कक्षा 11 की हिंदी की पाठ्य-पुस्तक 'आरोह भाग 1' में संकलित ''स्पीति में बारिश" ( कृष्णनाथ ) का मूल पाठ अभ्यास के प्रश्नों सहित |
स्पीति हिमाचल प्रदेश के लाहुल-स्पीति जिले की तहसील है। लाहुल-स्पीति का यह योग भी आकस्मिक ही है। इनमें बहुत योगायोग नहीं है। ऊँचे दरों और कठिन रास्तों के कारण इतिहास में भी कम रहा है। अलंघ्य भूगोल यहाँ इतिहास का एक बड़ा कारक है। अब जबकि संचार में कुछ सुधार हुआ है तब भी लाहुल-स्पीति का योग प्रायः ‘वायरलेस सेट’ के जरिए है जो केलंग और काजा के बीच खड़कता रहता है। फिर भी केलंग के बादशाह को भय लगा रहता है कि कहीं काजा का सूबेदार उसकी अवज्ञा तो नहीं कर रहा है? कहीं बगावत तो नहीं करने वाला है? लेकिन सिवाय वायरलेस सेट पर संदेश भेजने के वह कर भी क्या सकता है? वसंत में भी 170 मील जाना आना कठिन है। शीत में प्रायः असंभव है।
प्राचीनकाल में शायद स्पीति भारतीय साम्राज्यों का अनाम अंग रही है। जब ये साम्राज्य टूटे तो यह स्वतंत्र रही है। फिर मध्य युग में प्रायः लद्दाख मंडल और कभी कश्मीर मंडल, कभी बुशहर मंडल, कभी कुल्लू मंडल, कभी ब्रिटिश भारत के तहत रही है। तब भी प्रायः स्वायत्त रही है। इसकी स्वायत्तता भूगोल ने सिरजी है। भूगोल ही इसकी रक्षा करता है। भूगोल ही इसका संहार भी करता है।
पहले कभी उन राजाओं का कोई हरकारा आता था तो उसके आते-जाते वह अल्प वसंत बीत जाता था। कभी कोई जोरावर सिंह जैसा आता था तो स्पीति का तरीका वही था जो तुपचिलिंग गोनपा में मैंने देखा। जब डाइनामाइट का विस्फोट हुआ तो लाहुली हदस कर, आँख बंदकर, चाँग्मा का तना पकड़ या एक-दूसरे को पकड़कर बैठ गए। जब धमाका गुज़र गया तो फिर डरते-डरते आँख खोल कर उठे। जोरावर सिंह के आक्रमण के समय स्पीति के लोग घर छोड़कर भाग गए। उसने स्पीति को और वहाँ के विहारों को लूटा। यह अप्रतिकार शायद स्पीति की सुरक्षा की पद्धति है।
स्पीति में जनसंख्या लाहुल से भी कम है। 1901 की जनगणना के अनुसार 3,231 रही है। 1971 की जनगणना के अनुसार 7,196 है। इसका क्षेत्रफल मुझे 1971 की जनगणना में लाहुल के साथ जोड़कर मिला है जो 12,015 वर्ग किलोमीटर है’। स्पीति का अलग क्षेत्रफल नहीं दिया गया है। इंपीरियल गजेटियर (ऑक्सफोर्ड, 1908, खंड 23) के अनुसार यह क्षेत्रफल 2.155 वर्गमील है। इस तरह स्पीति की जनसंख्या प्रति वर्गमील चार से भी कम है। 1901 में यह प्रति म है। 1901 में यह प्रति वर्गमील दो से भी कम थी।
लाहुल-स्पीति का प्रशासन ब्रिटिश राज से भारत को जस का तस मिला। अंग्रेजों को यह 1846 ई. में कश्मीर के राजा गुलाब सिंह के जरिए मिला। अंग्रेज इनके जरिए पश्चिमी तिब्बत के ऊन वाले क्षेत्र में प्रवेश चाहते थे। तिब्बत में अंग्रेजी साम्राज्य के दूरगामी हित भी थे। जो भी हो, 1846 में कुल्लू, लाहुल, स्पीति ब्रिटिश अधीनता में आए। पहले सुपरिंटेंडेंट के अधीन थे। फिर 1847 में वे काँगड़ा जिले में शरीक कर दिए गए। लद्दाख मंडल के दिनों में भी स्पीति का शासन एक नोनो द्वारा चलाया जाता था। ब्रिटिश भारत में भी कुल्लू के असिस्टेंट कमिश्नर के समर्थन से यह नोनो कार्य करता रहा। इसका अधिकार क्षेत्र केवल द्वितीय दरजे के मजिस्ट्रेट के बराबर था। लेकिन स्पीति के लोग इसे अपना राजा ही मानते थे। राजा नहीं है तो दमयंती जी को रानी मानते हैं।
1873 में स्पीति रेगुलेशन पास हुआ जिसके तहत लाहुल और स्पीति को विशेष दरजा दिया गया। ब्रिटिश भारत के अन्य कानून यहाँ नहीं लागू होते थे। रेगुलेशन के अधीन प्रशासन के अधिकार नोनो को दिए गए जिसमें मालगुजारी इकट्ठा करना और छोटे-छोटे फ़ौजदारी के मुकद्दमों का फ़ैसला करना भी शामिल था। उसके रूपर के मामले वह कमिश्नर के पास भेज देता था। उन दिनों लाहुल-काँगड़ा जिले के अंतर्गत कुल्लू तहसील में मिलता है। स्वराज्य 5/11 लाहुल-स्पीति पंजाब राज्य के अंतर्गत एक अलग जिला बना दिया गया जिसका केन्द्र केलंग में है। 1966 में जब हिमाचल प्रदेश राज्य बना तो लाहुल-स्पीति उसका उत्तरी छोर का जिला हो गया। यह देश का सबसे अधिक दुर्गम क्षेत्र है।
स्पीति 31.42 और 32.59 अक्षांश उत्तर और 77.26 और 78.42 पूर्व देशांतर के बीच स्थित है। यह चारों ओर से ऊँचे ऊँचे पहाड़ों का कैदी है। इन पहाड़ों की औसत ऊँचाई 18,000 फ़ीट है। यह पहाड़ उसे पूरब में तिब्बत, पश्चिम में लाहुल, दक्षिण में किन्नौर और उत्तर में लद्दाख से अलग करते हैं। इसकी मुख्य घाटी इसी नाम की स्पीति नदी की घाटी है। स्पीति पश्चिम हिमालय में लगभग 16,000 फ़ीट की ऊँचाई से निकल कर पूरब में तिब्बत में बहती है, वहाँ से स्पीति में आती है। स्पीति से बह कर पुराने रामपुर बुशहर राज्य में, अब किन्नौर जिले में बहती हुई सतलुज में मिलती है। मेरी इस स्पीति नदी से प्रीति है। स्पीति में मैं सिर्फ़ इसी नदी को पहचानता हूँ। सुनता हूँ कि कोई पारा नदी भी है, फिर घाटी है। स्पीति के अलावा पिन की घाटी प्रसिद्ध है। मान भाई से इसका किस्सा सुना है। अत्यंत बीहड़ और वीरान है। इनमें से शायद स्पीति की घाटी ही आबाद है। जैसी वह आबाद है वह आप देख ही रहे हैं। प्रति वर्गमील चार से भी कम लोग बसते हैं।
अचरज यह नहीं कि इतने कम लोग क्यों हैं? अचरज यह है कि इतने लोग भी कैसे बसे हुए हैं? मैंने जब भी स्पीति की विपत्ति बताई है तो लोगों ने यही पूछा कि आखिर तब लोग वहाँ रहते क्यों हैं? आठ-नौ महीने शेष दुनिया से कटे हुए हैं। ठंड में ठिठुर रहे हैं। सिर्फ़ एक फ़सल उगाते हैं। लकड़ी भी नहीं है कि घर गरम रख सकें। वृत्ति नहीं है। फिर क्यों रहते हैं? क्या अपने धर्म की रक्षा के लिए रहते हैं? अपनी जन्मभूमि के ममत्व के कारण रहते हैं? या इस मजबूरी में रहते हैं कि कहीं और जा नहीं सकते? कहाँ जाएँ? या फिर और बातों के साथ-साथ यह सब कारण हैं? मैं नहीं जानता। मैं तो इतना ही देखता हूँ कि यहाँ रह रहे हैं, इसलिए रह रहे हैं। और कोई तर्क नहीं है। तर्क से हम किसी चीज को भले सिद्ध कर सकें, स्पीति में रहने को नहीं सिद्ध कर सकते। लेकिन तर्क का इतना मोह क्यों? ज्यादा करके संसार और निर्वाण अतर्क्स है। तर्क के परे है।
स्पीति नदी के साथ-साथ मेरा थोड़ा परिचय स्पीति के पहाड़ों का भी है। स्पीति के पहाड़ लाहुल से ज्यादा ऊँचे, नंगे और भव्य हैं। इनके सिरों पर स्पीति के नर-नारियों का आर्तनाद जमा हुआ है। शिव का अट्टहास नहीं, हिम का आतनाद है | ठिठुरन है। गलन है। व्यथा है।
इस व्यथा की कथा इन पहाड़ों की ऊँचाई के आँकड़ों में नहीं कही जा सकती। फिर भी जो सुंदरता को इंच में मापने के अभ्यासी हैं वे भला पहाड़ को कैसे बख्श सकते हैं। वे यह जान लें कि स्पीति मध्य हिमालय की घाटी है। जिसे वे हिमालय जानते हैं- स्केटिंग, सौंदर्य प्रतियोगिता, आइसक्रीम और छोले-भटूरे का कुल्लू-मनाली, शिमला, मसूरी, नैनीताल, श्रीनगर वह सब हिमालय नहीं है। हिमालय का तलुआ है। शिवालिक या पीरपंचाल या ऐसा ही कुछ उसका नाम है यह तलहटी है। रोहतांग जोत के पार मध्य हिमालय है। इसमें ही लाहुल-स्पीति की घाटियाँ हैं। इन घाटियों की औसत ऊँचाई नापी गई है। श्री कनिंघम के अनुसार लाहुल की समुद्र की सतह से ऊँचाई 10,535 फीट है। स्पीति की 12,986 फीट है। यानी लगभग 13,000 फ्रीट तो औसत ऊँचाई है।
मध्य हिमालय की जो श्रेणियाँ स्पीति को घेरे हुए हैं उनमें से जो उत्तर में हैं उसे बारालाचा श्रेणियों का विस्तार समझें। बारालाचा दरें की ऊँचाई का अनुमान 16.221 फीट से लगाकर 16,500 फ़ीट का लगाया गया है। इस पर्वत श्रेणी में दो चोटियों की ऊँचाई 21,000 फ़ीट से अधिक है। दक्षिण में जो श्रेणी है वह माने श्रेणी कहलाती है। इसका क्या अर्थ है? कहीं यह बौद्धों के माने मंत्र के नाम पर तो नहीं है? “ओं मणि पद्म हुं”* इनका बीज मंत्र है इसका बड़ा महात्म्य है। इसे संक्षेप में माने कहते हैं। कहीं इस श्रेणी का नाम इस माने के नाम पर तो नहीं है? अगर नहीं है तो करने जैसा है। यहाँ इन पहाड़ियों में माने का इतना जाप हुआ है कि यह नाम उन श्रेणियों को दे डालना ही सहज है।
इंपीरियल गजेटियर में माने श्रेणी की ऊँचाई 21,646 फ़ीट बताई गई है। यह तो इस श्रेणी की किसी चोटी की ऊँचाई होगी। पूरी श्रेणी की ऊँचाई तो एक नहीं होगी। इसमें जो छोटी-छोटी चोटियाँ हैं उनकी ऊँचाई भी 17,000 फ़ीट से अधिक है। कई गाँव समुद्र की सतह से 13,000 फ़ीट से ऊँचे बसे हैं। एक या दो 14,000 फ़ीट की ऊँचाई पर हैं। यह मध्य हिमालय है। इसमें स्पीति स्थित है।
इसके पार बाह्य हिमालय दीखता है। इसकी एक चोटी 23,064 फ़ीट ऊँची बताई जाती है। इसमें कई चोटियाँ 20,000 फ़ीट से अधिक ऊँची हैं।
न इनसे होड़ लगाने के पश्थ में हैं। तह मैं ऊँचाई के माप के चक्कर में नहीं हूँ। एक बार लोसर में जो कर लिया सो बस है। इन ऊँचाइयों से होत हाँ, कभी-कभी उनका मान-मर्दन करना मर्द और औरत की शान कि देश और दुनिया के मैदानों से और पहाड़ों से युवक-युवतियाँ आएँ और पहले तो स्वयं अपने अहंकार को गलाएँ फिर इन चोटियों के अहंकार को चूर करें। उस आनंद का अनुभव करें जो साहस और कूवत से यौवन में ही प्राप्त होता है। अहंकार का ही मामला नहीं है। ये माने की चोटियाँ बूढ़े लामाओं के जाप से उदास हो गई हैं। युवक-युवतियाँ किलोल करें तो यह भी हर्षित हों। अभी तो इन पर स्पीति का आर्तनाद जमा हुआ है। वह इस युवा अट्टहास की गरमी से कुछ तो पिघले। यह एक युवा निमंत्रण है।
लाहुल की तरह ही स्पीति में भी दो ही ऋतुएँ होती हैं। कहीं मैंने षड्ऋतुओं का बखान किया है। वह अभ्यास दोष के कारण है। यहाँ जून से सितंबर तक की एक अल्पकालिक वसंत ऋतु है, शेष वर्ष शीत ऋतु होती है। वसंत में, जुलाई में औसत तापमान 15 सेंटीग्रेड और शीत में, जनवरी में औसत तापमान 8° रिकार्ड किया गया है। औसत से कुछ अंदाज नहीं लगता। वसंत में दिन गरम होता है, रात ठंडी होती है। शीत में क्या होता है? इसकी कल्पना ही की जा सकती है। कभी रहकर देखा जा सकता है।
स्पीति में वसंत लाहुल से भी कम दिनों का होता है। वसंत में भी यहाँ फूल नहीं खिलते, न हरियाली आती है, न वह गंध होती है। दिसंबर से घाटी में फिर बरफ्र पड़ने लगती है। अप्रैल-मई तक रहती है। यहाँ ठंडक भी लाहुल से ज्यादा पड़ती है। नदी-नाले सब जम जाते हैं और हवाएँ तेज चलती हैं। मुँह, हाथ और जो खुले अंग हैं उनमें जैसे शूल की तरह चुभती हैं।
स्पीति में लाहुल से भी कम वर्षा होती है। मध्य हिमालय मानसून की पहुँच के परे है। यहाँ बरखा बहार नहीं है। कालिदास को अपने ‘ऋतु संहार’ में यहाँ वर्षा का तो संहार ही करना पड़ेगा। कालिदास में वर्षा का क्या ठाठ है? यह वर्षा वर्णन इस प्रकार शुरू होता है: प्रिये! जल की फुहारों से भरे बादलों के मतवाले हाथी पर चढ़ा हुआ, चमकती हुई बिजलियों की झंडियों को फहराता हुआ और बादलों की गरज के नगाड़े बजाता हुआ यह कामीजनों का प्रिय पावस राजाओं का-सा ठाट-बाट बनाकर आ पहुँचा।
यह पावस यहाँ नहीं पहुँचता है। कालिदास की वर्षा की शोभा विंध्याचल में है। हिमाचल की इन मध्य की घाटियों में नहीं है। मैं नहीं जानता कि इसका लालित्य लाहुल-स्पीति के नर-नारी समझ भी पाएँगे या नहीं। वर्षा उनके संवेदन का अंग नहीं है। वह यह जानते नहीं हैं कि ‘बरसात में नदियाँ बहती हैं, बादल बरसते, मस्त हाथी चिंघाड़ते हैं, जंगल हरे-भरे हो जाते हैं, अपने प्यारों से बिछुड़ी हुई स्त्रियाँ रोती कलपती हैं, मोर नाचते हैं और बंदर चुप मारकर गुफाओं में जा छिपते हैं।’
अगर कालिदास यहाँ आकर कहें कि ‘अपने बहुत से सुंदर गुणों से सुहानी लगने वाली, स्त्रियों का जी खिलाने वाली, पेड़ों की टहनियों और बेलों की सच्ची सखी तथा सभी जीवों का प्राण बनी हुई वर्षा ऋतु आपके मन की सब साधे पूरी करें’ तो शायद स्पीति के नर-नारी यही पूछेंगे कि यह देवता कौन है? कहाँ रहता है? यहाँ क्यों नहीं आता?
स्पीति में कभी-कभी बारिश होती है। वर्षा ऋतु यहाँ मन की साध पूरी नहीं करती। धरती सूखी, ठंडी और वंध्या रहती है।
स्पीति में साल में एक फ़सल होती है। मुख्य फ़सलें हैं: दो किस्म का जौ, गेहूँ, मटर और सरसों। इसमें भी जौ मुख्य है। सिंचाई का साधन पहाड़ों से आ रहे नाले हैं या उनपर बनाए कूल हैं। ये नालियाँ पहाड़ों के किनारे-किनारे बहुत दूर तक जाती हैं। स्पीति नदी का तट इतना चौड़ा है कि इसका पानी किसी काम में नहीं आ पाता। स्पीति में ऐसी भूमि बहुत है जो खेती के लायक बनाई जा सकती है। शर्त इतनी है कि इसके लिए स्पीति में जल उलीचा जाए। या फिर पानी का कोई और स्रोत पहुँचाया जाए। स्पीति में कोई फल नहीं होता। मटर और सरसों को छोड़कर कोई सब्जी नहीं होती। शायद ऊँचाई, वायुमंडल के दबाव में कमी, ठंड की अधिकता, वर्षा की कमी वगैरह के कारण यहाँ पेड़ नहीं होते। इसलिए स्पीति विशेषकर नंगी और वीरान है।
वर्षा यहाँ एक घटना है। एक सुखद संयोग है। हम काजा के डाक बंगले में सो रहे थे तो लगा कि कोई खिड़की खड़का रहा है। आधी रात का भी पिछला पहर है। इस समय कौन है? लैंप की लौ तेज की खिड़की का एक पल्ला खोला। तो तेज हवा का झोंका मुँह और हाथ को जैसे छीलने लगा। मैंने पल्ला भिड़ा दिया। उसकी आड़ से देखने लगा। देखा कि बारिश हो रही थी। मैं उसे देख नहीं रहा था। सुन रहा था। अँधेरा, ठंड और हवा का झोंका आ रहा था। जैसे बरफ़ का अंश लिए तुषार जैसी बूँदें पड़ रही थीं। जैसे नगाड़े पर थाप पड़ रही थी। दुगछेन को हवा बजा रही थी। महाशंख की ध्वनि घाटी में तैर रही थी। स्पीति की घाटी में वर्षा हो रही थी। कमरे में ठंड बढ़ रही थी। मैं बिस्तर में पड़ा-पड़ा मालूम नहीं कब सो गया।
के लोग सुबह उठा। चाय पीते-पीते सुना कि स्पीति के लोग कह रहे हैं कि हमारी यात्रा शुभ है। स्पीति में बहुत दिनों बाद बारिश हुई है।
अभ्यास के प्रश्न ( स्पीति में बारिश )
प्रश्न 1 — इतिहास में स्पीति का वर्णन नहीं मिलता | क्यों?
उत्तर — स्पीति हिमाचल की पहाड़ियों में एक ऐसा दुर्गम स्थल है जहाँ पहुँचना सामान्य लोगों के वश में नहीं है। संचार माध्यमों एवं आवागमन के साधनों का अभाव है। अतः यहाँ दूसरे देशों की जानकारी नहीं होती। स्पीति का भूगोल अलंघ्य है। साल में आठ-नौ महीने बरफ़ रहती है तथा यह संसार से कटा रहता है। दुर्गम स्थान के कारण किसी राजा ने यहाँ हमला नहीं किया इसका जिक्र सिर्फ राज्यों के साथ जुड़े रहने पर ही आता है। मानवीय गतिविधियों के अभाव के कारण यहाँ इतिहास नहीं बना। यह क्षेत्र प्रायः स्वायत्त ही रहा है।
प्रश्न 2– स्पीति के लोग जीवन-यापन के लिए किन कठिनाइयों का सामना करते हैं?
उत्तर — स्पीति का जीवन बहुत कठोर है। यहाँ लंबी शीत ऋतु होती है। आठ-नौ महीने यह क्षेत्र शेष विश्व से कटा रहता है। यहाँ जलाने के लिए लकड़ी भी नहीं होती। लोग ठंड से ठिठुरते रहते हैं। यहाँ न हरियाली है और न ही पेड़। यहाँ पर्याप्त वर्षा भी नहीं होती। यहाँ साल में एक ही फसल उगा सकते हैं। जौ, गेहूँ, मटर व सरसों के अलावा दूसरी फसल नहीं हो सकती। किसी प्रकार का फल व सब्जियाँ पैदा नहीं होतीं। यहाँ रोजगार के साधन नहीं हैं। यहाँ की जमीन खेती योग्य है, परंतु सिंचाई के साधन विकसित नहीं हैं। अतः यहाँ के लोग अत्यंत जटिल परिस्थिति में रहते हैं।
प्रश्न 3 — लेखक माने श्रेणी का नाम बौद्धों के माने तंत्र के नाम पर करने के पक्ष में क्यों हैं?
उत्तर — लेखक को पूरा विश्वास है कि माने श्रेणी का नामकरण बौद्धों के माने मंत्र के नाम पर ही हुआ है। बौद्धों के माने मंत्र का महात्म्य है। “ओं मणि पद्म हूं” मंत्र का जाप बहुत अधिक हुआ है। इसलिए लेखक माने श्रेणी का नाम बौद्धों के माने तंत्र के नाम पर करने के पक्ष में हैं।
प्रश्न 4– “ये माने की चोटियाँ बूढ़े लामाओं के जाप से उदास हो गई हैं” – इस पंक्ति के माध्यम से लेखक ने युवा वर्ग से क्या आग्रह किया है?
उत्तर — माने की चोटियों पर बड़ी उम्र के बौद्ध लामा निवास करते हैं जो माने मंत्रों का जाप करते हैं। इनके तप करने से चोटियों में गंभीर और उदासी का वातावरण बन गया है। यहाँ चहल-पहल तथा ख़ुशी का माहौल नहीं दिखाई देता । इसलिए लेखक ने युवाओं से आग्रह किया है कि वे आगे आएँ तथा खेल और गतिविधियों को बढ़ावा दें। जिससे यहाँ प्रसन्नता और हर्ष का संचार हो सके |
प्रश्न 5 — वर्षा यहाँ एक घटना है, एक सुखद संयोग है- लेखक ने ऐसा क्यों कहा है?
उत्तर — स्पीति में वर्षा नहीं होती। वहाँ के लोग वर्षा की आनंददायक स्थितियों से अनभिज्ञ हैं। यहाँ वर्षा ऋतु मन की साध पूरी नहीं करती। यहाँ की धरती सूखी, ठंडी और वंध्या रहती है। स्पीति में साल में केवल एक फ़सल होती है। सिंचाई का साधन है-पहाड़ों से आ रहे नाले। उपजाऊ और खेती के योग्य धरती का तो यहाँ अभाव नहीं है, परंतु वर्षा नहीं होती। वर्षा यहाँ के लोगों के लिए एक घटना है। इसीलिए लेखक ने इसे एक सुखद संयोग माना है। स्पीति की यात्रा के दौरान वहाँ की वर्षा देखने का सौभाग्य भी लेखक को मिला था। स्थानीय लोगों ने भी इसी कारण लेखक की यात्रा को शुभ कहा था।
प्रश्न 6 — स्पीति अन्य पर्वतीय स्थलों से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर — स्पीति अन्य पर्वतीय स्थलों से बहुत भिन्न हैं; जैसे-
(क) स्पीति के पहाड़ों की ऊँचाई 13000 से 21,000 फीट तक की है। ये अत्यंत दुर्गम हैं।
(ख) यहाँ के दरें बहुत ऊँचे व दुर्गम हैं।
(ग) यहाँ साल में आठ-नौ महीने बर्फ जमी रहती है तथा रास्ते बंद हो जाते हैं।
(घ) यहाँ वर्षा नहीं होती तथा पेड़ व हरियाली का नामोनिशान नहीं है।
(ङ) हुए ह फल हता है उसे भोज मर सों आदमुवा है फ्लए समय या उन नाह होती हैं।
(च) यहाँ सिर्फ दो ऋतुएँ होती हैं-वसंत व शीत ऋतु।
(छ) यहाँ परिवहन व संचार का कोई साधन नहीं।
(ज) यहाँ आबादी बेहद कम है। यहाँ प्रति किलोमीटर चार व्यक्ति रहते हैं।
(झ) यहाँ पर्यटक नहीं आते। अतः यहाँ का वातावरण उदास रहता है |
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