साये में धूप ( दुष्यंत कुमार )

( यहाँ NCERT की हिंदी की पाठ्य पुस्तक 'आरोह भाग 1' में संकलित गज़ल 'साये में धूप' की व्याख्या तथा प्रतिपाद्य दिया गया है | )
साये में धूप

कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए,

कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए | 1️⃣

व्याख्या – उपरोक्त पंक्तियों में उन नेताओं पर व्यंग्य किया है जो चुनाव के वक्त जनता को रंग-बिरंगे, लोक-लुभावने सपने दिखाते हैं मगर सत्ता में आते ही जनता से किए वादों को भूल जाते हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में कवि कहते हैं कि आजादी के वक्त हमारे नेताओं ने तय किया था कि हर घर में खुशियों के दीप जलाएंगे यानि हर घर में खुशहाली लाएंगे लेकिन आजादी के इतने साल बाद भी हर घर तो छोड़िए, वो एक शहर तक को खुशहाल नहीं बना पाये।

यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है,

चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए | 2️⃣

व्याख्या – इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि पेड़ों की छाया में भी हमें धूप लग रही है जबकि पेड़ों की छाया में हमें छाँव अर्थात ठंडक मिलनी चाहिए। कहने का भाव यह है कि जिन राजनेताओं को हमने अपने लोक-कल्याण, सुरक्षा व विकास के लिए चुना था। आज वही हमारा शोषण कर रहे हैं , भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। ऐसे समाज में जीना बहुत मुश्किल है। कवि इस समाज को छोड़कर कहीं दूर चले जाना चाहते हैं और फिर कभी लौटकर दोबारा यहाँ नहीं आना चाहते हैं। साथ में वो समाज के अन्य लोगों से भी ऐसे समाज को छोड़ने का आह्वान करते हैं।

न हो कमीज तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे,

ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए | 3️⃣

व्याख्या – प्रस्तुत पंक्तियों में कवि समाज के उन लोगों पर कटाक्ष करते हैं जो हर परिस्थिति में जीने के आदी होते है। उनके आसपास क्या हो रहा हैं। इस बात से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। वो अभाव में भी आराम से जी लेते हैं।
कवि कहते हैं कि अभाव में जीवन जीने के आदी इन लोगों के पास यदि पहनने को कमीज अर्थात कपड़े नहीं होते हैं तो वो अपने पांवों को मोड़ कर अपने पेट को ढंक लेते हैं मगर शासक वर्ग के खिलाफ आवाज तक नहीं उठाते हैं। और ऐसे ही लोग, भ्रष्ट शासक वर्ग के लिए बहुत योग्य या अच्छे होते हैं क्योंकि वो उनका विरोध नहीं करते हैं या उस व्यवस्था के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर नहीं करते हैं।

खुदा नहीं, न सही, आदमी का ख्वाब सही,

कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए | 4️⃣

व्याख्या – उपरोक्त पंक्तियों में कवि कहते हैं कि अगर लोग वर्तमान परिस्थितियों को बदल नहीं सकते हैं या शासक वर्ग पर उनकी किसी बात का कोई असर नहीं हो रहा है तो कोई बात नही। कम से कम वो सुंदर सपने तो देख ही सकते हैं।
कवि कहते हैं कि अगर ईश्वर, इंसान की मनचाही मुराद पूरी नहीं कर रहा हैं तो कोई बात नहीं। कम से कम वह सपनों में ही सही, कुछ मनचाहे सुंदर दृश्य या नजारे देखकर खुश तो हो ही सकता हैं। कहने का आशय यह है कि इन्सान को सपने अवश्य देखने चाहिए भले वो पूरे हों या न हों।

वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता,

मैं बेकरार हूँ, आवाज़ में असर के लिए | 5️⃣

व्याख्या – प्रस्तुत पंक्तियों में कवि कहते हैं कि गरीब व शोषित वर्ग को यह विश्वास हो गया है कि हम कुछ भी कर लें लेकिन इन परिस्थितियों को नही बदल सकते हैं लेकिन मेरे अन्दर इन परिस्थितियों को बदलने की बेचैनी है।
कवि कहते हैं कि अगर हम सब मिलकर इस भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ आवाज उठायेंगे और हमारी आवाज में दम होगा तो ये परिस्थितियां अवश्य बदलेंगी।

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की,

ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए | 6️⃣

व्याख्या – प्रस्तुत पंक्तियों में कवि कहते हैं कि जब भी कोई कवि या लेखक शासन की भ्रष्ट नीतियों के खिलाफ लोगो को जागरूक करने के लिए अपनी आवाज बुलंद करता हैं तो शासन वर्ग उस कवि की जुबान बंद करने की कोशिश करता हैं। उसकी अभिव्यक्ति पर रोक लगा देता हैं।
इसीलिए कवि कहते हैं कि यह संभव हैं कि सत्ताधारी लोग अपनी सत्ता बचाये रखने के लिए मेरी जुबान बंद कर सकते हैं या मेरी अभिव्यक्ति की आजादी को छीन सकते हैं। कवि खुद मानते है कि इस सिस्टम को चलाए रखने के लिए ऐसी सावधानी करनी भी ठीक उसी प्रकार जरूरी है जैसे गजल के छंद (बहर) के लिए बंधन की सावधानी करनी बहुत जरूरी है।

जिएँ तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले

मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए | 7️⃣

व्याख्या – यहाँ पर गुलमोहर शब्द का प्रयोग “ स्वतंत्रता या स्वाभिमान या आत्मसम्मान” के अर्थ में प्रयोग हुआ है। उपरोक्त पंक्तियों में कवि कहते हैं कि इन्सान को अपने घर में भी पूरे आत्मसम्मान व स्वाभिमान के साथ जीवन जीना चाहिए। और अगर अपने घर के बाहर हमारी जान चली भी जाती हैं तो, वो भी अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए जाय यानि घर हो या बाहर, व्यक्ति को सदैव अपने स्वाभिमान व आत्मसम्मान के साथ जीना चाहिए।

अभ्यास के प्रश्न ( साये में धूप )

प्रश्न 1 – आखिरी शेर में गुलमोहर की चर्चा हुई है। क्या उसका आशय एक खास तरह के फूलदार वृक्ष से है या उसमें कोई सांकेतिक अर्थ निहित है? समझा कर लिखें?

उत्तर – “साये में धूप” गजल के आखिरी शेर में “गुलमोहर” शब्द का प्रयोग किया गया है। सामान्यतः गुलमोहर चटक लाल फूलों वाला एक धना व छायादार पेड़ होता है। इस पेड़ के नीचे बैठकर लोग सुकून व आनंद महसूस करते हैं। यह शांति प्रदान करने वाला है। लेकिन दुष्यंत कुमारजी की इस ग़ज़ल में “गुलमोहर” शब्द का प्रयोग सांकेतिक रूप से किया गया है जिसका अर्थ व्यक्ति के स्वाभिमान या आत्मसम्मान से है। कवि कहते हैं कि व्यक्ति को सदैव अपने आत्मसम्मान व स्वाभिमान के साथ इस दुनिया में जीना चाहिए और अपने आत्मसम्मान के लिए अगर मरना भी पड़े तो कोई बात नहीं, खुशी-खुशी अपने प्राण न्यौछावर करने चाहिए।

प्रश्न 2 – पहले शेर में “चिराग” शब्द एक बार बहुवचन में आया है और दूसरी बार एकवचन में। अर्थ और काव्य सौंदर्य की दृष्टि से इसका क्या महत्व है?

उत्तर – पहले शेर में “चिराग” शब्द एकवचन और बहुवचन दोनों रूपों में प्रयोग हुआ है। शेर की पहली पंक्ति के “चिरागाँ” शब्द का अर्थ है “भारत के प्रत्येक शहर व प्रत्येक घर में खुशियों से है”। जबकि दूसरी पंक्ति में “चिराग” शब्द का अर्थ है “सिर्फ एक शहर के लिए खुशियों से है”। वस्तुतः पहले शेर में कवि ने तत्कालीन सामाजिक व राजनैतिक व्यवस्था पर करारी चोट की हैं। आजादी के बाद जिस खुशहाल भारत का सपना भारतीयों ने देखा था, वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। कवि कहते हैं कि सत्ताधारी लोग तो सभी सुख सुविधाएं भोग रहे हैं मगर आम आदमी अपनी मूलभूत सुख सुविधाओं के लिए भी तरस रहा है। काव्य-सौंदर्य की दृष्टि से चिरागाँ के बदले चिराग का न मिलना एक चमत्कारी प्रयोग है जो शाब्दिक कम और अर्थपूर्ण सौंदर्य अधिक बिखेर रहा है।

प्रश्न 3 – गजल के तीसरे शेर को गौर से पढ़िए। यहाँ दुष्यंत का इशारा किस तरह के लोगों की ओर है?

उत्तर – गजल के तीसरे शेर में कवि दुष्यंत कुमार ने उन उत्साहहीन, दीन हीन, बेबस और मजबूर लोगों की ओर इशारा किया हैं जिन्होंने भ्रष्ट शासन व्यवस्था के खिलाफ लड़ना व बोलना छोड़ दिया है। और वर्तमान परिस्थितियों को अपना भाग्य समझकर उसके अनुसार अपने आप को ढाल लिया है। जो हर स्थिति को आसानी से स्वीकार कर लेते हैं। वे अन्याय का विरोध नहीं करते। उनकी प्रतिरोध शक्ति समाप्त प्राय: हो चुकी है। राजनेता व अफसरशाही जनता की इसी उदासीनता का लाभ उठाकर उसका शोषण करते रहते हैं। हर परिस्थिति से समझौता कर उन्होंने जीवन में अपनी जरूरतों को बहुत ही सीमित कर दिया है। अपने अधिकारों व भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने के बजाय उन्होंने उसी के साथ समझौता कर जीना सीख लिया है।

प्रश्न 4 — आशय स्पष्ट करें :

तेरा निजाम है सिल दे जुबान शायर की,
ये एहतियात जरूरी है इस बहर के लिए।

उत्तर – उपरोक्त पंक्तियों में कवि दुष्यंत ने वर्तमान शासन-व्यवस्था के चलते बुद्धिजीवी वर्ग की भयभीत विवशता पर प्रकाश डाला है। शासन अपनी कमी सुनने के लिए तैयार नहीं है। अतः वह शायरों और कवियों के मुँह सिल सकता है। कवि स्पष्ट करता है कि मुँह बंद कर लेना वह सावधानी भरा कदम है जो एक शायर द्वारा अपनी गज़ल के लिए उठाया गया है। मूक रहकर रचना को अंजाम देना शायर की विवशता और समय की माँग दोनों ही है। कवि कहते हैं कि जब भी कोई कवि या लेखक शासन की भ्रष्ट नीतियों के खिलाफ लोगो को जागरूक करने के लिए अपनी आवाज बुलंद करता हैं तो शासन वर्ग उस कवि की जुबान बंद करने की कोशिश करता हैं। उसकी अभिव्यक्ति पर रोक लगा देता हैं। इसीलिए कवि कहते हैं कि यह संभव हैं कि सत्ताधारी लोग अपनी सत्ता बचाये रखने के लिए मेरी जुबान बंद कर सकते हैं या मेरी अभिव्यक्ति की आजादी को छीन सकते हैं। कवि खुद मानते है कि इस सिस्टम को चलाए रखने के लिए ऐसी सावधानी करनी भी ठीक उसी प्रकार जरूरी है जैसे गजल के छंद (बहर) के लिए बंधन या मीटर की सावधानी करनी बहुत जरूरी होती है।

यह भी देखें

आरोह भाग 1 ( कक्षा 11) ( पूरी पुस्तक एक साथ )

आरोह भाग 1 ( गद्य खंड )

नमक का दारोगा ( हिंदी कहानी) : प्रेमचंद / Namak Ka Daroga : Premchand

मियाँ नसिरुद्दीन ( रेखाचित्र ) : कृष्णा सोबती

अपु के साथ ढाई साल ( संस्मरण ): सत्यजित राय

विदाई संभाषण ( निबंध ) : बालमुकुंद गुप्त

गलता लोहा ( शेखर जोशी )/ Galta Loha ( Shekhar Joshi )

स्पीति में बारिश ( कृष्णनाथ ) / Sptiti Mein Barish ( Krishan Nath )

रजनी ( मन्नू भंडारी )/ Rajani ( Mannu Bhandari )

जामुन का पेड़ ( कृश्न चंदर ) / Jamun Ka Ped ( Krishan Chandar )

भारत माता ( जवाहरलाल नेहरू ) / Bharat Mata ( Jawaharlal Nahru )

आत्मा का ताप ( सैयद हैदर रज़ा ) / Aatma Ka Taap ( Saiyad Haidar Raza )

आरोह भाग 1 ( काव्य खंड )

हम तो एक एक करि जांनां कबीर ( Kabir Ke Pad Class 11)

कबीर ( Kabir )

मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई / मीरा( मीराबाई)

मीरा ( Mirabai )

पथिक : रामनरेश त्रिपाठी ( Pathik : Ram Naresh Tripathi )

वे आँखें : सुमित्रानंदन पंत ( Ve Aankhen : Sumitranandan Pant )

घर की याद : भवानी प्रसाद मिश्र ( Ghar Ki Yad : Bhawani Prasad Mishra )

चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती : त्रिलोचन

साये में धूप ( दुष्यंत कुमार )

अक्क महादेवी ( Akka Mahadevi )

सबसे खतरनाक : पाश ( Sabse Khatarnak : Pash )

आओ मिलकर बचाएँ : निर्मला पुतुल ( Aao, Milkar Bachayen : Nirmala Putul )

वितान भाग 1 ( कक्षा 11)

▪️भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ : लता मंगेशकर ( कुमार गन्धर्व )

▪️राजस्थान की रजत बूंदें ( अनुपम मिश्र ) / Rajasthan Ki Rajat Boonden ( Anupam Mishra )

▪️आलो आँधारी ( बेबी हालदार )

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