कक्षा 11 की हिंदी की पाठ्य-पुस्तक 'आरोह भाग 1' में संकलित ''आत्मा का ताप" ( सैयद हैदर रज़ा ) का मूल पाठ अभ्यास के प्रश्नों सहित |
नागपुर स्कूल की परीक्षा में मैं कक्षा में प्रथम आया, दस में से नौ विषयों में मुझे विशेष योग्यता प्राप्त हुई। इससे मुझे बड़ी मदद मिली। पिता जी रिटायर हो चुके थे। अब मुझे नौकरी ढूँढ़नी थी। मैं गोंदिया’ में ड्राइंग का अध्यापक बन गया। महीने भर में ही मुझे बंबई में ‘जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट’ में अध्ययन के लिए मध्य प्रांत की सरकारी छात्रवृत्ति मिली। यह सितंबर 1943 की बात है। मैंने अमरावती’ के गवर्नमेंट नॉर्मल स्कूल से त्यागपत्र दे दिया। जब तक मैं बंबई पहुंचा तब तक जे.जे. स्कूल में दाखिला बंद हो चुका था। दाखिला हो भी जाता तो उपस्थिति का प्रतिशत पूरा न हो पाता। छात्रवृत्ति वापस ले ली गई। सरकार ने मुझे अकोला में ड्राइंग अध्यापक की नौकरी देने की पेशकश की। मैंने तय किया कि मैं लौटूंगा नहीं, बंबई में ही अध्ययन करूँगा। मुझे शहर पसंद आया, वातावरण पसंद आया, गैलरियाँ और शहरों में अपने पहले मित्र पसंद आए। और भी अच्छी बात यह हुई कि मुझे एक्सप्रेस ब्लॉक स्टूडियो में डिजाइनर की नौकरी मिल गई। यह स्टूडियो फ़ीरोजशाह मेहता रोड पर था। एक बार फिर कड़ी मेहनत का दौर चला। करीब साल भर में ही स्टूडियो के मालिक श्री जलील और मैनेजर श्री हुसैन ने मुझे मुख्य डिजाइनर बना दिया। सुबह दस बजे से शाम छह बजे तक मैं दफ़्तर में काम करता। फिर मैं अध्ययन के लिए मोहन आर्ट क्लब जाता और फिर जेकब सर्कल जहाँ भाई के परिचित एक टैक्सी ड्राइवर ने मुझे रहने की जगह दे रखी थी। उसने कहा कि मैं तो टैक्सी रात को ही चलाता हूँ तो तुम वहाँ सो सकते हो। वह दिन में कमरे पर लौटता। यह छोटा-सा कमरा जेकब सर्कल सात रास्ता में पहली मंजिल पर था। एक रात जब साढ़े नौ बजे मैं कमरे पर पहुँचा तो हमारे दरवाजे पर एक पुलिसवाला खड़ा था। उसने कहा कि तुम अंदर नहीं जा सकते, यहाँ हत्या की वारदात हुई है। हमलोग कभी भी राजनीति या किसी भी तरह की संदिग्ध गतिविधियों में शामिल नहीं हुए थे। मेरी तो अक्ल गुम हो गई। मैं तुरंत पुलिस स्टेशन जाकर कमिश्नर से मिला। उन्हें बताया कि मैं एक विद्यार्थी हूँ, जेकब सर्कल में रहता हूँ, मेरे कमरे के बाहर पुलिसवाला खड़ा है और मुझे अंदर नहीं जाने दे रहा है। उन्होंने बताया कि मेरे टैक्सी ड्राइवर मित्र राल्फ़ पर या मुझ पर शक नहीं है। राल्फ़ की टैक्सी में किसी ने एक सवारी की छुरा मारकर हत्या कर दी थी। अगले दिन मैंने जलील साहब को रामकहानी सुनाई तो उन्होंने मुझे आर्ट डिपार्टमेंट में कमरा दे दिया। मैं फ़र्श पर सोता। वे मुझे रात ग्यारह-बारह बजे तक गलियों के चित्र या और तरह-तरह के स्केच बनाते देखते। कभी-कभी वे कहते कि तुम बहुत देर तक काम करते रह गए, अब सो जाओ। कुछ महीने बाद उन्होंने मुझे एक बहुत शानदार ठिकाना देने की पेशकश की-उनके चचेरे भाई के छठी मंजिल के फ़्लैट का एक कमरा। उसमें दो पलंग पड़े थे। उनकी योजना यह थी कि अगर मैं उनके यहाँ काम करता रहा तो मुझे कला विभाग का प्रमुख बना दिया जाए। मैं जेकब सर्कल का सात रास्ते वाला घर और उसका गलीज़ वातावरण छोड़कर नए ठिकाने पर आ गया और पूरी तरह अपने काम में डूब गया। इसका परिणाम यह हुआ कि चार बरस में, 1948 में, बॉम्बे आर्ट्स सोसाइटी का स्वर्ण पदक मुझे मिला। इस सम्मान को पाने वाला मैं सबसे कम आयु का कलाकार था। दो बरस बाद मुझे फ्रांस सरकार की छात्रवृत्ति मिल गई। मैंने खुद को याद दिलायाः भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं। मेरे पहले दो चित्र नवंबर 1943 में आर्ट्स सोसाइटी ऑफ इंडिया की प्रदर्शनी में प्रदर्शित हुए। उद्घाटन में मुझे आमंत्रित नहीं किया गया, क्योंकि मैं जाना-माना नाम नहीं था। अगले दिन मैंने ‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में प्रदर्शनी की समीक्षा पढ़ी। कला-समीक्षक रुडॉलफ वॉन लेडेन ने मेरे चित्रों की काफ़ी तारीफ की थी। उसका पहला वाक्य मुझे आज भी याद है, “इनमें से कई चित्र पहले भी प्रदर्शित हो चुके हैं, और नयों में कोई नई प्रतिभा नहीं दिखी। हाँ, एस.एच. रजा के नाम के छात्र के एक-दो जलरंग लुभावने हैं। उनमें संयोजन और रंगों के दक्ष प्रयोग की जबरदस्त समझदारी दिखती है।” दोनों चित्र 40-40 रुपये में बिक गए। एक्सप्रेस ब्लॉक स्टूडियोज़ में आठ-दस घंटा रोज काम करने के बाद भी महीने भर में मुझे इतने रुपये नहीं मिल पाते थे। वेनिस अकादमी के प्रोफ़ेसर वाल्टर लैंगहैमर से भेंट हुई तो उन्होंने जर्मन उच्चारणवाली अंग्रेजी में कहा, “आई लफ्ड यूअर स्टॅफ, मिस्टर रत्जा” (रजा साहब, मुझे आपका काम पसंद आया)। रुडॉल्फ वॉन लेडेन भी कृपा बनाए रखते थे। इसके बाद वियना के एक कला-संग्राहक एम्मेनुएल श्लैसिंगर मेरे काम के प्रशंसक बने, यह मेरी बहुमूल्य उपलब्धि थी। समय के साथ-साथ चीजें होती चली गईं। प्रोफ़ेसर लैंगहैमर ने काम करने के लिए अपना स्टूडियो दे दिया। वे ‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में आर्ट डायरेक्टर थे। मैं दिन में उनके स्टूडियो में चित्र बनाता, शाम को चित्र उन्हें दिखाता तो वे बारीकी से उनका विश्लेषण करते। मेरे काम में उनकी रुचि बढ़ती गई। मेरा काम निखरता गया। वे मेरे चित्र खरीदने लगे और आखिर मेरे लिए नौकरी छोड़कर कला के अध्ययन में जुट पाना संभव हो सका। 1947 में मैं जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट का नियमित छात्र बन गया, क्योंकि अब मैं नौकरी किए बिना भी अपनी फ्रीस और रहने का खर्चा उठा सकता था।
भले ही 1947 और 1948 में महत्वपूर्ण घटनाएँ घटी हों, मेरे लिए वे कठिन बरस थे। पहले तो कल्याण वाले घर में मेरे पास रहते मेरी माँ का देहांत हो गया। पिता जी मेरे पास ही थे। वे मंडला लौट गए। मई 1948 में वे भी नहीं रहे। विभाजन की त्रासदी के बावजूद भारत स्वतंत्र था। उत्साह था, उदासी भी थी। जीवन पर अचानक जिम्मेदारियों का बोझ आ पड़ा। हम युवा थे। मैं पच्चीस बरस का था, लेखकों, कवियों, चित्रकारों की संगत थी। हमें लगता था कि हम पहाड़ हिला सकते हैं। और सभी अपने-अपने क्षेत्रों में, अपने माध्यम में सामर्थ्य भर-बढ़िया काम करने में जुट गए। देश का विभाजन, महात्मा गांधी की हत्या क्रूर घटनाएँ थीं। व्यक्तिगत स्तर पर, मेरे माता-पिता की मृत्यु भी ऐसी ही क्रूर घटना थी। हमें इन क्रूर अनुभवों को आत्मसात करना था। हम उससे उबर काम में जुट गए।
1948 में मैं श्रीनगर गया, वहाँ चित्र बनाए। ख्वाजा अहमद अब्बास भी वहीं थे। कश्मीर पर कबायली* आक्रमण हुआ, तब तक मैंने तय कर लिया था कि भारत में ही रहूँगा। मैं श्रीनगर से आगे बारामूला तक गया। घुसपैठियों ने बारामूला को ध्वस्त कर दिया था। मेरे पास कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला का पत्र था. जिसमें कहा गया था कि यह एक भारतीय कलाकार हैं, इन्हें जहाँ चाहे वहाँ जाने दिया जाए और इनकी हर संभव सहायता की जाए। एक बार मैं बस से बारामूला से लौट रहा था या वहाँ जा रहा था तो स्थानीय कश्मीरियों के बीच मुझ पैंटधारी शहराती को देखकर एक पुलिसवाले ने मुझे बस से उतार लिया। मैं उसके साथ चल दिया। उसने पूछा, “कहाँ से आए हो? नाम क्या है?” मैंने बता दिया कि मैं रजा हूँ, बंबई से आया हूँ। शेख साहब की चिट्ठी उसे दिखाई। उसने सलाम ठोंका और परेशानी के लिए माफ़ी माँगता हुआ चला गया।
श्रीनगर की इसी यात्रा में मेरी भेंट प्रख्यात फ्रेंच फोटोग्राफ़र हेनरी कार्तिए-ब्रेसाँ से हुई। मेरे चित्र देखने के बाद उन्होंने जो टिप्पणी की वह मेरे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण रही है। उन्होंने कहा “तुम प्रतिभाशाली हो, लेकिन प्रतिभाशाली युवा चित्रकारों को लेकर मैं संदेहशील हूँ। तुम्हारे चित्रों में रंग है, भावना है, लेकिन रचना नहीं है। तुम्हें मालूम होना चाहिए कि चित्र इमारत की ही तरह बनाया जाता है-आधार, नींव, दीवारें, बीम, छत और तब जाकर वह टिकता है। मैं कहूँगा कि तुम सेजाँ का काम ध्यान से देखो।” इन टिप्पणियों का मुझ पर गहरा प्रभाव रहा। बंबई लौटकर मैंने फ्रेंच सीखने के लिए अलयांस फ्रांसे में दाखिला ले लिया। फ्रेंच पेंटिंग में मेरी खासी रुचि थी, लेकिन मैं समझना चाहता था कि चित्र में रचना या बनावट वास्तव में क्या होगी।
1950 में एक गंभीर वार्तालाप के दौरान फ्रेंच दूतावास के सांस्कृतिक सचिव ने मुझसे पूछा, “तुम फ्रांस जाकर कला का अध्ययन क्यों करना चाहते हो?” मैंने पूरे आत्मविश्वास से उत्तर दिया, “फ्रेंच कलाकारों का चित्रण पर अधिकार है। फ्रेंच पेंटिंग मुझे अच्छी लगती है।” “तुम्हारे पसंदीदा कलाकार?” “सेजाँ, वॉन गॉग, गोगाँ पिकासो, मातीस, शागाल और ब्रॉक।” “पिकासो के काम के बारे में तुम्हारा क्या विचार है?” मैंने कहा “पिकासो का हर दौर महत्वपूर्ण है, क्योंकि पिकासो जीनियस है।” वह इतने खुश हुए कि मुझे एक के बजाय दो बरस के लिए छात्रवृत्ति मिली। मैं सितंबर में फ्रांस के लिए निकला और 2 अक्टूबर 1950 को मार्सेई पहुँचा। यूँ पेरिस में मेरा जीवन प्रारंभ हुआ। बंबई में रहते एक ऊर्जा थी, काम करने की एक इच्छा थी। आत्मा को चढ़ा यह ताप लोगों को दिखाई देता था। अपने यहाँ ज़बरदस्त उदारता थी। कोई काम करने का इच्छुक हो तो लोग सहायता को तैयार रहते थे।
मैं अपने कुटुंब के युवा लोगों से कहता रहता हूँ कि तुम्हें सब कुछ मिल सकता है बस, तुम्हें मेहनत करनी होगी। चित्रकला व्यवसाय नहीं, अंतरात्मा की पुकार है। इसे अपना सर्वस्व देकर ही कुछ ठोस परिणाम मिल पाते हैं। केवल जहरा जाफ़री को कार्य करने की ऐसी लगन मिली। वह पूरे समर्पण से दमोह शहर के आसपास के ग्रामीणों के साथ काम करती हैं। कल मैंने उन्हें फ़ोन किया-यह जानने के लिए कि वह दमोह में क्या कर रही हैं। उन्हें बड़ी खुशी हुई कि मुझे सूर्यप्रकाश (उस ग्रामीण स्त्री का पति, जो अपने पति का नाम नहीं ले रही थी) का किस्सा याद है। मैंने धृष्टता से उन्हें बताया कि ‘बिन माँगे मोती मिले, मौगे मिले न भीख।’ मेरे मन में शायद युवा मित्रों को यह संदेश देने की कामना है कि कुछ घटने के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे न बैठे रहो खुद कुछ करो। जरा देखिए, अच्छे-खासे संपन्न परिवारों के बच्चे काम नहीं कर रहे, जबकि उनमें तमाम संभावनाएँ हैं। और यहाँ हम बेचैनी से भरे, काम किए जाते हैं। मैं बुखार से छटपटाता-सा, अपनी आत्मा, अपने चित्त को संतप्त किए रहता हूँ। मैं कुछ ऐसी बात कर रहा हूँ, जिसमें खामी लगती है। यह बहुत गजब की बात नहीं है, लेकिन मुझमें काम करने का संकल्प है। भगवद् गीता कहती है, “जीवन में जो कुछ भी है, तनाव के कारण है।” बचपन, जीवन का पहला चरण, एक जागृति है। लेकिन मेरे जीवन का बंबईवाला दौर भी जागृति का चरण ही था। कई निजी मसले थे, जिन्हें सुलझाना था। मुझे आजीविका कमानी थी। मैं कहूँगा कि पैसा कमाना महत्वपूर्ण होता है, वैसे अंततः वह महत्वपूर्ण नहीं ही होता। उत्तरदायित्व होते हैं. किराया देना होता है, फ़ीस देनी होती है, अध्ययन करना होता है, काम करना होता है। कुल मिलाकर स्थिति खासी जटिल थी। मेरे माता-पिता के न रहने और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को खो देने से जटिलता और बढ़ी।
अभ्यास के प्रश्न ( आत्मा का ताप )
प्रश्न 1 — रज़ा ने अकोला में ड्राइंग अध्यापक की नौकरी की पेशकश क्यों नहीं स्वीकार की?
उत्तर — रज़ा ने अकोला में ड्राइंग अध्यापक की नौकरी की पेशकश नहीं स्वीकार की, क्योंकि उन्हें मुंबई में ही रहकर अध्ययन करने का निश्चय किया| उन्हें शहर तथा वहाँ का वतावरण और सभी मित्र बहत पसंद आए|
प्रश्न 2 — मुंबई में रहकर कला के लिए रज़ा ने क्या-क्या संघर्ष किए?
उत्तर — मुंबई में रहकर कला के लिए रज़ा को कड़ी मेहनत करनी पड़ी| रज़ा को जिस स्टूडियो में डिजाईनर की नौकरी मिली थी, वह फीरोजशाह मेहता रोड पर था| वहाँ वे सुबह दस बजे से शाम छह बजे तक काम करते थे| काम के बाद अध्ययन के लिए मोहन आर्ट क्लब जाते और रात में वे अपने किसी परिचित टैक्सी ड्राइवर के कमरे में रहते थे| वहाँ उन्हें फर्श पर सोना पड़ता था| वे रात के ग्यारह-बारह बजे तक जागकर स्केच बनाया करते थे| इतने कठिन परिश्रम के बाद 1948 में उन्हें बॉम्बे आर्ट ऑफ़ सोसाइटी का स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ| 1943 में आर्ट्स सोसाइटी ऑफ़ इंडिया की प्रदर्शनी में उनकी चित्रों को प्रदर्शित किया गया| कला समीक्षक रुडॉल्फ़ वॉन लेडेन ने उनके चित्रों की प्रशंसा की| प्रदर्शनी में उनके दो चित्र बीस-बीस रूपये में बिक गए| यह उनके बहुत बड़ी उपलब्धि थी| वेनिस अकादमी के प्रोफेसर लैंगहैमर उनके चित्र के प्रशंसक बने तथा उनके द्वारा बनाई गई चित्रों को खरीदने लगे| इससे रजा के अध्ययन में जुट पाना संभव हो गया और वे जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट के नियमित छात्र बन गए |
प्रश्न 3 — भले ही 1947 और 1948 में महत्वपूर्ण घटनाएँ घटी हों, मेरे लिए वे कठिन बरस थे- रजा ने ऐसा क्यों कहा?
उत्तर — 1947 में भारत आजाद हुआ और 1948 में महात्मा गाँधी की हत्या| लेकिन रजा के लिए ये दोनों वर्ष कठिन दौर थे क्योंकि व्यक्तिगत तौर पर उनके साथ घटनाएँ घटी थीं | 1947 में उनकी माता और फिर 1948 में उनके पिता का देहांत हो गया | पूरे परिवार की जिम्मेदारी का बोझ उनके कन्धों पर आ गया | इस प्रकार उन्हें अनेक क्रूर अनुभवों से गुजरना पड़ा |
प्रश्न 4 — रज़ा के पसंदीदा फ्रेंच कलाकार कौन थे?
उत्तर — रज़ा के पसंदीदा फ्रेंच कलाकार सेजां, वॉन, गॉग, गोगाँ पिकासो, मातीस, शागाल एवं ब्रॉक थे |
प्रश्न 5 — “तुम्हारे चित्रों में रंग है, भावना है, लेकिन रचना नहीं है| चित्र इमारत की ही तरह बनाया जाता है- आधार, नींव, दीवारें, बीम, छत और तब जाकर वह टिकता है |” यह बात :
(क) किसने, किस संदर्भ में कही?
(ख) रज़ा पर इसका क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर — (क) यह बात फ्रेंच फोटोग्राफर हेनरी कार्तिए-ब्रेसाँ ने रजा के चित्रों को देखने के बाद कही |
(ख) उनकी इस टिप्पणी से रज़ा पर गहरा एवं सकारात्मक प्रभाव पड़ा| उन्हें यह महसूस हुआ कि उन्हें चित्रों की बुनियाद मजबूत बनानी पड़ेगी अर्थात उनका आधार मजबूत होना चाहिए| इससे उनकी कला में और भी अधिक निखार आ सकता है |
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