पद : 185
कैसे दिन कटिहै जतन बताये जड्यो,
एहि पार गंगा ओहि पार जमुना,
बिचवाँ मडड्या हमकाँ छवाये जइयो ।
अँचरा फरिके कागज़ बनाइन,
अपनी सुरतिया हियरे लिखाये जइयो।
कहत कबीर सुनो भाई साधो,
बहियाँ पकरिके रहिया बताये जड्यो।
व्याख्या : इस पद में जीवात्मा अपने प्रियतम परमात्मा से विनती करती है कि आपके बिना मेरा जीवन कैसे कटेगा, मुझे कोई ऐसा उपाय बता दीजिए जिससे यह विरह का समय कट सके। वह कहती है कि एक तरफ गंगा और दूसरी तरफ यमुना बह रही है, आप कृपा करके इनके बीच में (सुषुम्ना नाड़ी में) मेरे रहने के लिए एक छोटी-सी कुटिया बनवा दीजिए ताकि मैं ध्यान लगा सकूँ। मैंने अपने आँचल को फाड़कर कागज बना लिया है, आप अपनी सुंदर छवि मेरे हृदय में बसा जाइए ताकि मैं निरंतर आपका स्मरण करती रहूँ। कबीरदास जी कहते हैं कि हे संतों सुनो, वह जीवात्मा प्रभु से यही गुहार लगा रही है कि इस संसार के अंधकार में मेरी बाँह पकड़ लीजिए और मुझे मुक्ति का सीधा मार्ग दिखा जाइए।
पद : 186
कैसे जीवेगी विरहिनी पिया बिन, कीजै कौन उपाय।
दिवस न भूख रैन नहिं सुख है, जैसे करि जुग जाम।
खेलत फाग छाँडि चलु सुंदर, तज चलु धन औ धाम।
बन-खंड जाय नाम लौ लावो, मिलि पियसे सुख पाय।
तलफत मीन बिना जल जैसे, दरसन लीजै धाय।
बिना आकार रूप नहीं रेखा, कौन मिलेगी आय।
आपन पुरुष समझि ले सुंदरि, देखो तन निरताय।
सब्द सरुपी जिव-पिव बूझो, छांडो भ्रम की टेक।
कहैं कबीर और नहिं दूजा, जुग जुग हम-तुम एक।
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि परमात्मा के वियोग में तड़पती जीवात्मा उनके बिना कैसे जीवित रहे, इसके लिए क्या उपाय किया जाए? उसे दिन में भूख नहीं लगती और रात में सुख-चैन नहीं मिलता, उसका हर पहर कलयुग के समान भारी बीत रहा है। कबीर जीवात्मा को समझाते हैं कि हे सुंदरी! संसार के झूठे खेल-तमाशों, धन-दौलत और घर-द्वार के मोह को छोड़ दो। चित्त के एकांत में जाकर प्रभु के नाम से लौ लगाओ, तभी प्रियतम से मिलकर सच्चा सुख मिलेगा। जैसे पानी के बिना मछली तड़पती है, वैसे ही व्याकुल होकर उनके दर्शन के लिए दौड़ पड़ो। लेकिन यह भी समझो कि जिस परमात्मा का कोई भौतिक रूप, रंग या रेखा नहीं है, वह बाहर साकार रूप में तुमसे कैसे मिलेगा? इसलिए अपने शरीर के भीतर ही खोजकर उस आत्म-तत्व को पहचानो। परमात्मा को शब्द-स्वरूपी समझो और बाहर भटकने की व्यर्थ जिद छोड़ दो। कबीर कहते हैं कि तुम्हारे और परमात्मा के बीच कोई द्वैत नहीं है, तुम दोनों युगों-युगों से वास्तव में एक ही हो।
पद : 187
भींजै चुनरिया प्रेम-रस बूंदन।
आरत साज चली है सुहागिन पिय अपने को ढूंढन ।
काहे की तोरी बनी है चुनरिया काहे के लगे चारों फूंदन।
पाँच तत्त की बनी है चुनरिया नामके लागे फूंदन।
चढ़िगे महल खुल गई रे किवरिया दास कबीर लागे झूलन।।
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि ईश्वर के प्रेम-रस की बूंदों से जीवात्मा की चुनरी भीग रही है। सौभाग्यवती जीवात्मा अपने प्रियतम परमात्मा से मिलने के लिए प्रेम और विरह का श्रृंगार सजाकर उनकी खोज में निकल पड़ी है। कबीर प्रश्न करते हैं कि तुम्हारी यह चुनरी किस चीज़ की बनी है और इसके चारों कोनों पर क्या लगा है? फिर स्वयं उत्तर देते हुए कहते हैं कि यह चुनरी पाँच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बनी है और इसमें प्रभु के पावन नाम रूपी चार फुंदने लगे हैं। जब यह जीवात्मा साधना करते हुए अंतःकरण के ऊँचे महल (सहस्रार) तक पहुँच जाती है, तो ज्ञान के सारे बंद कपाट खुल जाते हैं और कबीरदास जी परमानंद के झूले में झूलने लगते हैं।
पद : 188
“मैं अपने साहिब संग चली।
हाथ में नरियल मुख में बीड़ा, मोतियन माँग भरी।
लिल्ली घोड़ी जरद बछेड़ी, तापै चढ़ि के चली।
नदी किनारे सतगुरु भेंटे, तुरत जनम सुधरी।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, दोउ कुल तारि चली।”
व्याख्या : इस पद में जीवात्मा कहती है कि अब मैं संसार के सारे बंधनों को त्यागकर अपने स्वामी परमात्मा के साथ चलने के लिए तैयार हो गई हूँ। जैसे सती होने वाली नारी पूरी साज-सज्जा के साथ हाथ में नारियल, मुँह में पान का बीड़ा और माँग में मोतियों का सिंदूर भरकर निकलती है, वैसे ही मैं भी पूर्ण समर्पण के साथ तैयार हूँ। मन और प्राणों की चंचलता पर नियंत्रण रूपी सवारी पर सवार होकर मैं आगे बढ़ी। संसार रूपी नदी के किनारे मुझे सच्चे गुरु मिल गए और उनके उपदेश से तुरंत मेरा यह जन्म सुधर गया। कबीरदास जी कहते हैं कि हे संतों सुनो, ऐसी समर्पित आत्मा अपने दोनों कुलों—संसार (मायके) और परलोक (ससुराल)—का उद्धार करके मुक्ति पा जाती है।
पद : 189
गुरु मोहि घुँटिया अजर पियाई।
जबसे गुरु मोहि घुँटिया पियाई, भई सुचित मेटी दुचिताई।
नाम-औषधि आधार-कटोरी, पियत अघाय कुमति गई मोरी।
ब्रह्मा-विस्नु पिये नहिं पाये, खोजत संभू जन्म गँवाये।
सुरत निरत करि पियै जो कोई, कहै कबीर अमर होय सोई।।
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि सद्गुरु ने मुझे ज्ञान और नाम रूपी ऐसी अमर घुट्टी पिला दी है जो कभी समाप्त नहीं होती। जब से गुरु ने मुझे यह घूँट पिलाया है, मेरा मन पूरी तरह शांत और एकाग्र हो गया है तथा मन की सारी दुविधा व भ्रम मिट गए हैं। गुरु ने प्रेम और विश्वास के कटोरे में रखकर मुझे राम-नाम रूपी अचूक दवा दी, जिसे जी भरकर पीते ही मेरी सारी दुर्बुद्धि नष्ट हो गई। जिस अमृत-रस को केवल बाहरी कर्मकांडों से ब्रह्मा और विष्णु भी नहीं पा सके और जिसकी खोज में शिवजी भी युगों तक ध्यान लगाते रहे, कबीर कहते हैं कि जो भी व्यक्ति अपने ध्यान और चेतना को एकाग्र करके इस रस को पी लेता है, वह जन्म-मरण के बंधन से छूटकर हमेशा के लिए अमर हो जाता है।
पद : 190
कबीर भाटी कलालकी, बहुतक बैठे आइ।
सिर सौंपे सोई पिवै, नहीं तो पिया न जाइ ।।
हरि-रस पीया जाणिए, जे कबहूं न जाइ खुमार।
मैंमंता घुमत रहै, नाहीं तन की सार।।
सबै रसायण मैं किया, हरि-सा और न कोई।
तिल इक घटमैं संचरै, तो सब कंचन होइ।।
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि सद्गुरु रूपी मदिरा विक्रेता की दुकान पर बहुत से लोग आकर बैठे हैं, लेकिन इस ईश्वरीय प्रेम-रस को केवल वही पी सकता है जो अपना अहंकार रूपी सिर गुरु के चरणों में अर्पित कर दे; बिना पूर्ण समर्पण के यह रस नहीं मिल सकता। सच्चे हरि-रस का पान वही माना जाता है जिसका नशा कभी उतरता ही नहीं; उसे पीकर साधक मतवाले हाथी की तरह प्रभु-प्रेम में मस्त रहता है और उसे अपने शरीर की भी कोई सुध नहीं रहती। कबीर कहते हैं कि मैंने संसार के सारे रस और रसायन परख कर देख लिए हैं, पर ईश्वर के नाम जैसा कोई दूसरा रसायन नहीं है। यदि यह रस तनिक मात्र (तिल भर) भी हृदय में उतर जाए, तो मनुष्य का पूरा जीवन सोने की तरह पवित्र और शुद्ध हो जाता है।
पद : 191
पीछे लागा जाइ था, लोक वेद के साथि।
आगैं थें सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि ॥
दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट।
पूरा किया बिसाहूणा, बहुरिन आँवौं हट्ट॥
कबीर गुरु गरवा मिल्या, रलि गया आटे लूंण।
जाति पाँति कुल सब मिटें, नाँव धरोगे कूण ।।
सतगुरु हमसूँ रीझि करि, एक कहाय परसंग।
बरस्या बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग ॥
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि मैं भी संसार के अन्य लोगों की तरह रूढ़ियों और किताबी ज्ञान के पीछे भटका जा रहा था, लेकिन आगे चलकर मुझे सच्चे गुरु मिल गए और उन्होंने मेरे हाथ में ज्ञान का दीपक थमा दिया। उस दीपक में गुरु ने प्रेम का तेल भरा और कभी न घटने वाली ध्यान रूपी बत्ती लगा दी; उसके प्रकाश में मैंने जीवन का आध्यात्मिक सौदा पूरा कर लिया, अब मुझे संसार रूपी बाज़ार में दोबारा जन्म लेने नहीं आना पड़ेगा। मुझे इतने महान गुरु मिले कि मैं उनमें वैसे ही घुल-मिल गया जैसे आटे में नमक मिल जाता है; अब मेरी जाति, कुल और सांसारिक पहचान सब मिट गई है, अब मुझे किस नाम से पुकारोगे? कबीर कहते हैं कि सद्गुरु ने मेरी निष्ठा से प्रसन्न होकर ज्ञान का ऐसा अद्भुत मर्म समझाया कि ईश्वर के प्रेम का बादल उमड़ पड़ा और उसकी वर्षा से मेरा रोम-रोम भीग गया।
पद : 192
व दिन कब आवैगे भाइ (माइ ) ।
जा कारनि हम देह धरि है, मिलिबौ अंगि लगाइ।।
हौँ जॉनूं जे हिल-मिलि खेलूँ, तन मन प्रान समाइ।।
या कांमनां करौ परिपूरन, समरथ हौ रांम राइ।।
मांहि उदासी माधौ चाहै, चितवन रैनि बिहाइ।।
सेज हमारी स्यंघ भई है, जब सोऊँ तब खाइ ।।
यहु अरदास दासकी सुनिये, तनकी तपनि बुझाइ ।।
कहै कबीर मिलै जे सांई, मिलि करि मंगल गाइ।।
व्याख्या : कबीरदास जी विरह में व्याकुल होकर कहते हैं कि हे भाई! ( या हे माँ ) वह दिन कब आएगा जिसके लिए मैंने यह मानव शरीर धारण किया है, जब मैं अपने प्रियतम परमात्मा से गले लगकर मिल सकूँगा? मेरी बस यही इच्छा है कि मैं उनके साथ मिलकर रम जाऊँ और अपने तन, मन तथा प्राणों को उनमें विलीन कर दूँ। हे सर्वसमर्थ राम! आप मेरी इस कामना को पूरा कीजिए। मेरे हृदय में उदासी छाई है और मेरा चित्त केवल प्रभु को चाहता है; उनकी राह देखते-देखते सारी रात बीत जाती है। उनके बिना मेरी सेज बाघिन के समान डरावनी हो गई है, जिस पर सोने जाने से वह काटने को दौड़ती है। हे प्रभु! अपने इस सेवक की प्रार्थना सुनिए और दर्शन देकर मेरे शरीर व मन की जलन को शांत कीजिए। कबीर कहते हैं कि यदि एक बार मेरे स्वामी मिल जाएँ, तो मैं उनके साथ मिलकर अनंत आनंद के मंगल गीत गाऊँ।
पद : 193
मेरी अंखियाँ जांन सुजांन भई।
देवर भरम सुसर संग तजि करि, हरि पीव तहाँ गई।।
बालपने के करम हमारे, काटे जानि दई।
बाँह पकरि करि किरपा किन्हीं, आप समींप लई।।
पानीं की बूँद थे जिनि प्यंड साज्या, ता संगि अधिक रई।
दास कबीर पल प्रेम न घटई, दिन दिन प्रीति नई ।।
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि मेरी आँखें और अंतर्दृष्टि अब सचमुच ज्ञानवान और समझदार हो गई हैं। मैंने इंद्रियों के विषयों (देवर), झूठे अहंकार (गर्व) और लोक-लाज के बंधनों (ससुर) का साथ छोड़कर सीधे अपने प्रियतम प्रभु की शरण ले ली है। अज्ञान के समय में मुझसे जो भी पाप या भूलें हुई थीं, प्रभु ने कृपा करके उन सभी संचित कर्म-बंधनों को काट दिया। उन्होंने दया करके मेरी बाँह पकड़ी और मुझे अपने पास बैठा लिया। जिस विधाता ने पानी की एक बूँद से इस शरीर को बनाया, अब मैं केवल उसी से सच्चा प्रेम करता हूँ। कबीरदास जी कहते हैं कि उस परमात्मा से मेरा प्रेम एक पल के लिए भी कम नहीं होता, बल्कि दिनों-दिन यह प्रेम और अधिक नया और गहरा होता जाता है।
पद : 194
इहि बिधि राम सूं ल्यौ लाइ।।
चरन पाषै निरति करि, जिभ्या बिनाँ गुंण गाइ।
जहाँ स्वाँति बूँद न सीप साइर, सहजि मोती होइ।
उन मोतियन मै नीर पोयो पवन अम्बर धोई |
जहाँ धरनि बरषै, गगन भीजै, चन्द-सूरज मेल।
दोई मिलि तहाँ जुड़न लागे, करत हंसा केलि।
एक बिरष भीतरि नदी चाली, कनक कलस समाइ।
पंच सुवटा आइ बैठे, उदै भई जनराइ।
जहाँ बिछ्य्यौ तहाँ लाग्यौ, गगन बैठो जाइ।
जन कबीर बटाऊवा, जिनि मारग लियौ चाइ।
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि परमात्मा से इस प्रकार ध्यान लगाओ कि बिना पैरों के ही भक्ति में नृत्य हो और बिना जीभ हिलाए ही मन ही मन उनके गुणों का गान चलता रहे। वहाँ न स्वाति नक्षत्र की बूँद है, न कोई सीप और न समुद्र, फिर भी सहज साधना से ज्ञान के सुंदर मोती उत्पन्न होते हैं। अपनी श्वास और चेतना को शून्य आकाश में शुद्ध करके उन मोतियों को पिरोया जाता है। साधना की उस अवस्था में नीचे मूलाधार से अमृत धारा ऊपर उठती है और ऊपर का सहस्रार आकाश उसमें भीग जाता है तथा सूर्य व चंद्र नाड़ियों का मिलन हो जाता है। दोनों के शांत होने पर जीवात्मा रूपी हंस परम आनंद में रमण करने लगता है। शरीर रूपी वृक्ष के भीतर सुषुम्ना रूपी नदी बहती है और वह ब्रह्म-रस के कलश में समा जाती है; पाँचों इंद्रियाँ बाहर भटकना छोड़कर भीतर शांत बैठ जाती हैं और अंतःकरण में ज्ञान का सूर्य चमक उठता है। मन जो संसार में बिखरा हुआ था, वह सिमटकर शून्य आकाश में स्थिर हो जाता है। कबीर कहते हैं कि वह साधक सच्चा यात्री है जिसने इस साधना के मार्ग को प्रेम से अपना लिया है।
पद : 195
करो जतन सखी साँई मिलन की।
गुड़िया गुड़वा सूप सुपलिया, तजि दें बुधि लरिकैयाँ खेलनकी।
देवता पित्तर भुइयाँ भवानी, यह मारग चौरासी चलन की।
ऊँचा महल अजब रँग बँगला, साँईं की सेज वहाँ लगी फूलन की।
तन मन धन सब अरपनि कर वहाँ, सुरत सम्हार परु पड्याँ सजन की।
कहै कबीर निर्भय होय हंसा, कुंजी बता दयो ताला खुलन की।
व्याख्या : कबीरदास जी जीवात्मा को समझाते हुए कहते हैं कि हे सखी! अब उस परमात्मा से मिलने का प्रयास करो और बचपन के खेल-खिलौनों (गुड़िया और सूप) की तरह संसार के प्रपंचों वाली बचकानी बुद्धि को त्याग दो। देवी-देवताओं, पितरों और लोक-देवियों की पूजा-पाठ में ही उलझे रहना चौरासी लाख योनियों में भटकने का रास्ता है, यह मुक्ति का मार्ग नहीं है। परमात्मा का निवास अंतःकरण के ऊँचे महल में है, जहाँ आनंद के फूलों की सुंदर सेज सजी है। वहाँ पहुँचकर अपना तन, मन और धन सब कुछ उन्हें समर्पित कर दो और अपनी सुरति को संभालकर प्रियतम के चरणों में गिर जाओ। कबीर कहते हैं कि हे जीवात्मा रूपी हंस! अब तुम पूरी तरह निर्भय हो जाओ, क्योंकि सद्गुरु ने अज्ञान का ताला खोलने वाली ज्ञान की चाबी दे दी है।
पद : 196
मोरि लगी गये बान सुरंगी हो।
धन सत गुरु उपदेश दियो है, होई गयो चित्त भिरंगी हो।
ध्यान पुरुष की बनी है तिरिया, घायल पाँचो सँगी हो।
घायल की गति घायल जाने, की जानै जात पतंगी हो।
का है कबीर सुनों भाई साधो, निसि दिन प्रेम उमंगी हो।
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि मुझे सद्गुरु के ज्ञान और प्रेम का ऐसा सुंदर बाण लगा है कि मेरी अंतरात्मा पूरी तरह बिंध गई है। वे सद्गुरु धन्य हैं जिन्होंने ऐसा उपदेश दिया, जिसके प्रभाव से मेरा मन भृंगी कीट की तरह प्रभु के ध्यान में लीन होकर उन्हीं के रंग में रंग गया है। मेरी जीवात्मा उस परमात्मा के ध्यान में मग्न होकर उनकी सच्ची प्रेमिका बन गई है और उस शब्द-बाण से मेरे पाँचों साथी (पाँचों इंद्रियाँ) शांत होकर वश में आ गए हैं। इस प्रेम-चोट के दर्द को केवल वही जान सकता है जो स्वयं घायल हुआ हो, या फिर वह पतंगा जानता है जो दीपक की लौ पर अपना जीवन न्योछावर कर देता है। कबीर कहते हैं कि हे संतों सुनो, अब तो मेरे हृदय में रात-दिन केवल ईश्वर के प्रेम की ही उमंग उठती रहती है।
पद : 197,
गुरु बड़े भृंगी हमारे गुरु बड़े भृंगी।
कीट सों ले भृंग कीन्हा आपसो रंगी।
पाँव औरै पंख औरै और रंग रंगी।
जाति कूल ना लखै कोई सब भये भृंगी।
नदी-नाले मिले गंगे कहलावै गंगी।
दरियाव-दरिया जा सामने संग में संगी।
चलत मनसा अचल कीन्ही मन हुआ पंगी।
तत्त में निःतत्त दरसा संग में संगी।
बंध में निर्बंध कीन्हा तोड़ सब तंगी।
कहै कबीर किया अगम गम, नाम रँग रंगी।।,
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि हमारे सद्गुरु भृंगी कीट के समान अत्यंत सामर्थ्यवान हैं, जो किसी साधारण कीड़े को भी अपनी गूँज से अपने जैसा भृंग बना लेता है; वैसे ही गुरु ने मुझे अपने जैसा ब्रह्म-रूप बना दिया। उन्होंने मेरा रूप, रंग और स्वभाव सब कुछ बदलकर आध्यात्मिक बना दिया। वहाँ जाति और कुल का कोई भेद नहीं रहता, सभी साधक एक समान होकर गुरु के रंग में रंग जाते हैं। जैसे साधारण नदी-नाले भी जब गंगा में मिलते हैं तो गंगाजल बन जाते हैं, और नदियां समुद्र में मिलकर समुद्र ही हो जाती हैं, वैसे ही आत्मा परमात्मा में मिलकर एक हो जाती है। गुरु ने मेरे चंचल मन की वासनाओं को शांत करके मन को स्थिर कर दिया और इस पंचतत्व के शरीर के भीतर उस निराकार ब्रह्म का दर्शन करा दिया। उन्होंने माया-मोह के सारे बंधन तोड़कर मुझे पूरी तरह मुक्त कर दिया और उस अगम्य मार्ग पर पहुँचाकर मुझे प्रभु-नाम के रंग में रंग दिया।
पद : 198
पिया मेरा जागे मैं कैसे सोई री।
पाँच सखि मेरे सँग की सहेली, उन रँग रँगी पिया रंग न मिली री।
सास सयानी ननद-बोरानी, उन डर डरी पिय सार न जानी री।
दादस ऊपर सेज बिछानी, चढ़ न सकौ मारी ला लजानी री।
रात दिवस मोहिं कूका मारे, मैं न सुनी रचि रहि संग जानी री।
कहै कबीर सुनु सखी सयानी, बिन सतगुरु पिया मिले न मिलानी री।।
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि मेरा प्रियतम परमात्मा तो निरंतर जाग रहा है (सदा चैतन्य है), फिर मैं अज्ञान और मोह की नींद में कैसे सोई रहूँ? मेरे साथ रहने वाली पाँचों सहेलियाँ (पाँचों इंद्रियाँ) संसार के विषयों में डूबी रहीं, इसलिए मैं उनके रंग में रंगकर अपने प्रियतम के प्रेम-रंग से दूर रह गई। अविद्या रूपी चतुर सास और तृष्णा रूपी ननद के डर से मैं अपने स्वामी के वास्तविक प्रेम को नहीं पहचान सकी। हृदय के द्वादश दल कमल पर प्रियतम के मिलन की सुंदर सेज सजी है, लेकिन मैं अपनी झिझक और लोक-लाज के कारण उस पर चढ़ नहीं सकी। प्रभु मुझे रात-दिन भीतर से पुकारते रहे, पर मैंने उनकी आवाज़ अनसुनी कर दी और संसार के झूठे सुखों में ही उलझी रही। कबीर कहते हैं कि हे समझदार सखी! बिना सच्चे गुरु के मार्गदर्शन के उस परमात्मा से कभी मिलन नहीं हो सकता।
पद : 199
बहुत दिनन की जोवती, बाट तुम्हारी राम।
जिव तरसे तुझ मिलन कूँ, मनि नाहीं बिसराम ।।
बिरहिन ऊठै भी पड़े, दरसन कारनि राम।
मूवाँ पीछे देहुगे, सो दरसन किहिं काम ॥
मूवां पीछे जिनि मिलै, कहै कबीरा राम।
पाथर घाटा लौह तब पारस कोणों काम ||
बासुरि सुख, नाँ रैणि सुख, ना सुख सुपिनै माहिं।
कबीर बिछुट्या राम सूं, ना सुख धूप न छाँहि ॥
व्याख्या : कबीरदास जी अत्यंत आर्त भाव से कहते हैं कि हे राम! मैं बहुत दिनों से आपकी राह देख रहा हूँ। मेरा प्राण आपसे मिलने के लिए तड़प रहा है और मन को एक पल भी चैन नहीं है। आपके दर्शन की चाह में यह विरहिणी आत्मा इतनी कमजोर हो गई है कि बार-बार उठती है और गिर पड़ती है; हे प्रभु! यदि मेरे मरने के बाद दर्शन दोगे तो वह दर्शन किस काम का होगा? कबीर कहते हैं कि हे राम, मरने के बाद मिलने का कोई अर्थ नहीं है; जैसे घिसकर नष्ट हो चुके लोहे के लिए पारस पत्थर का कोई उपयोग नहीं बचता, वैसे ही जीवन समाप्त होने पर दर्शन व्यर्थ है। परमात्मा से अलग होकर कबीर को न दिन में सुख है, न रात में आराम है और न सपने में शांति मिलती है; उसके लिए न धूप में सुख है और न ही छाया में कोई सांत्वना है।
पद : 200
परबति परबति मैं फिरता, नैन गँवाए रोई।
सो बूटी पाऊँ नहीं, जातै जीवन होई।।
नैन हमारे जलि गए, छिन छिन लोड़े तुज्झ।
नां तू मिलै न मैं सुखी, ऐसी बेदना मुज्झ।।
सुखिया सब संसार है, खाये अरु सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै।।
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि मैं ईश्वर की खोज में पहाड़ों और जंगलों में भटकता फिरा और रो-रोकर मैंने अपनी आँखें तक गँवा दीं, लेकिन मुझे वह संजीवनी बूटी (आत्मज्ञान) नहीं मिली जिससे इस तड़पती आत्मा को नया जीवन मिल सके। हे प्रभु! आपके वियोग की आग में मेरे नेत्र जल गए हैं, वे हर पल केवल आपको ही ढूँढ़ते हैं; न आप मिलते हैं और न मैं सुखी हो पाता हूँ, मेरी हालत अत्यंत दयनीय हो गई है। यह सारा अज्ञानी संसार भौतिक सुखों को पाकर बहुत सुखी बना फिरता है, वह खाता है और निश्चिंत होकर सोता है; परंतु दास कबीर प्रभु के वियोग और संसार की नश्वरता को देखकर रात भर जागता रहता है और विरह में रोता रहता है।
पद : 201
आई न सकौ तुज्झ पै, सकूँ न तुज्झ बुलाइ।
जियरा यौही लेहुगे, विरह तपाइ तपाइ ।।
यहु तन जालौ मसि करौ, लिखौ रामका नांऊँ।
लेखणि करूँ करंककी, लिखि लिखि राम पठाऊँ ।।
इस तनका दीवा करौ, बाती मेलूँ जीव।
लोही सिचौ तेल ज्यूँ, कब मुख देखौ पीव ||
कै बिरहिन कूँ मीच दे, कै आपा दिखलाइ।
आठ पहरका दाझणा, मोपै सहा न जाइ।।
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि हे प्रभु! न तो मैं अपनी कमजोरी के कारण आपके पास आ सकती हूँ और न ही अधिकार से आपको अपने पास बुला सकती हूँ; क्या आप इस विरह की आग में तपा-तपाकर ही मेरी जान लेंगे? मैं अपने इस शरीर को जलाकर उसकी राख से स्याही बनाऊँगी, अपनी हड्डियों की कलम बनाऊँगी और उससे निरंतर राम का नाम लिख-लिखकर अपने प्रियतम को प्रेम-पत्र भेजूँगी। मैं अपने शरीर का दीपक बनाऊँगी, उसमें अपने प्राणों की बत्ती डालूँगी और तेल की जगह अपना खून सींचूँगी, ताकि देखूँ कि कब मुझे उस प्रियतम का मुखड़ा देखने को मिलता है। हे परमात्मा! या तो इस विरहिणी को मृत्यु दे दो या फिर अपना साक्षात दर्शन करा दो; क्योंकि अब आठों पहर (दिन-रात) की यह वियोग की जलन मुझसे बिल्कुल सही नहीं जाती।
पद : 202
कबीरा प्याला प्रेमका, अंतर दिया लगाय।
रोम रोम में रमि रह्या, और अमल क्या खाए।।
कबीरा हम गुरु-रस पिया, बाकी रही न छाक।
पाका कलस कुम्हार का, बहुरि न चढ़सी चाक । |
राता-माता नाम का, पीया प्रेम अघाय।
मतवाला दीदार का, माँगें मुक्ति बलाय।।
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि मैंने ईश्वर के प्रेम का प्याला अपने हृदय से लगा लिया है और वह रस मेरे रोम-रोम में समा गया है; अब मुझे संसार के किसी अन्य नशे या भोग की क्या ज़रूरत है? हमने सद्गुरु द्वारा दिया गया ज्ञान और भक्ति का रस ऐसा पी लिया है कि अब कोई दूसरी इच्छा या प्यास बची ही नहीं। जैसे कुम्हार का पकाया हुआ घड़ा दोबारा चाक पर नहीं चढ़ाया जाता, वैसे ही यह आत्मा ज्ञान से पककर फिर से संसार-चक्र में नहीं फँसती। जो साधक प्रभु के नाम-रंग में पूरी तरह रंग गया है और जिसने तृप्त होकर प्रेम का अमृत पी लिया है, जो केवल अपने प्रियतम के दर्शन का दीवाना है, वह मोक्ष जैसी स्थिति की भी परवाह नहीं करता; उसके लिए तो प्रभु का साक्षात प्रेम ही सब कुछ है।
पद : 203
ऐ कबीर, तै उतरि रहु, संबल परो न साथ।
संबल घटे न पगु थके, जीव बिराने हाथ ।।
कबीरा का घर सिखर पर, जहाँ सिलहली गैल।
पाँव न टिकै पिपीलिका, खलकन लादे बैल।।
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि हे मन! अहंकार के ऊँचे घमंड से नीचे उतर आओ और परलोक की यात्रा के लिए सांसारिक वासनाओं का बोझ अपने साथ मत बाँधो। जब तक यह जीवात्मा परमात्मा को नहीं सौंप दी जाती, तब तक यात्रा का सहारा घटता रहेगा और पैर थकते रहेंगे। कबीर समझाते हैं कि सत्य का घर (प्रभु का धाम) साधना के सर्वोच्च शिखर पर है, जहाँ का रास्ता अत्यंत फिसलन भरा है। उस सूक्ष्म मार्ग पर तो चींटी के पैर भी फिसल जाते हैं, लेकिन अज्ञानी संसारी लोग उस पर सांसारिक इच्छाओं और कर्मकांडों से लदे हुए बैल हाँकने का व्यर्थ प्रयास कर रहे हैं।
पद : 204
काल खड़ा सिर उपरे, जागु बिराने मीत |
जाका घर है गैल मे, सो कस सोय निचीत ।। 1 ।।
व्याख्या : कबीरदास जी संसार के मनुष्यों को सचेत करते हुए कहते हैं कि हे भूले-भटके मित्र! अब तो मोह-माया की गहरी नींद से जाग जाओ, तुम्हारे सिर पर हर समय मृत्यु (काल) खड़ी है। जिस व्यक्ति का घर बीच रास्ते या चौराहे पर बना हो, वह निश्चिंत होकर बेखबर कैसे सो सकता है? भाव यह है कि यह मानव-जीवन केवल कुछ दिनों का अस्थाई पड़ाव है, जहाँ मौत कभी भी आ सकती है; इसलिए बेपरवाह होकर सोने के बजाय ईश्वर के स्मरण में लग जाना चाहिए।
पद : 205
छाकी परयों आतम मतवारा। पीवत रामरस करत बिचारा ।।
बहुत मोलि मंहगै गुड़ पावा लै कसाब, रस राम चुवावा ।।
तन पाटन मै कीन्ह पसारा, माँगि-माँगि रस पीवै बिचारा।।
कहै कबीर फानी मतवारी, पीवत राम रस लगी खुमारी।।
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि मेरी आत्मा राम-नाम के रस को पी-पीकर और आत्म-चिंतन में लीन होकर दिव्य आनंद में मतवाली हो गई है। यह ज्ञान रूपी गुड़ बहुत भारी कीमत (अहंकार का त्याग) चुकाने पर मिला है, जिसे विवेक रूपी कलाल ने भट्टी में चुआकर शुद्ध राम-रस तैयार किया है। शरीर रूपी नगर के भीतर इस प्रेम-रस की दुकान खुली है, जहाँ यह दीन साधक बार-बार माँगकर उस अमृत को पी रहा है। कबीर कहते हैं कि यह आध्यात्मिक मस्ती मुझ पर बहुत सुंदर लग रही है; राम-रस पीते ही मुझ पर एक दिव्य और कभी न उतरने वाली खुमारी छा गई है।
पद : 206
सब दुनी सयानी मैं बौरा, हम बिगरे बिगरौ जनि औरा।
मैं नहिं बौरा, राम कियो बौरा, सतगुरु जार गयौ भ्रम मोरा।
बिद्या न पढूँ, वाद नहिं जॉनूं, हरि गुण कथत-सुनत बौराँनुं ।।
काम-क्रोध दोऊ भये बिकारा, आपहि आप जरै संसारा ।।
मिठो कहा, जाहि जो भावे, दास कबीर रांम गुण गावै।।
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि यह सारा संसार दुनियादारी में बहुत चतुर और समझदार बना फिरता है और केवल मुझे ही पागल समझता है। यदि मैं ईश्वर के प्रेम में बिगड़ (दीवाना हो) गया हूँ, तो कोई दूसरा मेरी तरह न बिगड़े! मैं अपनी मर्जी से पागल नहीं हुआ हूँ, बल्कि परमात्मा के अगाध प्रेम ने मुझे मतवाला बना दिया है और सच्चे गुरु ने आकर मेरे सारे सांसारिक भ्रम जला दिए हैं। मैं न तो कोई पोथी-पंडिताई पढ़ता हूँ और न ही किसी वाद-विवाद में उलझता हूँ; मैं तो बस प्रभु के गुणों को कहते और सुनते हुए उनके प्रेम में मगन रहता हूँ। यह संसार काम और क्रोध के विकारों में पड़कर ईर्ष्या की आग में खुद ही जल रहा है। जिसे जो अच्छा लगे वह उसे ही मीठा कहे, दास कबीर तो बस अपने राम के पावन गुणों का गान करता रहता है।
पद : 207
नैहर में दाग लगाय आई चुनरी।
ऊ रँगरेजवा कै मरम न जानै |
नहिं मिलै धोबिया कौन करै उजरी।
तनकै कुंडी ज्ञान के सौंटन,
साबुन महँगा बिचाय या नगरी।
पहिरि-ओढ़ीके चली ससुरारिया,
गौवाँ के लोग कहै बड़ी फुहरी।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, बिन सतगुरु कबहूँ नहिं सुधरी ।।
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि जीवात्मा पश्चाताप कर रही है कि मैंने इस सांसारिक जीवन (मायके) में रहकर वासनाओं के कारण अपनी आत्मा रूपी निर्मल चुनरी पर पापों के दाग लगा लिए हैं। मैं उस परम रंगरेज (ईश्वर) के रहस्य को नहीं समझ पाई और न ही मुझे यहाँ कोई ऐसा साधु रूपी धोबी मिला जो इस चुनरी को धोकर फिर से उजली कर देता। शरीर रूपी नाद में ज्ञान रूपी जल और विवेक रूपी साबुन की ज़रूरत थी, लेकिन इस संसार में गुरु-कृपा रूपी साबुन बहुत दुर्लभ और महँगा है। उसी मैली चादर को ओढ़कर जब जीवात्मा परलोक (ससुराल) पहुँची, तो वहाँ के लोगों ने उसे बहुत फूहड़ और अयोग्य कहा। कबीरदास जी कहते हैं कि हे संतों सुनो, बिना सच्चे गुरु की शरण लिए और उनकी बताई साधना के यह जीवात्मा कभी सुधर नहीं सकती।
पद : 208
सील-संतोख ते सब्द जा मुख बसै, संतजन जौहरी साँच मानी।
बदन बिकसित रहै ख्याल आनंद मे, अधर में मधुर मुस्कात बानी।
साँच गेलै नहीं, झूठ बोलै नहीं , सूरतमें सुमति सोई श्रेष्ठ ज्ञानी।
कहत हैं ज्ञान पुक्कारि कै सबन सो, देत उपदेस दिल दर्द जानी ।
ज्ञान को पूर है रहनि को सूर है, दया की भक्ति दिल माही ठानी।
और तो छोर लौ एकरस रहत है, ऐस जन जगत में बिरले प्रानी।
ठग्ग बटपार संसार में भरि रहे, हंस की चाल कहाँ काग जानि।
चपल और चतुर है, बने चीकने, बात में ठीक, पै कपट ठानी।
कहा तिनसो कहो दया जिनके नहीं, घाट बहुतै करै बकुल ध्यानी।
दुर्मती जीवकी दुबिध छूटै नहीं, जन्म जन्मान्त पड़ नर्क खानी ।
काग कुबुद्धि सुबुद्धि पावै कहाँ, कठिन कट्ठोर बिकराल बानी।
अगिन के पुंज है सितलता तन नाही, अमृत औ विष दोऊ एक सानी।
कहा साखी कहें सुमति जागी नहीं, साँचीकी चाल बिन धूर घानी।
सुकृति औ सत्त की चाल साँची सही, काग बक अधम की कौन खानी।
कहै कबीर कोऊ सुघर जन जौहरी, सदा सावधान पिये नीर छानी ।।
व्याख्या : कबीरदास जी सच्चे ज्ञानी और पाखंडी के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि जिसके मुख में शील (सदाचार) और संतोष से भरे सत्य वचन बसते हैं, संत रूपी पारखी जौहरी उसी को सच्चा साधक मानते हैं। जिसका चेहरा आत्म-आनंद में हमेशा खिला रहता है, होंठों पर मधुर मुस्कान और वाणी में मिठास होती है, जो कभी सत्य का मार्ग नहीं छोड़ता, जिसकी आँखों में कपट नहीं होता और जिसकी बुद्धि में सद्ज्ञान होता है, वही सच्चा ज्ञानी है। ऐसा ज्ञानी सबके सामने पुकार कर सत्य कहता है और उसके दिल में दूसरों के दुखों के प्रति सच्ची दया व दर्द होता है। वह ज्ञान से परिपूर्ण और आचरण में शूरवीर होता है तथा जीवन भर हर परिस्थिति में एक समान (समभाव) रहता है; संसार में ऐसे संत बहुत दुर्लभ होते हैं। दूसरी ओर, संसार में ठग और लुटेरे भरे पड़े हैं; कौआ कभी हंस की पवित्र चाल को नहीं समझ सकता। पाखंडी लोग बाहर से बहुत चतुर, चिकने और मीठी बातें करने वाले होते हैं, लेकिन मन में भारी कपट छिपाए रहते हैं। ऐसे निर्दयी और बगुले जैसा झूठा ध्यान लगाने वालों को उपदेश देने का कोई लाभ नहीं है, वे अपनी दुर्बुद्धि के कारण जन्म-जन्मांतरों तक नरक के दुखों में गिरते रहते हैं। कौवे जैसी दुर्बुद्धि वाले लोग सद्बुद्धि कहाँ से पा सकते हैं, जिनकी वाणी कठोर व भयानक होती है; वे भीतर से क्रोधी होते हैं और अमृत व विष को एक जैसा मिला देते हैं। उन्हें कितनी भी साखियाँ या सीख दी जाएँ, उनकी बुद्धि नहीं सुधरती और बिना सच्चे आचरण के उनका जीवन नष्ट हो जाता है। केवल सत्य और अच्छे कर्मों का मार्ग ही सच्चा है, कौवे और बगुले जैसे पाखंडियों का कोई मान नहीं है। कबीर कहते हैं कि कोई विवेकशील संत रूपी जौहरी ही हंस की तरह सावधान रहकर सत्य रूपी जल को छानकर पीता है।
पद : 209
अपनपौ आप ही बिसरो।
जैसे सोनहा काँच मंदिर में भरमत भूकि मरो।
जो केहरि वपु निरखि कूप-जल प्रतिमा देखी परो।
ऐसे हि मदगज फाटिक शिला पर दसननि आनि अरो।
मरकर मुठी स्वाद ना बिसरै, घर-घर नटत फिरो।
कह कबीर नलनी कै सुवना तोहि काने पकरो ।।
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि यह मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप (आत्म-तत्व) को स्वयं ही भूल गया है और अपने ही बनाए भ्रमों में फँसकर दुखी हो रहा है। जैसे कोई कुत्ता शीशमहल में जाकर अपनी ही सैकड़ों परछाइयों को दूसरा कुत्ता समझ लेता है और उन पर भौंक-भौंक कर अपनी जान गँवा देता है; अथवा जैसे कोई शेर कुएँ के शांत पानी में अपनी ही परछाईं देखकर उसे दूसरा शेर मान लेता है और गुस्से में कुएँ में कूदकर मर जाता है; या जैसे मतवाला हाथी स्फटिक पत्थर में अपना ही अक्स देखकर उसे प्रतिद्वंद्वी समझकर उस पर अपने दाँत दे मारता है जिससे उसके दाँत टूट जाते हैं; और जैसे बंदर चने के स्वाद के लालच में तंग मुँह वाले बर्तन में हाथ डालकर मुट्ठी बाँध लेता है और मुट्ठी न खोलने के कारण पकड़ा जाता है तथा घर-घर नाचता फिरता है; वैसे ही कबीर कहते हैं कि जैसे नलिनी (घूमने वाली नली) पर बैठा हुआ तोता नली के पलट जाने पर यह समझकर डर जाता है कि वह पकड़ा गया है, जबकि उसे किसी ने पकड़ा नहीं होता (वह केवल अपनी पकड़ छोड़ दे तो तुरंत उड़ सकता है)। हे मनुष्य! तुम्हें भी संसार ने नहीं बाँधा है, तुमने स्वयं अपने अज्ञान और मोह से खुद को बाँध रखा है; जैसे ही तुम अपने आत्म-स्वरूप को पहचान लोगे, तुम पूरी तरह मुक्त हो जाओगे।