‘राम की शक्तिपूजा’ की केन्द्रीय संवेदना : शक्ति की मौलिक कल्पना या नारी-मुक्ति

‘राम की शक्तिपूजा’ की केन्द्रीय संवेदना का प्रसंग विवादास्पद है क्योंकि विभिन्न समीक्षकों ने इस संबंध में भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ की हैं। नन्दकिशोर नवल का दावा है कि इस कविता का केन्द्रीय भाव ‘सीता की मुक्ति’ और सीता के प्रतीक के माध्यम से ‘नारी मुक्ति’ है। निराला गार्हस्थिक प्रेम के कवि हैं। उनके सम्पूर्ण साहित्य में … Read more

परिवर्तन ( सुमित्रानंदन पंत )

(1) आज कहाँ वह पूर्ण-पुरातन, वह सुवर्ण का काल?भूतियों का दिगंत-छबि-जाल,ज्योति-चुम्बित जगती का भाल?राशि राशि विकसित वसुधा का वह यौवन-विस्तार?स्वर्ग की सुषमा जब साभारधरा पर करती थी अभिसार! प्रसूनों के शाश्वत-शृंगार,(स्वर्ण-भृंगों के गंध-विहार)गूंज उठते थे बारंबार,सृष्टि के प्रथमोद्गार!नग्न-सुंदरता थी सुकुमार,ॠध्दि औ’ सिध्दि अपार! अये, विश्व का स्वर्ण-स्वप्न, संसृति का प्रथम-प्रभात,कहाँ वह सत्य, वेद-विख्यात?दुरित, दु:ख, दैन्य … Read more

ग्राम श्री ( सुमित्रानंदन पंत )

(1) फैली खेतों में दूर तलकमखमल की कोमल हरियाली,लिपटीं जिससे रवि की किरणेंचाँदी की सी उजली जाली!तिनकों के हरे हरे तन परहिल हरित रुधिर है रहा झलक,श्यामल भू तल पर झुका हुआनभ का चिर निर्मल नील फलक! उपरोक्त पंक्तियों में कवि सुमित्रानंदन पंत जी ने गाँव के प्राकृतिक सौंदर्य का बड़ा ही सुंदर चित्रण किया … Read more

प्रथम रश्मि ( सुमित्रानंदन पंत )

प्रथम रश्मि का आना रंगिणि!तूने कैसे पहचाना?कहाँ, कहाँ हे बाल-विहंगिनि!पाया तूने वह गाना?सोयी थी तू स्वप्न नीड़ में,पंखों के सुख में छिपकर,ऊँघ रहे थे, घूम द्वार पर,प्रहरी-से जुगनू नाना। शशि-किरणों से उतर-उतरकर,भू पर कामरूप नभ-चर,चूम नवल कलियों का मृदु-मुख,सिखा रहे थे मुसकाना। स्नेह-हीन तारों के दीपक,श्वास-शून्य थे तरु के पात,विचर रहे थे स्वप्न अवनि मेंतम … Read more

राम की शक्ति पूजा : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ( भाग 4)

(29) बोले भावस्थ चन्द्रमुख निन्दित रामचन्द्र,प्राणों में पावन कम्पन भर स्वर मेघमन्द्र,“देखो, बन्धुवर, सामने स्थिर जो वह भूधरशोभित शत-हरित-गुल्म-तृण से श्यामल सुन्दर,पार्वती कल्पना हैं इसकी मकरन्द विन्दु,गरजता चरण प्रान्त पर सिंह वह, नहीं सिन्धु। व्याख्या : चंद्रमा की कांति को लज्जित करने वाले मुख के स्वामी राम भाव-मग्न होकर बोले | उनके शरीर में सात्विक … Read more

राम की शक्ति पूजा : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ( भाग 3)

(17) व्याख्या : विभीषण श्री राम से कहते हैं — “हाय! जब फल प्राप्ति का समय आया, तब सोचो इस पलायन से कितना श्रम व्यर्थ चला जाएगा? अब तक तो हम लोग विजय-लाभ के लिए काफी खून-पसीना बहा चुके हैं। क्या यह सब व्यर्थ ही न चला जायेगा ? अभी तो जानकी से मिलने का … Read more

राम की शक्ति-पूजा : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ( भाग 2)

(11) प्रसंग — प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की बहुचर्चित कविता ‘राम की शक्ति-पूजा’ से अवतरित हैं | इन पंक्तियों में राम-रावण युद्ध की विभीषिका, रावण की भयावहता और राम की हताशा और उससे उबरने की मनःस्थिति को दर्शाया गया है | व्याख्या — राम के दिव्य चरणों पर उनके दो अश्रु-बिन्दु टपक पड़े। हनुमान … Read more

राम की शक्ति-पूजा : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ( भाग 1)

(1) प्रसंग — प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की बहुचर्चित कविता ‘राम की शक्ति-पूजा’ से अवतरित हैं | इन पंक्तियों में राम-रावण युद्ध की विभीषिका, रावण की भयावहता और राम की हताशा और उससे उबरने की मनःस्थिति को दर्शाया गया है | व्याख्या — युद्ध करते-करते सूर्य अस्त होने से दिवस का अन्त हो गया … Read more

श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 6)

(1) दया, माया, ममता लो आज,मधुरिमा लो, अगाध विश्वास; हमारा हृदय रत्न निधि स्वच्छतुम्हारे लिए खुला है पास। प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन और वार्तालाप का वर्णन किया गया है … Read more

श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 5)

(1) किंतु जीवन कितना निरुपाय!लिया है देख नहीं संदेह निराशा है जिसका परिणामसफलता का वह कल्पित गेह। प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन और वार्तालाप का वर्णन किया गया है | … Read more

श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 4)

(1) तपस्वी! क्यों इतने हो क्लांत?वेदना का यह कैसा वेग? आह! तुम कितने अधिक हताशबताओ यह कैसा उद्वेग! प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन और वार्तालाप का वर्णन किया गया है … Read more

श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 3)

(1) एक विस्मृति का स्तूप अचेत,ज्योति का धुँधला-सा प्रतिबिंब; और जड़ता की जीवन राशिसफलता का संकलित विलंब। प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन को शब्द दिये गये हैं | व्याख्या : … Read more

श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 2 )

(1) घिर रहे थे घुँघराले बालअंस अवलंबित मुख के पास; नील घन-शावक से सुकुमारसुधा भरने को विधु के पास। प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन को शब्द दिये गये हैं | … Read more

श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 1 )

(1) कौन तुम! संसृति-जलनिधि तीरतरंगों से फेंकी मणि एक, कर रहे निर्जन का चुपचापप्रभा की धारा से अभिषेक! प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन को शब्द दिये गये हैं | व्याख्या … Read more

चिंता सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 3 )

(1) एक नाव थी, और न उसमें डाँड़े लगते, या पतवार,तरल तरंगों में उठ-गिरकर बहती पगली बारंबार।लगते प्रबल थपेड़े, धुँधले तट का था कुछ पता नहीं,कातरता से भरी निराशा देख नियति पथ बनी वहीं। प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘चिंता सर्ग’ से अवतरित है | प्रस्तुत काव्यांश में जलप्रलय … Read more

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