श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 2 )
(1) घिर रहे थे घुँघराले बालअंस अवलंबित मुख के पास; नील घन-शावक से सुकुमारसुधा भरने को विधु के पास। प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन को शब्द दिये गये हैं | … Read more