चिंता सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 2 )
(1) चिर-किशोर-वय,नित्यविलासी–सुरभित जिससे रहा दिगंतआज तिरोहित हुआ कहाँ वह मधु से पूर्ण अनंत वसंत?कुसुमित कुंजों में वे पुलकित प्रेमालिंगन हुए विलीन,मौन हुई हैं मूर्च्छित तानें और न सुन पड़ती अब बीन। प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘चिंता सर्ग’ से अवतरित है | प्रस्तुत काव्यांश में जलप्रलय के बाद मनु … Read more