चिंता सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 3 )
(1) एक नाव थी, और न उसमें डाँड़े लगते, या पतवार,तरल तरंगों में उठ-गिरकर बहती पगली बारंबार।लगते प्रबल थपेड़े, धुँधले तट का था कुछ पता नहीं,कातरता से भरी निराशा देख नियति पथ बनी वहीं। प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘चिंता सर्ग’ से अवतरित है | प्रस्तुत काव्यांश में जलप्रलय … Read more