राम की शक्ति पूजा : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ( भाग 3)

(17) व्याख्या : विभीषण श्री राम से कहते हैं — “हाय! जब फल प्राप्ति का समय आया, तब सोचो इस पलायन से कितना श्रम व्यर्थ चला जाएगा? अब तक तो हम लोग विजय-लाभ के लिए काफी खून-पसीना बहा चुके हैं। क्या यह सब व्यर्थ ही न चला जायेगा ? अभी तो जानकी से मिलने का … Read more

राम की शक्ति-पूजा : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ( भाग 2)

(11) प्रसंग — प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की बहुचर्चित कविता ‘राम की शक्ति-पूजा’ से अवतरित हैं | इन पंक्तियों में राम-रावण युद्ध की विभीषिका, रावण की भयावहता और राम की हताशा और उससे उबरने की मनःस्थिति को दर्शाया गया है | व्याख्या — राम के दिव्य चरणों पर उनके दो अश्रु-बिन्दु टपक पड़े। हनुमान … Read more

राम की शक्ति-पूजा : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ( भाग 1)

(1) प्रसंग — प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की बहुचर्चित कविता ‘राम की शक्ति-पूजा’ से अवतरित हैं | इन पंक्तियों में राम-रावण युद्ध की विभीषिका, रावण की भयावहता और राम की हताशा और उससे उबरने की मनःस्थिति को दर्शाया गया है | व्याख्या — युद्ध करते-करते सूर्य अस्त होने से दिवस का अन्त हो गया … Read more

श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 6)

(1) दया, माया, ममता लो आज,मधुरिमा लो, अगाध विश्वास; हमारा हृदय रत्न निधि स्वच्छतुम्हारे लिए खुला है पास। प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन और वार्तालाप का वर्णन किया गया है … Read more

श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 5)

(1) किंतु जीवन कितना निरुपाय!लिया है देख नहीं संदेह निराशा है जिसका परिणामसफलता का वह कल्पित गेह। प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन और वार्तालाप का वर्णन किया गया है | … Read more

श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 4)

(1) तपस्वी! क्यों इतने हो क्लांत?वेदना का यह कैसा वेग? आह! तुम कितने अधिक हताशबताओ यह कैसा उद्वेग! प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन और वार्तालाप का वर्णन किया गया है … Read more

श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 3)

(1) एक विस्मृति का स्तूप अचेत,ज्योति का धुँधला-सा प्रतिबिंब; और जड़ता की जीवन राशिसफलता का संकलित विलंब। प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन को शब्द दिये गये हैं | व्याख्या : … Read more

श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 2 )

(1) घिर रहे थे घुँघराले बालअंस अवलंबित मुख के पास; नील घन-शावक से सुकुमारसुधा भरने को विधु के पास। प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन को शब्द दिये गये हैं | … Read more

श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 1 )

(1) कौन तुम! संसृति-जलनिधि तीरतरंगों से फेंकी मणि एक, कर रहे निर्जन का चुपचापप्रभा की धारा से अभिषेक! प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन को शब्द दिये गये हैं | व्याख्या … Read more

चिंता सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 3 )

(1) एक नाव थी, और न उसमें डाँड़े लगते, या पतवार,तरल तरंगों में उठ-गिरकर बहती पगली बारंबार।लगते प्रबल थपेड़े, धुँधले तट का था कुछ पता नहीं,कातरता से भरी निराशा देख नियति पथ बनी वहीं। प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘चिंता सर्ग’ से अवतरित है | प्रस्तुत काव्यांश में जलप्रलय … Read more

चिंता सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 2 )

(1) चिर-किशोर-वय,नित्यविलासी–सुरभित जिससे रहा दिगंतआज तिरोहित हुआ कहाँ वह मधु से पूर्ण अनंत वसंत?कुसुमित कुंजों में वे पुलकित प्रेमालिंगन हुए विलीन,मौन हुई हैं मूर्च्छित तानें और न सुन पड़ती अब बीन। प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘चिंता सर्ग’ से अवतरित है | प्रस्तुत काव्यांश में जलप्रलय के बाद मनु … Read more

चिंता सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 1 )

(1) हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह,एक पुरुष, भींगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह ।नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन,एक तत्व की ही प्रधानता-कहो उसे जड़ या चेतन । प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘चिंता सर्ग’ से अवतरित … Read more

समकालीन हिंदी कविता की प्रमुख प्रवृत्तियाँ या विशेषताएँ

समकालीन हिंदी कविता की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं : (1) परंपरागत प्रभावों से मुक्ति : समकालीन हिंदी कविता ने छायावादी और रोमांटिक सौंदर्यबोध से मुक्ति पाई है, जो इसे अधिक यथार्थवादी बनाती है। यह कविता जीवन की कठोर वास्तविकताओं को सामने लाती है, आदर्शवाद से हटकर वर्तमान की जटिलताओं को दर्शाती है। कवि पारंपरिक प्रतीकों … Read more

समाचार : अर्थ, तत्त्व ( विशेषताएँ ) और लेखन शैली ( उलटा पिरामिड शैली )

समाचार वह सूचना होती है जो किसी ताज़ा, महत्वपूर्ण, रोचक या जन-सामान्य को प्रभावित करने वाली घटना के बारे में बताती है। यह वह जानकारी है जो जनता को देश, दुनिया, समाज, राजनीति, खेल, विज्ञान, व्यापार, मनोरंजन आदि से जुड़े हालिया घटनाक्रमों से अवगत कराती है। सरल शब्दों में — “समाचार वह सूचना है जो … Read more

भागी हुई लड़कियाँ ( आलोक धन्वा )

एक घर की ज़ंजीरें कितना ज़्यादा दिखाई पड़ती हैंजब घर से कोई लड़की भागती है क्या उस रात की याद आ रही हैजो पुरानी फ़िल्मों में बार-बार आती थी जब भी कोई लड़की घर से भागती थी?बारिश से घिरे वे पत्थर के लैंप पोस्ट सिर्फ़ आँखों की बेचैनी दिखाने भर उनकी रोशनी?और वे तमाम गाने … Read more

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