आलोक धन्वा का साहित्यिक परिचय

जीवन परिचय आलोक धन्वा का जन्म 2 जुलाई 1948 को बिहार के मुंगेर जिले के बेलबिहमा गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ। वे हिंदी साहित्य के सशक्त जनकवि हैं, जिन्होंने 1970 के दशक में नई कविता को सामाजिक चेतना से जोड़ा। उनकी पहली कविता ‘जनता का आदमी’ ने 1972 में ‘वाम’ पत्रिका में प्रकाशित … Read more

चाँद और कवि ( रामधारी सिंह दिनकर )

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,आदमी भी क्या अनोखा जीव है!उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है। जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरतेऔर लाखों बार तुझ-से पागलों को भीचाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते। आदमी का स्वप्न? है … Read more

कुकुरमुत्ता ( सूर्यकांत त्रिपाठी निराला )

कुकुरमुत्ता भाग 1 एक थे नव्वाब, फ़ारस के मँगाए थे गुलाब।बड़ी बाड़ी में लगाए देशी पौधे भी उगाएरखे माली कई नौकर ग़ज़नवी का बाग़ मनहरलग रहा था। एक सपना जग रहा था साँस पर तहज़ीब की, गोद पर तरतीब की।क्यारियाँ सुंदर बनी चमन में फैली घनी।फूलों के पौधे वहाँ लग रहे थे ख़ुशनुमा।बेला, गुलशब्बो, चमेली, … Read more

सरदार पूर्ण सिंह का साहित्यिक परिचय

जीवन परिचय सरदार पूर्ण सिंह जिन्हें अध्यापक पूर्ण सिंह के नाम से जाना जाता है, का जन्म 17 फरवरी 1881 को एबटाबाद (वर्तमान पाकिस्तान) के सलहड़ गाँव में एक सिख परिवार में हुआ था। उनके पिता करतार सिंह राजस्व विभाग में कार्यरत थे, जबकि माता परमा देवी धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। प्रारंभिक शिक्षा रावलपिंडी से … Read more

पीछे मत फेंकिये ( निबंध ) : बालमुकुंद गुप्त / Piche Mat Fenkiye ( Nibandh ) : Balmukund Gupt

‘पीछे मत फेंकिये’ ( निबंध ) का मूल पाठ माई लार्ड! सौ साल पूरे होने में अभी कई महीनों की कसर है। उस समय ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने लार्ड कार्नवालिस को दूसरी बार इस देश का गवर्नर-जनरल बनाकर भेजा था। तबसे अब तक आप ही को भारतवर्ष का फिर से शासक बनकर आने का अवसर … Read more

‘बूढ़ी काकी’ कहानी की तात्विक समीक्षा / ‘Budhi Kaki’ Kahani Ki Tatvik Samiksha

मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘बूढ़ी काकी’ हिंदी साहित्य की एक मार्मिक कृति है, जो बुढ़ापे की लाचारी, पारिवारिक उपेक्षा और मानवीय संवेदनाओं को यथार्थवादी ढंग से उजागर करती है। कहानी-कला के छह प्रमुख तत्वों—कथावस्तु, पात्र एवं चरित्र-चित्रण, कथोपकथन या संवाद, देशकाल या वातावरण, उद्देश्य तथा भाषा-शैली—के आधार पर इसकी तात्विक समीक्षा निम्नलिखित है : (1) … Read more

‘मजदूरी और प्रेम’ निबंध का सारांश व मूल भाव या संदेश

सरदार पूर्ण सिंह का निबंध ‘मजदूरी और प्रेम’ हिंदी साहित्य की एक महत्वपूर्ण रचना है, जो श्रम की गरिमा, पवित्रता और प्रेम के साथ इसके संयोग को काव्यात्मक तथा दार्शनिक शैली में प्रस्तुत करता है। निबंध का उद्देश्य आधुनिक समाज में श्रम की उपेक्षा की आलोचना करना और प्रेमपूर्ण श्रम को ईश्वरीय बताना है। निबंध … Read more

साहित्य का उद्देश्य ( हिंदी निबंध ) : प्रेमचंद

यह निबंध वास्तव में 1936 में लखनऊ में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन में प्रेमचंद द्वारा दिया गया अध्यक्षीय भाषण है | सज्जनो, यह सम्मेलन हमारे साहित्य के इतिहास में स्मरणीय घटना है। हमारे सम्मेलनों और अंजुमनों में अब तक आम तौर पर भाषा और उसके प्रचार पर ही बहस की जाती रही … Read more

नाखून क्यों बढ़ते हैं ( निबंध ) : हजारी प्रसाद द्विवेदी / Nakhoon Kyon Badhte Hain ( Nibandh ) : Hajari Prasad Dvivedi

बच्चे कभी-कभी चक्कर में डाल देनेवाले प्रश्न कर बैठते हैं। अल्पज्ञ पिता बड़ा दयनीय जीव होता है। मेरी छोटी लड़की ने जब उस दिन पूछ दिया कि आदमी के नाखून क्यों बढ़ते हैं, तो मैं कुछ सोच ही नहीं सका। हर तीसरे दिन नाखून बढ़ जाते हैं, बच्चे कुछ दिन तक अगर उन्हें बढ़ने दें, … Read more

मजदूरी और प्रेम ( निबंध ) : सरदार पूर्ण सिंह / Majdoori Aur Prem ( Nibandh ) : Sardar Pooran Singh

हल चलाने वाले का जीवन हल चलाने वाले और भेड़ चराने वाले प्रायः स्वभाव से ही साधु होते हैं। हल चलाने वाले अपने शरीर का हवन किया करते हैं। खेत उनकी हवनशाला है। उनके हवनकुंड की ज्वाला की किरणें चावल के लंबे और सुफेद दानों के रूप में निकलती हैं। गेहूँ के लाल-लाल दाने इस … Read more

भिक्षुक ( सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ) / Bhikshuk ( Suryakant Tripathi Nirala )

वह आता–दो टूक कलेजे को करता, पछतातापथ पर आता। पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,चल रहा लकुटिया टेक,मुट्ठी भर दाने को — भूख मिटाने कोमुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता —दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता। साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाए,बाएँ से वे मलते हुए पेट को चलते,और दाहिना … Read more

पुराना जमाना नया जमाना ( हिंदी निबंध ) : प्रेमचंद

Purana Jamana Naya Jamana (Hindi Nibandh) 🙁 Munshi Premchand ) पुराने जमाने में सभ्यता का अर्थ आत्मा की सभ्यता और आचार की सभ्यता होता था। वर्तमान युग में सभ्यता का अर्थ है स्वार्थ और आडंबर। उसका नैतिक पक्ष छूट गया। उसकी सूरत बदल कर अब वह हो गई है जिसे हमारे पुराने लोग असभ्यता कहते। … Read more

स्वदेशी आंदोलन ( मुंशी प्रेमचंद )

हिन्दुस्तान के लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्रों और पत्रिकाओं ने इस देशभक्तिपूर्ण आंदोलन का समर्थन किया है और जो पहले थोडा हिचकिचा रहे थे उनका भी अब विश्वास पक्का होता जाता है। मगर अभी अक्सर भलाई चाहने वालों की जबान से सुनने में आता है कि वह उन मुश्किलों का सामना करने के काबिल नहीं हैं … Read more

कफ़न ( मुंशी प्रेमचंद )

झोपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए हैं और अन्दर बेटे की जवान बीवी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी. रह-रहकर उसके मुंह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे. जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे … Read more

मनोवृत्ति (हिंदी कहानी) : मुंशी प्रेमचंद

Manovritti (Hindi Kahani) : Munshi Premchand एक सुन्दर युवती, प्रातःकाल गाँधी पार्क में बिल्लौर के बेंच पर गहरी नींद में सोयी पायी जाय, यह चौंका देनेवाली बात है। सुन्दरियाँ पार्कों में हवा खाने आती हैं, हँसती हैं, दौड़ती हैं, फूल-पौधों से खेलती हैं, किसी का इधर ध्यान नहीं जाता, लेकिन कोई युवती रविश के किनारेवाले … Read more

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