रंगमंच एक जीवंत और परिवर्तनशील कला है। समय, परिस्थिति, और दर्शकों की रुचि के अनुसार नाटकों को मंच पर प्रस्तुत करने के तरीके निरंतर बदलते रहे हैं। नाटक के प्रस्तुतीकरण (Presentation) के इन्हीं अलग-अलग तरीकों को ‘रंगमंच की शैली’ (Style of Theatre) कहा जाता है। एक ही नाटक को अलग-अलग शैलियों में खेला जा सकता है और हर शैली का दर्शकों पर अपना एक अलग प्रभाव होता है।
विश्वविद्यालयी स्तर पर हिंदी रंगमंच के अध्ययन में इन शैलियों को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। हिंदी रंगमंच ने अपने विकास क्रम में कई प्रमुख शैलियों को अपनाया है, जिनका सरल विवरण निम्नलिखित है:
1. लोक रंगमंच शैली (Folk Theatre Style)
हिंदी रंगमंच की जड़ें भारत की लोक-कलाओं में बहुत गहराई तक फैली हुई हैं। यह सबसे प्राचीन, उन्मुक्त और ज़मीनी शैली है।
- विशेषताएँ: इस शैली की सबसे बड़ी विशेषता इसकी आत्मीयता और सरलता है। इसके मंचन के लिए किसी भव्य ऑडिटोरियम की आवश्यकता नहीं होती; यह गाँव की चौपाल, मंदिर के प्रांगण या खुले मैदान में खेला जा सकता है। दर्शक चारों ओर बैठते हैं और कलाकार बीच में अभिनय करते हैं। इसमें गीत, संगीत, और स्थानीय बोलियों की प्रधानता होती है। इसमें कोई ‘चौथी दीवार’ (Fourth Wall) नहीं होती, यानी अभिनेता सीधे दर्शकों से संवाद करते हैं।
- उदाहरण: उत्तर भारत की रामलीला, नौटंकी, रासलीला, हरियाणा का ‘सांग’ और मध्य प्रदेश का ‘माच’। हबीब तनवीर ने ‘चरनदास चोर’ नाटक में इस शैली का बेहद शानदार आधुनिक प्रयोग किया था।
2. पारसी रंगमंच शैली (Parsi Theatre Style)
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में यह शैली पूरे भारत में बहुत लोकप्रिय हुई। यह मुख्य रूप से एक व्यावसायिक शैली थी जिसका प्रमुख उद्देश्य दर्शकों का मनोरंजन करना था।
- विशेषताएँ: पारसी रंगमंच की सबसे बड़ी पहचान इसका ‘अति-नाटकीय’ (Melodramatic) स्वरूप था। इसमें बहुत ही भड़कीले और जादुई सेट लगाए जाते थे (जैसे मंच पर परियों का हवा में उड़ना)। वेशभूषा चमकीली होती थी और अभिनेता ऊँची आवाज़ में, शेरो-शायरी से भरे लंबे-लंबे संवाद बोलते थे। इसमें भावनाओं को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता था।
- प्रभाव: यद्यपि इसमें साहित्यिक गहराई का अभाव था, लेकिन आम जनता को थिएटर तक खींचने में इस शैली का बहुत बड़ा योगदान रहा है। आगा हश्र कश्मीरी इस शैली के एक प्रमुख नाम थे।
3. यथार्थवादी शैली (Realistic Theatre Style)
जैसे-जैसे समाज में बदलाव आया, रंगमंच पर भी जीवन की असली सच्चाई को दिखाने की मांग उठने लगी। आज़ादी के बाद हिंदी रंगमंच ने इस यथार्थवादी शैली को सबसे अधिक अपनाया।
- विशेषताएँ: इस शैली का मूल मंत्र है— “जीवन को मंच पर ज्यों का त्यों प्रस्तुत करना।” इस शैली में मंच पर सेट बिल्कुल असली घर या कमरे जैसा बनाया जाता है। कलाकार आम लोगों जैसे ही कपड़े पहनते हैं और उनकी भाषा बिल्कुल रोज़मर्रा की बोलचाल वाली होती है। यहाँ अभिनेता अत्यंत स्वाभाविक अभिनय करते हैं, मानो वे कोई असली ज़िंदगी जी रहे हों।
- उदाहरण: इस शैली में समाज की समस्याओं और मध्यवर्गीय परिवारों की उलझनों को दिखाया जाता है। मोहन राकेश के प्रसिद्ध नाटक ‘आधे अधूरे’ और ‘आषाढ़ का एक दिन’ यथार्थवादी शैली के मील के पत्थर माने जाते हैं।
4. प्रतीकात्मक और काव्य-नाटक शैली (Symbolic and Poetic Style)
यह एक अत्यंत कलात्मक और बौद्धिक शैली है। जब नाटककार अपनी बात को सीधे-सीधे न कहकर प्रतीकों (Symbols) और कविताओं के माध्यम से कहना चाहता है, तब इस शैली का प्रयोग होता है।
- विशेषताएँ: इस शैली में मंच-सज्जा बहुत ही साधारण (Minimalist) होती है। मंच पर रखी केवल एक सीढ़ी किसी बड़े महल का प्रतीक हो सकती है, या लाल प्रकाश युद्ध का प्रतीक हो सकता है। संवादों की भाषा में एक खास तरह की लय, संगीत और दार्शनिकता होती है। यह शैली दर्शकों को गहरे विचार में डाल देती है।
- उदाहरण: धर्मवीर भारती द्वारा रचित ‘अंधा युग’ (महाभारत के युद्ध के बाद की कहानी) हिंदी की काव्य-नाटक और प्रतीकात्मक शैली का सबसे महान उदाहरण है।
5. नुक्कड़ नाटक शैली (Street Theatre Style)
यह रंगमंच की सबसे विद्रोही, ऊर्जावान और जनता से सीधी जुड़ने वाली शैली है। इसका जन्म समाज में तुरंत जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से हुआ।
- विशेषताएँ: इसके लिए न तो किसी बंद थिएटर की ज़रूरत होती है, न माइक की, और न ही किसी विशेष प्रकाश व्यवस्था की। कलाकार किसी भी चौराहे, कॉलेज परिसर या बाज़ार में गोल घेरा बनाकर खड़े हो जाते हैं और अपनी तेज़ आवाज़ तथा ढोलक के शोर से दर्शकों को इकट्ठा कर लेते हैं। इसका मुख्य फोकस भ्रष्टाचार, महिला उत्पीड़न, या महँगाई जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों पर होता है।
- प्रभाव: यह शैली दर्शकों को सोचने और सवाल करने पर मजबूर करती है। हिंदी रंगमंच में सफदर हाशमी का नाम इस शैली के लिए अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है।
6. प्रयोगात्मक और आधुनिक शैली (Experimental Style)
आज का हिंदी रंगमंच बहुत सी शैलियों का मिश्रण बन चुका है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) के निर्देशकों ने इस शैली को जन्म दिया है। इसमें निर्देशक नई-नई तकनीकों का प्रयोग करता है। कहानी कहने के लिए आधुनिक ‘लाइटिंग’, उन्नत ध्वनि (Sound), और ‘बॉडी लैंग्वेज’ (आंगिक अभिनय) का भरपूर सहारा लिया जाता है। यह एक निर्देशक-प्रधान शैली है, जहाँ मंच पर प्रयोग करने की पूरी कलात्मक आज़ादी होती है।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि हिंदी रंगमंच किसी एक शैली के दायरे में सीमित नहीं रहा है। समय की मांग के अनुसार इसने विभिन्न रूप धारण किए हैं। जहाँ लोक और पारसी शैली ने इसे जनसामान्य से जोड़ा, वहीं यथार्थवादी शैली ने इसे जीवन की कटु सच्चाइयों के करीब ला खड़ा किया। प्रतीकात्मक शैली ने इसे साहित्यिक गहराई प्रदान की, तो नुक्कड़ नाटकों ने इसे सामाजिक परिवर्तन का एक धारदार हथियार बनाया। ये सभी विविध शैलियाँ मिलकर ही हिंदी रंगमंच की एक मुकम्मल और गौरवशाली तस्वीर का निर्माण करती हैं।