हो गई है पीर पर्वत सी ( दुष्यंत कुमार )

‘हो गई है पीर पर्वत सी’ सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश और परिवर्तन की तीव्र इच्छा को दर्शाती है । यह कविता साधारण व्यक्ति के दुख और पीड़ा को एक विशाल पर्वत के समान बताती है, जिसे पिघलकर समाप्त हो जाना चाहिए। कवि का मानना है कि अब सिर्फ हंगामा खड़ा करना मकसद नहीं, बल्कि समाज की बुनियाद में बदलाव लाना ज़रूरी है। 

यह ग़ज़ल दुष्यंत कुमार के प्रसिद्ध ग़ज़ल संग्रह ‘साये में धूप’ में संकलित है, जो वर्ष 1975 में प्रकाशित हुआ था। यह रचना व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह का प्रतीक है और यह संदेश देती है कि जब लोगों के सीने में बदलाव की आग जलती है, तो क्रांति होकर रहती है। यह आज भी युवाओं को प्रेरित करती है और बदलाव की अलख जगाती है। 

 
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए |

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए |

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गांव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए |

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए |

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए |

प्रसंग — प्रस्तुत गज़ल दुष्यंत कुमार के प्रसिद्ध गज़ल संग्रह ‘साये में धूप’ से ली गई है | यह गजल सामाजिक अन्याय,राजनीतिक भ्रष्टाचार और आम जनता की पीड़ा के विरुद्ध विद्रोह की भावना को मुखर करती है | इसमें कवि ने जन क्रांति का आह्वान किया है |

व्याख्या — प्रस्तुत काव्यांश में कवि ने देश की आम जनता की गहरी और पुरानी पीड़ा को रूपक के माध्यम से व्यक्त किया है । वह कहते हैं कि यह पीड़ा अब पर्वत के समान भारी और जमी हुई हो गई है अर्थात् समाज स्थिर, जड़ और असंवेदनशील होता जा रहा है। इसे अब पिघलना चाहिए, और पिघलने से उनका तात्पर्य है कि इस स्थायी पीड़ा को समाप्त कर, उसमें से कोई गंगा के समान शुद्ध, जीवनदायिनी और परिवर्तनशील धारा निकलनी चाहिए। कवि इस बात की ओर संकेत करता है कि अब समय आ गया है कि पीड़ा और अन्याय को सहने की प्रवृत्ति को त्यागा जाए और उसके स्थान पर एक सक्रिय और प्रगतिशील समाज खड़ा हो।

आज दीवार का परदों की तरह हिलना यह दर्शाता है कि वर्तमान व्यवस्था की दीवारें केवल सतही रूप से हिल रही हैं, जैसे परदे हिलते हैं, लेकिन शर्त तो बुनियाद के हिलने की थी यानी कवि केवल ऊपरी सुधार नहीं चाहता, वह तो व्यवस्था की जड़ तक बदलाव चाहता है।

दुष्यंत कुमार समाज में फैले अन्याय, शोषण और उदासीनता के विरुद्ध क्रांति और बदलाव की जरूरत पर बल देते हैं। वे कहते हैं कि अब यह समय केवल व्यक्तिगत दुख या आक्रोश का नहीं है, बल्कि समूचे राष्ट्र को जाग्रत करने का है। हर सड़क, हर गली, हर नगर, हर गाँव की ओर संकेत करती इन पंक्तियों के माध्यम से कवि संपूर्ण देश में जन-जागरण और आंदोलन की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं। हाथ लहराते हुए हर लाश का चलना प्रतीकात्मक है। यह पंक्ति प्रतीकात्मक रूप से बताती है कि मृतप्राय समाज को भी अब जाग्रत होकर सक्रिय होना चाहिए। कवि कहते हैं कि उनका उद्देश्य केवल हंगामा खड़ा करना या ध्यान आकर्षित करना नहीं है, बल्कि उनका मकसद है समाज की “सूरत बदलना” यानी जड़ व्यवस्था को समूल हटाकर एक नई व्यवस्था की स्थापना करना।

इसके पश्चात दुष्यंत जी कहते हैं कि व्यवस्था परिवर्तन के लिए विद्रोह-भावना की आग मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, जलनी अवश्य चाहिए। इस प्रकार यह पक्ति क्रांति और बदलाव के लिए व्यक्तिगत अहम् को त्यागकर सामूहिक प्रयास की आवश्यकता को रेखांकित करती है। उनके लिए जरूरी यह नहीं कि अगुवाई कौन करे, बल्कि यह है कि “आग जलनी चाहिए” यानी परिवर्तन की ज्वाला निरंतर प्रज्वलित रहनी चाहिए।

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