सावन के महीने में जोरदार वर्षा होने लगी। एक ओर तो मूसलाधार वृष्टि हो रही थी जबकि बेचारी नागमती विरहाग्नि में झुलसती जा रही थी। नागमती सोचने लगी कि पुनर्वसु नामक नक्षत्र लग गया है किन्तु मैं अब तक स्व-पति के दर्शन प्राप्त करने में असफल रही हूँ। यह सोच-सोचकर मैं बावली हो चुकी हूँ कि न जाने मेरे चतुर प्रियतम कहाँ रह रहे हैं- अथवा यह कि प्रियतम के समान और कौन सुखदायक हो सकता है। मेरे नेत्रों से रक्त के आँसू भूमि पर टूट-टूटकर गिरते रहते हैं, जो ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो बीर बहूटियां रेंग रही हों। मेरी सखियों ने अपने-अपने प्रियतमों के साथ हिंडोले डाले हुए हैं। मेरी सखियों ने अपने-अपने प्रियतमों के साथ हिण्डोले डाले हुए हैं | भूमि पर चारों ओर हरियाली छाई हुई है जबकि उन्होंने ( सखियों ने ) कुसुम्भी रंग के चोले धारण किए हुए हैं | सखियों को अपने प्रियतमों के साथ हिण्डोलों पर झूलते देख मेरा हृदय भी विरह रूपी हिण्डोले पर झूलने लगता है और विरह मुझे झोंटे और झंकोरे देता हुआ इस झूले पर झुला रहा है |

मुझे अपने पति से सम्मिलन का मार्ग बड़ा ही असूझ, अथाह और अत्यधिक गंभीर लग रहा है और मेरा हृदय बावला होकर भंभीरी की भांति घूम रहा है। जहाँ तक भी पृथ्वी दिखाई पड़ती है, वह जल में डूबी हुई है। ऐसे घनघोर वर्षा-काल में जहाँ चारों ओर पानी-ही-पानी दृष्टिगत होता है मेरी जीवन रूपी नौका को पार लगाने वाला मल्लाह, पति के अभाव में और कौन हो सकता है।

स्व-प्रियतम को संबोधित करती हुई नागमती कहने लगी कि हे प्राणनाथ। मेरे और तुम्हारे मध्य अनेक अगम्य पर्वत और समुद्र तथा बीहड़ वनों और सघन ढाक के वनों का अन्तराल (दूरी) है। मैं आपसे कैसे आकर मिलूं क्योंकि न तो मेरे पास ऐसे पैर ही हैं जो ये दुर्गम रास्ता तय कर सकें और न पंख ही हैं जिनकी सहायता से मैं उड़कर आपसे मिल सकूँ |

(6) 

भर भादौं दूभर अति भारी । कैसें भरौं रैनि अँधियारी ||
मँदिल सून पिय अनतै बसा। सेज नागिनी भै धै-धै डसा ||
रहौं अकेलि गहें एक पाटी। नैंन पसारि मरौं हिय फाटी ।।
चमकि बीज घन गरजि तरासा। बिरह काल होइ जीउ गरासा ।।
बरिसै मेघा झँकोरि-झँकोरि। मोर दुइ नैन चुवहिं जसि ओरी ।।
पुरबा लग पुहुमि जल पूरी। आक जवास भई हौं झूरी।।
धनि सूखै भर भादौं माहाँ। अबहूँ आइ न सींचति नाहाँ ।।

जल थल भर अपूरि सब, गँगन धरति मिलि एक ।
घनि जोबन औगाह मँह, दे बूड़त पिय टेक ।। (6)

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — विरहिणी नागमती के लिए भाद्र माह की झर की लड़ी अर्थात् निरन्तर वर्षा अतीव कष्टकर सिद्ध हो रही है। वह इस चिन्ता में दुःखी है कि इस महीने की अँधेरी रातों को मैं कैसे व्यतीत करूँ। मेरा गृह सुनसान है क्योंकि मेरे पति कहीं अन्यत्र रह रहे हैं। पति के वियोग के कारण मेरी शैया मुझ पर नागिन बनकर बार-बार काटने दौड़ती-सी प्रतीत होती है। हे प्राणनाथ! तुम्हारी अनुपस्थिति में मैं अपनी चारपाई अथवा पलंग की पाटी पकड़े पड़ी रहती हूँ। आपके आने की प्रतीक्षा में मेरे नेत्र फटे के फटे रह जाते हैं, जबकि मेरा हृदय टुकड़े-टुकड़े हो उठता है। बार-बार बिजली चमकती है, जबकि बादल अपनी गर्जना से मुझे त्रस्त करते हैं। विरह तो काल-रूप होकर मेरे जीवन को हड़पना चाहता है। मघा नक्षत्र में घनघोर वर्षा हो रही है—वर्षा के झोंके पर झोंके आते रहते हैं और मेरे नेत्रों से भी आँसुओं की ऐसी झड़ी लगी रहती है, मानो ओलती टपक रही हो। मघा नक्षत्र के बाद पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र लग गया है, जिसमें और भी अधिक वर्षा होने के कारण पृथ्वी जल से परिपूर्ण हो उठती है। मेरा शरीर विरहाग्नि में उसी प्रकार सूखा जा रहा है जैसे वर्षा-काल में आक और जवासा सूख जाते हैं। हे नाथ! आपकी स्त्री भरे भादों के महीने में सूखती जा रही है। आप अब भी आकर इसको सींचते क्यों नहीं हो—इसे अपनी उपस्थिति-रूपी जल से सूखने से बचा लीजिए।

हे प्राणेश्वर! भर-भादों के महीने में इतनी घनघोर वर्षा हुई कि चारों ओर जल ही दिखाई पड़ता है तथा पृथ्वी और आकाश मिलकर एक हो गए हैं। आपकी प्रियतमा यौवन-रूपी अगाध जल में डूबती जा रही है, आप इस डूबती को शीघ्र ही आकर सहारा क्यों नहीं देते?

(7) 

लाग कुआर नीर जग घटा। अबहुँ आउ पिउ परभूमि लटा ।।
तोहि देखे पिउ पलुहै काया । उतरा चित्त फेरि करु माया ।।
उए अगस्ति हस्ति घन गाजा । तुरै पलानि चढ़े रन राजा ।।
चित्रा मीत मीन घर आवा। कोकिल पीउ पुकारत पावा ।।
स्वाति बूँद चातिक मुख परे । सीप समुँद मोति लै भरे ।।
सरवर सँवरि हँस चलि आए। सारस कुलरहिं खंजन देखाए ।।
भए अवगास काँस बन फूले। कँत न फिरे बिंदेसहि भूले ।।

विरह हस्ति तन सालै, धाइ करै तन चूर ।
बेगि आई पिय बाजहु, गाजहु होई सदूर।। (7)

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — कवि वर्णन करता है कि अब कुआर का महीना लग गया और जगत से पानी की मात्रा कुछ कम हो गई तो विरहिणी नागमती कातर स्वर में याचना करने लगी कि अरे मेरे परदेशी प्रियतम तुम अब भी लौट आओ। हे प्राणेश्वर! मेरा यह सूखकर अस्थिपंजर मात्र शरीर आपको देखकर ही पुनः हरा-भरा हो उठेगा। आपका मेरी ओर से इस प्रकार मन क्यों फिर गया है, आप मुझ पर पुनः अनुकम्पा कीजिए। अगस्त्य तारे के उदय होने पर हस्ति नक्षत्र मेघ-गर्जन करने लगा है अथवा मेघ-रूपी हाथी गर्जने लगे हैं और राजाओं ने अपने अश्वों पर सवार होकर युद्धों की तैयारी कर दी है—भाव यह है कि अब तो आने-जाने के मार्ग खुल गए हैं, अतः यदि आप वर्षा के जल के कारण नहीं आ पा रहे थे तो अब तो आ जाइए।
हे प्राणेश्वर! अब तो चित्रा नक्षत्र का स्वामी (मित्र) चन्द्रमा मीन राशि में आ गया है तथा कोयल भी पीड़-पीड़ पुकारती हुई अपने स्वामी को पुकारती हुई उसको प्राप्त कर चुकी है—भाव यह है कि जब चित्रा का सम्मिलन चन्द्रमा से और कोयल का सम्मिलन अपने प्रियतम से हो चुका है तो फिर आप भी मुझसे आकर क्यों नहीं मिलते। यही नहीं चातक के मुख में भी स्वाति-नक्षत्र की बूँदें पड़ गई हैं और सीपी का मुख भी स्वाति-नक्षत्र की बूँदें पड़ने के कारण मोती से भर गया है। पुराने सरोवरों को याद करते हुए वे हंस पुनः उन सरोवरों में लौट आए हैं जो वर्षाकाल में उनको छोड़ गए थे। सारस के जोड़े कुलेलें करने लगे हैं जबकि खंजन पक्षियों के भी जोड़े दिखाई पड़ने लगे हैं। जब सभी ओर मिलन की व्याप्ति है तो फिर आप भी आकर मुझसे क्यों नहीं मिलते हो। सभी ओर मैदानों में कास के वन फूल उठे हैं, फिर भी न जाने मेरे पति विदेश में रहते हुए मुझको भूलकर अभी तक क्यों नहीं लौटे हैं।
हे प्राणनाथ! विरह-रूपी हाथी मेरे शरीर को चूर-चूर करके कष्ट दे रहा है। आप शीघ्र ही शार्दूल के रूप में मेरे समीप आकर गर्जना क्यों नहीं करते, जिससे मुझे विरह-रूपी हाथी से छुटकारा मिल सके। शार्दूल रूपी आपके आते ही विरह रूपी हाथी डर का पलायन कर जायेगा |

(8)

कातिक सरद चंद उजियारी। जग सीतल हौं बिरहैं जारी ।।
चौदह करा चाँद परगासू। जानहुँ जरें सब धरति अकासू ।।
तन मन सेज करै अगिडाहू। सब कहँ चाँद मोहि होइ राहू ।।
चहू खंड लागे अँधियारा । औं घर नाहिन कँत पियारा ।।
अबहूँ निठुर आव एहिं बारा। परब देवारी होइ सँसारा ।।
सखि झूमक गावहिं अंग मोरी। हौं झूरौं बिछुरी मोरी जोरी।।
जेहि घर पिउ सो मुनिवरा पूजा। मो कँह बिरह सवति दुःख दूजा ।।

सखि मानहिं तेवहार, सब गाइ देवारी खेलि |
हों का खेलों कँत बिनु रही छार सिर मेलि || (8)

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — कार्तिक के महीने में दिवाली के त्योहार पर नागमती की विरह-व्यथा के और भी बढ़ जाने का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि कार्तिक के महीने में शरद-चंद्र की उज्ज्वलता अर्थात् चाँदनी व्याप्त रहने लगी। विरहाकुल नागमती सोचती है कि एक ओर तो समस्त जगत में शीतलता परिव्याप्त है जबकि मैं विरह-अग्नि में झुलसी जा रही हूँ। चन्द्रमा अपनी चौदह-कलाओं से युक्त होकर चमक रहा है, किन्तु मुझे ऐसी अनुभूति होती है मानो चन्द्रमा की चाँदनी में पृथ्वी और आकाश दग्ध हो रहे हैं। मेरे शरीर, अंतर्मन और शैया सभी में अग्निदाह-सा प्रतीत होता है। सारे संसार को ही चन्द्रमा की सुशीतलता आनंदकर है जबकि मुझको राहू के समान कष्टकर सिद्ध हो रही है। मुझे तो चारों ही खंडों में अंधकार छाया लगता है, क्योंकि मेरे प्राणेश्वर गृह में विद्यमान नहीं हैं। अरे निष्ठुर प्रियतम! तुम अब भी एक बार लौटकर आ जाओ। क्योंकि सम्पूर्ण जगत् में दिवाली का त्योहार मनाया जा रहा है। मेरी समस्त सखियाँ अपने अंगों को मरोड़ती हुई उल्लासपूर्वक झुमक गा रही हैं, क्योंकि मेरी जोड़ी बिछुड़ी होने के कारण, प्रियतम से बिछोह के कारण में आनन्दित होने के स्थान पर विरह में झुलसती-सुरती रहती हूँ। जिन नारियों के गृह में उनके पति हैं वे मुनियों की पूजा कर रही हैं जबकि मेरे अंतर्मन में दोहरे कष्ट साल रहे हैं – एक ओर तो मुझको प्रियतम से बिछोह का दुःख मारे डालता है। जबकि उसके साथ ही सपत्नी (सौत) का दुःख तो मुझे मारे ही डाल रहा है।

मेरी समस्त सखियाँ (तथा अन्य नारियाँ) हँसते-खेलते हुए दिवाली का त्योहार मना रही हैं, जबकि अपने प्रियतम के अभाव में मैं इस प्रकार की खुशियाँ कैसे मना सकती हूँ, अतः अपने सिर में धूल डाल रही हूँ – मेरा दुःख पराकाष्ठा को पहुँचा हुआ है क्योंकि तभी व्यक्ति ऐसा आचरण करता है।

(9) 

अगहन देवस घटा निसि बाढ़ी। दूभर रैनि सो जाइ किमि काढ़ी ।।
अब धनि देवस विरह भा राती। जरै बिरह ज्यों दीपक बाती ।।
काँपा हिया जनावा सीऊ। तौ पै जाइ होइ सँग पीऊ ।।
घर घर चीर रचा काहूँ। मोर रूप रँग लै गा नाहूँ ।। पलटि न बहुरा गा जो बिछोई। अबहूँ फिर फिरै रँग सौइ ।।
सियरि अगिनि बिरहिनि हिया जारा। सुलगि सुलगि दगधै होइ छारा ।।
यह दुःख-दुगध न जानै कंतू । जोबन जरम करै भसमंतू ।।

पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा हे भँवरा हे काग |
सो धनि बिरहैं जरि मुइ तेहिक धुआँ हम लाग || (9)

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — अगहन के महीने में जब दिन छोटे और रातें लम्बी हो गईं तो विरहिनी नागमती की व्यथा और भी अधिक बढ़ गई क्योंकि वह समझ नहीं पाती थी कि पति के विछोह के असह्य दुःख को कैसे दूर किया जाए लम्बी रातों का काटना उसके लिए और भी अधिक कष्टकर हो गया था। अब तो विरह के कारण नागमती को दिवस भी रात्रि जैसा कष्टकर प्रतीत होता था और वह वियोग में दीपक की वर्तिका की तरह तिल-तिल करके जलती रहती थी। शीत के कारण उसका हृदय विकंपित रहने लगा था और यह कम्प तभी दूर हो सकता था जबकि उसके प्राणेश्वर उसके समीप होते। प्रत्येक घर में नारियों ने शरद काल के अनुरूप नए-नए वस्त्रों की रचना कर ली थी, किन्तु नागमती ऐसा भी नहीं कर सकी क्योंकि वह सोचती थी कि मेरे तो रूप और रंग को मेरे प्राणेश्वर ही अपने साथ ले गए हैं भाव यह है कि उसकी खाने-पहनने की ओर अभिरुचि ही नहीं रह गई थी। वह बार-बार सोचती थी कि मेरे पति यहां से किसी ऐसी अशुभ घड़ी में गए हैं कि एक बार जाकर उन्होंने लौटने का नाम तक नहीं लिया है। यदि वे अब भी लौट आएं, तो सुहावने दिवस लौट आएंगे। शीत आग बनकर उस विरहिणी के अंतर्मन को निरन्तर दग्ध करता रहता था और वह विरहाग्नि में सुलग कर जलकर राख हो चुकी थी। उसके अंतर्मन में टीस थी कि मेरी विरहावस्था के दुःख से मेरे प्रियतम सर्वथा अनभिज्ञ हैं और उसकी इस अज्ञानता के कारण ही मेरा यौवन और जीवन जलकर भस्म होते जा रहे हैं निस्सार होते जा रहे हैं।

विरहिणी नागमती भ्रमर और कागों को संबोधित करते हुए कहने लगी कि हे भ्रमरों! अरे कागों! तुम मेरे प्रियतम के समीप पहुंचकर उन्हें यह संदेश पहुंचा देना कि आपकी प्रियतमा वियोगाग्नि में दग्ध हो-होकर मर गई है ओर उसका धुआं लगने के कारण ही हमारे शरीर काले पड़ गए हैं।

(10) 

पूस जाड़ थर-थर तन काँपा । सुरुज जड़ाइ लंक दिसि तापा ।।
बिरह बाढ़ि भा दारून सीऊ। कँपि-कँपि मरौं लेहि हरि जीऊ ।।
कँत कहीं हौं लागौं हियरे। पंथ अपार सूझ नहि नियरें ।।
सौर सुपेती आवै जूड़ी। जानहु सेज हिवँचल बूड़ी ।। चकई निसि बिछुरै दिन मिला। हौं निसि बासर बिरह कोकिला ।।
रैनि अकेलि साथ नहि सखी। कैसे जिऔं बिछोही पँखी ।।
बिरह मँचान भँवे तन चाँड़ा। जियत खाइ अब मुएँ नहि छाँड़ा ।।

रकत ढरा माँसू गरा हाड़ भए सब सँख ।
धनि साँरस होइ ररि मुई पीउ सेमटहु पंख ।। (10)

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — कवि कहता है कि पूस के महीने में ठंडक इतनी अधिक बढ़ गई कि सभी नर-नारी थर-थर कांपने लगे। यही नहीं स्वयं सूर्य भी जाड़े से पीड़ित होकर लंका की ओर तापने लगा (आग सेकने को तापना कहते हैं) अर्थात् वह उत्तरायण से दक्षिणायन हो गया। बेचारी नागमती की विरह-व्यथा और भी बढ़ गई और उसको शीत भयंकर प्रतीत होने लगा। अपने प्रियतम को स्मरण करते हुए वह सोचने लगी कि उनके अभाव में मैं कांप-कांप कर मरी जा रही हूं और जाड़ा तो मेरी जान लेकर ही पीछा छोड़ेगा। हे प्राणनाथ! आप कहां हो ? यदि आप यहां होते तो मैं आपके कंठ से लगकर इस मारक शीत से परित्राण पा सकती थी। आपके और मेरे मध्य तो असीम असूझ मार्ग की दूरी है, आप कहीं समीप भी तो नहीं हैं जिससे मैं ही आकर आपसे मिल लेती। मुझे तो अब ऐसी जूड़ी आने लगी है कि कई-कई रजाइयां ओढ़ने पर भी मेरे अंतर्मन का जाड़ा नहीं मिट पाता। अपनी शैया मुझे इतनी ठंडी प्रतीत होती है, मानो उसको बर्फ में डुबो दिया गया है। मुझसे तो चकई बहुत अच्छी होती है जो अपने प्रियतम से रात्रि को बिछुड़कर उससे प्रातःकाल मिल जाती है। इसके सर्वथा मैं अहिर्निशि आपके वियोग में कोयल की भांति तड़पती रहती हूं। रात्रि में मैं अकेली रह जाती हूं। मेरे साथ कोई सखी तक नहीं होती, ऐसी दशा में मैं वियोगिनी पक्षिणी क्योंकर जीवित रह सकती हूं ? हे प्राणनाथ! विरह-रूपी भयंकर बाज मुझ पक्षिणी के चतुर्दिक चक्कर काट रहा है। यह मुझको जीवित ही खाना चाहता है और मरने पर तो मुझे किसी प्रकार भी नहीं छोड़ेगा।

सारस-सारसी की अटूट जोड़ी की भांति साथ निभाने की याचना करती हुई नागमती स्व-प्राणेश्वर को संबोधित करते हुए कहती है कि हे प्राणनाथ! मेरे शरीर का सम्पूर्ण रुधिर दुलक गया है। मेरे शरीरांगों का मांस गल गया है जबकि मेरी हड्डियां सूखकर शंख जैसी निष्प्राण-नीरस हो गई हैं, और आपकी पत्नी सारसी की भांति आपका नाम रटते-रटते मर रही है आप इतनी कृपा तो कीजिए कि उस मरी हुई के पंखों को समेट लीजिए।

(11)

लागेउ माघ परै अब पाला। बिरहा काल भएउ जड़ काला ।।
पहल-पहल तन रूई जो झाँपै । हहलि-हहलि अधिकौ हिय काँपे । ।
आइ सूर होइ तपु रे नाहाँ। तेहि बिनु जाड़ न छूटै माहाँ ।।
एहि मास उपजै रस मूलू। तूं सौ भँवर मोर जीवन फूलू ।।
नैन चुवहिं जस माँहुट नीरू। तोहि जल अंग लाग सर-चीरू ।।
टूटहिं बुंद परहिं जस ओला। बिरह पवन होइ मारै झोला । ।
केहिक सिंगार को पहिंर पटोरा । गियँ नहिं हार रही होई डोरा ।।

तुम्ह बिनु कंता धनि हरूई, तन तिनुवर भा डोल |
तेहि पर विरह जराइ कै, चहै उड़ावा झोल || (11)

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — माघ का महीना लग गया है और पाला पड़ गया है। विरहावस्था में तो जाड़ा काल बन गया है। शरीर के प्रत्येक पहलू को रूई से ढकने का प्रयत्न करने पर हृदय और भी थर-थर कांपने लगता है। अथवा जाड़ा इतना अधिक है कि जब शुरू-शुरू में रूई के वस्त्रों से भी शरीर को ढकने का प्रयत्न करते हैं तो वस्त्रों के ठंडे होने के कारण शरीर और भी अधिक कांपने लगता है।

अरे प्रियतम! तुम मेरे समीप सूर्य बनकर आ तपिए – अर्थात् यदि आप मेरे समीप आ जाओगे तो मुझे सूर्य के समान सुखद प्रतीत होंगे। तुम्हारे अभाव में मेरा यह माघ महीने का शीत नहीं छूट सकता। इसी माह में वनस्पतियों में रस का उद्रेक होता है अर्थात् उनमें रस पड़ना प्रारम्भ होता है। तुम ही वह भ्रमर हो जो मेरे यौवन-रूपी रस का उपभोग कर सकता है। मेरे नेत्रों से माघ महीने की वर्षा अर्थात् माहोैं की भांति वर्षा की-सी झड़ी लगी रहती है – अश्रुपात होता रहता है। आंसुओं से भींगे हुए ठंडे वस्त्र मुझको बाणों की तरह चुभते और रीसते रहते हैं। तुम्हारे अभाव में मुझ माहोैंट की वर्षा की बूंदें ओलों की भांति कष्टकर प्रतीत होती हैं, जबकि विरह-रूपी पवन के झोंकों के कारण मेरी व्यथा और भी बढ़ जाती है – भाव यह है कि हवा के झोंकों के कारण ओले और भी अधिक जोर से लगा करते हैं, उसी प्रकार आपके विरह में मुझे माघ की वर्षा की बूंदें और भी अधिक संतापित करती हैं।

अब मैं किसके लिए श्रृंगार करूं और किसके हेतु स्वयं को रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित करूं? मैं अपनी ग्रीवा में हार भी नहीं धारण कर सकती क्योंकि मेरी गर्दन सूख-सूखकर डोरे जैसी हो गई है। डॉ० अग्रवाल के अनुसार – “मेरे कंठ में हार नहीं रहा। मैं उस हार का डोरा मात्र हो गई हूं।”

हे प्राणनाथ! आपके विरह में सूख-सुखकर मैं अत्यधिक हल्की रह गई हूं और मेरा शरीर तिनकों के ढेर के तुल्य हो गया है। इस पर भी विरह की आग मुझको जलाकर राख की भांति उड़ाने को तत्पर है।

(12) 

फागुन पवन झँकोरा बहा। चौगुन सीउ जाइ किंमि सहा ।।
तन जस पियर पात भा भोरा। बिरह न रहै पवन होइ झोरा । ।
तरिवर झरै-झरै वन ढाँका । भइ फूल फर साखा || करिन्ह बनाफति कीन्ह हुलासू। मो कहँ भा जग, दून उदासू ।।
फागु करहिं सब चाँचर जोरी। मोहिं जिय लाइ दीन्हि जसि होरी ।।
जौं पै पियहिं जरत अस भावा । जरत मरत मोहि रोस न आवा ।।
राति दिवस इहै मन मोरें। लागौ कंत भार होउँ तोरें ।।

यह तन जारौ छार कै कहौं कि पवन उड़ाउ |
मकु तेहि मारग होइ, परौं कंत धरै जहँ पाँउ || (12)

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — हे प्राणेश्वर फागुन के महीने में हवा झकझोरों के साथ प्रवाहित हो रही है, जिसमें शीत का प्रकोप चौगुना हो उठा है, उसे मैं अकेली और विरहिणी किस प्रकार सहन करूं? मेरी काया पत्ते के तुल्य हो गई है। विरह के कारण यह पीले पत्ते जैसा शरीर भी सुरक्षित नहीं रह पाएगा, क्योंकि विरह के झकझोरे उसे तोड़ डालेंगे अर्थात् मेरे प्राणान्त होने की आशंका है। अब सभी वृक्षों के पत्ते झड़ने लगे हैं, ढाक-वनी के ढाकों के भी पत्ते झड़ रहे हैं। जितनी भी लताएं हैं वे फल-फूल और पत्रों से शून्य हो गई हैं। हां अब वनस्पतियों से नई कोंपलें फूटने लगी हैं मानो वे इन कोंपलों के द्वारा अपना उल्लास व्यक्त कर रही हैं। एक ओर तो लताएं हैं जो अपने प्रियतम वसन्त से मिलकर नवोल्लास से पूर्ण हो चुकी हैं, दूसरी ओर विरहिणी मैं हूं, जो आपके न लौटने के कारण और भी अधिक उदास हो उठी हूं। मेरी सभी सखियां चांचरि जोड़कर फाग मना रही हैं। सखियों को स्व-प्रियतमों के साथ रस-रंग मनाते देखकर मेरे अंतर्मन में विरह की आग इस प्रकार भड़क उठती है मानो उसमें होली जला दी गई हो। हे नाथ! यदि आपको मेरा इस प्रकार विरह की आग में जलना अच्छा लगता (भाता) है, तो मैं सहर्ष इस प्रकार जलते हुए मर जाऊंगी और मुझको क्रोध नहीं आएगा। हे प्रियतम मैं तो अहर्निश यही सोचती रहती हूं कि तुम्हारे थाल जैसे हृदय से लग जाऊं – अथवा मैं स्वयं को तेरे समक्ष उस प्रकार भोग रूप में प्रस्तुत करूं, जैसे उपभोक्ता (खाने वाले को) थाल में सामग्री सज्जित करके प्रदान की जाती है।

हे प्राणेश्वर! मेरी अभिलाषा तो यह है कि मैं आपकी वियोगाग्नि में अपने शरीर को जलाकर राख कर दूं और पवन से निवेदन करूं कि वह मुझको उड़ा ले जाए। ऐसा करने पर शायद मेरी राख उस मार्ग पर भी गिर पड़े जहां पर आप अपने चरण रखेंगे – भाव यह है कि मैं तो राख बन कर भी आपके चरण चूमना चाहती हूं।

(13)

चैत बसंता होइ धमारी। मोहि लेखें सँसार उजारी ।। पंचम बिरह पँच सर मारै। रकत रोइ सगरौ बन ढारै ||बूड़ि उठ सब तरिवर पाता। भीज मँजीठ टेसू बन राता ।।
बीरें आंब फरें अब लागे। अबहुँ सँवरि घर आउ सभागे ।।
सहस भाव फूली बनफती। मधुकर फिरे सँवरि मालती ।।
मो कहँ फूल भए जस काँटे। दिस्टि परत तन लागहि चाँटे ।।
फरि जीवन एहु नारगँ साखा। सुआ बिरह अब जाइ न राखा।।

घिरिनि परेवा आव जस आइ परंहु पिय टूटि |
नारि पराए हाथ है तुम्ह बिनु पाव न छूटि || (13)

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — अपने परदेशी प्रियतम को स्मरण करती हुई नागमती कहती है कि चैत्र का महीना आ गया है जिसमें चारों ओर धमार का आयोजन हो रहा है। चारों ओर उल्लास और आनन्द छाया हुआ है जबकि मेरे लिए तो यह संसार प्रियतम के अभाव में वीरान और सुनसान लग रहा है। जब कोयल पंचम स्वर में कुहुकती है तो उसकी बोली मेरे हृदय में कामदेव के बाणों की भाँति लगती है और मेरे रुधिर के आँसुओं से सम्पूर्ण वन ओत-प्रोत हो गया है – वसंत-ऋतु में कोयल का रुदन उपयुक्त नहीं लगता यहाँ यही अर्थ अधिक उचित है कि नागमती के रक्त पूर्ण आँसू सारे वन में ढुलकते रहते हैं, अन्यथा इन पंक्तियों का अधिकांश टीकाकारों ने यह अर्थ किया है – “कोयल अपने पंचम राग में विरह के कारण पिउ-पिउ रटती हुई काम के पंच बाण मारती है और रक्त के आँसू रोकर सारे वन में गिराती है (डॉ० वा० शरण अग्रवाल)।” “कोयल अपने पंचम स्वर में विरह के कारण पिउ-पिउ रटती हुई कामदेव के पंचबाण मारती है और रक्त के आँसू रोकर सारे वन में गिराती है।” इन दोनों ही अर्थों में कोयल द्वारा कामदेव को बाण मारने का अभिप्राय ग्रहण किया गया है, जबकि कवि का अभिव्यंग्यार्थ यह है कि कोयल की कुहुक सुनकर नागमती के हृदय पर काम-बाणों का प्रहार होता है – उसकी कामोत्तेजना बढ़ उठती है। उन रुधिरमय आँसुओं में भीगकर वृक्षों के पत्ते लाल हो उठे हैं, जबकि मंजीठ और टेसू उनमें भीगकर लाल हो गए हैं। हे सभागे प्राणेश्वर ! अब तो बौर आए हुए आम्रवृक्षों पर फल भी लगने लगे हैं, अतः आप भी मुझको याद करके घर क्यों नहीं लौट आते। वसुन्धरा की समस्त वनस्पतियाँ सहस्रों रूपों में पुष्पित हो उठी हैं और भ्रमर अपनी मालती की स्मृति करके उसके चक्कर काटने लगा है। हे नाथ! आपके अभाव में मेरे लिए पुष्प भी कंटक तुल्य बन गए हैं और जब मैं पुष्पों को देखती हूँ तो मेरे शरीर में उसी प्रकार का कष्टानुभव होने लगता है, जैसा चाँटे (चपत) मारने पर हुआ करता है। मेरे इस नारंगी के वृक्ष रूपी शरीर में यौवन भर उठा है – नारंगी वृक्ष पर नारंगियाँ आने की भाँति मेरी शरीर-लता भी यौवन से परिपूर्ण है (स्तन-रूपी फल लगे हुए हैं) किन्तु अब विरह-रूपी तोता इसको कुतरे डाल रहा है और मुझसे इसकी रक्षा नहीं हो पा रही है — भाव यह है कि आप स्वयं ही किसी प्रकार इसकी रक्षा कीजिए।

हे प्रियतम! आप मुझसे अचानक ही उस प्रकार आ मिलिए जैसे लोटन कबूतर अचानक ही आकाश से टूटकर अपनी प्रियतमा से आ मिलता है। तुम्हारी स्त्री (अथवा मेरी नाड़ी) अब विरह-रूपी पर-पुरुष के हाथों फँसी हुई है, इसको आपके अतिरिक्त और कौन छुड़ा पाएगा।

(14) 

भा बैसाख तपनि अति लागी। चोला चीर चंदन भा आगी ।।
सूरूज जर हिवंचल ताका। बिरह बजागि सोहँ रथ हाँका ।।
जरत बजागिनि होउ पिय छाँहाँ । आइ बुझाइ अँगारन्ह माहाँ ।।
तोहि दरसन होइ सीतल नारी। आइ आगि सों करू फुलवारी ।।
लागिउँ जरै जरै जस भारू। बहुरि जो भुंजसि तजौ न बारू ।।
सरवर हिया घटत निति जाई। टूक टूक होइ होई बिहराई ।।
विहरत हिया करहु पिय टेका। दिस्टि दवँगरा मेरवहु एका ।।

कँवल जो बिगसा मानसर छारिहं मिलै सुखाइ |
अबहुँ बेलि फिरि पलुहै जौं पिय सींचहु आइ || (14)

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — कवि वर्णन करता है कि वैसाख का महीना आ जाने के कारण चारों ओर भयंकर ताप पड़ने लगा है। विरहिणी नागमती को चन्दनी चीर और चोला आग जैसा दाहक प्रतीत होता है। वह सूर्य जो इससे पूर्व लंका की ओर चला गया था अब तपते हुए हिमाचल की ओर ताकने (देखने) लगा है और उसने मेरी बिरह-रूपी वज्राग्नि की ओर अपने रथ को हांक दिया है अथवा सूर्य जलता हुआ हिमालय की ओर जाना चाहता था। (वहां तो वह नहीं गया) विरह की वज्राग्नि में तपती हुई मेरी ओर ही उसने रथ हांक दिया है (मैं और तपने लगी)। हे प्रियतम! मैं विरह-रूपी वज्राग्नि में प्रज्ज्वलित हो रही हूं आप इससे मेरी रक्षा कीजिए — मुझे अपने सम्मिलन की छाया प्रदान कीजिए। मैं विरहाग्नि के अंगारों में झुलसी जा रही हूं, इनसे आप मेरी रक्षा कीजिए अपने आगमन-रूपी जल से इन अंगारों को बुझाइए। आपकी पत्नी आपके दर्शनों से ही सुशीतल हो सकती है। हे प्राणनाथ! शीघ्र ही आइए और मुझको अंगारों से फुलवाड़ी में परिणत कर दीजिए। आपके विरह की आग में मैं सदैव भाड़ की तरह जलती रहती हूं और यदि आप मुझको फिर भी जलाएंगे तो भी आपका द्वार (बारू) न छोड़ूंगी। अथवा जिस प्रकार भाड़ की आग में भूने जाने पर जौ की बौहरिया (भुने हुए जौ को लोक शब्दावली में बौहरी कहते हैं) जिस प्रकार तीव्र ताप के कारण बार-बार उछल-उछल कर भी बालू में ही आ गिरती है — तप्त बालू को नहीं छोड़ती — उसी प्रकार मैं भी आपके द्वारा नाना प्रकार के कष्ट-संताप दिए जाने पर भी आपका साथ नहीं छोड़ सकती है। हे प्रिय! मेरा सरोवर-रूपी हृदय नित्यप्रति घटता जा रहा है – जैसे गर्मी से तालाब का जल सूखता जाता है उसी प्रकार विरह ताप के कारण मेरे हृदय की भावनाएं शुद्ध-नीरस होती जा रही हैं। स्थिति यहां तक आ पहुंची है कि मेरा हृदय पूर्णतः सूखकर छिन्न-भिन्न हो उठा है जैसे सूखे हुए तालाब का तल (मिट्टी ) अनेक खण्डों में विभक्त हो जाती है। हे प्राणेश्वर! मेरे फटते हुए हृदय को सहारा दीजिए और अपनी दृष्टि-रूपी दौंगरे ( हल्की वर्षा ) से उसके छिन्न-भिन्न टुकड़ों को मिलाकर एक कर दीजिए।

हे नाथ! वह कमल जो मेरे हृदय-रूपी मानसरोवर में खिला हुआ था – अर्थात् मेरा प्रफुल्लित हृदय – आपके दर्शन-रूपी जल के अभाव में सूख-सूखकर मिट्टी में मिल रहा है। उसकी सूखी हुई बेल (कमलनाल) अब भी पुनः हरी-भरी हो सकती है यदि आप उसको अपनी दृष्टि-रूपी जल (वर्षा) से सींचने की अनुकम्पा करेंगे।

(15)

जेठ जरै जग बहै लुवारा। उठे बवंडर धिकै पहारा ।। बिरह गाजि हनिवंत होइ जागा । लँका डाह करै तनु लागा ।।
चारिहुँ पवन झँकोरै आगी । लंगा डाहि पलंका लागी ।।
दहि भइ साम नदी कालिंदी । विरह की आगि कठिन असि मंदी ।।
उठे आणि औ आवे आँधी। नैन न सूझ मरौं दुःख बांधी।।
अधजर भई माँसु तन सूखा। लागेउ विरह काग होइ भूखा ||
माँसु खाइ अब हाड़न्ह लागा। अबहूँ आउ आवत सुनि भागा ।।

परबत समुँद मेघ ससि दिनअर, सहि न, सकहिं यह आगि ।
मुहम्मद सती सराहिऐ जरै जो अस पिय लागि || (15)

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — ज्येष्ठ के महीने में सारी पृथ्वी जलने लगी। आँधी के बवंडर उठने लगे और तीव्र ताप के कारण पहाड़ भी दहकने लगे। विरह हनुमान की भाँति गर्जना करते हुए जागृत हो गया और लोगों के (नागमती के) शरीरों को लंका की भांति दग्ध करने लगा। चारों पवन अपने झोंकों से इस विरह की आग को विवर्धित करने लगे और उससे लंका ही नहीं अपितु पलका तक जल उठी। इस विरहाग्नि में जलकर ही यमुना नदी का जल काला हो गया है। विरह की अग्नि धीमी-धीमी सुलगती आग की तरह अत्यधिक दुसह्य हुआ करती है। आग भड़क उठी है, जबकि अंधड़ भी चल रहा है। नागमती कहती है कि ऐसे में मुझको हाथों-हाथ नहीं दिखाई पड़ रहा है और इस दुःख में ग्रस्त होकर मैं मरी जा रही हूं। विरहाग्नि में जलकर मैं अधमरी (अधजली) हो उठी हूं और मेरे शरीर का सारा मांस सूख गया है। विरह-रूपी काग मेरे मांस को उसी प्रकार खाए डालता है, जैसे बुभिक्षित कौआ मांस पर झपटा करता है। विरह-रूपी कौवे ने मेरे मांस का भक्षण करने के पश्चात् अब मेरी हड्डियों को खाना आरम्भ कर दिया है। हे प्राणनाथ ! आप अब भी आकर मुझे जीवित बचा लीजिए क्योंकि यह आपके आने का नाम सुनते ही भाग खड़ा होगा।

नागमती की यह विरहाग्नि जो ज्येष्ठ माह की लुओं के रूप में प्रकट हो रही है, इसको पर्वत, समुद्र, बादल, चन्द्रमा और सूर्य में से कोई भी नहीं सहन कर सकता। कवि मलिक मुहम्मद जायसी कहते हैं कि सती-साध्वी नागमती की सराहना करनी चाहिए जो अपने प्रियतम के आगमन की प्रतीक्षा में इस विरहाग्नि को सहन कर रही है।

(16)

तपै लाग अक जेठ-असाढ़ी। भै मोकहै यह छाजनि गाढ़ी।।
तन तिनुवर भा झुरौं खरी। मैं विरहा आगरि सिर परी ।।
साँठि नांहि लगि बात को पूँछा। बिनु जिय भएउ मूँज तन छूछा ।।
बंध नाहि और कंध न कोई। बाक न आव कहौ केहि रोई ।।
ररि दूबरि भइ टेक बिहूनी। थम नाहि उठि सकै न थूनी ।।
बरसहिं नैन चुअहिं घर माहाँ। तुम्ह बिनु कंत न छाजन छाँहाँ ।।
कारौं कहाँ ठाट नव साजा। तुम्ह बिनु कंत न छाजन छाजा ।।

अबहूँ दिस्टि मया करू छान्हिन तजु घर आउ |
मंदिल उजार होत है नव आनि बसाउ || (16)

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — नागमती अपने परदेसी प्रियतम को याद करते हुए कहती है कि प्राणेश्वर अब मेरे शरीरांगों में विरह जेठ असाढ़ की तरह तपने लगा है और यह तपन मेरे शरीर को छाजन (एक रोग विशेष) की तरह व्यथित करने लगा है। मेरा शरीर सूख-सूखकर कांटा हो गया है और मैं खड़ी झरती रहती हूं। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है मानो विरह की खान (आगरी) ही मेरे सिर पर टूट पड़ी है। अब मेरी गांठ में पूंजी नहीं है अर्थात् मेरा पति-रूपी धन मुझसे दूर है अतः मेरी बात कौन पूछेगा ? अपने प्रियतम के अभाव में मेरा शरीर मूंज की भांति निस्सार हो गया है (मूंज के बान से चारपाई बुनी जाती है)। इस समय न तो कोई मेरा बंधु-बांधव है और न ही कोई कंधा अर्थात् सहारा देने वाला है। मेरे मुंह से शब्द ही नहीं निकल पाते अतः मैं किसको रोकर बातें सुनाऊं। रो-रोकर मैं अत्यधिक दुर्बल हो गई हूं और सभी प्रकार के आश्रयों से विहीन हूं। जब पति-रूपी स्तंभ ही न हो तो जीवन-रूपी छप्पर थूनियों (छोटे-छोटे सहारों) पर कैसे टिका रह सकता है। मेरे नेत्रों से अविरल रूप में आंसुओं की वर्षा होती रहती है जो घर में ही टपकते रहते हैं। हे नाथ! आपके अभाव में न तो मेरे भवन पर छप्पर (छाजन) ही है और न छाया ही है। अब कौन है जो नऐ ठाठ सजाएगा अथवा “अरे, कौन कहां अब नया साज सजाएगा ?” हे नाथ आपके अभाव में तो अब वस्त्र अथवा छप्पर कुछ भी तो अच्छा नहीं लगता।

हे प्राणेश्वर! आप अब भी मेरी ओर अपनी कृपा दृष्टि कीजिए और उस स्थान को छोड़कर जहां पर आप किसी अन्य को आश्रय प्रदान कर रहे हैं, अर्थात जिस स्त्री के जीवन-रूपी घर में आपने अपनी उपस्थिति-रूपी छान छायी हुई है, उसे छोड़कर मेरे समीप लौट आइए। आपकी पत्नी का यह शरीर-रूपी घर उजाड़ होता जा रहा है आप आकर इसको नए रूप में बसा लीजिए।

(17)

रोइ गँवाएउ बारह मासा। सहस-सहस दुःख एक-एक साँसा ।।
तिल-तिल बरिस-बरिस बरु जाई। पहर-पहर जुग-जुग न सिराई ।।
सो न आउ पिय रूप मुरारी। जासौं पाव सोहाग सो नारी ।।
साँझ भए झुरि-झुरि पँथ हेरा। कौनु सो धरी करै पिउ फेरा।।
दहि कोइल भै कंत सनेहा। तोला माँस रहा नहिं देहा ।।
रकत न रहा बिरह तन गरा। रती-रती होइ नैनन्हि ढरा ।।
पाव लागि चेरी धनि हाहा। चूरा नेहु जुडा वहु नाहा ।।

बरिस देवस धनि रोइ के हारि परी चित झँखि |
मानुस घर घर पूँछि के पूँछ निसरी पंखि || (17)

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — कवि कहता है कि पीछे वर्णित रीति से विरहिणी नागमती ने रो-रोकर बारह महीने जैसे-तैसे व्यतीत किए। उसकी एक-एक सांस में भी उसको हजारों प्रकार का दुःखानुभव होता था। उसके लिए एक-एक क्षण का समय काटना वर्षों की भांति लम्बा हो गया था। इसी प्रकार एक-एक पहर की कालावधि युगों के समान लम्बी प्रतीत होती थी। फिर भी उसका कृष्ण की भांति सुन्दर पति लौटकर नहीं आया था जिससे उसको सौभाग्यवती कहलाने का सुअवसर मिल सकता। संध्या होते ही वह बड़ी उत्सुकतापूर्वक पति के प्रत्यागमन के मार्ग की ओर देखने लगती थी और सोचती रहती थी कि न जाने वह शुभ घड़ी कब आएगी जब उसके पति उसके समीप आएंगे। वह अपने प्रियतम के प्रेम में जलकर कोयल की भांति काली पड़ गई थी और उसके शरीर में एक तोला तक मांस अवशिष्ट नहीं बचा था। उसके शरीर में रक्त भी शेष नहीं बचा था और विरह ने उसके शरीर को गला दिया था। उसके शरीर का रुधिर उसके आंसुओं के रूप में रत्ती-रत्ती की मात्रा तक शरीर से निकल गया था। बड़े ही कातर स्वर में वह कहने लगी कि हे प्राणेश्वर मैं हा! हा! खाते हुए आपके चरणों में गिरती हूं। आप अपने उस स्नेह-संबंध को पुनः जोड़ लीजिए जो इस समय आपने तोड़ रखा है।

कवि कहता है कि इस प्रकार एक वर्ष तक नाना प्रकार से विलाप करती हुई नागमती अंततः झख मारकर रह गई अर्थात् उसकी अभिलाषा सफल नहीं हो पाई। उसने स्व-पति के विषय में लोगों से घर-घर जाकर, पूछताछ की और जब उनसे कुछ भी पता न चला तो वह हारकर वन के पक्षियों से पूछने के लिए राजमहल से निकल पड़ी।

(18)

भई पुछारि लीन्ह बनबासू । वैरिन सवति दीन्ह चिल्हवाँसू ।।
कै खर बान कसै पिय लागा। जौं घर आवै अबहूँ कागा ।।
हारिल भइ पंथ मे सेवा। अब जहँ पठवौं कौनु परेवा ।।
धौरी पंडुक कहुँ पिय ठाऊँ। जो चित रोख न दोसर नाऊँ ।।
जाहि बया गहि पिय कंठ लैवा । करे मेराउ सोई गौरवा।।
कोयलि भई पुकारत रही। महरि पुकारि लेहु रे दही ।। पियरि तिलौरि आव जलहंसा। बिरहा पठि हिएँ कत नंसा ।।

जेहि पंखी कहँ अढवौं कहि सो बिरह की बात |
सोई पंखि जाइ डहि, तरिवर होइ निपात || (18)

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — अपने पति की खोज में घर से निकली नागमती का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि अब वह विरह में व्याकुल होकर मोरनी बनकर बन-बन में मारी-मारी फिर रही थी। उसको उसकी सौत (पद्मावती) ने चिड़िया फंसाने के जाल रूपी विरह में फंसा रखा था। विरह की तीव्रता उसको जलाए डालती थी, जो उसके हृदय में तीव्र बाण की भांति चुभ रहा था। कौवे को बैठा देखकर वह उससे कह उठती थी कि अरे कौवे! यदि आज मेरे प्रियतम घर लौट रहे हों तो तू उड़ जा। मैं लम्बे समय से हारिल बनी हुई स्व-प्रियतम के आगमन की प्रतीक्षा कर रही हूं और अब किसी पक्षी को संदेश देकर अपने प्राणेश्वर के समीप प्रेषित करूं। नागमती धौरी और पंडुक चिड़ियों से कहने लगी कि अरी तुम्हीं मुझको प्रियतम का स्थान बता दो। यदि मेरे प्रियतम अपने हृदय में मुझसे रुष्ट हुए हैं तो फिर मेरे लिए दूसरा स्थान ही कौन-सा है ? हे बया पक्षी! तू ही जाकर मुझको कंठ से लगाने वाले प्रियतम को लिवा ला। मेरे लिए तो उसी पक्षी का गौरवपूर्ण स्थान रहेगा जो मेरा स्व-प्रियतम से सम्मिलन कराएगा। मैं तो अपने प्रियतम को कोयल बनकर पुकारती हूं। कवि कहता है कि वह नारी ग्वालिन नामक चिड़िया की तरह दही लो, दही लो चिल्लाती फिरती थी अथवा नागमती यह कहते हुए कि मैं विरहाग्नि में जली जा रही हूं, दया के लिए (महरि) पुकारती फिर रही थी। बिना किसी ओर ध्यान दिए, एक वृक्ष पर तिलौरी, मैना पक्षी और सरोवर में हंस क्रीड़ा करते रहे। नागमती के हृदय में तो अब विरह-रूपी नीलकंठ का निवारा हो गया है जो बराबर उसके शरीर को कचोटता रहता है।

कवि कहता है कि विरह-दग्धा नागमती जिस किसी भी वृक्ष के समीप पहुंचकर उस पर बैठे हुए पक्षियों को अपनी विरह-व्यथा सुनाने का प्रयास करती थी, उसकी विरहाग्नि की लपटों से वही पक्षी जल जाती था और वृक्ष पत्रहीन हो जाते थे।

(19)

कुहकि कुहुकि जिस कोइलि रोई। रकत आँसु घुंघची बनबोई।।
पे करमुखी नैन तन राती। को सिराय बिरहा दुःख ताती ।।
जहँ-जहँ ठाढ़ि होई बनवासी। तहँ तहँ होइ घुंघचिन्ह कै रासी ।।
बुँद-बुँद मँह जानहुँ जीऊ। कुंजा गुँजि करहिं पिऊ-पिऊ ।।
तेहि दुःख हे परास निपाते। लोहू बूड़ि उठे परभाते ।। राते बिंब भए तेहि लोहू। परवर पाक फाट हिय गोहूँ ।।
देखिअ जहाँ सोइ होई राता। जहाँ सो रतन कहै को बाता ||

न पावस ओहि देसरें ना हेबंत बसंत |
न कोकिल न पपीहरा केहि सुनि आवहि कंत || (19)

प्रसंग — प्रस्तुत काव्यांश मालिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग खंड’ से अवतरित है | प्रस्तुत खण्ड में विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन किया गया है।

व्याख्या — विरहिणी नागमती की विरहावस्था का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि नागमती वनों में कोयल की भांति कुहुक-कुहुक कर अर्थात् हूकें भरती हुई। रुदन करती फिर रही थी और उसके रुधिरमय अश्रु लाल रंग की घुंघचियों के रूप में चारों ओर बिखर गए थे। विरहाग्नि में सुलगते रहने के कारण उसका मुख काला पड़ गया था जबकि उसके नेत्र तथा शरीर लाल रंग के हो रहे थे। रक्ताश्रुओं में भीगने के कारण शरीर का लाल हो जाना सर्वथा स्वाभाविक है। वह विरह की जिस तीव्र अग्नि में जल रही थी उसको शीतल करने वाला कोई भी नहीं था। वह वन में जहां कहीं भी जाकर खड़ी हो जाती थी वहीं पर उसके नेत्रों से गिरे रक्ताश्रुओं के कारण घुंघचियों का ढेर-सा लग जाता था, उसके आंसुओं की एक-एक बूंद मानो जान ही टपकी पड़ रही थी, इसीलिए प्रत्येक कुंज में से ‘पिउ-पिउ’ की अनुगूंज उठ रही थी। उसके दुःख में विदग्ध होकर पलाश-वृक्ष पत्रहीन हो गए थे (परास का प्रयोग फरास के वृक्ष के लिए भी माना जा सकता है, जिसको पत्ते नहीं आते) और फिर प्रातःकाल लाल-लाल पुष्पों से लदकर ऐसे प्रतीत होते थे, मानो नागमती के रक्त में डूबने के कारण ही उनके फूल लाल रंग के हो गए हैं। बिम्बफल भी नागमती के रुधिर में डूबकर लाल हो गए, जबकि परवल पक कर पीले पड़ गए और गेहूं का हृदय फट गया। जिस किसी को भी और जहां कहीं भी देखिए, वही लाल दिखाई पड़ता था अथवा नागमती इसलिए जहां रत्नसेन रूपी जिस किसी पर भी अपनी दृष्टि डालती थी, वही लाल हो जाता था लाल विद्यमान था, वहां इस बात को जाकर कौन कहता ?

अपने प्रियतम के वियोग में कलपती हुई नागमती कहने लगी कि मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि मेरा प्रियतम जिस देश में निवास कर रहा है उस देश में न तो वर्षा ऋतु होती है और न हेमंत और वसंत ऋतु का ही अस्तित्व है। वहां पर कोयल और पपीहे भी नहीं होते। यही कारण है कि मेरे प्राणेश्वर न तो ऋतुओं के प्रभाव स्वरूप मुझको याद करके लौट पाते हैं और न कोयल और पपीहे की आवाज से उनको यह याद आती है कि मेरी वियुक्ता पत्नी मुझको इसी प्रकार तड़प-तड़प कर याद कर रही होगी |

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