अशोक की चिंता : जयशंकर प्रसाद ( Ashok Ki Chinta : Jai Shankar Prasad )

(1)

जीवन कितना ? अति लघु क्षण,

ये शलभ पुंज-से-कण-कण,
तृष्णा वह अनलशिखा बन
दिखलाती रक्तिम यौवन ।
जलने की क्यों न उठे उमंग ?

है ऊँचा आज मगध शिर
पदतल में विजित पड़ा,
दूरांगत क्रन्दन ध्वनि फिर,
क्यों गूँज रही हैं अस्थिर

कर विजयी का अभिमान भंग ?

व्याख्या — सम्राट अशोक कलिंग युद्ध के भयावह दृश्य को देखकर जीवन की क्षणभंगुरता पर गहन चिंतन कर रहे हैं। वे स्वयं से प्रश्न करते हैं: यह जीवन कितना है? यह तो अत्यंत छोटे-छोटे क्षणों का समूह मात्र है। यह शरीर और जीवन पतंगों के समूह (शलभ पुंज) के कण-कण जैसा है, जो शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।

​मनुष्य की ‘तृष्णा’ (असीमित लालसा या वासना) ही वह ‘अनलशिखा’ (आग की लपट) है, जो उसे अपनी शक्ति और अधिकार के ‘रक्तिम यौवन’ (खून से सने हुए उन्माद या अहंकार) का भ्रम दिखाती है। इस क्षणभंगुर जीवन में भी मनुष्य, वासना की आग में जलकर, अपनी ही नाश की उमंग क्यों उठाता है? कवि कहते हैं कि मनुष्य अपनी तृष्णा के वशीभूत होकर हिंसा करता है, जबकि उसका जीवन इतना अस्थिर और नाशवान है।

अशोक अपनी ‘विजय’ और उसके परिणाम पर केंद्रित होकर आत्मग्लानि व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि आज निःसंदेह मगध का मस्तक (शिर) तो ऊँचा है, क्योंकि हमने कलिंग को पराजित कर उसे अपने पैरों के नीचे (पदतल में विजित) गिरा दिया है। यह भौतिक विजय तो प्राप्त हो गई है, लेकिन यह कैसी जीत है?

​दूर-दूर से आ रही रोने-पीटने की आवाज़ें (दूरांगत क्रन्दन ध्वनि) मेरे मन में अस्थिरता पैदा कर रही हैं और मेरी विजय के अभिमान को भंग कर रही हैं। यह ध्वनि पूछ रही है कि यह कैसा गौरव है, जो लाखों लोगों के आँसुओं और रक्त पर खड़ा है? इस जीत ने मेरे हृदय को शांति देने के बजाय, केवल पश्चात्ताप और संताप से भर दिया है।

​संक्षेप में, अशोक ने भौतिक राज्य जीत लिया है, लेकिन मानव मन की शांति खो दी है, और यही उनकी सबसे बड़ी चिंता है।

(2)

इन प्यासी तलवारों से,
इन पैनी धारों से,
निर्दयता की मारों से,
उन हिंसक हुंकारों से,

नत मस्तक आज हुआ कलिंग।

यह सुख कैसा शासन का ?
शासन रे मानव मन का !
गिरि भार बना-सा तिनका,
यह घटाटोप दो दिन का

फिर रवि शशि किरणों का प्रसंग !

व्याख्या — सम्राट अशोक यह स्वीकार करते हैं कि कलिंग पर उनकी विजय किसी महान शौर्य या धर्म युद्ध का परिणाम नहीं है। वे कहते हैं कि कलिंग का सिर (नत मस्तक) यदि झुका है, तो उसका कारण केवल ‘प्यासी तलवारें’ (जो रक्त की भूखी थीं), उनकी ‘पैनी धारें’, ‘निर्दयता की क्रूर मारें’ और मगध की सेना की ‘हिंसक हुंकारें’ हैं।

​इन पंक्तियों में, अशोक अपनी विजय का श्रेय अपनी शक्ति के अहंकार को देते हैं, न कि न्याय या धर्म को। वे युद्ध में हुए भीषण नरसंहार और क्रूरता को याद करते हैं, जिसके कारण उन्हें यह जीत मिली। यह जीत अब उनके लिए गर्व का विषय नहीं, बल्कि गहरी ग्लानि और पश्चात्ताप का कारण बन गई है।

पिछले काव्यांश में आत्मग्लानि व्यक्त करने के बाद, अशोक अब राजसत्ता और वास्तविक शासन के स्वरूप पर प्रश्न करते हैं। वे इस रक्तरंजित विजय से प्राप्त हुए शासन के सुख को अस्वीकार करते हैं। वे समझते हैं कि सच्चा शासन तो मनुष्य के हृदय पर किया जाता है, जो प्रेम, दया और सद्भाव से ही संभव है, न कि तलवार के बल पर।

जिस साम्राज्य विस्तार और सत्ता को उन्होंने पहले तिनके के समान हल्का समझा था, वह अब कलिंग के नरसंहार के कारण पहाड़ के समान भारी (गिरि भार) हो गया है। जीत का यह भार अब उनके लिए असहनीय हो गया है।

अशोक कोनश्वरता का बोध होता है। वे कहते हैं कि यह शासन और वैभव तो दो दिन का घटाटोप (घने बादल) मात्र है, जो क्षणभर में छँट जाएगा। इसके हटने के बाद फिर से सूर्य (रवि) और चंद्रमा (शशि) की किरणें ही होंगी, अर्थात प्रकृति का शाश्वत नियम ही चलेगा। राजसत्ता और अहंकार क्षणिक हैं, जबकि सत्य, शांति और प्रकृति के नियम ही शाश्वत हैं।

​संक्षेप में, अशोक ने भौतिक राज्य जीत लिया है, लेकिन यह जीत उनके लिए अब बोझ बन गई है। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हृदय पर शासन करना ही वास्तविक और स्थायी विजय है, जबकि भौतिक सत्ता का सुख अस्थायी और मिथ्या है।

(3)

यह महादम्भ का दानव
पीकर अनंग का आसव
कर चुका महा भीषण रव,
सुख दे प्राणी को मानव
तज विजय पराजय का कुढंग।
संकेत कौन दिखलाती,
मुकुटों को सहज गिराती,
जयमाला सूखी जाती,
नश्वर गीत सुनाती,

तब नहीं थिरकते हैं तुरंग |

व्याख्या –इन पंक्तियों में सम्राट अशोक अपने भीतरी अहंकार (महादम्भ का दानव) पर विजय पाने की बात करते हुए संसार की नश्वरता का बोध प्रकट कर रहे हैं। अशोक आत्म-मंथन करते हुए कहते हैं कि उनके भीतर के अहंकार रूपी राक्षस ने ही वासना या मद (अनंग का आसव) पीकर महा भीषण गर्जना (रव) की, जिसके कारण कलिंग में इतना बड़ा नरसंहार हुआ। अब इस आत्म-ज्ञान के बाद, अशोक स्वयं को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे मानव, अब इस विजय और पराजय के बुरे ढंग (कुढंग) को छोड़कर प्राणी मात्र को सुख देने का मार्ग अपनाओ। इसके बाद वे संसार की क्षणभंगुरता पर चिंतन करते हुए पूछते हैं कि वह कौन-सी अदृश्य शक्ति है जो सहज ही राजाओं के मुकुटों को गिरा देती है, जीत की जयमालाओं को सूखा देती है और हर पल नश्वरता का गीत सुनाती रहती है, जिसकी शक्ति के सामने युद्ध के घोड़े (तुरंग) भी भय से नहीं थिरकते? इस चिंतन से स्पष्ट होता है कि अशोक ने हिंसा को त्यागकर धर्म (नैतिकता) के मार्ग को अपना लिया है, क्योंकि वे जान गए हैं कि क्षणभंगुर सत्ता से ऊपर, प्रकृति की नश्वरता ही अंतिम सत्य है।

(4)

वैभव की यह मधुशाला,
जग पागल होने वाला,
अब गिरा-उठा मतवाला,
प्याले में फिर भी हाला,

यह क्षणिक चल रहा राग-रंग |

व्याख्या — इन पंक्तियों में सम्राट अशोक संसार के क्षणिक और मिथ्या सुख को देखकर वैराग्य की भावना व्यक्त कर रहे हैं। वे कहते हैं कि यह संसार वैभव (ऐश्वर्य) की मधुशाला (शराबखाना) के समान है, जहाँ लोग धन, शक्ति और सत्ता के नशे में पागल होकर मदमस्त हैं। यहाँ मनुष्य मतवाला होकर बार-बार गिरता है और उठता है, लेकिन प्याले में फिर भी वही हाला (शराब) भरी है, जिसका अर्थ है कि वह कभी तृष्णा (लालच) और वासना के चक्र से बाहर नहीं निकल पाता। अशोक को यह अनुभव होता है कि यह सारा राग-रंग (ऐशो-आराम) और उन्माद केवल क्षणभर के लिए है, जिसका अंत निश्चित है। इस प्रकार, वे इस नश्वर और भ्रमपूर्ण सुख की निंदा करते हुए एक स्थायी और आध्यात्मिक शांति की ओर उन्मुख होते हैं।

(5)

काली-काली अलकों में,
आलस मद-नत पलकों में,
मणि मुक्ता की झलकों में,
सुख की प्यासी ललकों में,

देखा क्षण भंगूर है तरंग |

व्याख्या — इन पंक्तियों में, सम्राट अशोक भौतिक सुख और सौंदर्य के क्षणभंगुर स्वभाव पर चिंतन कर रहे हैं। वे राजमहल के भीतर के दृश्य का वर्णन करते हैं, जहाँ काली-काली अलकें (केश) बिखरी हैं, आलस और मद (नशे) से आँख की पलकें झुकी हुई हैं, और आभूषणों पर जड़े मणि तथा मोती (मुक्ता) चमक रहे हैं। ये सभी दृश्य सुख की प्यासी ललकों (लालसाओं) को व्यक्त करते हैं। अशोक यह सब देखकर निष्कर्ष निकालते हैं कि यह सारा वैभव, सौंदर्य और इससे जुड़ा सुख केवल क्षण भर के लिए नष्ट होने वाली तरंग (क्षण भंगूर है तरंग) के समान है। यह क्षणिक सुख, जिसे पाने के लिए मनुष्य युद्ध और हिंसा करता है, पानी की लहर जैसा है जो तुरंत मिट जाती है, अतः यह किसी भी प्रकार से स्थायी और वास्तविक नहीं है।

(6)

फिर निर्जन उत्सव शाला,
नीरव नुपूर श्लथ माला,
सो जाती है मधुबाला,
सूखा लुढ़का है प्याला,

बजती वीणा न यहाँ मृदंग |

व्याख्या — इन पंक्तियों में, सम्राट अशोक भौतिक भोग-विलास के अंतिम और उदास परिणाम को दर्शाते हैं। वे कहते हैं कि जहाँ क्षणभर पहले वैभव और मस्ती का माहौल था, अब वह ‘उत्सव शाला’ वीरान (निर्जन) हो गई है। यहाँ उत्सव के चिन्ह, जैसे कि नर्तकियों के ‘नूपुर’ (पायल), अब शांत (नीरव) हैं और उनके गले की ‘मालाएँ शिथिल (श्लथ)’ होकर पड़ी हैं। सुख-विलास में डूबी ‘मधुबाला’ (युवती) भी सो गई है, और शराब का प्याला (सूखा लुढ़का है प्याला) खाली होकर लुढ़क गया है। अब इस जगह पर न तो वीणा बज रही है और न ही मृदंग। अशोक का यह चिंतन यह स्थापित करता है कि संसार का सारा ऐश्वर्य और आनंद क्षणिक है, और अंत में सब कुछ उदासी और सन्नाटे में बदल जाता है, जो जीवन की नश्वरता को सिद्ध करता है।

(7)

इस नील विषाद गगन में
सुख चपला-सा दुःख घन में,
चिर विरह नवीन मिलन में,
इस मरू-मरीचिका-वन में

उलझा है चंचल मन कुरंग |

व्याख्या — इन पंक्तियों में, सम्राट अशोक संसार की दुःखमयता (दुःखवाद) और मन की चंचलता का चित्रण करते हैं। वे कहते हैं कि यह संसार विषाद (उदासी) से भरे नीले आकाश के समान है, जहाँ सुख की स्थिति दुःख रूपी घने बादलों में कौंधने वाली बिजली (चपला) जैसी है—अर्थात् सुख क्षणिक है जबकि दुःख स्थायी। जीवन एक ऐसे मरु-मरीचिका-वन (रेगिस्तान जहाँ पानी का भ्रम होता है) के समान है, जिसमें शाश्वत वियोग (चिर विरह) और नए मिलन का चक्र चलता रहता है, लेकिन कोई वास्तविक तृप्ति नहीं मिलती। मनुष्य का चंचल मन, जो हिरण (कुरंग) के समान है, इसी भ्रमपूर्ण जंगल में वास्तविक आनंद की खोज में भटकता हुआ उलझा रहता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि भौतिक संसार में शांति पाना असंभव है।

(8)

आँसू कन-कन ले छल-छल
सरिता भर रही दृगंचल;
सब अपने में हैं चंचल ;
छूटे जाते सूने पल,

खाली न काल का है निषँग |

व्याख्या — ​इन पंक्तियों में सम्राट अशोक संसार की अनिवार्य गतिशीलता (चंचलता) और काल की अपरिहार्यता का बोध करा रहे हैं। वे अनुभव करते हैं कि इस दुःख भरे संसार में, उनके आँसू ही छलछलाकर बह रहे हैं और ‘दृगंचल’ (आँखों के कोने) आँसुओं की नदी (सरिता) से भर रहे हैं। यह आँसू केवल उनके नहीं, बल्कि युद्ध के कारण दुखी संपूर्ण मानवता के हैं। अशोक यह देखते हैं कि इस जगत में सब कुछ अपने आप में चंचल है, यानी हर वस्तु परिवर्तनशील और क्षणिक है। उनके जीवन के सुने (अर्थहीन) पल लगातार बीतते जा रहे हैं, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि काल (समय) का निषंग (तरकश) कभी खाली नहीं होता, जिसका अर्थ है कि समय हमेशा गतिशील रहता है और हर क्षण अपने बाण (आघात/परिवर्तन) छोड़ता रहता है। इस चिंतन से अशोक को यह ज्ञान होता है कि भौतिक संसार में शांति या स्थिरता खोजना व्यर्थ है।

(9)

वेदना विकल यह चेतन,
जड़ का पीड़ा से नर्तन,
लय सीमा में यह कंपन,
अभिनयमय है परिवर्तन,

चल रही यही कब से कुढंग |

व्याख्या — इन पंक्तियों में, सम्राट अशोक सृष्टि की अनिवार्य और दुःखपूर्ण गति पर दार्शनिक चिंतन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि चेतन (सजीव) प्राणी वेदना से व्याकुल हैं, जबकि जड़ (निर्जीव) प्रकृति भी अपनी सीमाओं में रहकर पीड़ा से नर्तन (नाच) कर रही है, यानी सृष्टि में हर ओर दुःख का प्रभाव है। जीवन की हर एक ताल और लय में कंपन (अस्थिरता/परिवर्तन) है। अशोक इस पूरे संसार को एक अभिनयमय परिवर्तन के रूप में देखते हैं—एक ऐसा नाटक जिसमें सब कुछ केवल बदल रहा है, पर यह परिवर्तन दुख और पीड़ा से भरा है। वे निष्कर्ष निकालते हैं कि सृष्टि में यही बुरा ढंग (कुढंग) अनिश्चित काल से चला आ रहा है, जहाँ परिवर्तन केवल पीड़ा लाता है, जिससे वे इस नश्वर जगत की क्रूरता से विमुख हो जाते हैं।

(10)

करुणा गाथा गाती है,
यह वायु बही जाती है,
ऊषा उदास आती है,
मुख पीला ले जाती है,

वन मधु पिंगल संध्या सुरंग |

व्याख्या — इन पंक्तियों में, सम्राट अशोक प्रकृति के माध्यम से भी दुःख और वेदना का अनुभव कर रहे हैं। उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि वायु (हवा) भी कोई सामान्य प्रवाह नहीं है, बल्कि वह करुणा की गाथा गाती हुई बह रही है, जो उनके मन के गहरे दुःख को प्रतिध्वनित करती है। सबेरा (ऊषा) भी उनके लिए आशा लेकर नहीं आता, बल्कि उदास और म्लान दिखता है। दिन ढलने पर, पीले मुख वाली संध्या आती है और वन की मधु (बसंत या आनंद) को पिंगल (धुंधला पीला/भूरा) रंग में रंगकर, उसके सुरंग (सुंदर रंग) को उदासी में बदल देती है। इस प्रकार, अशोक की गहन चिंता और पश्चात्ताप इतना व्याप्त हो गया है कि उन्हें प्रकृति के हर रूप में केवल उदासी, वेदना और नश्वरता का ही अनुभव होता है।

(11)

आलोक किरन हैं आती,
रेशमी डोर खिंच जाती,
दृग पतली, कुछ नच पाती,
फिर तम घट में छिप जाती,

कलरव कर सो जाते विहंग |

व्याख्या — इन पंक्तियों में, सम्राट अशोक संसार की क्षणभंगुरता (क्षणिकता) को एक सूक्ष्म, गतिशील और दृश्यमान प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि आलोक की किरणें (प्रकाश) आती हैं और एक रेशमी डोर के समान धीरे से खिंच जाती हैं, यानी प्रकाश आता है और तुरंत चला जाता है। हमारी ‘दृग पुतली’ (आँख की पुतली) उस दृश्य को क्षण भर के लिए ‘कुछ नच पाती’ है (देख पाती है या उसका आनंद ले पाती है), लेकिन फिर तुरंत ही वह किरण अंधकार के घड़े (तम घट) में छिप जाती है। दिन समाप्त होने पर, आसमान में कलरव करने वाले पक्षी (विहंग) भी थककर सो जाते हैं। यह बिंब यह दर्शाता है कि सुख, आशा, और जीवन के सुंदर क्षण कितने अस्थायी हैं, और अंधकार (तम) का आगमन तथा शांति (नीरवता) ही इस संसार का अटल नियम है।

(12)

जब पल भर का है मिलना,
फिर चिर वियोग में झिलना,
एक ही प्राप्त है खिलना,
फिर सूख धूल में मिलना,

तब क्यों चटकीला सुमन रंग |

व्याख्या — इन पंक्तियों में, सम्राट अशोक मानव जीवन के अंतिम सत्य और नश्वरता को एक मार्मिक प्रश्न के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि इस जीवन में जब मिलना भी केवल पल भर का होता है, और उसके बाद चिरकाल का वियोग (चिर वियोग में झिलना) निश्चित है, तो फिर इस संसार में हर वस्तु का एकमात्र नियति है पहले खिलना (जन्म और विकास) और अंत में सूखकर धूल में मिल जाना (मृत्यु)। जब जीवन और सौंदर्य का अंत इतना अटल है, तो फिर सुमन (फूल) का चटकीला रंग (उसका आकर्षक वैभव और क्षणिक सौंदर्य) क्यों व्यर्थ का अहंकार करता है? इस चिंतन के माध्यम से अशोक भौतिक सौंदर्य, सत्ता और क्षणिक उपलब्धियों की तुच्छता को सिद्ध करते हुए वैराग्य की भावना की ओर बढ़ते हैं।

(13)

संसृति के विक्षत पर रे!
यह चलती है डगमग रे!
अनुलेप सदृश तू लग रे!
मृदु दल बिखेर इस मग रे!

कर चुके मधुर मधुपान भृंग |

व्याख्या — इन अंतिम पंक्तियों में सम्राट अशोक अपने मन को करुणा और सेवा का उपदेश देते हुए कविता का समापन करते हैं। वे कहते हैं कि यह संसार (संसृति) दुःख से घायल (विक्षत) होकर डगमगाता हुआ चल रहा है, इसलिए हे मन! तू इस दुखी और घायल सृष्टि के लिए अनुलेप (मरहम) के समान लग जा। जिस जीवन मार्ग पर पग-पग पर काँटे हैं, उस मार्ग पर करुणा के कोमल फूल (मृदु दल) बिखेर दे, क्योंकि भौंरों (भृंग) ने तो पहले ही मधुर मधुपान (अर्थात् भौतिक सुख का भोग) कर लिया है और अब उनका समय जा चुका है। यह कथन अशोक के युद्ध-मार्ग को त्यागकर बौद्ध धर्म की करुणा और सेवा-भाव अपनाने के दृढ़ संकल्प को दर्शाता है, जहाँ व्यक्तिगत सुख की बजाय मानव कल्याण ही एकमात्र लक्ष्य बन जाता है।

(14)

भुनती वसुधा, तपते नग,
दुःखिया है सारा अग जग,
कटक मिलते हैं प्रति पग,
जलती सिकता जा यह मग,

बह जा बन करुणा की तरंग,
जलता है यह जीवन-पतंग |

व्याख्या — इन अंतिम और सारगर्भित पंक्तियों में, सम्राट अशोक कलिंग युद्ध के बाद की सार्वभौमिक पीड़ा को महसूस करते हुए, करुणा के मार्ग को अपनाने का दृढ़ संकल्प व्यक्त करते हैं। वे देखते हैं कि हिंसा के कारण यह धरती (वसुधा) दुःख की आग में भुन रही है, पर्वत (नग) तप रहे हैं, और सारा जड़-चेतन संसार (अग जग) अत्यंत दुःखिया है। जीवन के इस मार्ग पर हर कदम पर काँटे (कंटक) मिलते हैं और यह मार्ग जलती हुई रेत (सिकता) के समान कष्टदायक है। इस असहनीय पीड़ा को देखकर, अशोक अपने मन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि इस दुःख की आग को बुझाने के लिए तू करुणा की तरंग (लहर) बन कर बह जा, क्योंकि यह संपूर्ण जीवन पतंगे की तरह जल रहा है। यह उद्घोषणा अशोक के हृदय परिवर्तन को अंतिम रूप देती है, जहाँ वे व्यक्तिगत विजय और अहंकार को त्यागकर प्राणी मात्र की सेवा और दुःख-निवारण (धम्म) के मार्ग को स्वीकार करते हैं।

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