चाँद और कवि ( रामधारी सिंह दिनकर )
रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,आदमी भी क्या अनोखा जीव है!उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है। जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरतेऔर लाखों बार तुझ-से पागलों को भीचाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते। आदमी का स्वप्न? है … Read more