राजभाषा संकल्प, 1968 स्वतंत्र भारत के भाषाई इतिहास और प्रशासनिक नीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज है। जब 1965 में संविधान के अनुसार अंग्रेजी की अनिवार्य अवधि समाप्त हो रही थी, तब देश के गैर-हिन्दी भाषी राज्यों, विशेषकर दक्षिण भारत में, तीव्र विरोध प्रदर्शन हुए। इस भाषाई गतिरोध को दूर करने, देश की अखंडता को बनाए रखने और संघ के कार्यों में हिन्दी के क्रमिक प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए भारतीय संसद के दोनों सदनों द्वारा 18 जनवरी 1968 को यह सरकारी संकल्प पारित किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्थापित करने के साथ-साथ देश की सभी क्षेत्रीय भाषाओं के समन्वित विकास को सुनिश्चित करना था ताकि किसी भी राज्य के नागरिकों में भाषाई असुरक्षा की भावना पैदा न हो।
राजभाषा संकल्प 1968 के प्रावधान
राजभाषा संकल्प 1968 के मुख्य प्रावधान निम्नलिखित हैं :
(1) केंद्र सरकार संघ के आधिकारिक प्रशासनिक कार्यों में हिन्दी के प्रसार और उपयोग की गति को तेज करने के लिए एक व्यापक व गहन कार्यक्रम तैयार करेगी और इस दिशा में हुई प्रगति की समीक्षा के लिए प्रतिवर्ष एक विस्तृत मूल्यांकन रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों के पटल पर प्रस्तुत करेगी।
(2) देश की एकता और भाषाई सामंजस्य को मजबूत करने के लिए पूरे देश में त्रि-भाषा सूत्र (Three-Language Formula) को कड़ाई से लागू किया जाएगा, जिसके तहत हिन्दी भाषी क्षेत्रों में किसी एक दक्षिण भारतीय या आधुनिक भाषा का और गैर-हिन्दी भाषी क्षेत्रों में क्षेत्रीय भाषा व अंग्रेजी के साथ हिन्दी का अध्ययन अनिवार्य होगा।
(3) भारत सरकार संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के समेकित विकास के लिए राज्य सरकारों के सहयोग से ठोस कदम उठाएगी ताकि देश की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता अक्षुण्ण बनी रहे।
(4) केंद्रीय सेवाओं और नौकरियों में भर्ती के लिए होने वाली परीक्षाओं में बैठने वाले उम्मीदवारों के लिए हिन्दी या अंग्रेजी में से किसी एक भाषा का ज्ञान होना आवश्यक किया गया ताकि दोनों ही माध्यमों के युवाओं को समान अवसर मिल सकें।
(5) संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित की जाने वाली अखिल भारतीय और उच्चतर केंद्रीय सेवा परीक्षाओं में अंग्रेजी के साथ-साथ संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित सभी क्षेत्रीय भाषाओं को परीक्षा के वैकल्पिक माध्यम के रूप में मान्यता दी गई।
निष्कर्ष: संक्षेप में कहा जा सकता है कि राजभाषा संकल्प, 1968 भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का परिचायक है, जिसने देश के भाषाई विवाद को काफी हद तक शांत किया। यह संकल्प न केवल राजभाषा हिन्दी के विकास का मार्ग प्रशस्त करता है, बल्कि भारत की बहुभाषी पहचान का सम्मान करते हुए क्षेत्रीय भाषाओं को भी फलने-फूलने का समान अवसर प्रदान करता है। इसी ऐतिहासिक प्रस्ताव की नींव पर आगे चलकर ‘राजभाषा नियम, 1976’ जैसी महत्वपूर्ण नीतियां तैयार की गईं, जो आज भी हमारे प्रशासनिक ढांचे को सुचारू रूप से चला रही हैं।
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