श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 6)
(1) दया, माया, ममता लो आज,मधुरिमा लो, अगाध विश्वास; हमारा हृदय रत्न निधि स्वच्छतुम्हारे लिए खुला है पास। प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन और वार्तालाप का वर्णन किया गया है … Read more