मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई / मीरा( मीराबाई)

मीरा ( Mirabai )
मीरा ( Mirabai )

( यहाँ NCERT की हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘आरोह भाग 1’ में संकलित मीरा ( Mirabai ) के पदों की व्याख्या तथा अभ्यास के प्रश्न दिए गए हैं |)

पद 1

मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई

जा के सिर मोर-मुकुट, मेरो पति सोई

छांडि दयी कुल की कानि, कहा करिहै कोई?

संतन ढिग बैठि-बैठि, लोक-लाज खोयी

अंसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेलि बोयी

अब त बेलि फैलि गयी, आणन्द-फल होयी

दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से विलोयी

दधि मथि घृत काढि लियो, डारि दयी छोयी

भगत देखि राजी हुयी, जगत देखी रोयी

दासि मीरां लाल गिरधर! तारो अब मोही | 1️⃣

व्याख्या – मीराबाई कहती हैं कि मेरे तो गिरधर गोपाल अर्थात् उनके लिए तो श्री कृष्ण ही सब कुछ हैं। दूसरों से उनका कोई संबंध नहीं है। जिसके सिर पर मोर का मुकुट है, वही उनका पति है। कहने का तात्पर्य यह है कि मीरा श्री कृष्ण को अपना स्वामी मान चुकीं हैं। श्री कृष्ण के लिए उन्होंने परिवार की मर्यादा भी छोड़ दी है। उन्हें अब किसी की कोई परवाह नहीं है। मीरा संतों के पास बैठकर ज्ञान प्राप्त करती हैं और इस प्रकार लोक-लाज भी खो दी है। उन्होंने अपने आँसुओं के जल से सींच-सींचकर प्रेम की बेल बोई है। अब यह बेल फैल गई है और इस पर आनंद रूपी फल लगने लगे हैं। वे कहती हैं कि उन्होंने कृष्ण के प्रेम रूप दूध को भक्ति रूपी मथानी में बड़े प्रेम से बिलोया है। उन्होंने दही से सार तत्व अर्थात् घी को निकाल लिया और छाछ रूपी सारहीन अंशों को छोड़ दिया है। वे प्रभु के भक्त को देखकर बहुत प्रसन्न होती हैं और संसार के लोगों को मोह-माया में लिप्त देखकर रोती हैं। वे स्वयं को गिरधर की दासी बताती हैं और अपने उद्धार के लिए प्रार्थना करती हैं।

पद 2

पग घुँघरू बाधि मीरां नाची,

मैं तो मेरे नारायण सूं, आपहि हो गई साची

लोग कहै, मीरां भइ बावरी ; न्यात कहै कुल-नासी

विस का प्याला राणा भेज्या, पीवत मीरां हाँसी

मीरां के प्रभु गिरधर नागर, सहज मिले अविनासी | 2️⃣

व्याख्या — मीराबाई कहती हैं कि मैं अपने पाँवों में घुँघरू बाँध प्रभु श्री कृष्ण के प्रेम में अनुरक्त हो नाचती रहती हूँ | मैंने स्वयं को अपने नारायण को समर्पित कर दिया है जिससे मैं स्वयं ही सच्ची अर्थात शुद्ध हो गई हूँ | मेरे इस व्यवहार को देखकर लोग कहते हैं कि मीरा बावली अर्थात पगली हो गई है और मेरे सगे संबंधी कहते हैं कि मैं कुलनाशिनी हूँ | यहाँ तक कि राणा जी ने मुझे मारने के लिए जो विष का प्याला भेजा था मैं उसे भी हँसते-हँसते पी गई | अंत में मीराबाई कहती हैं कि मेरे प्रभु गिरिधर गोपाल श्री कृष्ण हैं | वे अविनाशी हैं और सहज रूप में ही मिल जाते हैं अर्थात जिन्हें पाने के लिए कठोर जप-तप की आवश्यकता नहीं |

अभ्यास के प्रश्न ( मीरा )

प्रश्न 1 – मीरा कृष्ण की उपासना किस रूप में करती हैं? वह रूप कैसा है?

उत्तर – मीरा कृष्ण की उपासना अपने स्वामी के रूप में करती हैं। उसका रूप मन मोहने वाला है। वे पर्वत को धारण करने वाले हैं। उनके सिर पर मोरपंखी मुकुट है। इस रूप को अपना मानकर वे सारे संसार से विमुख हो गई हैं। इस रूप के मोह के आगे उन्होंने संसार के सभी मोह-माया का त्याग कर दिया है।

प्रश्न 2 – भाव व शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए –
(क) अंसुवन जल सींचि-सीचि, प्रेम-बेलि बोयी
अब त बेलि फैलि गई आणंद-फल होयी

उत्तर – भाव-सौंदर्य – इस पद में भक्ति की चरम सीमा है। विरह के आँसुओं से मीरा ने कृष्ण-प्रेम की बेल बोयी है। अब यह बेल बड़ी हो गई है और आनंद-रूपी फल मिलने का समय आ गया है।

शिल्प-सौंदर्य –

  1. ‘सींचि-सींचि’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
  2. सांगरूपक अलंकार है – प्रेम-बेलि, आणंद-फल, असुवन जल
  3. राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा है।
  4. बलि बोयी में अनुप्रास अलंकार है।
  5. पद में संगीतात्मकता है।

(ख) दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से विलोयी
दधि मथि घृत काढ़ि लियो, डारि दयी छोयी

उत्तर – भाव-सौंदर्य – इन काव्य पंक्तियों में कवयित्री ने दूध की मथानी से भक्ति रूपी घी निकाल लिया है तथा सांसारिक सुखों को छाछ के समान छोड़ दिया है। इस प्रकार उन्होंने भक्ति की महिमा को व्यक्त किया है।

शिल्प-सौंदर्य –

  1. अन्योक्ति अलंकार है।
  2. राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा है।
  3. प्रतीकात्मकता है – ‘घी’ भक्ति का तथा ‘छाछ” सांसारिकता का प्रतीक है।
  4. दधि, घृत आदि तत्सम शब्द हैं।
  5. संगीतात्मकता है।
  6. गेयता है।

प्रश्न 3 – मीरा जगत को देखकर रोती क्यों हैं?

उत्तर – संसार के सभी लोग संसारी मायाजाल में फंसकर ईश्वर अर्थात श्री कृष्ण से दूर हो गए हैं। उनका सारा जीवन व्यर्थ जा रहा है। इस सारहीन जीवन-शैली को देखकर मीरा को रोना आता है। लोग दुर्लभ मानव जन्म को ईश्वर भक्ति में नहीं लगाते। इसलिए संसार की दुर्दशा पर मीरा को रोना आ रहा है।

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