आओ मिलकर बचाएँ : निर्मला पुतुल ( Aao, Milkar Bachayen : Nirmala Putul )

( 'आओ मिलकर बचाएँ' NCERT की बारहवीं कक्षा की हिंदी की पाठ्य पुस्तक 'आरोह भाग -1 में संकलित कविता है जो झारखण्ड की प्रसिद्ध कवयित्री निर्मला पुतुल द्वारा लिखित है | कविता झारखण्ड की आबो-हवा और संस्कृति को बचाने का आग्रह करती है | )
आओ मिलकर बचाएँ :  निर्मला पुतुल
आओ मिलकर बचाएँ : निर्मला पुतुल

अपनी बस्तियों को

नंगी होने से

शहर की आबो-हवा से बचाएँ उसे

बचाएँ डूबने से

पूरी की पूरी बस्ती को

हड़िया में (1)

व्याख्या – प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री झारखंड की अपनी संथाली आदिवासी संस्कृति को शहरी सभ्यता-संस्कृति के कुप्रभाव से दूर रखना चाहती हैं क्योंकि अब आदिवासी लोग भी अपनी संस्कृति को छोड़कर धीरे-धीरे शहरी तौर तरीके अपनाने लगे हैं।
कवयित्री कहती है कि हमारी बस्तियों पर लगातार शहरी संस्कृति का प्रभाव पड़ रहा है। लोगों में तन ढकने के बजाय तन दिखाने की होड़ मची है। इसके साथ ही धरती को भी पेड़ पौधों से विहीन किया जा रहा है यानि शहरीकरण के चक्कर में लगातार पेड़-पौधों को काट कर इस हरी भरी धरती को नंगा किया जा रहा हैं। कवयित्री लगातार हो रहे शहरीकरण के कारण अपने क्षेत्र को वृक्ष विहीन होने से बचाना चाहती हैं। अपने पर्यावरण को सुरक्षित रखना चाहती हैं और अपनी संथाली परम्पराओं को बचाना चाहती हैं। कवयित्री कहती है कि शहरी वातावरण का प्रभाव अब हमारे क्षेत्र के लोगों पर भी पड़ रहा हैं। यहाँ की बस्ती के लोग भी अब शहर के लोगों की तरह ही नशा करने लगे हैं। इससे पहले कि हमारी पूरी बस्ती के लोगों को नशे की लत लग जाए। कवयित्री अपने लोगों को नशे की प्रवृत्ति से बचाना चाहती हैं

अपने चेहरे पर

संथाल परगना की माटी का रंग

भाषा में झारखंडीपन |

ठंडी होती दिनचर्या में

जीवन की गर्माहट

मन का हरापन

भोलापन दिल का

अक्खड़पन, जुझारूपन भी

भीतर की आग

धनुष की डोरी

तीर का नुकीलापन

कुल्हाड़ी की धार

जंगल की ताजा हवा

नदियों की निर्मलता

पहाड़ों का मौन

गीतों की धुन

मिट्टी का सोंधापन

फसलों की लहलहाहट | (2)

व्याख्या – इन पंक्तियों में कवयित्री कहती है कि शहरी वातावरण आदिवासियों के सरल रहन-सहन, स्वभाव व संस्कृति को प्रभावित कर रही हैं। इसीलिए वो अपने लोगों से आग्रह करते हुए कहती है कि हमें अपने मूल आदिवासी चरित्र व संस्कृति को बनाए रखना हैं। कवयित्री कहती है कि संथाल परगना के लोगों की सभ्यता, संस्कृति व झारखंडी भाषा ही उनकी असली पहचान है। इसीलिए उसे बनाए रखें। उस पर शहरी प्रभाव न पड़ने दें। शहरी प्रभाव पड़ने के कारण लोगों की दिनचर्या में आलस बढ़ता जा रहा है जिस कारण उनकी दिनचर्या पहले जैसी उत्साह, उमंग भरी नही रही। उन्हें उसे दूर करना चाहिए ताकि जीवन में उमंग, उल्लास, उत्साह बना रहे और मन खुशियों से भरा रहे। उनके दिल का भोलापन शहरी प्रभाव से प्रभावित न हो। अक्खड़पन, जुझारूपन आदिवासियों के स्वभाव की विशेषता है जिसे उन्हें खोना नहीं चाहिए। अर्थात कवयित्री कहती है कि झारखंडी संथाल समाज की पहचान वहाँ के लोगों का उत्साह से भरा जीवन, उनका जोशीला मन, दिल का भोलापन, स्वभाव में अक्खड़पन व जुझारूपन हैं जिसे उन्हें बनाये रखना हैं। कवयित्री कहती है कि संथाली लोगों की पहचान उनके भीतर की आग यानि उनका साहस, पराक्रम व वीरता है। धनुष की डोरी पर चढ़ा तीर और कंधे पर कुल्हाड़ी ही उनकी असली पहचान हैं जिसे उन्हें बनाए रखना है। प्रकृति ने झारखंड को भरपूर प्राकृतिक संपदा से नवाजा हैं। इसलिए यहाँ खूब पेड़ पौधे हैं। वातावरण में ताजा हवा है। नदियों का पानी एकदम साफ व निर्मल है। ऊँचे-ऊँचे शानदार पहाड़ों में एकदम शांति छायी रहती हैं। आदिवासी पहाड़ी गीतों की धुन, मिट्टी की सुगंध व खेतों पर लहलहाती फसल इस क्षेत्र को विशिष्टता प्रदान करती है। कहने का तात्पर्य यह है कि संथाल परगना की मिट्टी की भीनी भीनी खुशबू, खेतों पर लहलहाती फसल, यहाँ के लोकगीत, ये सब उनकी संस्कृति व उनकी पहचान हैं। इन सब को शहरी संस्कृति के प्रभाव से बचाये रखना हैं।

नाचने के लिए खुला आँगन

गाने के लिए गीत

हँसने के लिए थोड़ी-सी खिलखिलाहट

रोने के लिए मुट्ठी भर एकांत

बच्चों के लिए मैदान

पशुओं के लिए हरी-हरी घास

बूढों के लिए पहाड़ों की शांति |

और इस अविश्वास-भरे दौर में

थोड़ा-सा विश्वास

थोड़ी-सी उम्मीद

थोड़े-से सपने

आओ मिलकर बचाएँ

कि इस दौर में भी बचाने को

बहुत कुछ बचा है,

अब भी हमारे पास | (3)

व्याख्या – कवयित्री कहती है कि शहरों में बढ़ती जनसंख्या के कारण घर एवं आंगन छोटे होते जा रहे हैं। बच्चों के खेलने के मैदान खत्म होते जा रहे हैं। इसीलिए उपरोक्त पंक्तियों में कवयित्री कहती है कि गाँवों में हमारे पास नाचने गाने व मौज मस्ती करने के लिए खुले स्थान हैं। अपनी खुशी व आनंद को प्रकट करने के लिए हमारे पास सुंदर-सुंदर लोकगीत-संगीत भी हैं यानी हम अपनी खुशी अपने लोकगीतों के जरिए प्रकट कर सकते हैं। शहर में बढ़ती आबादी के कारण घर व खुले मैदान छोटे और एकांत स्थान खत्म होते जा रहे हैं। भीड़ बहुत हैं मगर पड़ोसी-पड़ोसी को नही पहचानता हैं। व्यक्ति अपने सुख व दुःख, दोनों में अकेला रहता हैं। मगर हमारे गांवों में ऐसा नही हैं। हम अपनी खुशियों को पूरे गाँव के साथ मनाकर उसे दुगना कर लेते हैं और अपने दुःख को अपने आप से एकांत में व्यक्त कर कम कर लेते हैं क्योंकि जीवन में खुलकर हंसना खिलखिलाना और कभी-कभी रोना भी जरूरी है। कवयित्री कहती है कि बच्चों के खेलने के लिए खुले मैदान चाहिए, पशुओं के चरने के लिए हरी-हरी घास व बड़े-बुजुर्गों को रहने के लिए ठीक वैसी ही शान्ति चाहिए जैसी अमूमन पहाड़ों पर छाई रहती हैं। और यह सब उनके क्षेत्र में भरपूर मात्रा में हैं। कवयित्री कहती है कि शहरी संस्कृति के प्रभाव के कारण अब चारों तरफ लोगों में अविश्वास, ईर्ष्या, राग-द्वेष की भावना बढ़ रही हैं। लोग एक दूसरे पर सहज ही विश्वास नहीं पाते हैं। इन लोगो के अंदर थोड़ा सा विश्वास जगाना हैं जिससे उनके अंदर थोड़ी सी उम्मीद जागे ताकि वो फिर से थोड़े से सपने देख सकें और उनका जीवन सुखी हो सके। कवयित्री कहती है कि मैं लोगों से आग्रह करती हूँ कि अभी भी स्थिति बहुत अधिक नहीं बिगड़ी है। अभी भी हमारे पास बचाने के लिए बहुत कुछ है। इसीलिए आओ, हम सब मिलकर , अपनी सभ्यता व संस्कृति को बचाएँ, उसकी रक्षा करें।

अभ्यास के प्रश्न ( आओ, मिलकर बचाएं )

प्रश्न 1 – माटी का रंग प्रयोग करते हुए किस बात की ओर संकेत किया गया है?

उत्तर – कवयित्री ने ‘माटी का रंग’ प्रयोग करके स्थानीय विशेषताओं को उजागर करना चाहा है। संथाल परगने के लोगों में जुझारूपन, अक्खड़ता, नाच-गान, सरलता आदि विशेषताएँ जमीन से जुड़ी हैं। कवयित्री चाहती है कि आधुनिकता के चक्कर में हम अपनी संस्कृति को हीन न समझे। हमें अपनी पहचान बनाए रखनी चाहिए। इस कविता में कवयित्री क्षेत्रीय संथालों के लोक जीवन की महत्ता को बताती है। वे उनकी स्वाभाविक सम्वेदनाओं को (सादगी, मासूमियत, प्रकृति के प्रति लगाव), शहरीकरण के आवरण से दूर रखने की ओर इशारा करती हैं। जिस प्रकार शहरी संस्कृति ने अनेक संस्कृतियों की कब्रों के ऊपर, अपनी इमारत खड़ी की है। वे नहीं चाहती हैं, कि जो वर्तमान में संस्कृति शेष है, वो भी कब्र में बंद हो जाए।

प्रश्न 2 – भाषा में झारखंडीपन से क्या अभिप्राय है?

उत्तर – झारखंडी’ का अभिप्राय है – झारखंड के लोगों की स्वाभाविक बोली। कवयित्री का भाषा में झारखंडीपन से अभिप्राय उन आदिवासी समूह की मातृभाषा से हैं। प्रत्येक आदिवासी समूह की अस्मिता और पहचान का मूल स्रोत, उसकी भाषा होती है। इसी प्रकार संथालियों की भाषा संथाल है। इस भाषा में झारखंड की पहचान झलकती है। उनकी भाषा से यह पता लगता है, कि वे झारखंड के रहने वाले हैं। कवयित्री भाषा के इसी स्थानीय प्रयोग और स्वाभाविक विशेषताओं को नष्ट होने से बचाना चाहती है।

प्रश्न 3 – दिल के भोलेपन के साथ-साथ अक्खड़पन और जुझारूपन को भी बचाने की आवश्यकता पर क्यों बल दिया गया है?

उत्तर – दिल का भोलापन सच्चाई और ईमानदारी के लिए जरूरी है, परंतु हर समय भोलापन ठीक नहीं होता। कवयित्री भोलेपन के साथ अक्खड़पन और जुझारूपन की आवश्यकता से अभिप्राय, अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता, और अपने अधिकार के लिए आवाज़ उठाने से है। भोलेपन का फायदा उठाने वालों के साथ अक्खड़पन दिखाना भी जरूरी है। अपनी बात को मनवाने के लिए अकड़ भी होनी चाहिए। साथ ही कर्म करने की प्रवृत्ति भी आवश्यक है। अत: कवयित्री भोलेपन, अक्खड़पन व जुझारूपन-तीनों गुणों को बचाने की आवश्यकता पर बल देती है।

प्रश्न 4 – प्रस्तुत कविता आदिवासी समाज की किन बुराइयों की ओर संकेत करती है?

उत्तर – कविता में प्रकृति के विनाश एवं विस्थापन के कठिन दौर के साथ-साथ संथाली समाज की अशिक्षा, कुरीतियों और शराब की ओर बढ़ते झुकाव को भी व्यक्त किया गया है जिसमें पूरी-पूरी बस्तियाँ डूबती जा रही हैं। इस कविता में आदिवासी समाज में व्याप्त जड़ता, काम से अरुचि, बाहरी संस्कृति और शहरीकरण का अंधानुकरण, शराबखोरी, अकर्मण्यता, अशिक्षा, अपनी भाषा से अलगाव, परम्पराओं से विद्वेष की भावना आदि बुराइयों का भी जिक्र मिलता है।

प्रश्न 5 – इस दौर में भी बचाने को बहुत कुछ बचा है-से क्या आशय है?

उत्तर – कविता के अनुसार कवयित्री आज के युग की विकासलीला के परिणामस्वरूप, समाज में फैली अस्त व्यस्तता की ओर संकेत करती हैं। वे कहती हैं, कि आज के युग में मानवीय मूल्यों का हनन और प्राकृतिक संपदाएं नष्ट हो रही हैं। लेकिन अभी भी बहुत कुछ ऐसा है, जिसकी रक्षा करके उसे सुरक्षित किया जा सकता है। अगर व्यक्ति आदिवासियों की संस्कृतियों के विकास के नाम पर नष्ट करने के बजाए, उसे संजोए तो चीजें सुधार सकती हैं। कवयित्री को आशा है, कि सब ठीक हो सकता है। लोगों का विश्वास, उनकी टूटती उम्मीदों को जीवित करना, सपनों को पूरा करना आदि ऐसे तत्व हैं, जिन्हें सामूहिक प्रयासों से बचाया जा सकता है।

प्रश्न 6 – निम्नलिखित पंक्तियों के काव्य-सौंदर्य को उद्घाटित कीजिए :
(क) ठंडी होती दिनचर्या में,
जीवन की गर्माहट

उत्तर – इस पंक्ति में कवयित्री ने आदिवासी क्षेत्रों में विस्थापन की पीड़ा को व्यक्त किया है। विस्थापन से वहाँ के लोगों की दिनचर्या ठंडी पड़ गई है। हम अपने प्रयासों से उनके जीवन में उत्साह जगा सकते हैं। यह काव्य पंक्ति लाक्षणिक है। इसका अर्थ है-उत्साहहीन जीवन। ‘गर्माहट’ उमंग, उत्साह और क्रियाशीलता का प्रतीक है। इन प्रतीकों से अर्थ गंभीर्य आया है। शांत रस विद्यमान है। अतुकांत अभिव्यक्ति है।

(ख) थोड़ा-सा विश्वास
थोड़ा-सी उम्मीद
थोड़े-से सपने
आओ, मिलकर बचाएँ।

उत्तर – इस अंश में कवयित्री अपने प्रयासों से लोगों की उम्मीदें, विश्वास व सपनों को जीवित रखना चाहती है। समाज में बढ़ते अविश्वास के कारण व्यक्ति का विकास रुक-सा गया है। वह सभी लोगों से मिलकर प्रयास करने का आहवान करती है। उसका स्वर आशावादी है। ‘थोड़ा-सा’; ‘थोड़ी-सी’ वे ‘थोड़े-से’ तीनों प्रयोग एक ही अर्थ के वाहक है। अतः अनुप्रास अलंकार है। दूर्द (उम्मीद), संस्कृत (विश्वास) तथा तद्भव (सपने) शब्दों को मिला-जुला प्रयोग किया है। तुक, छंद और संगीत विहीन होते हुए कथ्य में आकर्षण है। खड़ी बोली है।

प्रश्न 7 – बस्तियों को शहर की किस आबो-हवा से बचाने की आवश्यकता है?

उत्तर – बस्तियों को शहर की नग्नता व जड़ता से बचाने की जरूरत है। स्वभावगत, वेशभूषा व वनस्पति विहीन नग्नता से बचाने का प्रयास सामूहिक तौर पर हो सकता है। शहरी जिंदगी में उमंग, उत्साह व अपनेपन का अभाव होता है। शहर के लोग अलगाव भरी जिंदगी व्यतीत करते हैं। कविता में कवयित्री बस्तियों को शहर की आबों हवा से बचाने की बात करती है, उनके यह कहने का अर्थ है, कि जिस शहरी परिवेश को ग्रामीण जीवन के लिए आदर्श समझ जाता है। वह न केवल संस्कृतियों के घातक है, बल्कि मानवीय पतन की अध्यक्षता कर रहा है। वे शहर में पर्यावरण व्यवहार से परेशान हैं, एकांकी जीवन, अलगाव, और व्यस्तता आदि समस्याओं से बस्तियों को बचाना चाहती हैं।

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आरोह भाग 1 ( कक्षा 11) ( पूरी पुस्तक एक साथ )

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मियाँ नसिरुद्दीन ( रेखाचित्र ) : कृष्णा सोबती

अपु के साथ ढाई साल ( संस्मरण ): सत्यजित राय

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गलता लोहा ( शेखर जोशी )/ Galta Loha ( Shekhar Joshi )

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भारत माता ( जवाहरलाल नेहरू ) / Bharat Mata ( Jawaharlal Nahru )

आत्मा का ताप ( सैयद हैदर रज़ा ) / Aatma Ka Taap ( Saiyad Haidar Raza )

आरोह भाग 1 ( काव्य खंड )

हम तो एक एक करि जांनां कबीर ( Kabir Ke Pad Class 11)

कबीर ( Kabir )

मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई / मीरा( मीराबाई)

मीरा ( Mirabai )

पथिक : रामनरेश त्रिपाठी ( Pathik : Ram Naresh Tripathi )

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चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती : त्रिलोचन

साये में धूप ( दुष्यंत कुमार )

अक्क महादेवी ( Akka Mahadevi )

सबसे खतरनाक : पाश ( Sabse Khatarnak : Pash )

आओ मिलकर बचाएँ : निर्मला पुतुल ( Aao, Milkar Bachayen : Nirmala Putul )

वितान भाग 1 ( कक्षा 11)

▪️भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ : लता मंगेशकर ( कुमार गन्धर्व )

▪️राजस्थान की रजत बूंदें ( अनुपम मिश्र ) / Rajasthan Ki Rajat Boonden ( Anupam Mishra )

▪️.आलो आँधारी ( बेबी हालदार )

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