राम की शक्ति पूजा : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ( भाग 4)
(29) बोले भावस्थ चन्द्रमुख निन्दित रामचन्द्र,प्राणों में पावन कम्पन भर स्वर मेघमन्द्र,“देखो, बन्धुवर, सामने स्थिर जो वह भूधरशोभित शत-हरित-गुल्म-तृण से श्यामल सुन्दर,पार्वती कल्पना हैं इसकी मकरन्द विन्दु,गरजता चरण प्रान्त पर सिंह वह, नहीं सिन्धु। व्याख्या : चंद्रमा की कांति को लज्जित करने वाले मुख के स्वामी राम भाव-मग्न होकर बोले | उनके शरीर में सात्विक … Read more