कक्षा 11 की हिंदी की पाठ्य-पुस्तक 'आरोह भाग 1' में संकलित ''अपु के साथ ढाई साल' का मूल पाठ अभ्यास के प्रश्नों सहित |
पथेर पाँचाली फ़िल्म की शूटिंग का काम ढाई साल तक चला था! इस ढाई साल के कालखंड में हर रोज़ तो शूटिंग होती नहीं थी। मैं तब एक विज्ञापन कंपनी में नौकरी करता था। नौकरी के काम से जब फ़ुर्सत मिलती थी, तब शूटिंग करता था। मेरे पास उस समय पर्याप्त पैसे भी नहीं थे। पैसे ख़त्म होने के बाद, फिर से पैसे जमा होने तक शूटिंग स्थगित रखनी पड़ती थी।
शूटिंग का आरंभ करने से पहले फ़िल्म में काम करने के लिए कलाकार इकट्ठा करने का एक बड़ा आयोजन हुआ। विशेषकर अपू की भूमिका निभाने के लिए छह साल का लड़का मिल ही नहीं रहा था। आख़िर मैंने अख़बार में उस संदर्भ में एक इश्तहार दिया।
रासबिहारी एवेन्यू की एक बिल्डिंग में मैंने एक कमरा भाड़े पर लिया था, वहाँ पर बच्चे इंटरव्यू के लिए आते थे। बहुत-से लड़के आए, लेकिन अपू की भूमिका के लिए मुझे जिस तरह का लड़का चाहिए था, वैसा एक भी नहीं था। एक दिन एक लड़का आया। उसकी गर्दन पर लगा पाउडर देखकर मुझे शक हुआ। नाम पूछने पर नाज़ुक आवाज़ में वह बोला—’टिया’। उसके साथ आए उसके पिता जी से मैंने पूछा, ‘क्या अभी-अभी इसके बाल कटवाकर यहाँ ले आए हैं?’ वे सज्जन पकड़े गए। सच छिपा नहीं सके बोले, असल में यह मेरी बेटी है। अपू की भूमिका मिलने की आशा से इसके बाल कटवाकर आपके यहाँ ले आया हूँ।
विज्ञापन देकर भी अपू की भूमिका के लिए सही तरह का लड़का न मिलने के कारण मैं तो बेहाल हो गया। आख़िर एक दिन मेरी पत्नी छत से नीचे आकर मुझसे बोली, ‘पास वाले मकान की छत पर एक लड़का देखा, ज़रा उसे बुलाइए तो!’ आख़िर हमारे पड़ोस के घर में रहने वाला लड़का सुबीर बनर्जी ही ‘पथेर पाँचाली’ में ‘अपू’ बना। फ़िल्म का काम आगे भी ढाई साल चलने वाला है, इस बात का अंदाज़ा मुझे पहले नहीं था। इसलिए जैसे-जैसे दिन बीतने लगे, वैसे-वैसे मुझे डर लगने लगा। अपू और दुर्गा की भूमिका निभाने वाले बच्चे अगर ज़्यादा बड़े हो गए, तो फ़िल्म में वह दिखाई देगा! लेकिन मेरी ख़ुशक़िस्मती से उस उम्र में बच्चे जितने बढ़ते हैं, उतने अपू और दुर्गा की भूमिका निभाने वाले बच्चे नहीं बढ़े। इंदिरा ठाकरुन की भूमिका निभाने वाली अस्सी साल उम्र की चुन्नीबाला देवी ढाई साल तक काम कर सकी, यह भी मेरे सौभाग्य की बात थी।
शूटिंग की शुरुआत में ही एक गड़बड़ हो गई। अपू और दुर्गा को लेकर हम कलकत्ता1 से सत्तर मील पर पालसिट नाम के एक गाँव गए। वहाँ रेल-लाइन के पास काशफूलों से भरा एक मैदान था। अपू और दुर्गा पहली चार रेलगाड़ी देखते हैं—इस सीन की शूटिंग हमें करनी थी। यह सीन बहुत ही बड़ा था। एक दिन में उसकी शूटिंग पूरी होना नामुमकिन था। कम-से-कम दो दिन लग सकते थे। पहले दिन जगद्धात्री पूजा का त्योहार था। दुर्गा के पीछे-पीछे दौड़ते हुए अपू काशफूलों के वन में पहुँचता है। सुबह शूटिंग शुरू करके शाम तक हमने सीन का आधा भाग चित्रित किया। निर्देशक, छायाकार, छोटे अभिनेता-अभिनेत्री हम सभी इस क्षेत्र में नवागत होने के कारण थोड़े बौराए हुए ही थे, बाक़ी का सीन बाद में चित्रित करने का निर्णय लेकर हम घर पहुँचे। सात दिन बाद शूटिंग के लिए उस जगह गए, तो वह जगह हम पहचान ही नहीं पाए! लगा, ये कहाँ आ गए हैं हम? कहाँ गए वे सारे काशफूल। बीच के सात दिनों में जानवरों ने वे सारे काशफूल खा डाले थे! अब अगर हम उस जगह बाक़ी आधे सीन की शूटिंग करते, तो पहले आधे सीन के साथ उसका मेल कैसे बैठता? उसमें से ‘कंटिन्युइटी’ नदारद हो जाती!
उस सीन के बाक़ी अंश की शूटिंग हमने उसके अगले साल शरद ऋतु में, जब फिर से वह मैदान काशफूलों से भर गया, तब की। उसी समय रेलगाड़ी के भी शॉट्स लिए। लेकिन रेलगाड़ी के इतने शॉट्स थे कि एक रेलगाड़ी से काम नहीं चला। एक के बाद एक तीन रेलगाड़ियों को हमने शूटिंग के लिए इस्तेमाल किया। सुबह से लेकर दुपहर तक कितनी रेलगाड़ियाँ उस लाइन पर से जाती हैं—यह पहले ही टाइम-टेबल देखकर जान लिया था। हर एक ट्रेन एक ही दिशा से आने वाली थी। जिस स्टेशन से वे रेलगाड़ियाँ आने वाली थीं, उस स्टेशन पर हमारी टीम के अनिल बाबू थे। रेलगाड़ी स्टेशन से निकलते समय अनिल बाबू भी इंजिन-ड्राइवर की केबिन में चढ़ते थे। क्योंकि गाड़ी के शूटिंग को जगह के पास आते ही बॉयलर में कोयला डालना ज़रूरी था, ताकि काला धुआँ निकले। सफ़ेद काशफूलों की पृष्ठभूमि पर अगर काला धुआँ नहीं आया, तो दृश्य कैसे अच्छा लगेगा?
‘पथेर पाँचाली’ फ़िल्म में जब यह सीन दिखाई देता है, तब दर्शक पहचान नहीं पाते कि उस सीन में हमने तीन अलग-अलग रेलगाड़ियों का इस्तेमाल किया है। आज के डीजल और बिजली पर चलने वाले इंजनों के युग में वह दृश्य उस प्रकार से हम चित्रित न कर पाते।
आर्थिक अभाव के कारण बहुत दिनों तक हमें अलग-अलग समस्याओं से जूझना पड़ा। एक उदहारण देता हूँ।
मूल उपन्यास में अपू और दुर्गा के ‘भूलो’ नामक पालतू कुत्ते का उल्लेख है गाँव से ही हमने एक कुत्ता प्राप्त किया और वह भी हमसे ठीक बर्ताव करने लगा। फ़िल्म में एक दृश्य ऐसा है: अपू की माँ सर्वजया अपू को भात खिला रही है। भूलो कुत्ता दरवाज़े के सामने आँगन में बैठकर अपू का भात खाना देख रहा है। अपू के हाथ में छोटे तीर-कमान हैं। खाने में उसका पूरा ध्यान नहीं है। वह माँ की ओर पीठ करके बैठा हुआ है। वह तीर-कमान खेलने के लिए उतावला है।
अपू खाते-खाते ही कमान से तीर छोड़ता है। उसके बाद खाना छोड़कर तीर वापस लाने के लिए जाता है। सर्वजया बाएँ हाथ में वह थाली और दाहिने हाथ में निवाला लेकर बच्चे के पीछे दौड़ती है, लेकिन बच्चे के भाव देखकर जान जाती है कि वह अब कुछ नहीं खाएगा। भूलो कुत्ता भी खड़ा हो जाता है। उसका ध्यान सर्वजया के हाथ में जो भात की थाली है, उसकी ओर है।
इसके बाद वाले शॉट में हमें ऐसा दिखाना था कि सर्वजया थाली में बचा भात एक गमले में डाल देती है, और भूलो वह भात खाता है। लेकिन यह शॉट हम उस दिन ले नहीं सके, क्योंकि सूरज की रोशनी ख़त्म हुई और उसी के साथ हमारे पास जो पैसे थे, वे भी ख़त्म हुए!
छह महीने बाद, फिर से पैसे इकट्ठा होने पर हम फिर बोडाल गाँव में उस सीन का बाक़ी अंश चित्रित करने के लिए गए। लेकिन वहाँ जाने पर समाचार मिला कि भूलो कुत्ता अब इस दुनिया में नहीं है। अब क्या होगा?
ख़बर मिली कि भूलो जैसा दिखने वाला और एक कुत्ता गाँव में है। अब लाओ पकड़ के उस कुत्ते को!
सचमुच! यह कुत्ता भूलों जैसा ही दिखता था। वह भूलो से बहुत ही मिलता-जुलता था। उसके शरीर का रंग तो भूलो जैसा बादामी था ही, उसकी दुम का छोर भी भूलो के दुम की छोर जैसा ही सफ़ेद था। आख़िर यह फेंका हुआ भात उसने खाया, और हमारे उस दृश्य की शूटिंग पूरी हुई। फ़िल्म देखते समय यह बात किसी के भी ध्यान में नहीं आती कि एक ही सीन में हमने ‘भूलो’ की भूमिका में दो अलग-अलग कुत्तों से काम लिया है!
और सिर्फ़ कुत्ते के संदर्भ में ही नहीं, आदमी के संदर्भ से भी ऐसी ही समस्या से ‘पथेर पाँचाली’ की शूटिंग के दौरान उलझना पड़ा था।
श्रीनिवास नामक घूमते मिठाईवाले से मिठाई ख़रीदने के लिए अपू और दुर्गा के पास पैसे नहीं हैं। वे तो मिठाई ख़रीद नहीं सकते, इसलिए अपू और दुर्गा उस मिठाईवाले के पीछे-पीछे मुखर्जी के घर के पास जाते हैं। मुखर्जी अमीर आदमी हैं। वे तो मिठाई ज़रूर ख़रीदेंगे और उनका मिठाई ख़रीदना देखने में ही अपू और दुर्गा की ख़ुशी है।
इस दृश्य का कुछ अंश चित्रित होने के बाद हमारी शूटिंग कुछ महीनों के लिए स्थगित हो गई। पैसे हाथ आने पर फिर जब हम उस गाँव में शूटिंग करने के लिए गए, तब ख़बर मिली कि श्रीनिवास मिठाईवाले की भूमिका जो सज्जन कर रहे थे, उनका देहांत हो गया है। अब पहले वाले श्रीनिवास का मिलता-जुलता दूसरा आदमी कहाँ से मिलेगा?
आख़िर श्रीनिवास की भूमिका के लिए हमें जो सज्जन मिले, उनका चेहरा पहले वाले श्रीनिवास से मिलता-जुलता नहीं था, लेकिन शरीर से वे पहले श्रीनिवास जैसे ही थे। उन्हीं पर हमने दृश्य का बाक़ी अंश चित्रित किया। फ़िल्म में दिखाई देता है कि एक नंबर श्रीनिवास बाँसबन से बाहर आता है और अगले शॉट में दो नंबर श्रीनिवास कैमरे की ओर पीठ करके मुखर्जी के घर के गेट के अंदर जाता है। ‘पथेर पाँचाली’ फ़िल्म अनेक लोगों ने एक से अधिक बार देखी है, लेकिन श्रीनिवास के मामले में यह बात किसी के ध्यान में आई है, ऐसा मैंने नहीं सुना!
इस श्रीनिवास के सीन में ही एक शॉट के वक़्त हम बिलकुल तंग आ गए थे और वह भी उस भूलो कुत्ते की वजह से। छोटे से पुकुर के पार मिठाईवाला खड़ा है, और इस पार, अपने घर के पास अपू-दुर्गा मिठाईवाले की ओर ललचाई नज़र से देख रहे हैं। ‘क्यों, मिठाई ख़रीदेंगे?’ मिठाईवाले के इस सवाल का वे ‘ना’ में जवाब देते हैं, तब मिठाईवाला मुखर्जी के घर की ओर जाने लगता है। दुर्गा अपू से कहती है, ‘चल, हम भी जाएँगे।’ भाई-बहन दौड़ने लगते हैं और उसी समय पीछे झुरमुट में बैठा भूलो कुत्ता भी छलाँग लगाकर उनके साथ दौड़ने लगता है।
हमें ऐसा सीन लेना था, लेकिन मुश्किल यह कि यह कुत्ता कोई हॉलीवुड का सिखाया हुआ नहीं था। इसलिए यह बताना मुश्किल ही था कि वह अपू-दुर्गा के साथ भागता जाएगा या नहीं। कुत्ते के मालिक से हमने कहा था, ‘अपू-दुर्गा जब भागने लगते हैं, तब तुम अपने कुत्ते को उन दोनों के पीछे भागने के लिए कहना।’ लेकिन शूटिंग के वक़्त दिखाई दिया कि वह कुत्ता मालिक की आज्ञा का पालन नहीं कर रहा है। इधर हमारा कैमरा चालू ही था। क़ीमती फ़िल्म जाया हो रही थी और मुझे बार-बार चिल्लाना पड़ रहा था—’कट्! कट्!’
अब यहाँ धीरज रखने के सिवा दूसरा उपाय नहीं था। अगर कुत्ता बच्चों के पीछे दौड़ा, तो ही वह उनका पालतू कुत्ता लग सकता था। आख़िर मैने दुर्गा से अपने हाथ में थोड़ी मिठाई छिपाने के लिए कहा, और वह कुत्ते को दिखाकर दौड़ने को कहा। इस बार कुत्ता उनके पीछे भागा, और हमें हमारी इच्छा के अनुसार शॉट मिला।
पैसों की कमी के कारण ही बारिश का दृश्य चित्रित करने में बहुत मुश्किल आई थी। बरसात के दिन आए और गए, लेकिन हमारे पास पैसे नहीं थे, इस कारण शूटिंग बंद थी। आख़िर जब हाथ में पैसे आए, तब अक्टूबर का महीना शुरू हुआ था। शरद ऋतु में, निरभ्र आकाश के दिनों में भी शायद बरसात होगी, इस आशा से मैं अपू और दुर्गा की भूमिका करने वाले बच्चे, कैमरा और तकनीशियन को साथ लेकर हर रोज़ देहात में जाकर बैठा रहता था। आकाश में एक भी काला बादल दिखाई दिया, तो मुझे लगता था कि बरसात होगी। मैं इच्छा करता, वह बादल बहुत बड़ा हो जाए और बरसने लगे।
आख़िर एक दिन हुआ भी वैसा ही। शरद ऋतु में भी आसमान में बादल छा गए और धुआँधार बारिश शुरू हुई। उसी बारिश में भीगकर दुर्गा भागती हुई आई और उसने पेड़ के नीचे भाई के पास आसरा लिया। भाई-बहन एक दूसरे से चिपककर बैठे। दुर्गा कहने लगी—‘नेबूर-पाता करमचा, हे वृष्टी घरे जा!’ 2बरसात, ठंड, अपू का बदन खुला, प्लास्टिक के कपड़े से ढके कैमरे को आँख लगाकर देखा, तो वह ठंड लगने के कारण सिहर रहा था। शॉट पूरा होने के बाद दूध में थोड़ी ब्राँडी मिलाकर दी और भाई-बहन का शरीर गर्म किया। जिन्होंने ‘पथेर पाँचाली’ फ़िल्म देखी है, वे जानते ही है कि वह शॉट बहुत अच्छा चित्रित हुआ है।
शूटिंग की दृष्टि से गोपाल ग्राम की तुलना में बोडाल गाँव हमें अधिक उपयुक्त लगा। अपू-दुर्गा का घर, अपू का स्कूल, गाँव के मैदान, खेत, पुकुर, आम के पेड़, बाँस की झुरमुट ये सभी बातें बोडाल गाँव में और आस-पास हमें मिलीं। अब उस गाँव में बिजली आ गई हैं, पक्के घर, पक्के रास्ते बने हैं। उस ज़माने में वे नहीं थे।
उस गाँव में हमें बहुत बार जाना पड़ा। बहुत बार रहना भी पड़ा, इसलिए वहाँ के लोगों से भी हमारा परिचय हुआ। उन लोगों में एक बहुत अद्भुत सज्जन थे। उन्हें हम ‘सुबोध दा’ कहकर पुकारते थे। वे साठ-पैंसठ साल के थे। उनका माथा गंजा था। वे अकेले ही एक झोपड़े में रहते और दरवाज़े पर बैठकर ख़ुद ही से कुछ-न-कुछ बड़बड़ाते रहते थे। हम उस गाँव में एक फ़िल्म की शूटिंग करने वाले है यह जानकर वे ग़ुस्सा हो गए। हमें देखने पर वे चिल्लाते—‘फ़िल्मवाले आए हैं, मारो उनको लाठियों से!’ पूछताछ करने पर लोगों ने बताया कि वे मानसिक रूप से बीमार थे। बाद में ‘सुबोध दा’ से हमारा अच्छा परिचय हुआ। वे हमें पास बुलाकर, दरवाज़े में बैठकर वायलिन पर लोकगीतों की धुनें बजाकर सुनाते थे। बीच-बीच में हमारे कानों में फुसफुसाते, ‘वो साइकिल पे जा रहा आदमी देख रहे हो न, वह कौन है, जानते हो? वह है रुज़वेल्ट3! पक्का पाजी उनके मत से दूसरा एक था चर्चिल4, एक था हिटलर5, तो एक था अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान6 ! सभी उनके मतानुसार पाजी थे, उनके दुश्मन थे।
हम जिस घर में शूटिंग करते थे, उसके पड़ोस में एक धोबी रहता था। उसके कारण हमें बहुत परेशानी होती थी। वह भी थोड़ा-सा पागल था और कभी भी ‘भाइयों और बहनों!’ कहकर किसी राजकीय मुद्दे पर लंबा भाषण शुरू करता था। फ़ुर्सत के समय में उसके भाषण पर हमें कुछ आपत्ति नहीं थी, लेकिन अगर शूटिंग के समय वह भाषण शुरू करता, तो हमारे साउंड का काम प्रभावित हो सकता था। उस धोबी के रिश्तेदारों ने अगर हमारी मदद न की होती, तो वह धोबी सचमुच ही एक सिरदर्द बन जाता!
जिस घर में हम ‘पथेर पाँचाली’ की शूटिंग करते थे, वह घर हमें एकदम ध्वस्त अवस्था में मिला था। उसके मालिक कलकत्ता में रहते थे। उनसे हमने वह घर शूटिंग के लिए भाड़े पर लिया था। उस घर की मरम्मत करके उसे शूटिंग के लिए ठीक-ठाक करवाने में हमें लगभग एक महीना लगा।
उस घर के एक हिस्से में एक के पास एक ऐसे कुछ कमरे थे। वे हमने फ़िल्म में नहीं दिखाए। उन कमरों में हम अपना सामान रखा करते थे। एक कमरे में रिकॉर्डिंग मशीन लेकर हमारे साउंड-रिकॉर्डिस्ट भूपेन बाबू बैठा करते थे। हम शूटिंग के वक़्त उन्हें देख नहीं सकते थे, फिर भी उनकी आवाज़ सुन सकते थे। हर शॉट के बाद हम उनसे पूछते, ‘साउंड ठीक है न?’ भूपेन बाबू इस पर ‘हाँ’ या ‘ना’ जवाब देते।
एक दिन शॉट के बाद मैंने साउंड के बारे में उनसे सवाल किया, लेकिन कुछ भी जवाब नहीं आया। फिर एक बार पूछा, ‘भूपेन बाबू, साउंड ठीक है न?’ इस पर भी जवाब न आने पर मैं उनके कमरे में गया, तो देखा कि एक बड़ा-सा साँप उस कमरे की खिड़की से नीचे उतर रहा था। वह साँप देखकर भूपेन बाबू सहम गए थे और उनकी बोलती बंद हो गई थी।
वह साँप हमने वहाँ आने पर कुछ ही दिनों के बाद देखा था। उसे मार डालने की इच्छा होने पर भी स्थानीय लोगों के मना करने के कारण हम उसे मार नहीं सके। वह ‘वास्तुसर्प’ था और बहुत दिनों से वहाँ रह रहा था।…
अभ्यास के प्रश्न ( अपु के साथ ढाई साल )
प्रश्न 1 – ‘पथेर पांचाली’ फिल्म की शूटिंग का काम ढाई साल तक क्यों चला?
उत्तर – ‘पथेर पांचाली’ फ़िल्म की शूटिंग का काम ढाई साल तक चला। इसके बहुत से कारण थे। जैसे लेखक को पैसे का अभाव था। पैसे इकट्ठे होने पर ही वह शूटिंग करता था। वह विज्ञापन कंपनी में काम करता था। इसलिए काम से फुर्सत होने पर ही लेखक तथा अन्य कलाकार फिल्म का काम करते थे। तकनीक के पिछड़ेपन के कारण पात्र, स्थान, दृश्य आदि की समस्याएँ आ जाती थीं। पैसों के अभाव के कारण शूटिंग को बार-बार रोकना पड़ता था। शूटिंग में होने वाली देरी के कारण कई स्थान और पात्र भी या तो बदल जाते थे या उनका देहांत हो जाता था जिस कारण लेखक को उनसे मिलते-झूलते पात्र व् स्थान ढूँढना कठिन हो जाता था।
प्रश्न 2 – अब अगर हम उस जगह बाकी आधे सीन की शूटिंग करते, तो पहले आधे सीन के साथ उसका मेल कैसे बैठता? उसमें से ‘कंटिन्युइटी’ नदारद हो जाती-इस कथन के पीछे क्या भाव है?
उत्तर – किसी भी चीज़ में निरंतरता होनी चाहिए ताकि वह स्वाभाविक लगे। ‘उसमें से ‘कंटिन्युइटी’ नदारद हो जाती’ – इस कथन के पीछे भाव यह है कि कोई भी फिल्म हमें तभी प्रभावित कर पाती है जब उसमें निरंतरता हो। यदि एक दृश्य में ही एकरूपता नहीं होती तो फिल्म कैसे चल पाती। दर्शक भ्रमित हो जाता है। पथेर पांचाली फ़िल्म में काशफूलों के साथ शूटिंग पूरी करनी थी, परंतु एक दिन में पूरी शूटिंग होना संभव नहीं था और पैसों की भी कमी थी। इस कारण एक सप्ताह के अंतराल के बाद शूटिंग करना तय हुआ। परन्तु एक सप्ताह बाद काशफूलों को पशु खा गए। अत: उसी पृष्ठभूमि में दृश्य चित्रित करने के लिए एक वर्ष तक इंतजार करना पड़ा। यदि यह आधा दृश्य काशफूलों के बिना चित्रित किया जाता तो दृश्य में निरंतरता नहीं बन पाती।
प्रश्न 3 – किन दो दृश्यों में दर्शक यह पहचान नहीं पाते कि उनकी शूटिंग में कोई तरकीब अपनाई गई है?
उत्तर – प्रथम दृश्य – इस दृश्य में ‘भूलो’ नामक कुत्ते को अपू की माँ द्वारा गमले में डाले गए भात को खाते हुए चित्रित करना था, परंतु सूर्य के अस्त होने तथा पैसे खत्म होने के कारण यह दृश्य चित्रित न हो सका। छह महीने बाद लेखक पुन: उस स्थान पर गया तब तक उस कुत्ते की मौत हो चुकी थी। काफी प्रयास के बाद उससे मिलता-जुलता कुत्ता मिला और उसी से भात खाते हुए दृश्य को फ़िल्माया गया। यह दृश्य इतना स्वाभाविक था कि कोई भी दर्शक उसे पहचान नहीं पाया।
दूसरा दृश्य – इस दृश्य में श्रीनिवास नामक व्यक्ति मिठाई वाले की भूमिका निभा रहा था। बीच में शूटिंग रोकनी पड़ी। दोबारा उस स्थान पर जाने से पता चला कि उस व्यक्ति का देहांत हो गया है, फिर लेखक ने उससे मिलते-जुलते व्यक्ति को लेकर बाकी दृश्य फ़िल्माया। पहला श्रीनिवास बाँस वन से बाहर आता है और दूसरा श्रीनिवास कैमरे की ओर पीठ करके मुखर्जी के घर के गेट के अंदर जाता है। इस प्रकार इस दृश्य में दर्शक अलग-अलग कलाकारों की पहचान नहीं पाते।
प्रश्न 4 – ‘भूलो’ की जगह दूसरा कुत्ता क्यों लाया गया? उसने फिल्म के किस दृश्य को पूरा किया?
उत्तर – ‘भूलो’ की मृत्यु हो गई थी, इस कारण उससे मिलता-जुलता कुत्ता लाया गया। फ़िल्म का दृश्य इस प्रकार था कि अप्पू की माँ उसे भात खिला रही थी। अप्पू तीर-कमान से खेलने के लिए उतावला है। भात खाते-खाते वह तीर छोड़ता है तथा उसे लाने के लिए भाग जाता है। माँ भी उसके पीछे दौड़ती है। भूलो कुत्ता वहीं खड़ा सब कुछ देख रहा है। उसका ध्यान भात की थाली की ओर है। यहाँ तक का दृश्य पहले भूलो कुत्ते पर फ़िल्माया गया था। इसके बाद के दृश्य में अप्पू की माँ बचा हुआ भात गमले में डाल देती है और भूलो वह भात खा जाता है। परन्तु शाम हो जाने के कारण सही रोशनी न मिल पाने की वजह से दृश्य पूरा नहीं फिल्माया गया और पैसे न होने के कारण दृश्य कुछ समय बाद फिल्माया गया। परन्तु तब तक भूलो कुत्ता मर चूका था, बचा हुआ दृश्य दूसरे कुत्ते से पूरा किया गया।
प्रश्न 5 – फिल्म में श्रीनिवास की क्या भूमिका थी और उनसे जुड़े बाकी दृश्यों को उनके गुजर जाने के बाद किस प्रकार फिल्माया गया?
उत्तर – फिल्म में श्रीनिवास की भूमिका मिठाई बेचने वाले की थी। उनका दृश्य भी किसी कारण वश समय रहते पूरा नहीं हो पाया। और जब उसे पूरा करने का समय आया तब तक श्रीनिवास की भूमिका निभाने वाले व्यक्ति का देहांत हो गया था और उनके देहांत के बाद उनकी जैसी कद-काठी का व्यक्ति ढूँढ़ा गया। उसका चेहरा तो अलग था, परंतु शरीर श्रीनिवास जैसा ही था। ऐसे में फ़िल्मकार ने तरकीब लगाई कि नया-आदमी कैमरे की तरफ पीठ करके मुखर्जी के घर के गेट के अंदर आएगा और इनकी तरक़ीब कामयाब रही , अत: कोई भी अनुमान नहीं लगा पाता कि यह अलग व्यक्ति है।
प्रश्न 6 – बारिश का दृश्य चित्रित करने में क्या मुश्किल आई और उसका समाधान किस प्रकार हुआ?
उत्तर – फ़िल्मकार के पास पैसे का अभाव था, अत: बारिश के दिनों में शूटिंग नहीं कर सके। अक्टूबर माह तक उनके पास पैसे इकट्ठे हुए तो बरसात के दिन समाप्त हो चुके थे। शरद ऋतु में बारिश होना भाग्य पर निर्भर था। लेखक हर रोज अपनी टीम के साथ गाँव में जाकर बैठे रहते और बादलों की ओर टकटकी लगाकर देखते रहते। एक दिन उनकी इच्छा पूरी हो गई। अचानक बादल छा गए और धुआँधार बारिश होने लगी। फिल्मकार ने इस बारिश का पूरा फायदा उठाया और दुर्गा और अप्पू का बारिश में भीगने वाला दृश्य शूट कर लिया। इस बरसात में भीगने से दोनों बच्चों को ठंड लग गई, परंतु दृश्य पूरा हो गया।
प्रश्न 7 – किसी फिल्म की शूटिंग करते समय फिल्मकार को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, उन्हें सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर – किसी फ़िल्म की शूटिंग करते समय फिल्मकार को निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ता है –
(क) धन की कमी।
(ख) कलाकारों का चयन।
(ग) कलाकारों के स्वास्थ्य, मृत्यु आदि की स्थिति।
(घ) पशु-पात्रों के दृश्य की समस्या।
(ङ) बाहरी दृश्यों हेतु लोकेशन ढूँढ़ना।
(च) प्राकृतिक दृश्यों के लिए मौसम पर निर्भरता।
(छ) स्थानीय लोगो का हस्तक्षेप व असहयोग।
(ज) संगीत।
(झ) दृश्यों की निरंतरता हेतु भटकना।
(ञ) फ़िल्म के अनुकूल वातावरण का होना।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न
प्रश्न 1– फिल्म बनाते समय फिल्म के सदस्यों को किस प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ा ?
उत्तर – फिल्म के सदस्यों को फिल्म बनाते समय निम्न समस्याओं का सामना करना पड़ा था –
(1) एक फिल्म बनाते समय अत्यधिक पैसों की जरूरत पड़ती है लेकिन फिल्म के दौरान पैसों की कमी हुई जिससे फ़िल्म को बार-बार बंद किया जाता था।
(2) फिल्म के पात्रों का चुनाव बहुत ही महत्वपूर्ण एवं कठिनाई पूर्ण कार्य है क्योंकि सही पात्र ही फिल्म को सफल बना सकता है।
(3) बदलते मौसम, पर्यावरण समस्याएं, बाहर के क्षेत्रों में वह जगह ढूंढना जहां फिल्म की शूटिंग हो सके।
(4) शूटिंग के दौरान सारी चीजों की व्यवस्थाओं को देखना।
प्रश्न 2 – काश के फूल वाले दृश्य को एक साल बाद क्यों फिल्माया गया?
उत्तर – काश के फूल वाले दृश्य को एक साल बाद फिल्माया गया क्योंकि पहली बार में पूरा दृश्य एक साथ शूट नहीं किया जा सका और अगले शूटिंग को एक हफ्ते के बाद शूट किया गया उस एक हफ्ते में पशुयों ने काश के सारे फूल खा लिए जिसके कारण दृश्य में निरंतरता लाने के लिए इस दृश्य को एक साल बाद तब फिल्माया गया जब फिर से उस मैदान में काश के फूल खिले।
प्रश्न 3 – ‘ अप्पू के साथ ढाई साल ‘ संस्मरण का प्रतिपादय / मूल भाव बताइए।
उत्तर – ‘अप्पू के साथ ढाई साल’ नामक संस्मरण पथेर पांचाली फ़िल्म के अनुभवों से संबंधित है जिसका निर्माण भारतीय फ़िल्म के इतिहास में एक बड़ी घटना के रूप में दर्ज है। इससे फ़िल्म के सृजन और उनके व्याकरण से संबंधित कई बारीकियों का पता चलता है। यही नहीं, जो फ़िल्मी दुनिया हमें अपने ग्लैमर से चुधियाती हुई जान पड़ती है, उसका एक ऐसा सच हमारे सामने आता है, जिसमें साधनहीनता के बीच अपनी कलादृष्टि को साकार करने का संघर्ष भी है। यह पाठ मूल रूप से बांग्ला भाषा में लिखा गया है जिसका अनुवाद विलास गिते ने किया है।
किसी फिल्मकार के लिए उसकी पहली फ़िल्म एक अबूझ पहेली होती है। बनने या न बन पाने की अमूर्त शंकाओं से घिरी। फ़िल्म पूरी होने पर ही फ़िल्मकार जन्म लेता है। पहली फ़िल्म के निर्माण के दौरान हर फ़िल्म निर्माता का अनुभव-संसार इतना रोमांचकारी होता है कि वह उसके जीवन में बचपन की स्मृतियों की तरह हमेशा जीवंत बना रहता है। इस अनुभव-संसार में दाखिल होना उस बेहतरीन फ़िल्म से गुजरने से कम नहीं है।
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