कबीर ( संपादक : हजारी प्रसाद द्विवेदी ) भाग 1 ( पद संख्या 160 से 184 )

पद : 160

​लोका मति के भोरा रे।

जो काशी तन तजै कबीरा, तौ रामहिं कहा निहोरा रे।।

तब हम वैसे अब हम ऐसे, इहै जनमका लाहा रे।।

राम-भगति-परि जाकौ हित चित, ताकौ अचिरज काहा रे।।

गुर-प्रसाद साधकी संगति, जग जीते जाइ जुलाहा रे।।

कहै कबीर सुनहु रे सन्तो, भ्रमि परै जिनि कोई रे।।

जस काशी तस मगहर ऊसर, हिरदै राम सति होई रे।।

व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि संसार के लोग बुद्धि के बहुत सीधे और भोले हैं, जो इस अंधविश्वास में पड़े हैं कि केवल काशी में प्राण त्यागने से ही मुक्ति मिलती है। कबीर कहते हैं कि यदि मुझे मुक्ति काशी में शरीर छोड़ने के नियम से ही मिली, तो उसमें भगवान राम की कृपा का क्या उपकार रहा? पहले हम अज्ञान में भटके हुए थे, लेकिन अब हमें आत्मज्ञान हो गया है और यही इस मनुष्य जन्म की सबसे बड़ी कमाई है। जिसका चित्त और प्रेम सच्चे मन से राम की भक्ति में लगा है, उसके लिए मुक्ति पाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। गुरु की कृपा और साधुओं की संगति के बल पर यह साधारण जुलाहा पूरे संसार के बंधनों को जीत रहा है। कबीर कहते हैं कि हे संतों सुनो, किसी को भी इस भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए। यदि हृदय में सच्चे राम का वास है, तो पवित्र काशी और बंजर मगहर में कोई अंतर नहीं है, दोनों एक समान हैं।

पद : 161

​पूजा-सेवा-नेम-व्रत, गुड़ियनका-सा खेल

जव लग पिउ परसै नहीं, तब लग संसय

व्याख्या : कबीरदास जी बाहरी कर्मकांडों की सच्चाई बताते हुए कहते हैं कि पूजा-पाठ, बाहरी सेवा, नियम और व्रत रखना तब तक बच्चों के गुड़िया-गुड्डे के खेल जैसा ही है, जब तक कि मनुष्य को अपने प्रियतम परमात्मा का साक्षात अनुभव नहीं हो जाता। जब तक आत्मा का परमात्मा से सच्चा मिलन या स्पर्श नहीं होता, तब तक मन का संशय, भ्रम और विकारों का मैल कभी दूर नहीं हो सकता।

पद : 162

​जाती न पूछो साधकी, पूछि लीजिये ज्ञान।

मोल करो तलवारका, पड़ा रहन दो म्यान।।

हस्ती चढ़िए ज्ञानकौ, सहज दुलीचा डारि।

स्वान-रूप संसार है, भँकन दे झक मार।।

व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि किसी सज्जन या साधु की जाति कभी नहीं पूछनी चाहिए, बल्कि उसके ज्ञान को समझना और अपनाना चाहिए; जैसे मूल्य हमेशा तलवार की धार का आंका जाता है, उसकी म्यान (खोल) चाहे जैसी भी हो, उसे पड़ा रहने दिया जाता है। साधक को चाहिए कि वह ज्ञान रूपी हाथी पर सहज साधना और विनम्रता का आसन बिछाकर निश्चिंत होकर सवार हो। यह संसार तो कुत्ते के स्वभाव जैसा है जो दूसरों को देखकर व्यर्थ ही भौंकता रहता है; इसलिए दुनिया की व्यर्थ बातों पर ध्यान दिए बिना अपनी साधना में लगे रहो और संसार को जो कहना है कहने दो।

पद : 163

​मेरा-तेरा मनुआँ कैसे इक होई रे।

मैं कहता हौ ऑखिन देखि, तू कहता कागद्‌की लेखी।

मैं कहता सुरझावन हारी, तू राख्यौ उरझाई रे।

मैं कहता तू जागत रहीयो, तू रहता है सोई रे।

मैं कहता निर्मोही रहियो, तू जाता है मोहि रे।

जुगन जुगन समुझावत हारा, कही न मानत कोई रे।

तू तो रंडी फिरै बिहंडी, सब धन डारे खोई रे।

सतगुरु धरा निर्मल बाहै, वामै काय धोई रे।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, तब ही वैसा होई रे।।

व्याख्या : कबीरदास जी सांसारिक लोगों से कहते हैं कि मेरा और तुम्हारा विचार एक जैसा कैसे हो सकता है? मैं तो वह सत्य कहता हूँ जो मैंने अपनी आँखों से देखा और अनुभव किया है, जबकि तुम केवल कागजों और किताबों में लिखी बातों को दोहराते हो। मैं जीवन के बंधनों को सुलझाने की बात करता हूँ, लेकिन तुम उन्हें और अधिक उलझाकर रख देते हो। मैं कहता हूँ कि अज्ञान की नींद से जागते रहो, पर तुम मोह में सोए रहते हो। मैं मोह-माया से दूर रहने की सीख देता हूँ, लेकिन तुम उसी में लिपटते जाते हो। मैं युगों-युगों से समझाते-समझाते थक गया, पर कोई मेरी बात नहीं मानता। तुम सांसारिक वासनाओं में भटककर जीवन की अनमोल सांसों की पूँजी गँवा रहे हो। सद्गुरु के वचनों की जो पवित्र नदी बह रही है, उसमें अपनी काया और मन को धो लो। कबीर कहते हैं कि हे संतों सुनो, जब मनुष्य गुरु की सीख मानकर अपने दोषों को धो लेगा, तभी उसका सच्चा कल्याण संभव होगा।

पद : 164

​दुलहिन अँगिया काहे न धोवाई।

बालपने की मैली अँगिया बिषय-दाग परि जाई।

बिन धोये पिय रीझत नाहीं, सेजसे देत गिराई।

सुमिरन ध्यानकै साबुन करि ले सत्तनाम दरियाई।

दुबिधाके भेद खोल बहुरिया मनकै मैल धोवाई।

चेत करो तीनों पन बीते, अब तो गवन नागिचाई।

पालनहार द्वार हैं ठाढ़े अब काहे पछिताई।

कहत कबीर सुनो री बहुरिया चित अंजन दे आई ।।

व्याख्या : कबीरदास जी जीवात्मा रूपी दुल्हन को समझाते हुए कहते हैं कि हे दुल्हन! तुमने अपनी अंगिया (मन और शरीर) को क्यों नहीं धोया? बचपन से ही यह अज्ञान और विषय-वासनाओं के दागों से मैली हो चुकी है। जब तक इसे धोकर साफ नहीं करोगी, तब तक प्रियतम परमात्मा तुम पर प्रसन्न नहीं होंगे और तुम्हें अपनी सेज से नीचे गिरा देंगे। ईश्वर के स्मरण और ध्यान का साबुन बना लो और सत्य-नाम रूपी नदी के जल से इसे धो लो। हे बहू! अपने मन की दुविधा और संशय की गाँठें खोल दो और मन के सारे मैल को धो डालो। अब तो सावधान हो जाओ, जीवन की तीनों अवस्थाएँ (बचपन, जवानी और बुढ़ापा) बीत चुकी हैं और अब परलोक जाने (गौना होने) का समय बहुत निकट आ गया है। परमात्मा और काल तुम्हारे द्वार पर खड़े हैं, अब पछताने से क्या लाभ होगा? कबीर कहते हैं कि हे जीवात्मा! सद्गुरु के ज्ञान का अंजन अपनी आँखों में लगाकर अपने प्रियतम के सामने जाओ, तभी तुम्हारा उद्धार होगा।

पद : 165

​मोरि चुनरी में परि गयो दाग पिया।

पाँच तत्व की बनी चुनरिया, सारेहसै बंद लागे जिया।

यह चुनारी मोरे मैके ते आई ससुरेमे मनुवाँ खोय दिया।

मलि मलि धोई दाग न छूटे ज्ञानकी साबुन लाय पिया।

कहै कबीर दाग कब छुटिहै जब साहब अपनाय लिया।

व्याख्या : जीवात्मा पश्चाताप करते हुए कहती है कि हे प्रियतम! मेरी इस चुनरी (काया और अंतःकरण) में पाप और वासनाओं के दाग लग गए हैं। यह चुनरी पाँच तत्वों से बनी है और इसमें शरीर के सोलह श्रृंगार व बंधन लगे हुए हैं। यह चुनरी मुझे मायके (ईश्वर के धाम) से बिल्कुल निर्मल मिली थी, लेकिन इस ससुराल (संसार) में आकर मैंने अपना मन विषय-विकारों में गँवा दिया और इसे मैला कर लिया। मैंने इसे खूब मल-मलकर धोया, पर कर्मों के ये दाग नहीं छूटे; हे प्रियतम! अब तो ज्ञान रूपी साबुन लगाकर ही इसे साफ किया जा सकता है। कबीरदास जी कहते हैं कि यह दाग केवल तभी छूट सकते हैं जब स्वयं परमात्मा कृपा करके इस जीवात्मा को अपने प्रेम में अपना लें।

पद : 166

​तेरा जन एक आध है कोई।

काम-क्रोध अरु लोभ बिवर्जित, हरिपद चीन्हें सोई ॥

राजस-तामस-सातिग तीन्यु, ये सब तेरी माया।

चौथै पद कौ जे जन चिन्हें, तिनहि परम पद पाया ॥

असतुति-निंदा-आसा छांडै, तजै मांन-अभिमानां ।

लोहा-कचन समि करि देखै, ते मूरति भगवाना ॥

च्यंतै तो माधो च्यंतामणि, हरिपद रमै उदासा।

त्रिस्ना अरु अभिमांन रहित है कहै कबीर सो दासा।

व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि हे प्रभु! आपका सच्चा भक्त संसार में कोई एक-आध ही विरला होता है। वही आपके सच्चे स्वरूप को पहचान पाता है जो काम, क्रोध और लोभ जैसे विकारों से पूरी तरह दूर हो चुका हो। सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण—ये तीनों गुण आपकी ही माया के रूप हैं; जो इन तीनों से परे जाकर चौथे पद (तुरीयावस्था या परब्रह्म) को पहचान लेता है, वही परम पद को प्राप्त करता है। जो स्तुति और निंदा की चिंता छोड़ देता है, झूठी आशाएँ त्याग देता है और मान-अपमान से ऊपर उठ जाता है, जो लोहे और सोने को एक समान दृष्टि से देखता है, वह भक्त स्वयं भगवान का रूप बन जाता है। वह केवल चिंतामणि स्वरूप ईश्वर का ही चिंतन करता है और संसार से विरक्त होकर प्रभु के चरणों में लीन रहता है। कबीर कहते हैं कि जो सब प्रकार की तृष्णा और अहंकार से रहित हो चुका है, वास्तव में वही प्रभु का सच्चा दास है।

पद : 167

​अबूझा लोग कहाँलौ बूझे बुझनहार बिचारो ।।

केते रामचंद्र तपसी से जिन जग यह भरमाया।

केते कान्ह भये मुरलीधर तिन भी अन्त न पाया।।

मच्छ-कच्छ बाराह स्वरूपी वामन नाम धराया।

केते बौध भये निकलंकी तिन भी अन्त न पाया।।

केतिक सिध-साधक सन्यासी जिन बन बास बसाया।

केते मुनिजन गोरख कहिये तिन भी अन्त न पाया।।

जाकी गति ब्रह्म नहिं पाये सिव-सनकादिक हारे।

तोके गुण नर कैसे पैहो कहै कबीर पुकारे।।

व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि जो लोग नासमझ और अज्ञानी हैं, वे उस असीम सत्य को कहाँ तक समझ पाएँगे; समझदार व्यक्ति को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। संसार में कितने ही तपस्वी राजा रामचंद्र हुए जिन्होंने सांसारिक लीलाओं में लोगों को उलझाए रखा, और कितने ही मुरलीधर कृष्ण हुए, पर वे भी उस परम ब्रह्म के पूर्ण रहस्य का अंत नहीं पा सके। मत्स्य, कच्छप, वराह और वामन जैसे अनेक अवतार हुए तथा कितने ही बुद्ध और निष्कलंक अवतार आए, लेकिन वे भी उस परमात्मा की थाह नहीं ले पाए। न जाने कितने सिद्ध, साधक और संन्यासी जंगलों में जाकर बस गए और गोरखनाथ जैसे कितने ही बड़े-बड़े मुनि हुए, पर वे भी उसका पार नहीं पा सके। जिस परम तत्व की गति को स्वयं ब्रह्मा भी नहीं जान सके और शिव तथा सनकादिक मुनि भी हार गए, कबीर पुकार कर कहते हैं कि हे साधारण मनुष्य! तू अपने सीमित बुद्धि-बल से उस असीम परमात्मा के संपूर्ण गुणों को कैसे पा सकेगा?

पद : 168

​साधो, देखो जग बौराना ।

साँची कहौ तौ मारन धावै, झूठे जग पतियाना ।

हिन्दू कहत, राम हमारा, मुसलमान रहमाना ।

आपस में दौऊ लड़ै मरत हैं, मरम कोई नहिं जाना ।

बहुत मिले मोहि नेमी-धर्मी, प्रात करे असनाना ।

आतम-छाँड़ि पषानै पूजै, तिनका थोथा ज्ञाना ।

आसन मारि डिंभ धरि बैठे, मन में बहुत गुमाना ।

पीपर-पाथर पूजन लागे, तीरथ-बरत भुलाना ।

माला पहिरे, टोपी पहिरे छाप-तिलक अनुमाना ।

साखी सब्दै गावत भूले, आतम खबर न जाना ।

घर-घर मंत्र जो देन फिरत हैं, माया के अभिमाना ।

गुरुवा सहित सिष्य सब बूढ़े, अन्तकाल पछिताना ।

बहुतक देखे पीर-औलिया, पढ़े किताब-कुराना ।

करै मुरीद, कबर बतलावैं, उनहूँ खुदा न जाना ।

हिन्दू की दया, मेहर तुरकन की, दोनों घरसे भागी ।

वह करै जिबह, वाँ झटका मारे, आग दोऊ घर लागी ।

या विधि हँसत चलत है, हमको आप कहावै स्याना ।

कहै कबीर सुनो भाई साधो, इनमें कौन दिवाना ।

व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि हे संतों देखो, यह सारा संसार पागल हो गया है। यदि इनसे सच्ची बात कहो तो ये मारने दौड़ते हैं, और यदि झूठी बातें कहो तो उन पर तुरंत विश्वास कर लेते हैं। हिंदू कहते हैं कि राम हमारे हैं और मुसलमान कहते हैं कि रहमान हमारे हैं; दोनों आपस में लड़-लड़कर मर रहे हैं, लेकिन ईश्वर के असली मर्म को किसी ने नहीं जाना। मुझे नियम और धर्म का पालन करने वाले बहुत से लोग मिले जो सुबह-सुबह स्नान करते हैं, पर वे अपने भीतर की आत्मा को छोड़कर पत्थरों की पूजा करते हैं, उनका सारा ज्ञान बिल्कुल खोखला है। कई लोग समाधि का आसन लगाकर पाखंड करते हैं और मन में बहुत घमंड रखते हैं। वे पीपल के पेड़ों और पत्थरों को पूजने में तथा तीर्थ-व्रत के दिखावे में असली सत्य को भूल गए हैं। लोग गले में माला, सिर पर टोपी और माथे पर तिलक-छापे लगाकर घूमते हैं, साखियाँ और शब्द गाते-गाते असली आत्म-ज्ञान को भूल चुके हैं। जो गुरु माया के घमंड में घर-घर जाकर गुरु-मंत्र बाँटते फिरते हैं, ऐसे पाखंडी गुरु अपने शिष्यों सहित भवसागर में डूब जाते हैं और अंत समय में पछताते हैं। मैंने बहुत से पीर-फकीर भी देखे जो कुरान और धार्मिक किताबें पढ़ते हैं, चेले बनाते हैं और कब्रों की पूजा सिखाते हैं, पर उन्होंने भी खुदा को नहीं पहचाना। हिंदुओं के घर से दया और मुसलमानों के दिल से करुणा दोनों गायब हो चुकी है; कोई झटका करता है तो कोई हलाल करता है, दोनों ही हिंसा की आग में जल रहे हैं। संसार के लोग कबीर की खरी बातों पर हँसते हैं और खुद को बहुत सयाना समझते हैं। कबीर कहते हैं कि हे संतों सुनो, अब तुम ही बताओ कि वास्तव में इनमें से दीवाना कौन है?

पद : 169

​मीयाँ तुम्हसौ बोल्याँ बणि नहीं आवै।

हम मसकीन खुदाई बन्दे तुम्हरा जस मनि भावै।।

अलह अवलि दीनका साहिब, जोर नहीं फुरमाया।

मुरिसद-पीर तुम्हारै है को, कहौ कहाँथै आया।।

रोजा करै निवाज गुजारै कलमै भिसत न होई।

सतरि काबे इक दिल भीतरि जे करि जानै कोई।।

खसम पिछांनि तरस करि जियमै, माल मनीं करि फीकी।

आया जाँनि साँईकूं जाँनै, तब है भिस्त सरीकी ।।

माटी एक भेप धरि नाँनाँ, सबमे ब्रह्म समानौँ।

कहै कबीर भिस्त छिटकाई दिजग ही मनमानाँ।।

व्याख्या : कबीरदास जी धर्म के संकीर्ण ठेकेदारों से कहते हैं कि हे मियाँ! तुमसे बात करते नहीं बनती क्योंकि तुम्हारा नजरिया बहुत तंग है। हम तो ईश्वर के सीधे-सादे दीन बंदे हैं और हमें केवल उस खुदा की महिमा ही अच्छी लगती है। अल्लाह तो सृष्टि का स्वामी और दीन-दुखियों का रक्षक है, उसने किसी पर जबरदस्ती या जुल्म करने का आदेश नहीं दिया। तुम्हारे जो पीर-मुर्शिद हैं, वे खुद कहाँ से आए हैं और उनका क्या आधार है? केवल रोजा रखने, नमाज पढ़ने और कलमा पढ़ने भर से स्वर्ग (बहिश्त) नहीं मिलता। यदि कोई अपने हृदय को पहचानना जाने, तो सत्तर काबों की पवित्रता इसी एक दिल के भीतर मौजूद है। अपने मालिक (खुदा) को पहचानो, अपने दिल में सब जीवों के प्रति दया रखो और धन-दौलत के घमंड को छोड़ दो। जब मनुष्य अपनी उत्पत्ति के सत्य को और उस परमात्मा को पहचान लेता है, तभी वह सच्चे स्वर्ग का अधिकारी होता है। मिट्टी एक ही है जिससे संसार के अनेक वेश और रूप बने हैं, और उन सब में एक ही ईश्वर समाया हुआ है। कबीर कहते हैं कि जो लोग केवल बाहरी दिखावे में पड़े हैं, उन्होंने सच्चे स्वर्ग को त्याग कर अपने मन से ही नरक चुन लिया है।

पद : 170

​वै क्यू कासी तजै मुरारी। तेरी सेवा-चोर भये बनवारी।।

जोगी-जती-तपी संन्यासी। मठ-देवल बसि परसै कासी ।।

तीन बार जे नित् प्रति न्हावे। काया भीतरि खबरि न पावे।।

देवल-देवल फेरी देही। नांव निरंजन कबहुँ न लेही ।।

चरन-विरद-कासी को न दैहूं। कहै कबीर भल नरकहि जैहूं।।

व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि हे प्रभु! काशी के ये पाखंडी लोग भला काशी को क्यों छोड़ेंगे, क्योंकि ये आपकी सच्ची भक्ति से जी चुराने वाले सेवक बन गए हैं। जोगी, यति, तपस्वी और संन्यासी केवल मठों और मंदिरों में रहकर काशी की महिमा का लाभ उठाना चाहते हैं। वे दिन में तीन-तीन बार गंगा में स्नान तो करते हैं, लेकिन अपने शरीर और मन के भीतर बैठे परमात्मा की उन्हें कोई खबर नहीं है। वे मंदिर-मंदिर भटकते हैं और परिक्रमा करते हैं, लेकिन उस पवित्र निराकार परमात्मा का सच्चा नाम कभी हृदय से नहीं लेते। कबीर कहते हैं कि मैं अपने प्रभु के चरणों की महिमा को छोड़कर केवल काशी को मुक्ति का श्रेय कभी नहीं दूँगा; यदि राम की भक्ति के बिना काशी में रहने से मुक्ति मिलती हो, तो मैं काशी छोड़कर नरक में जाना अधिक पसंद करूँगा जहाँ मेरे राम का नाम मेरे साथ हो।

पद : 171

​बहुविध चित्र बनाय कै, हरि रच्यौ क्रीडा-रास।

जेहि न इच्छा झुलिवे की, ऐसी बुधि केहि पास।।

झुलत-झुलत बहु कलप बीते, मन न छोड़े आस।

रचि हिंडोला अहो-निसि हो चारि जुग चौमास ।।

कबहुँ ऊँचसे नीच कबहूँ, सरग-भूमि ले जाय।

अति भ्रमत भरम हिंड़ोलवा हो, नेकु नहिं ठहराया।।

डरत हौं यह झूलबे को, राखु जादवराय।

कहै कबीर गोपाल बिनती, सरन हरि तुअ पास ।।

व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि परमात्मा ने अनेक प्रकार के रंग-रूप रचकर इस संसार रूपी खेल और लीला की रचना की है। इस संसार में ऐसी बुद्धि किसके पास है जिसके मन में इस मायावी झूले पर झूलने की इच्छा न जागती हो? इस संसार रूपी झूले पर झूलते-झूलते युगों-युगों का समय बीत गया, फिर भी मनुष्य का मन आशा और तृष्णा को नहीं छोड़ता। ईश्वर ने दिन-रात और चारों युगों का यह निरंतर चलने वाला झूला बना दिया है, जो कभी जीव को ऊँचाइयों पर ले जाता है तो कभी नीच दशा में गिरा देता है, कभी स्वर्ग के सुख दिखाता है तो कभी धरती के दुखों में पटक देता है। यह भ्रम का झूला इतना तेज घूमता है कि एक पल के लिए भी नहीं ठहरता। कबीर कहते हैं कि हे प्रभु! जन्म-मरण के इस निरंतर झूलने से मुझे बहुत डर लगता है, हे यादवराय! अब मेरी रक्षा कीजिए। कबीरदास जी प्रार्थना करते हैं कि हे गोपाल! मैं आपकी शरण में आ गया हूँ, मुझे इस आवागमन के झूले से मुक्त कीजिए।

पद : 172

​चली मैं खोजमे पियकी। मिटी नहीं सोच यह जियकी ।।

रहे नित पास ही मेरे। न पाऊँ यार को हेरे।।

बिकल चहुँ ओरको धाऊँ। तबहुँ नहिं कंतको पाऊँ ।।

धरो केहि भाँतिसो धीरा। गयौ गिर हाथ से हीरा ।।

कटी जब नैन की झांई। लख्यौ तब गगनमें साईं।।

कबीरा शब्द कहि त्रासा। नयन में यारको बासा ।।

व्याख्या : जीवात्मा कहती है कि मैं अपने प्रियतम परमात्मा को खोजने के लिए बाहर निकल पड़ी, लेकिन मेरे मन की चिंता और बेचैनी दूर नहीं हुई। वह परमात्मा तो सदा मेरे पास ही रहता है, फिर भी बाहर ढूँढ़ने पर मुझे वह सच्चा मित्र नहीं मिलता। मैं व्याकुल होकर चारों दिशाओं में दौड़ती फिरी, फिर भी मुझे अपने स्वामी के दर्शन नहीं हुए; मैं किस प्रकार अपने मन को धीरज बंधाऊँ, ऐसा लगता है जैसे मेरे हाथ से आत्म-ज्ञान रूपी अनमोल हीरा गिरकर खो गया हो। लेकिन जब सद्गुरु की कृपा से मेरी आँखों के आगे से अज्ञान का परदा (झाँईं) हटा, तब मैंने अपने ही भीतर शून्य आकाश (सहस्रार) में उस स्वामी का साक्षात दर्शन कर लिया। कबीर कहते हैं कि गुरु के शब्द ने सारे भय मिटा दिए और यह स्पष्ट हो गया कि वह प्रियतम कहीं बाहर नहीं, बल्कि मेरी अपनी ही आँखों की पुतलियों में बसता है।

पद : 173

​तलफै बिन बालम मोर जिया।

दिन नहिं चैन रात नहिं निंदिया, तलफ तलफके भोर किया।

तन-मन मोर रहंट-अस डोलै, सून सेज पर जनम छिया।

नैन चकित भए पंथ न सूझै, साईं बेदरदी सुध न लिया।

कहत कबीर सुनो भई साधो, हरो पीर दुख जोर किया।

व्याख्या : कबीरदास जी जीवात्मा की विरह-वेदना को प्रकट करते हुए कहते हैं कि प्रियतम परमात्मा के बिना मेरा मन तड़प रहा है। न दिन में चैन मिलता है और न रात में नींद आती है, पूरी रात तड़पते-तड़पते सुबह हो जाती है। मेरा तन और मन रहट के घड़ों की तरह लगातार डोलता रहता है और इस सूनी सेज पर मेरा पूरा जीवन व्यर्थ ही बीतता जा रहा है। प्रियतम की राह देखते-देखते मेरी आँखें थक गई हैं और अब मुझे आगे का मार्ग भी नहीं सूझता, पर उस निष्ठुर स्वामी ने अभी तक मेरी कोई सुध नहीं ली। कबीरदास जी कहते हैं कि हे संतों सुनो, प्रभु से यही प्रार्थना है कि इस विरह के भारी दर्द को दूर करें क्योंकि अब यह पीड़ा असहनीय हो गई है।

पद : 174

​अबिनासी दुलहा कब मिलिहौ, भक्तन के रछपाल ॥ टेक ॥

जल उपजल जल ही से नेहा, रटत पियास पियास।

मैं बिरहिनि ठाढ़ी मग जोऊँ, प्रीतम तुम्हरी आस ॥1 ॥

छोड्यो गेह नेह लगि तुमसे, भई चरन लौलीन।

तालाबेलि होत घट भीतर, जैसे जल बिन मीन ॥2॥

दिवस न भूख रैन नहिं निद्रा, घर अँगना न सुहाय।

सेजरिया बैरिनि भइ हमको, जागत रैन बिहाय ॥3॥

हम तो तुम्हरी दासी सजना, तुम हमरे भरतार।

दीनदयाल दया करि आओ, समरथ सिरजनहार ॥4॥

कै हम प्रान तजतु हैं प्यारे, कै अपनी करि लेव।

दास कबीर बिरह अति बाढ्‌यो, अब तो दरसन देव ॥5॥

व्याख्या : कबीरदास जी पुकारते हैं कि हे भक्तों के रक्षक अविनाशी प्रियतम! आप मुझे कब मिलेंगे? जैसे जल में उत्पन्न होकर और जल से प्रेम रखकर भी पपीहा प्यास-प्यास रटता रहता है, वैसे ही मैं विरहिणी आपकी ही आस लगाए मार्ग में खड़ी आपकी राह देख रही हूँ। आपसे प्रेम होने के कारण मैंने घर-द्वार का सारा मोह छोड़ दिया है और आपके चरणों में लीन हो गई हूँ; मेरे हृदय के भीतर ऐसी छटपटाहट हो रही है जैसे पानी के बिना मछली तड़पती है। मुझे दिन में भूख नहीं लगती, रात में नींद नहीं आती और घर-आँगन कुछ भी अच्छा नहीं लगता; यह सूनी सेज मेरी बैरिन बन गई है और जागते-जागते ही सारी रात कट जाती है। हे स्वामी! हम तो आपकी दासी हैं और आप हमारे भरतार हैं, हे दीनदयालु और सर्वसमर्थ सृष्टिकर्ता! कृपा करके आ जाइए। या तो मैं आपके वियोग में अपने प्राण त्याग दूँगी या फिर आप मुझे अपना बना लीजिए; कबीर कहते हैं कि अब विरह की यह पीड़ा हद से बढ़ गई है, इसलिए हे प्रभु, अब तो मुझे दर्शन दे दीजिए।

पद : 175

​नैना अंतरि आव तू, ज्यूं हौं नैन झंपेउ।

ना हौं देखूं और कूं, नां तुझ देखन देऊँ।

कबीर रेख सिन्दूर की काजल दिया न जाई।

नैनूं रमैया रमि रहा, दूजा कहाँ समाई ।

मन परतीति न प्रेम-रस, ना इस तन में ढंग।

क्या जाणौ उस पीव सूं कैसी रहसि संग।।”

व्याख्या : कबीरदास जी परमात्मा से अनन्य प्रेम प्रकट करते हुए कहते हैं कि हे प्रियतम! तुम मेरी आँखों के भीतर आ जाओ ताकि मैं तुरंत अपने नेत्र बंद कर लूँ; जिससे न तो मैं संसार में किसी और को देखूँ और न ही तुम्हें किसी और को देखने दूँ। जहाँ सौभाग्य का सिंदूर लगाया जाता है, वहाँ कालिख (काजल) नहीं लगाई जा सकती; मेरी आँखों में तो केवल वह राम रम गया है, अब उसमें किसी दूसरे सांसारिक विषय के लिए कोई स्थान नहीं है। यदि मन में प्रभु के प्रति सच्चा विश्वास नहीं है, प्रेम का रस नहीं है और शरीर में भक्ति का कोई सलीका नहीं है, तो मनुष्य क्या जाने कि उस परम प्रियतम के साथ एकाकार होकर मिलने का सच्चा आनंद कैसा होता है।

पद : 176

​नैनो की करि कोठरी, पुतली पलंग बिछाय।

पलकों की चिक डारि कै, पिय को लिया रिझाय ।। 1 ।।

प्रियतम को पतिया लिखूं, कहीं जो होय बिदेस।

तनमें, मनमें, नैनमें, ताकौ कहा संदेस ।।

व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि मैंने अपनी आँखों को ही एक सुंदर कमरा बना लिया है, आँखों की पुतली का पलंग बिछा दिया है और उस पर अपनी पलकों का परदा (चिक) गिराकर अपने प्रियतम परमात्मा को भीतर ही प्रसन्न कर लिया है। मैं अपने प्रियतम को चिट्ठी तब लिखूँ जब वे मुझसे दूर किसी परदेस में रहते हों; जो परमात्मा मेरे तन में, मेरे मन में और मेरी आँखों में हर समय समाया हुआ है, उसे बाहर से कोई संदेश भेजने की क्या आवश्यकता है।

पद : 177

​अँखियाँ तो झांई परी, पंथ निहारि-निहारि।

जीभड़ियाँ छाला पड्या, राम पुकारि-पुकारि।

विरह कमंडल कर लिये वैरागी दो नैन ।

माँगै दरस मधूकरी छके रहें दिन रैन ॥

सब रंग तात रबाब तान, विरह बजाबै नित्त

और न कोई सुनि सकै, कै साईं कै चित्त

व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि परमात्मा की राह देखते-देखते मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया (झाँईं पड़ गई) और उनका नाम पुकारते-पुकारते मेरी जीभ पर छाले पड़ गए। मेरे दोनों नेत्र वैरागी साधु बन गए हैं जिन्होंने हाथ में विरह का कमंडल ले लिया है; वे रात-दिन भिक्षा के रूप में केवल प्रियतम के दर्शन माँगते हैं और उसी की आस में मतवाले बने रहते हैं। मेरे शरीर का अंग-प्रत्यंग वीणा के तारों की तरह बन गया है जिस पर विरह का दर्द हर समय संगीत बजाता रहता है; इस आंतरिक विरह की धुन को संसार का कोई दूसरा व्यक्ति नहीं सुन सकता, इसे या तो मेरा स्वामी सुनता है या फिर मेरा अपना तड़पता हुआ हृदय समझता है।

पद : 178

​पछा पछीके कारनै, सब जग रहा भुलान।

निरपछ हैंकै हरि भजै, सोई सन्त सुजान ।।1।।

अमृत केरी मोटरी, सिरसे धरी उतार।

जाहिं कहौ मै एक है, मोहि कहै दो-चार।।

व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि पक्ष-विपक्ष और ‘मेरा धर्म-तेरा धर्म’ के व्यर्थ वाद-विवाद में पड़कर यह सारा संसार अपने वास्तविक आत्म-कल्याण को भूल गया है। जो व्यक्ति किसी भी पक्षपात में न पड़कर निष्पक्ष भाव से ईश्वर का भजन करता है, वास्तव में वही सच्चा और समझदार संत है। संसार के लोगों ने अज्ञानवश भक्ति रूपी अमृत की गठरी को अपने सिर से उतार कर फेंक दिया है। जब मैं उनसे कहता हूँ कि ईश्वर एक ही है, तो वे अज्ञानी मुझसे उलझ पड़ते हैं और मुझे ही खरी-खोटी सुनाने लगते हैं।

पद : 179

​दुलहिनि तोहि पियके घर जाना।

काहे रोवो काहे गावो काहे करत वहाना।।

काहे पहिरयौ हरि हरि चुरियाँ पहिरयौ प्रेम कै बाना।

कहै कबीर सुनो भाई साधो, बिन पिया नहिं ठिकाना।।

व्याख्या : कबीरदास जी जीवात्मा को सचेत करते हुए कहते हैं कि हे दुल्हन! तुझे एक दिन यह संसार छोड़कर अपने प्रियतम परमात्मा के घर (परलोक) जाना ही है; फिर तू रोने, गाने और संसार में रुकने के व्यर्थ बहाने क्यों बना रही है? संसार के इन कच्चे और नश्वर सुखों रूपी हरी-हरी चूड़ियों को पहनने का क्या लाभ, तुझे तो केवल प्रभु के सच्चे प्रेम का वस्त्र धारण करना चाहिए। कबीर कहते हैं कि हे संतों सुनो, इस जीवात्मा का अपने परमात्मा के सिवा संसार में दूसरा कोई सच्चा ठिकाना या सहारा नहीं है।

पद : 180

​सूतल रहलूँ मैं नींद भरि, पिया दिहलै जगाय।

चरन-कँवलके अंजन हो नैना ले लूँ लगाया।।

जासो निंदिया न आवे हो नहि तन अलसाय।

पियाके वचन प्रेम-सागर हो, चलूँ चली हो नहाय ।।

जनम जनमके पापवा छिनमे डारब धोवाय।

यहि तनके जग दीप कियौ प्रीत बतिया लगाय।।

पाँच ततके तेल चुआए ब्रह्म अगिनि जगाय।

प्रेम-पियाला पियाइके हो पिया पिया बौराय।।

बिरह अगिनि तन तलफै हो जिय कछु न सोहेय ।।

ऊँच अटरिया चढ़ि बैठ लूँ हो जहँ काल न जाय।

कहै कबीर विचारिके हो जम देख डराया।।

व्याख्या : जीवात्मा कहती है कि मैं अज्ञान और मोह की गहरी नींद में सोई हुई थी, पर मेरे प्रियतम परमात्मा ने मुझे जगा दिया है। अब मैं उनके चरण-कमलों की धूल का अंजन अपनी आँखों में लगा लूँगी, जिससे अज्ञान की नींद फिर कभी न आए और मेरा शरीर कभी साधना में आलसी न हो। प्रियतम के वचन प्रेम के अथाह सागर हैं, मैं उनमें जाकर स्नान करूँगी जिससे मेरे जन्म-जन्मांतरों के सारे पाप एक ही क्षण में धुल जाएँ। मैंने अपने इस शरीर को दीपक बना लिया है, उसमें प्रेम की बत्ती लगा दी है और पाँचों तत्वों को साधना में गलाकर तेल तैयार किया है तथा उसमें ब्रह्म-ज्ञान की ज्योति जगा दी है। प्रियतम ने मुझे अपने प्रेम का ऐसा प्याला पिलाया है कि मैं उनकी दीवानी हो गई हूँ। उनके वियोग की आग में मेरा शरीर तड़पता है और संसार का कोई भोग मुझे अच्छा नहीं लगता। अब मैं साधना के सहारे अंतःकरण की उस ऊँची अटारी (सहस्रार) पर जाकर बैठ गई हूँ जहाँ काल (मृत्यु) भी नहीं पहुँच सकता; कबीर कहते हैं कि विचार करके देखने पर स्वयं यमराज भी इस स्थिति को देखकर भयभीत हो जाता है।

पद : 181

​अब तोहि जान न देहुँ राम पियारे

ज्यूँ भावै त्यूँ होहु हमारे ॥

बहुत दिननके बिछुरे हरि पाये,

भाग बड़े घर बैठे आये।

चरननि लागि करौं बरियाई।

प्रेम प्रीति राखौं उरझाई।

इत मन-मंदिर रहौ नित चोपै,

कहै कबीर करहु मति घोषै ॥

व्याख्या : कबीरदास जी अपने प्रियतम राम से अत्यंत आत्मीयता से कहते हैं कि हे प्यारे राम! अब मैं आपको अपने पास से कहीं नहीं जाने दूँगा; जैसे भी हो, आप केवल मेरे ही होकर रहिए। बहुत दिनों से बिछड़े हुए अपने प्रभु को मैंने आज पाया है, यह मेरा बड़ा सौभाग्य है कि आप मेरे घर बैठे ही आ गए हैं। अब तो मैं प्रेमपूर्वक हठ करके आपके चरण पकड़ लूँगी और आपको अपने सच्चे प्रेम और प्रीति के बंधन में बाँधकर रखूँगी। आप सदा मेरे इस मन रूपी मंदिर में उमंग और आनंद के साथ रहिए। कबीर कहते हैं कि अब आप मुझे छोड़कर जाने का कोई बहाना या छल मत कीजिए।

पद : 182

​तन-मन-धन बाजी लागि हो।

चौपड़ खेलूँ पीवसे रे, तन-मन बाजी लगाय।

हारी तो पियकी भी रे, जीती तो पिय मोर हो

चौसरियाके खेल में रे, जुग्ग मिलन की आस।

नर्द अकेली रह गई रे, नहि जीवन की आस हो।

चार बरन घर एक है रे, भाँति भाँतिके लोग।

मनसा-बाचा-कर्मना कोई, प्रीति निबाहो ओर हो।

लख चौरासी भरमत भरमत, पौपै अटकी आय।

जो अबके पौ ना पड़ी रे, फिर चौरासी जाय हो।

कहै कबीर धर्मदास रे, जीती बाजी मत हार।

अबके सुरत चढ़ाय दे रे, सोई सुहागिन नार हो।

व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि मैंने अपने तन, मन और धन का दाँव लगाकर अपने प्रियतम परमात्मा के साथ चौपड़ का खेल खेला है। इस खेल में मेरा दोनों ही तरह से लाभ है—यदि मैं हार गई तो भी प्रियतम की हो जाऊँगी, और यदि जीत गई तो प्रियतम मेरे हो जाएँगे। इस चौसर के खेल में युगों-युगों के मिलन की आशा लगी है; लेकिन यदि मेरी गोटी (जीवात्मा) अकेली रह गई, तो संसार से पार होने की कोई उम्मीद नहीं बचेगी। संसार के चारों वर्णों और तरह-तरह के लोगों के बीच वही सच्चा है जो मन, वचन और कर्म से प्रभु के साथ अंत तक प्रेम निभाए। चौरासी लाख योनियों में भटकते-भटकते यह आत्मा अब मानव जीवन रूपी अंतिम दाँव पर आकर रुक गई है; यदि इस बार मुक्ति का दाँव नहीं लगा, तो फिर से चौरासी लाख योनियों के चक्कर में भटकना पड़ेगा। कबीर कहते हैं कि हे साधक! इस जीती हुई बाज़ी को मत हारो; अपनी चेतना (सुरति) को ऊपर परमात्मा में लीन कर दो, वही आत्मा वास्तव में सच्ची सुहागिन है।

पद : 183

​नाम अमल उतरै ना भाई ।

औ अमल छिन छिन चढ़ि उतरै, नाम अमल दिन बढ़े सवाई ॥

देखत चढ़े सुनत हिय लागै, सुरत किए तन देत घुमाई ।

पियत पियाला भए मतवाला, पायो नाम मिटी दुचिताई ॥

जो जन नाम अमल रस चाखा, तर गई गनिका सदन कसाई।

कह कबीर गूंगे गुड़ खाया बिन रसना का करै बड़ई ॥

व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि हे भाई! ईश्वर के नाम का नशा ऐसा है जो कभी उतरता ही नहीं। संसार के अन्य सभी पदार्थों का नशा तो क्षण-क्षण में चढ़ता और उतर जाता है, लेकिन प्रभु-नाम का नशा दिन-प्रतिदिन सवाया होकर बढ़ता ही जाता है। इस रस को देखने मात्र से आनंद चढ़ने लगता है, सुनने से यह हृदय में समा जाता है और इसका ध्यान करते ही यह शरीर को दिव्य मस्ती में घुमा देता है। इस नाम रूपी प्याले को पीकर साधक पूरी तरह मतवाला हो जाता है और प्रभु का नाम मिलते ही मन की सारी दुविधा मिट जाती है। जिस-जिस ने इस नाम-रस का स्वाद चखा, चाहे वह गणिका हो या सदन कसाई, सबका उद्धार हो गया। कबीर कहते हैं कि यह रस तो गूँगे के गुड़ खाने जैसा है, जिसका स्वाद अनुभव तो किया जा सकता है, पर बिना वाणी के उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता।

पद : 184

​हमरी ननंद निगोडिन जागे।

कुमति लकुटिया निसि-दिन ब्यापै, सुमति देखि नहिं भावै।

निसि-दिन लेत नाम साहबको, रहत रहत रँग लागै।

निसिदिन खेलत रही सखियन-सँग, मोहिं बड़ो डर लागै।

मोरे साहबकी ऊँची अटरिया, चढ़तमे जियरा काँपै।

जो सुख चहै तो लज्जा त्यागै, पियसे हिलि-मिलि लागै।

घूँघट खोल अंग-भर भेंट, नैन-आरती साजै।

कहै कबीर सुनो भाई साधो, चतुर होय सो जानै।

निज प्रीतमकी आस नहीं है नाहक काजर पारै।

व्याख्या : कबीरदास जी जीवात्मा की ओर से रूपक बाँधते हुए कहते हैं कि मेरी आशा और तृष्णा रूपी ननद हर समय जागती रहती है और साधना में बाधा डालती है। दुर्बुद्धि रूपी लाठी दिन-रात मन पर चोट करती है और उसे सद्बुद्धि तनिक भी अच्छी नहीं लगती। जब कोई साधक दिन-रात प्रभु का नाम लेता रहता है, तब धीरे-धीरे उस पर ईश्वर के प्रेम का रंग चढ़ने लगता है। जीवात्मा कहती है कि मैं तो दिन-रात इंद्रियों रूपी सखियों के साथ संसार में ही खेलती रही, इसलिए अब मुझे बहुत डर लग रहा है। मेरे स्वामी परमात्मा का महल (सहस्रार) बहुत ऊँचा है, जहाँ तक चढ़ने में मेरा हृदय काँप उठता है। यदि आत्मा को सच्चा आध्यात्मिक सुख चाहिए तो उसे सांसारिक लोक-लाज को त्याग कर अपने प्रियतम से घुल-मिल जाना होगा। अज्ञान का घूँघट हटाकर परमात्मा से पूर्ण रूप से भेंट करनी होगी और आँखों में भक्ति का भाव सजाना होगा। कबीर कहते हैं कि हे संतों सुनो, जो समझदार है वही इस रहस्य को समझ सकता है; जिसे अपने सच्चे प्रियतम परमात्मा से मिलने की कोई सच्ची चाह नहीं है, उसका सांसारिक और बाहरी श्रृंगार करना बिल्कुल व्यर्थ है।

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