अशोक की चिंता : जयशंकर प्रसाद ( Ashok Ki Chinta : Jai Shankar Prasad )
(1)जीवन कितना ? अति लघु क्षण,ये शलभ पुंज-से-कण-कण, तृष्णा वह अनलशिखा बन दिखलाती रक्तिम यौवन । जलने की क्यों न उठे उमंग ?है ऊँचा आज मगध शिर पदतल में विजित पड़ा, दूरांगत क्रन्दन ध्वनि फिर, क्यों गूँज रही हैं अस्थिरकर विजयी का अभिमान भंग ? व्याख्या — सम्राट अशोक कलिंग युद्ध के भयावह दृश्य को … Read more