अनुस्मारक का अर्थ, परिभाषा व विशेषताएँ

अनुस्मारक का अर्थ एवं व्युत्पत्ति

​’अनुस्मारक’ शब्द संस्कृत के ‘अनु’ (पीछे/पुनः) उपसर्ग और ‘स्मारक’ (स्मरण कराने वाला) संज्ञा के संयोग से निर्मित हुआ है। अंग्रेजी प्रशासनिक शब्दावली में इसे ‘Reminder’ तथा सामान्य कार्यालयी बोलचाल में ‘स्मरण-पत्र’ कहा जाता है।

​प्रशासनिक कार्यप्रणाली में जब किसी मंत्रालय, विभाग, स्वायत्त निकाय या अधिकारी को पूर्व में भेजे गए किसी शासकीय पत्र, आदेश या आवेदन पर निर्धारित समय-सीमा के भीतर कोई प्रत्युत्तर अथवा अपेक्षित कार्रवाई प्राप्त नहीं होती, तब संबंधित अधिकारी का ध्यान उस विषय की ओर पुनः आकृष्ट करने हेतु जो पत्र भेजा जाता है, उसे अनुस्मारक कहते हैं।

​प्रामाणिक परिभाषाएँ

  • ​केंद्रीय सचिवालय कार्यपद्धति नियमावली के अनुसार: ​”जब किसी कार्यालय द्वारा पूर्व में प्रेषित किसी पत्र, परिपत्र या निर्देश का उत्तर नियत समय के भीतर प्राप्त नहीं होता अथवा उस पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होती है, तब उस विषय पर त्वरित कार्रवाई एवं उत्तर प्राप्त करने के उद्देश्य से जारी किया गया पत्र ‘अनुस्मारक’ कहलाता है।”
  • ​डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार: ​”अनुस्मारक मूल पत्र का अनुवर्ती पत्र होता है, जिसका मुख्य प्रयोजन पूर्व-प्रेषित पत्र के संदर्भ में संबंधित अधिकारी की स्मृति को जाग्रत करना तथा अनिर्णीत कार्य को गति प्रदान करना है।”
  • ​डॉ. दंगल झाल्टे के अनुसार: ​”प्रशासनिक पत्राचार में जब प्रेषक द्वारा मूल पत्र के माध्यम से मांगी गई सूचना निर्धारित अवधि तक प्राप्त नहीं होती है, तब स्मृति ताज़ा करने के उद्देश्य से जो संक्षिप्त पत्र भेजा जाता है, वह अनुस्मारक या स्मरण-पत्र कहलाता है।”

अनुस्मारक की प्रमुख विशेषताएँ

  1. ​पूर्व पत्र का अनिवार्य संदर्भ: अनुस्मारक का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता; यह सदैव किसी मूल पत्र की अगली कड़ी होता है। अतः इसमें पूर्व पत्र की पत्रांक संख्या (क्रमांक) और दिनांक का स्पष्ट उल्लेख अनिवार्य होता है।
  2. ​संक्षिप्तता एवं विषय-केंद्रितता: इसमें मूल पत्र की पूरी पृष्ठभूमि दोबारा नहीं लिखी जाती। केवल मूल विषय का एक-दो वाक्यों में संकेत देते हुए सीधे प्रतिउत्तर की मांग की जाती है।
  3. ​क्रम संख्या लिखना : यदि प्रथम स्मरण-पत्र पर भी उत्तर न मिले, तो क्रमिक रूप से भेजे जाने वाले पत्रों के शीर्ष पर ‘अनुस्मारक-1’, ‘अनुस्मारक-2’ अथवा ‘प्रथम स्मरण-पत्र’, ‘द्वितीय स्मरण-पत्र’ अंकित किया जाता है।
  4. ​प्रशासनिक शिष्टता एवं तटस्थ भाषा: यद्यपि अनुस्मारक कार्य में हो रहे विलंब के कारण भेजा जाता है, फिर भी इसकी भाषा कटु, व्यंग्यात्मक या आक्रामक नहीं होती। इसमें प्रशासनिक मर्यादा, सौम्यता और आधिकारिक तटस्थता बनी रहनी चाहिए।
  5. ​प्रारूपगत सामंजस्य: अनुस्मारक प्रायः उसी प्रारूप में तैयार किया जाता है जिस प्रारूप में मूल पत्र भेजा गया था (जैसे—शासकीय पत्र, कार्यालय ज्ञापन या अर्धशासकीय पत्र)।

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