सरोज स्मृति : सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ( भाग 2)
आयेंगे कल।” दृष्टि थी शिथिल,आई पुतली तू खिल-खिल-खिलहँसती, मैं हुआ पुन: चेतनसोचता हुआ विवाह-बन्धन।कुंडली दिखा बोला — “ए — लो”आई तू, दिया, कहा–“खेलो।”कर स्नान शेष, उन्मुक्त-केशसासुजी रहस्य-स्मित सुवेशआईं करने को बातचीतजो कल होनेवाली, अजीत,संकेत किया मैंने अखिन्नजिस ओर कुंडली छिन्न-भिन्न;देखने लगीं वे विस्मय भरतू बैठी संचित टुकडों पर। धीरे-धीरे फिर बढा़ चरण,बाल्य की केलियों का … Read more