कक्षा 11 की हिंदी की पाठ्य-पुस्तक 'वितान भाग 1' में संकलित ''भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर ( कुमार गंधर्व) का मूल पाठ अभ्यास के प्रश्नों सहित |
Bhartiya Gayikaon Mein Bejod : Lata Mangeshkar ( Kumar Gandharv )
बरसों पहले की बात है। मैं बीमार था। उस बीमारी में एक दिन मैंने सहज ही रेडियो लगाया और अचानक एक अद्वितीय स्वर मेरे कानों में पड़ा। स्वर सुनते ही मैंने अनुभव किया कि यह स्वर कुछ विशेष है, रोज़ का नहीं। यह स्वर सीधे मेरे कलेजे से जा भिड़ा। मैं तो हैरान हो गया। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि यह स्वर किसका है। मैं तन्मयता से सुनता ही रहा। गाना समाप्त होते ही गायिका का नाम घोषित किया गया—लता मंगेशकर। नाम सुनते ही मैं चकित हो गया। मन-ही-मन एक संगति पाने का भी अनुभव हुआ। सुप्रसिद्ध गायक दीनानाथ मंगेशकर की अजब गायकी एक दूसरा स्वरूप लिए उन्हीं की बेटी की कोमल आवाज़ में सुनने का अनुभव हुआ।
मुझे लगता है ‘बरसात’ के भी पहले के किसी चित्रपट का वह कोई गाना था। तब से लता निरंतर गाती चली आ रही है और मैं भी उसका गाना सुनता आ रहा हूँ। लता के पहले प्रसिद्ध गायिका नूरजहाँ का चित्रपट संगीत में अपना ज़माना था। परंतु उसी क्षेत्र में बाद में आई हुई लता उससे कहीं आगे निकल गई। कला के क्षेत्र में ऐसे चमत्कार कभी-कभी दीख पड़ते हैं। जैसे प्रसिद्ध सितारिये विलायत ख़ाँ अपने सितारवादक पिता की तुलना में बहुत ही आगे चले गए।
मेरा स्पष्ट मत है कि भारतीय गायिकाओं में लता के जोड़ की गायिका हुई ही नहीं। लता के कारण चित्रपट संगीत को विलक्षण लोकप्रियता प्राप्त हुई है, यही नहीं लोगों का शास्त्रीय संगीत की ओर देखने का दृष्टिकोण भी एकदम बदला है। छोटी बात कहूँगा। पहले भी घर-घर छोटे बच्चे गाया करते थे पर उस गाने में और आजकल घरों में सुनाई देने वाले बच्चों के गाने में बड़ा अंतर हो गया है। आजकल के नन्हें-मुन्ने भी स्वर में गुनगुनाते हैं। क्या लता इस जादू का कारण नहीं है? कोकिला का स्वर निरंतर कानों में पड़ने लगे तो कोई भी सुनने वाला उसका अनुकरण करने का प्रयत्न करेगा। ये स्वाभाविक ही है। चित्रपट संगीत के कारण सुंदर स्वर मालिकाएँ1 लोगों के कानों पर पड़ रही हैं। संगीत के विविध प्रकारों से उनका परिचय हो रहा है। उनका स्वर-ज्ञान बढ़ रहा है। सुरीलापन क्या है, इसकी समझ भी उन्हें होती जा रही है। तरह-तरह की लय के भी प्रकार उन्हें सुनाई पड़ने लगे हैं और आकारयुक्त लय के साथ उनकी जान-पहचान होती जा रही है। साधारण प्रकार के लोगों को भी उसकी सूक्ष्मता समझ में आने लगी है। इन सबका श्रेय लता को ही है। इस प्रकार उसने नई पीढ़ी के संगीत को संस्कारित किया है और सामान्य मनुष्य में संगीत विषयक अभिरुचि पैदा करने में बड़ा हाथ बँटाया है। संगीत की लोकप्रियता, उसका प्रसार और अभिरुचि के विकास का श्रेय लता को ही देना पड़ेगा।
सामान्य श्रोता को अगर आज लता की ध्वनिमुद्रिका2 और शास्त्रीय गायकी3 की ध्वनिमुद्रिका सुनाई जाए तो वह लता की ध्वनिमुद्रिका ही पसंद करेगा। गाना कौन से राग में गाया गया और ताल कौन-सा था, यह शास्त्रीय ब्योरा इस आदमी को सहसा मालूम नहीं रहता। उसे इससे कोई मतलब नहीं कि राग मालकोस4 था और ताल त्रिताल5। उसे तो चाहिए वह मिठास, जो उसे मस्त कर दे, जिसका वह अनुभव कर सके और यह स्वाभाविक ही है। क्योंकि जिस प्रकार मनुष्यता हो तो वह मनुष्य है, वैसे ही ‘गानपन’6 हो तो वह संगीत है। और लता का कोई भी गाना लीजिए तो उसमें शत-प्रतिशत यह ‘गानपन’ मौजूद मिलेगा।
लता की लोकप्रियता का मुख्य मर्म यह ‘गानपन’ ही है लता के गाने की एक और विशेषता है, उसके स्वरों की निर्मलता। उसके पहले की पार्श्व गायिका नूरजहाँ भी एक अच्छी गायिका थी, इसमें संदेह नहीं तथापि उसके गाने में एक मादक उत्तान दीखता था। लता के स्वरों में कोमलता और मुग्धता है। ऐसा दीखता है कि लता का जीवन की ओर देखने का जो दृष्टिकोण है वहीं उसके गायन की निर्मलता में झलक रहा है। हाँ, संगीत दिग्दर्शकों ने उसके स्वर की इस निर्मलता का जितना उपयोग कर लेना चाहिए था, उतना नहीं किया। मैं स्वयं संगीत दिग्दर्शक होता तो लता को बहुत जटिल काम देता, ऐसा कहे बिना रहा नहीं जाता।
लता के गाने की एक और विशेषता है, उसका नादमय उच्चार। उसके गीत के किन्हीं दो शब्दों का अंतर स्वरों के आलाप द्वारा बड़ी सुंदर रीति से भरा रहता है और ऐसा प्रतीत होता है कि वे दोनों शब्द विलीन होते-होते एक दूसरे में मिल जाते हैं। यह बात पैदा करना बड़ा कठिन है, परंतु लता के साथ यह बात अत्यंत सहज और स्वाभाविक हो बैठी है।
ऐसा माना जाता हैं कि लता के गाने में करुण रस विशेष प्रभावशाली रीति से व्यक्त होता है, पर मुझे ख़ुद यह बात नहीं पटती। मेरा अपना मत है कि लता ने करुण रस के साथ उतना न्याय नहीं किया है। बजाए इसके, मुग्ध शृंगार की अभिव्यक्ति करने वाले मध्य या द्रुतलय7 के गाने लता ने बड़ी उत्कटता से गाए हैं। मेरी दृष्टि से उसके गायन में एक और कमी है; तथापि यह कहना कठिन होगा कि इसमें लता का दोष कितना है और संगीत दिग्दर्शकों का दोष कितना। लता का गाना सामान्यतः ऊँची पट्टी8 में रहता है। गाने में संगीत दिग्दर्शक उसे अधिकाधिक ऊँची पट्टी में गवाते हैं और उसे अकारण ही चिलवाते हैं।
एक प्रश्न उपस्थित किया जाता है कि शास्त्रीय संगीत में लता का स्थान कौन-सा है। मेरे मत से यह प्रश्न ख़ुद ही प्रयोजनहीन है। उसका कारण यह है कि शास्त्रीय संगीत और चित्रपट संगीत में तुलना हो ही नहीं सकती। जहाँ गंभीरता शास्त्रीय संगीत का स्थायीभाव है वहीं जलदलय 9 और चपलता चित्रपट संगीत का मुख्य गुणधर्म है। चित्रपट संगीत का ताल प्राथमिक अवस्था का ताल होता है, जबकि शास्त्रीय संगीत में ताल अपने परिष्कृत रूप में पाया जाता है। चित्रपट संगीत में आधे तालों का उपयोग किया जाता है। उसकी लयकारी बिलकुल अलग होती है, आसान होती है। यहाँ गीत और आघात को ज़्यादा महत्व दिया जाता है। सुलभता और लोच10 को अग्र स्थान दिया जाता है; तथापि चित्रपट संगीत गाने वाले को शास्त्रीय संगीत की उत्तम जानकारी होना आवश्यक है और वह लता के पास निःसंशय है। तीन-साढ़े तीन मिनट के गाए हुए चित्रपट के किसी गाने का और एकाध ख़ानदानी शास्त्रीय गायक की तीन-साढ़े तीन घंटे की महफ़िल, इन दोनों का कलात्मक और आनंदात्मक मूल्य एक ही है, ऐसा मैं मानता हूँ। किसी उत्तम लेखक का कोई विस्तृत लेख जीवन के रहस्य का विशद् रूप में वर्णन करता है तो वही रहस्य छोटे से सुभाषित का या नन्हीं-सी कहावत में सुंदरता और परिपूर्णता से प्रकट हुआ भी दृष्टिगोचर होता है। उसी प्रकार तीन घंटों की रंगदार महफ़िल का सारा रस लता की तीन मिनट की ध्वनिमुद्रिका में आस्वादित किया जा सकता है। उसका एक-एक गाना एक संपूर्ण कलाकृति होता है। स्वर, लय, शब्दार्थ का वहाँ त्रिवेणी संगम होता है और महफ़िल की बेहोशी उसमें समाई रहती है। वैसे देखा जाए तो शास्त्रीय संगीत क्या और चित्रपट संगीत क्या, अंत में रसिक को आनंद देने की सामर्थ्य किस गाने में कितना है, इस पर उसका महत्व ठहराना उचित है। मैं तो कहूँगा कि शास्त्रीय संगीत भी रंजक न हो, तो बिलकुल ही नीरस ठहरेगा। अनाकर्षक प्रतीत होगा और उसमें कुछ कमी-सी प्रतीत होगी। गाने में जो गानपन प्राप्त होता है, वह केवल शास्त्रीय बैठक के पक्केपन की वजह से ताल सुर के निर्दोष ज्ञान के कारण नहीं। गाने की सारी मिठास, सारी ताक़त उसकी रंजकता पर मुख्यतः अवलंबित रहती है और रंजकता का मर्म रसिक वर्ग के समक्ष कैसे प्रस्तुत किया जाए, किस रीति से उसकी बैठक बिठाई जाए और श्रोताओं से कैसे सुसंवाद साधा जाए, इसमें समाविष्ट है। किसी मनुष्य का अस्थिपंजर और एक प्रतिभाशाली कलाकार द्वारा उसी मनुष्य का तैलचित्र11, इन दोनों में जो अंतर होगा वही गायन के शास्त्रीय ज्ञान और उसकी स्वरों द्वारा की गई सुसंगत अभिव्यक्ति में होगा।
संगीत के क्षेत्र में लता का स्थान अव्वल दरजे के ख़ानदानी गायक के समान ही मानना पड़ेगा। क्या लता तीन घंटों की महफ़िल जमा सकती है, ऐसा संशय व्यक्त करने वालों से मुझे भी एक प्रश्न पूछना है, क्या कोई पहली श्रेणी का गायक तीन मिनट की अवधि में चित्रपट का कोई गाना उसकी इतनी कुशलता और रसोत्कटता से गा सकेगा? नहीं, यही उस प्रश्न का उत्तर उन्हें देना पड़ेगा? ख़ानदानी गवैयों का ऐसा भी दावा है कि चित्रपट संगीत के कारण लोगों की अभिरुचि बिगड़ गई है। चित्रपट संगीत ने लोगों के ‘कान बिगाड़ दिए’ ऐसा आरोप लगाया जाता है। पर मैं समझता हूँ कि चित्रपट संगीत ने लोगों के कान ख़राब नहीं किए हैं, उलटे सुधार दिए। हैं। ये विचार पहले ही व्यक्त किए हैं और उनकी पुनरूक्ति नहीं करूँगा।
सच बात तो यह है कि हमारे शास्त्रीय गायक बड़ी आत्मसंतुष्ट वृत्ति के हैं। संगीत के क्षेत्र में उन्होंने अपनी हुकुमशाही स्थापित कर रखी है। शास्त्र-शुद्धता के कर्मकांड को उन्होंने आवश्यकता से अधिक महत्व दे रखा है। मगर चित्रपट संगीत द्वारा लोगों की अभिजात्य संगीत से जान-पहचान होने लगी है। उनकी चिकित्सक और चौकस वृत्ति अब बढ़ती जा रही है। केवल शास्त्र-शुद्ध और नीरस गाना उन्हें नहीं चाहिए, उन्हें तो सुरीला और भावपूर्ण गाना चाहिए। और यह क्रांति चित्रपट संगीत ही लाया है। चित्रपट संगीत समाज की संगीत विषयक अभिरुचि में प्रभावशाली मोड़ लाया है। चित्रपट संगीत की लचकदारी उसका एक और सामर्थ्य है, ऐसा मुझे लगता है। उस संगीत की मान्यताएँ, मर्यादाएँ, झंझटें सब कुछ निराली हैं। चित्रपट संगीत का तंत्र ही अलग है। यहाँ नवनिर्मिति की बहुत गुंजाइश है। जैसा शास्त्रीय रागदारी का चित्रपट संगीत दिग्दर्शकों ने उपयोग किया, उसी प्रकार राजस्थानी, पंजाबी, बंगाली, प्रदेश के लोकगीतों के भंडार को भी उन्होंने ख़ूब लूटा है, यह हमारे ध्यान में रहना चाहिए। धूप का कौतुक करने वाले पंजाबी लोकगीत, रूक्ष और निर्जल राजस्थान में पर्जन्य12 की याद दिलाने वाले गीत पहाड़ों की घाटियों, खोरों में प्रतिध्वनित होने वाले पहाड़ी गीत, ऋतुचक्र समझाने वाले और खेती के विविध कामों का हिसाब लेने वाले कृषिगीत और ब्रजभूमि में समाविष्ट सहज मधुर गीतों का अतिशय मार्मिक व रसानुकूल उपयोग चित्रपट क्षेत्र के प्रभावी संगीत दिग्दर्शकों ने किया है और आगे भी करते रहेंगे। थोड़े में कहूँ तो संगीत का क्षेत्र ही विस्तीर्ण है। वहाँ अब तक अलक्षित, असंशोधित और अदृष्टिपूर्व ऐसा ख़ूब बड़ा प्रांत है तथापि बड़े जोश से इसकी खोज और उपयोग चित्रपट के लोग करते चले आ रहे हैं। फलस्वरूप चित्रपट संगीत दिनोंदिन अधिकाधिक विकसित होता जा रहा है।
ऐसे इस चित्रपट संगीत क्षेत्र की लता अनभिषिक्त 13 सम्राज्ञी है। और भी कई पार्श्व गायक-गायिकाएँ हैं, पर लता की लोकप्रियता इन सभी से कहीं अधिक है। उसकी लोकप्रियता के शिखर का स्थान अचल है। बीते अनेक वर्षों से वह गाती आ रही है और फिर भी उसकी लोकप्रियता अबाधित है। लगभग आधी शताब्दी तक जन-मन पर सतत प्रभुत्व रखना आसान नहीं है। ज़्यादा क्या कहूँ, एक राग भी हमेशा टिका नहीं रहता। भारत के कोने-कोने में लता का गाना जा पहुँचे, यही नहीं परदेस में भी उसका गाना सुनकर लोग पागल हो उठे, यह क्या चमत्कार नहीं है? और यह चमत्कार हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं।
ऐसा कलाकार शताब्दियों में शायद एक ही पैदा होता है। ऐसा कलाकार आज हम सभी के बीच है, उसे अपनी आँखों के सामने घूमता-फिरता देख पा रहे हैं। कितना बड़ा है हमारा भाग्य!
अभ्यास के प्रश्न
प्रश्न 1 – लेखक ने पाठ में गानपन का उल्लेख किया है। पाठ के संदर्भ में स्पष्ट करते हुए बताएँ कि आपके विचार में इसे प्राप्त करने के लिए किस प्रकार के अभ्यास की आवश्यकता है?
उत्तर – ‘गानपन’ का मतलब है- गायन में कितनी मिठास और मस्ती है और इसका शाब्दिक अर्थ है – वह गायकी जो एक आम इंसान को भी भाव-विभोर कर दे। वास्तव में, यह कला लता जी में थी। गीत को गाने में मन की गहराइयों से भाव पिरोए जाएँ, यही उनका प्रयास रहता था। लता जी के गीतों में मस्ती और मिठास शत-प्रतिशत भरी हुई थी और यही उनकी लोकप्रियता का कारण रहा है। जिस प्रकार मनुष्य को मनुष्य कहने के लिए ‘मानवता’ नामक गुण का होना अनिवर्य हैं, उसी तरह गीत में ‘गानपन’ का होना अति आवश्यक हैं तभी इसे संगीत कहा जाता है। ‘लता जी की लोकप्रियता का मुख्य कारण यही गानपन था। यह गुण अपनी गायकी में लाने के लिए गायक को भरपूर रियाज़ करना चाहिए। साथ ही गीत के बोल, स्वरों के साथ-साथ भावों में भी पिरोए जाने चाहिए। गानों में गानपन के लिए स्वरों का उचित ज्ञान के साथ-साथ स्पष्टता व निर्मलता भी होनी चाहिए। स्वरों का जितना स्पष्ट व निर्मल उच्चारण होगा, संगीत उतना ही मधुर होगा। गाने में रस के अनुसार लय और ताल होना आवश्यक है। श्रोताओं को गाने का स्वर और अर्थ स्पष्ट रूप से समझ आना चाहिए। स्वर, लय, ताल, उच्चारण आदि का सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त कर उनको अपने संगीत में उतारने का प्रयास करना चाहिए।
प्रश्न 2 – लेखक ने लता की गायकी की किन विशेषताओं को उजागर किया है? आपको लता की गायकी में कौन-सी विशेषताएँ नज़र आती हैं? उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर – भारत में लता जी को स्वर कोकिला कहा जाता है। उनकी गायकी की क्षमता से लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे। लेखक ने लता की गायकी की निम्नलिखित विशेषताओं को उजागर किया है :
(1) सुरीलापन – लता के गायन में सुरीलापन था। उनके स्वर में अद्भुत मिठास, तन्मयता, मस्ती, लोच आदि था। उनका उच्चारण मधुर पूँज से परिपूर्ण रहता था।
(2) स्वरों की निर्मलता – लता के स्वरों में निर्मलता थी। लता का जीवन की ओर देखने का जो दृष्टिकोण था, वही उसके गायन की निर्मलता में झलकता था।
(3) कोमलता – लता के स्वरों में कोमलता व मुग्धता थी। इसके विपरीत नूरजहाँ के गायन में मादक उत्तान दिखता था।
(4) स्पष्ट उच्चारण – लेखक ने लता जी की गायन की एक और विशेषता का वर्णन करते हुए बताया है कि उनके गायन में स्पष्ट उच्चारण का प्रभाव नजर आता था।
(5) शास्त्रीय शुद्धता – लता जी शास्त्रीय शुद्धता में भी पारंगत थी। मधुर आवाज होने के साथ-साथ उनके अंदर गीत रंजकता का गुण भी पाया जाता था। गायन के क्षेत्र में लता मंगेशकर को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। उन्होंने बहुत से प्रकार के गीत गाये हैं। लता जी की आवाज इतनी मधुर थी कि किसी को भी अपनी और खींचने की क्षमता रखती थी। ये भारत की सर्वश्रेष्ठ गायिकाओं में से एक है।
हमें लता की गायकी में उपर्युक्त सभी विशेषताएँ नजर आती हैं। उन्होंने भक्ति, देशप्रेम, श्रृंगार, विरह आदि हर भाव के गीत गाए हैं। उनका हर गीत लोगों के मन को छू लेता है। वे गंभीर या अनहद गीतों को सहजता से गा लेती थी। एक तरफ ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत से सारा देश भावुक हो उठता है तो दूसरी तरफ ‘दिलवाले दुल्हनियाँ ले जाएंगे’ फ़िल्म के अल्हड़ गीत युवाओं को मस्त करते हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि लता मंगेशकर गायन क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ है और उनका कोई जोड़ नहीं है।
प्रश्न 3 – लता ने करुण रस के गानों के साथ न्याय नहीं किया है, जबकि श्रृंगारपरक गाने वे बड़ी उत्कटता से गाती हैं। इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं?
उत्तर – लेखक का यह कथन पूरी तरह से सत्य प्रतीत नहीं होता। यह संभव है कि किसी विशेष चित्रपट में लता ने करुण रस के गीतों के साथ न्याय नहीं किया हो, किंतु सभी चित्रपटों पर यह बात लागू नहीं होती। लता ने कई चित्रपटों में अपनी आवाज़ दी है तथा उनमें करुण रस के गीत बड़ी मार्मिकता व रसोत्कटता के साथ गाए हैं। उनकी वाणी में एक स्वाभाविक करुणा विद्यमान थी। उनके स्वरों में करुणा छलकती-सी प्रतीत होती थी। फ़िल्म ‘रुदाली’ में उनका ‘दिल-हुँ-हुँ करे…….’ गीत विरही जनों के हृदयों को उत्कंठित ही नहीं करता अपितु अपनी मार्मिकता से हृदय को बींध-सा देता है। इसी प्रकार अन्य कई चित्रपटों पर भी यह बात लागू होती है। अत: यह नहीं कहा जा सकता है कि लता जी केवल श्रृंगार के गीत ही भली प्रकार गा सकती थी। वे सभी गीतों को समान रसमयता के साथ गा सकती थी।
प्रश्न 4 – संगीत का क्षेत्र ही विस्तीर्ण है। वहाँ अब तक अलक्षित असंशोधित और अदृष्टिपूर्व ऐसा खूब बड़ा प्रांत है, तथापि बड़े जोश से इसकी खोज और उपयोग चित्रपट के लोग करते चले आ रहे हैं – इस कथन को वर्तमान फ़िल्मी संगीत के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – भारतीय संगीत शास्त्र बहुत प्राचीन है। इसमें वैदिक काल से ही नाना प्रकार के प्रयोग होते रहे हैं। इतनी प्राचीन परंपरा होने के कारण उसका क्षेत्र भी बहुत विशाल हैं। इसके अतिरिक्त भारतीय संस्कृति भी बहुरंगी संस्कृति है। इसमें केवल भारतीय ही नहीं अपितु विदेशों से आने वाली संस्कृतियों का भी समावेश समय-समय पर होता रहा है। आज भी संगीत में नए-नए प्रयोग होते देखे जा सकते हैं। शास्त्रीय व लोकसंगीत की परंपरा आज भी निरंतर चल रही है, किंतु उनमें नाना प्रकार के प्रयोग करके संगीत को नया आयाम आज की फ़िल्मों में दिया जा रहा है। फ़िल्मों में गीत-संगीतकार कुछ-न-कुछ नया करने का प्रयास पहले से ही करते आए हैं। संगीत के क्षेत्र में हर समय कुछ नया करने की गुंजाइश होती है इसके अंदर अपार संभावनाएं छुपी होती है। यदि वर्तमान समय में हम संगीत को सुने तो हम पाते हैं कि हर रोज कोई न कोई नई दुनिया का आविष्कार मिलता है, साथ ही नए-नए स्वरों और प्रयोग भी सुनने को मिलते हैं। वर्तमान में पश्चिमी संगीत को बड़े पैमाने पर सुना जा रहा है। आज शास्त्रीय गीत, लोकगीत, प्रांतीय गीत और पश्चिमी गीत के नाम का बोलबाला है। वर्तमान समय में हमें यह भी देखने को मिलता है की पश्चिमी गीतों और लोकगीतों को मिलाकर नए गीत बनाए जा रहे हैं। सीधे तौर पर कहा जाए तो वर्तमान समय में संगीत में नयापन देखने को मिल रहा है और अभी भी कई सुर और ताल का प्रयोग होना संगीत की दुनिया में बाकी है। इस प्रकार वर्तमान फ़िल्मी संगीत में भी नए प्रयोगों के माध्यम से संगीत का विस्तार हो रहा है।
प्रश्न 5 – ‘चित्रपट संगीत ने लोगों के कान बिगाड़ दिए’-अकसर यह आरोप लगाया जाता रहा है। इस संदर्भ में कुमार गंधर्व की राय और अपनी राय लिखें।
उत्तर – अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि चित्रपट संगीत ने लोगों के कान खराब कर दिए हैं लेकिन कुमार गंधर्व इस आरोप से सहमत नहीं हैं। कुमार गंधर्व की नजर में, संगीत में चित्रपट संगीत आने के बाद काफी सुधार आया है। और इसकी वजह से श्रोताओं को गीत समझने में आसानी होती है। आज के समय में लोगों को गीतों से बहुत लगाव है। आज सामान्य वर्ग भी संगीत की लय को समझने में सक्षम है।
इस विषय में कुमार गंधर्व का मत है कि वस्तुतः फ़िल्मी संगीत ने लोगों के कान बिगाड़े नहीं अपितु सुधारे हैं। आज फ़िल्मी संगीत के कारण एक साधारण श्रोता भी स्वर, लय, ताल आदि के विषय में जानकारी रखने लगा है। लोगों की रुचि संगीत में बढ़ी है। शास्त्रीय संगीत के काल में कितने लोग संगीत का ज्ञान रखते थे? कितने लोग उसके दीवाने होते थे? अर्थात् बहुत कम। आज लोग केवल फ़िल्मी संगीत ही नहीं शास्त्रीय संगीत की ओर भी मुड़ने लगे हैं। यह भी फ़िल्मी संगीत के कारण ही संभव हुआ है। चित्रपट संगीत के संदर्भ में, मेरी राय कुछ अलग है – मुझे लगता है कि चित्रपट संगीत से संगीत में अश्लीलता और शोर को बढ़ावा मिला है। यद्यपि चित्रपट संगीत में सुधार हुआ है, लेकिन यह बात केवल पुराने संगीत तक ही सीमित रह गई है। जहां पुराना संगीत मधुरता और जुड़ाव लाता था, वही आज का संगीत भयानक, शोर और तनाव लाता है। गाने के बोल विचित्र, भयानक, और अश्लील होते हैं। हो सकता है आने वाले समय में इसमें कुछ सुधार हो और कुमार गंधर्व का कथन सही साबित हो। क्योंकि आज के फ़िल्मी संगीत के कारण ही शास्त्रीय संगीतकारों की पूछ भी बढ़ी है। जब उन्हें फ़िल्मों में संगीत देने व कार्यक्रम प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है तो लाखों लोग उन्हें पहचानते हैं। अतः फ़िल्मी संगीत पर उपर्युक्त दोष लगाना उचित नहीं है।
प्रश्न 6 – शास्त्रीय एवं चित्रपट दोनों तरह के संगीतों के महत्त्व का आधार क्या होना चाहिए? कुमार गंधर्व की इस संबंध में क्या राय है? स्वयं आप क्या सोचते हैं?
उत्तर – कुमार गंधर्व का स्पष्ट मत है कि चाहे शास्त्रीय संगीत हो या फ़िल्मी संगीत, वही संगीत अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाएगा, जो ‘रसिकों या श्रोताओं को अधिक आनंदित कर सकेगा। वस्तुतः यह तथ्य बिलकुल सही है कि संगीत का मूल ही आनंद है। संगीत की उत्पत्ति उल्लास से हुई है। श्रोता भी संगीत अपने मनोविनोद के लिए ही सुनते हैं न कि ज्ञान के लिए। अतः संगीत का चरम उद्देश्य आनंद प्राप्ति ही है। जो भी संगीत श्रोताओं को अधिक-से-अधिक आनंदित करेगा, वही अधिक लोकप्रिय भी होगा। संगीत को मज़ेदार बनाने में गीत की क्षमता का महत्व होना जरूरी है। अगर शास्त्रीय संगीत में रंजकता का अभाव है, तो वह बिल्कुल नीरस, बदसूरत हो जाएगा और इस में कुछ कमी महसूस होगी। गीत में गायपन का होना आवश्यक है। गीत की सारी मिठास, उसकी सारी ताकत उस पर निर्भर है। अतः उसी को अधिक महत्त्व भी श्रोताओं द्वारा दिया जाएगा। यह बात संगीत ही नहीं अन्य सभी कलाओं पर भी लागू होती है। रंजक के स्वर को रसिक वर्ग के लिए कैसे प्रस्तुत किया जाए इसके लिए बैठक करनी चाहिए। सोचना चाहिए कि कैसे श्रोताओं के लिए अच्छे संगीत प्रस्तुत किए जाएं जो उन्हें निराश और उबाऊ ना लगे। इसलिए लेखक की राय बिल्कुल सही है और मुझे लगता है कि हर कोई इससे सहमत होगा।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न
प्रश्न 1 – शास्त्रीय संगीत और चित्रपट संगीत में अंतर स्पष्ट कीजिए?
उत्तर – शास्त्रीय संगीत और चित्रपट संगीत की तुलना नहीं की जा सकती। दोनों प्रकार के संगीत का अंत आनंद की प्राप्ति है। दोनों प्रकार के संगीत का अपने-अपने क्षेत्र में बहुत महत्त्व है। श्रोता उस संगीत को ज्यादा पसंद जिसमें उन्हें अधिक आनंद की प्राप्ति होती है। दोनों में समानता होते हुए भी अंतर है। शास्त्रीय संगीत और चित्रपट संगीत में निम्नलिखित अंतर है :
(1) शास्त्रीय संगीत में गंभीरता का स्थायी भाव है जबकि चित्रपट संगीत का गुण धर्म जलद लय और चपलता है।
(2) शास्त्रीय संगीत से ताल परिष्कृत रूप में पाया जाता है और चित्रपट संगीत का ताल प्राथमिक अवस्था का ताल होता है।
(3) चित्रपट संगीत में आधे तालों का उपयोग किया जाता है जबकि शास्त्रीय संगीत में तालों का पूरा ध्यान रखा जाता है।
(4) चित्रपट संगीत गाने वालों को शास्त्रीय संगीत का ज्ञान होनाआवश्यक है परंतु शास्त्रीय संगीत गायक को चित्रपट संगीत ज्ञान होना आवश्यक नहीं है।
(5) चित्रपट संगीत का एक गीत तीन-साढ़े तीन मिनट में वही आनंद और कलात्मकता प्रदान करता है जो शास्त्रीय संगीत तीन-साढ़े तीन घंटे की महफिल से प्राप्त होता है।
प्रश्न 2 – चित्रपट संगीत के लोकप्रिय होने के कारणों को समझाइए?
उत्तर – पहले समय में संगीत के क्षेत्र में शास्त्रीय संगीत का एकाधिकार था लेकिन चित्रपट संगीत ने शास्त्रीय संगीत के एकाधिकार को तोड़ दिया है। चित्रपट संगीत ने संगीत को जनसाधारण के बीच में पहुँचा दिया है। लोगों द्वारा शास्त्र शुद्ध संगीत के स्थान पर सुरीला और भावपूर्ण संगीत को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा है। चित्रपट संगीत की लचकदारी ने उसे लोकप्रिय बना दिया। इस संगीत की मान्यताएँ, मर्यादा तथा संगीत तंत्र सब कुछ निराला है जिसने लोगों के दिलों पर अपनी छाप छोड़ी है। चित्रपट संगीत निर्देशकों ने अपने संगीत में हर क्षेत्र तथा शास्त्रीय संगीत का बहुत उपयोग किया है। जहां चित्रपट संगीत में शास्त्रीय रागदारी सुनी जा सकती है। वहीं राजस्थानी, पंजाबी, बंगाली, पहाड़ी लोक गीतों के सुरीले बोल सुने जा सकते हैं। चित्रपट संगीत में देश की विभिन्नता, एकता के रूप में समाहित है। इस संगीत के माध्यम से लोग अपनी संस्कृति से परिचित हो रहे हैं। चित्रपट संगीत के जनसाधारण में अधिक लोकप्रिय होने का श्रेय लता मंगेशकर को भी जाता है। लता मंगेशकर के स्वरों की निर्मलता, कोमलता और सुरीलेपन ने लोगों को अपने साथ गुनगुनाने के लिए मज़बूर कर दिया है। लता के कारण ही भारत का चित्रपट संगीत भारत में ही नहीं विदेशों में भी लोकप्रिय हो चुका है।
प्रश्न 3 – ‘भारतीय गायिकाओं में बेजोड़: लता मंगेशकर’ पाठ का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – ‘भारतीय गायिकाओं में बेजोड़: लता मंगेशकर’ पाठ के माध्यम से भारतीय गायिकाओं में लता के जोड़ की गायिका न होने के कारणों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से स्पष्ट किया है। गायन कला से जुड़े बहुत महत्त्वपूर्ण तथ्यों का वर्णन किया है। लता मंगेशकर के गानपन ने संगीत को विशिष्ट लोगों की श्रेणी से निकालकर साधारण लोगों में लोकप्रिय बना दिया है। लेखक बहुत समय पहले बीमारी के समय में लता मंगेशकर का गीत रेडियो पर सुना और वह उसी समय से स्वयं को लता मंगेशकर के संगीत से जुड़ा हुआ अनुभव करने लगा। लता से पहले भी कई गायिकाएं आई हैं और बाद में भी परंतु लता के समान लोकप्रियता के शिखर तक कोई नहीं पहुँच पाया। आधी से अधिक शताब्दी बीत चुकी है लेकिन लता की लोकप्रियता कम नहीं हुई है इसका कारण लता के स्वरों की निर्मलता, कोमलता तथा मिठास है उनका स्वर लोगों को संगीत के साथ सीधा जोड़ता है। चित्रपट संगीत के निर्देशकों संगीत के माध्यम से शास्त्रीय संगीत को लोगों से जोड़ दिया है। उनके गीतों के माध्यम से राजस्थानी, पहाड़ी, पंजाबी, बंगाली लोकगीतों का बहुत उपयोग हुआ। साथ में देश की संस्कृति से आम लोगों को परिचित कराया है। संगीत का क्षेत्र एक ऐसा चित्र है जिसमें सभी वर्ण के लोग एक समान आनंद की अनुभूति प्राप्त करते हैं। लेखक ने इस पाठ के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि लता मंगेशकर की गायकी ने संगीत को एक नई दिशा प्रदान की है। संगीत सभा-समारोहों की परिधि से निकलकर लता मंगेशकर के कारण ही सामान्य जन मानस तक पहुँचा है।
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▪️आत्मा का ताप ( सैयद हैदर रज़ा ) / Aatma Ka Taap ( Saiyad Haidar Raza )
आरोह भाग 1 ( काव्य खंड )
▪️हम तौ एक एक करि जांनां कबीर ( Kabir Ke Pad Class 11)
▪️मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई / मीरा( मीराबाई)
▪️वे आँखें ( सुमित्रानंदन पंत )
▪️घर की याद : भवानी प्रसाद मिश्र ( Ghar Ki Yad : Bhawani Prasad Mishra )
▪️चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती : त्रिलोचन
▪️साये में धूप ( दुष्यंत कुमार )
▪️साये में धूप ( दुष्यंत कुमार )
▪️अक्क महादेवी ( Akka Mahadevi )
▪️सबसे खतरनाक : पाश ( Sabse Khatarnak : Pash )
▪️आओ मिलकर बचाएँ : निर्मला पुतुल ( Aao, Milkar Bachayen : Nirmala Putul )
वितान भाग 1 ( कक्षा 11)
▪️भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ : लता मंगेशकर ( कुमार गन्धर्व )
▪️राजस्थान की रजत बूंदें ( अनुपम मिश्र ) / Rajasthan Ki Rajat Boonden ( Anupam Mishra )
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