‘परंपरा’ रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित कविता है जो समाज में परंपराओं के प्रति एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। इस कविता में वे क्रांतिकारी विचारों और पुरानी मान्यताओं के बीच टकराव को दर्शाते हैं, लेकिन यह भी बताते हैं कि हमें उन परंपराओं का सम्मान करना चाहिए जो आज भी उपयोगी और जीवनदायी हैं।
परंपरा को अंधी लाठी से मत पीटो
उसमें बहुत कुछ है
जो जीवित है
जीवन दायक है
जैसे भी हो
ध्वंस से बचा रखने लायक हैपानी का छिछला होकर
समतल में दौड़ना
यह क्रांति का नाम है
लेकिन घाट बांध कर
पानी को गहरा बनाना
यह परम्परा का काम है |व्याख्या — परंपराओं की पूर्णत: अनदेखी नहीं करनी चाहिए | इन परंपराओं में बहुत कुछ ऐसा है जो हमारे जीवन के लिए लाभदायक है अतः स्वस्थ परंपराओं को बचाकर रखना आवश्यक है | कवि एक उदाहरण द्वारा अपनी बात को सिद्ध करना चाहता है कि जब पानी की गहराई कम होती है तो वह समतल भू-भाग पर दौड़ता हुआ बहता है लोग इसको क्रांति कहते हैं | लेकिन यदि हम उसे पानी को घाट बनाकर एकत्रित कर लें तो उसे पानी में गहराई आ जाती है | कवि के कहने का अभिप्राय यह है की क्रांति से उत्पन्न विचार प्राय: गंभीर नहीं होते, वे क्षणिक आवेग से उत्पन्न होते हैं | लेकिन परंपरा से आये विचारों में गहराई होती है |
परम्परा और क्रांति में
संघर्ष चलने दो
आग लगी है, तो
सूखी डालों को जलने दोमगर जो डालें
आज भी हरी हैं
उन पर तो तरस खाओ
मेरी एक बात तुम मान जाओ |व्याख्या — परम्परा और क्रान्ति दोनों के आधार अलग-अलग हैं। इसलिए दोनों में संघर्ष का होना अनिवार्य है। कवि का कथन है कि यह संघर्ष निरन्तर चलता रहना चाहिए। इस संघर्ष को रोकने का प्रयास करना उचित नहीं है। जो टहनियों सूख चुकी हैं, उनका आग में जलना अच्छा है लेकिन, जो टहनियों अभी तक हरी-भरी हैं, उनको हमें नष्ट नहीं करना चाहिए। कवि के कहने का भाव यह है कि परम्परा के कारण जो झूठी और बेकार बातें समाज में व्याप्त हैं, उनका समाप्त होना आवश्यक है। ऐसा करने से समाज में सुधार आता है और समाज स्वस्थ बनता है। लेकिन परिवर्तन के दौर में भी जो बातें मंगलकारी हैं, उनकी तो हमें निश्चय ही रक्षा करनी चाहिए। अतः अन्त में कवि पाठकों से यह आग्रह करता है कि वे उन परंपरागत मूल्यों की रक्षा करें जो स्वस्थ समाज के लिए जरूरी हैं।
परम्परा जब लुप्त होती है
लोगों की आस्था के आधार
टुट जाते है
उखड़े हुए पेड़ो के समान
वे अपनी जड़ों से छूट जाते हैपरम्परा जब लुप्त होती है लोगों को नींद नहीं आती न नशा किए बिना चैन या कल पड़ती हैं परंपरा जब लुप्त होती है
सभ्यता अकेलेपन के
दर्द मे मरती है |व्याख्या — कवि कहता है कि जब कुछ कारणों से समाज द्वारा स्वीकार की गई परम्पराएँ टूटने लगती हैं, तब लोगों के विश्वास के आधार भी टूटकर बिखरने लगते हैं। उनकी आस्था को ठेस पहुँचती है। वे आसानी से इस टूटे हुए बिखराव को स्वीकार नहीं करते और असहज हो उठते हैं। कवि उनकी तुलना धरती से उखड़े हुए वृक्षों के साथ करता है जो अपनी जड़ों से टूट कर अलग हो जाते हैं। जिस प्रकार किसी पेड़ को जड़ सहित उखाड़ देने पर वह सूख जाता है, उसी प्रकार परम्पराओं के नष्ट होने पर समाज भी नष्ट होने लगता है। परम्पराओं पर विश्वास रखने वाले लोगों को किसी भी प्रकार से चैन नहीं आता। यहाँ तक कि वे स्वयं को नशे में डुबो देते हैं। जब परम्परा नष्ट होती है तो सभ्यता अकेलेपन की पीड़ा में तड़पने लगती है और अन्त में जीर्ण-शीर्ण होकर नष्ट हो जाती है।
कलमें लगना जानते हो
तो जरुर लगाओ
मगर ऐसी कि फलो में
अपनी मिट्टी का स्वाद रहेऔर ये बात याद रहे
परम्परा चीनी नहीं मधु है
वह न तो हिन्दू है, ना मुस्लिम वह न द्रविड़ है न आर्य है न परंपरा का हर प्रहरी पूरी का शंकराचार्य है |व्याख्या — यदि समाज के कल्याण के लिए नई कलमें लगाना आवश्यक है तो उनको हमें जरूर लगाना चाहिए। लेकिन हमें ऐसी कलमें लगानी चाहिए जिन पर उगने वाले फलों का स्वाद हमारी अपनी मिट्टी का हो। भाव यह है कि परिवर्तन के बाद हमें ऐसी परम्पराओं और मूल्यों का विकास करना चाहिए जो हमारे देश और समाज से जुड़ी हों। लेकिन कवि देशवासियों को सावधान करते हुए कहता है कि परम्परा कोई चीनी नहीं है, बल्कि वह तो शहद है जिसके तैयार होने में काफी समय लगता है। इसके लिए कठोर परिश्रम भी करना पड़ता है। परम्पराओं को बनाने में काफी लम्बा काल व्यतीत हो जाता है। युग बीतने के बाद ही परम्पराओं को स्थापना होती है। परम्पराएँ न तो हिन्दू हैं, न मुसलमान हैं, न द्रविड़ और न ही आर्य हैं अर्थात् परम्परा का सम्बन्ध किसी विशेष जाति अथवा धर्म से नहीं होता। परम्परा का सम्बन्ध पूरे समाज और मानव जाति के साथ होता है। समाज की नस-नस में निवास करने वाली आस्था का नाम परम्परा है। परम्परा की रक्षा करने वाला प्रत्येक व्यक्ति पुरी का शंकराचार्य नहीं होता क्योंकि परम्परा सभी मनुष्यों के प्रयत्नों से निर्मित होती है। किसी एक व्यक्ति या एक वर्ग के प्रयास से परम्परा का निर्माण नहीं होता।
यह भी देखें
हिंदी भाषा एवं आधुनिक हिंदी कविता ( बी ए प्रथम सेमेस्टर ) ( पूरा सिलेबस )
हिंदी भाषा एवं /और आधुनिक हिंदी कविता ( बी ए प्रथम सेमेस्टर kuk )
▪️मैथिलीशरण गुप्त का साहित्यिक परिचय ( Mathilisharan Gupt Ka Sahityik Parichay )
▪️सखी, वे मुझसे कहकर जाते ( मैथिलीशरण गुप्त )
▪️मातृमंदिर ( मैथिलीशरण गुप्त )
▪️जयशंकर प्रसाद का साहित्यिक परिचय ( Jaishankar Prasad Ka Sahityik Parichay )
▪️अशोक की चिंता : जयशंकर प्रसाद ( Ashok Ki Chinta : Jai Shankar Prasad )
▪️आँसू ( Aansu ) : जयशंकर प्रसाद
▪️सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का साहित्यिक परिचय
▪️तोड़ती पत्थर ( Todti Patthar ) (सूर्यकांत त्रिपाठी निराला): व्याख्या व प्रतिपाद्य
▪️बादल राग : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ( Badal Raag : Suryakant Tripathi Nirala )
▪️बादल राग ( Badal Raag ) ( सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ): व्याख्या व प्रतिपाद्य
▪️रामधारी सिंह दिनकर का साहित्यिक परिचय
▪️चाँद और कवि ( रामधारी सिंह दिनकर )
▪️परंपरा ( रामधारी सिंह दिनकर )
▪️ नागार्जुन का साहित्यिक परिचय / जीवन परिचय
▪️बादल को घिरते देखा है ( Badal Ko Ghirte Dekha Hai ) : नागार्जुन
▪️उनको प्रणाम ( Unko Pranam ) :नागार्जुन
3 thoughts on “परंपरा ( रामधारी सिंह दिनकर )/ Parampara (Ramdhari Singh Dinkar )”