स्वर्ग में विचार-सभा का अधिवेशन ( हिंदी निबंध ) : भारतेंदु हरिश्चंद्र

स्‍वामी दयानन्‍द सरस्‍वती और बाबू केशवचन्‍द्रसेन के स्‍वर्ग में जाने से वहां एक बहुत बड़ा आंदोलन हो गया। स्‍वर्गवासी लोगों में बहुतेरे तो इनसे घृणा करके धिक्‍कार करने लगे और बहुतेरे इनको अच्‍छा कहने लगे। स्‍वर्ग में भी ‘कंसरवेटिव’ और ‘लिबरल’ दो दल हैं। जो पुराने जमाने के ऋषि-मुनि यज्ञ कर-करके या तपस्‍या करके अपने-अपने … Read more

भारतेन्दु हरिश्चंद्र( एम ए प्रथम सेमेस्टर ) पेपर -5 ( KUK )

इकाई 1 व्याख्या के लिए :👇 ▪️प्रेम सरोवर ▪️बंदर सभा ( भारतेन्दु हरिश्चंद्र )/ Bandar Sabha : Bharatendu Harishchandra ▪️नये जमाने की मुकरी : भारतेंदु हरिश्चंद्र ▪️ स्फुट रचना ( गज़ल 1) ▪️फिर आई फ़स्ल-ए-गुल फिर ज़ख़्म-ए-दिल रह रह के पकते हैं ( भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ) इकाई 2 ▪️अंधेर नगरी : भारतेंदु हरिश्चंद्र / Andher … Read more

भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है (हिंदी निबंध ) : भारतेंदु हरिश्चंद्र

आज बड़े आनंद का दिन है कि छोटे से नगर बलिया में हम इतने मनुष्यों को एक बड़े उत्साह से एक स्थान पर देखते हैं। इस अभागे आलसी देश में जो कुछ हो जाए वही बहुत है। बनारस ऐसे-ऐसे बड़े नगरों में जब कुछ नहीं होता तो हम यह न कहेंगे कि बलिया में जो … Read more

लोकतंत्र में पत्रकारिता का दायित्व

लोकतंत्र में पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तंभ कहा जाता है, क्योंकि यह शासन–प्रशासन, जनता और सत्ता के बीच सेतु का कार्य करती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था जनता की सहभागिता पर आधारित होती है और जनता तभी सही निर्णय ले सकती है जब उसे सत्य, निष्पक्ष और संपूर्ण जानकारी प्राप्त हो। पत्रकारिता का दायित्व केवल समाचार … Read more

देवनागरी लिपि का मानकीकरण

देवनागरी लिपि भारत की प्रमुख लिपियों में से एक है, जिसका उपयोग हिंदी, संस्कृत, मराठी, नेपाली आदि भाषाओं के लेखन के लिए होता है। यह लिपि प्राचीन ब्राह्मी लिपि की उत्तरी-शैली से विकसित हुई है | यह लगभग 8वीं–10वीं शताब्दी के आसपास आधुनिक रूप ले चुकी थी। समय के साथ, क्षेत्र, समय और प्रयोजन के … Read more

प्रूफ शोधन : अर्थ, परिभाषा, महत्त्व व प्रक्रिया

पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्य, सटीकता और स्पष्टता के साथ सूचना को जनता तक पहुँचाना है। मीडिया चाहे प्रिंट हो या डिजिटल—समाचार पत्र, पत्रिकाएँ, वेब पोर्टल, विज्ञापन, रिपोर्ट, संपादकीय, फीचर, भाषण या पुस्तकें—सभी में भाषा और तथ्यात्मक शुद्धता सर्वोपरि मानी जाती है। यदि समाचार में भाषा की त्रुटियाँ हों, वर्तनी गलत हो, अर्थ अस्पष्ट हो … Read more

स्वतंत्रता पूर्व की हिंदी पत्रकारिता

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास हिंदी पत्रकारिता के इतिहास से अलग नहीं किया जा सकता। जिस दौर में देश गुलामी की पीड़ा झेल रहा था, उसी दौर में हिंदी पत्रकारिता ने जनता की जागृति, राष्ट्रीय चेतना, समाज-सुधार और स्वतंत्रता की भावना को जन-जन तक पहुँचाने का सार्थक और साहसी कार्य किया। स्वतंत्रता पूर्व की हिंदी … Read more

हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता

पत्रकारिता का उद्देश्य केवल समाचारों का साधारण संकलन और प्रसारण नहीं है, बल्कि समाज की चेतना को जागृत करना, उसकी भावनाओं और संघर्षों को अभिव्यक्त करना तथा परिवर्तन की दिशा प्रदान करना भी है। विशेष रूप से हिंदी पत्रकारिता ने अपने आरंभिक चरण से ही साहित्य और राष्ट्रीय चेतना के समन्वय के माध्यम से समाज … Read more

जनसंचार के रूप में पत्रकारिता का महत्त्व

मानव समाज के विकास में संचार का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। व्यक्ति, समूह, समाज और राष्ट्र आपसी विचार-विनिमय तथा सूचना के आदान-प्रदान के माध्यम से ही आगे बढ़ते हैं। जनसंचार, जिसका उद्देश्य सूचना को व्यापक जनसमूह तक पहुँचाना है, आधुनिक युग में समाज का आधारस्तम्भ बन चुका है। जनसंचार के अनेक रूप हैं — रेडियो, … Read more

अनुवाद की आलोचना (Translation Criticism) के प्रमुख आधार

अनुवाद एक रचनात्मक और बौद्धिक प्रक्रिया है जिसमें एक भाषा के विचार, भाव, शैली और अर्थ को दूसरी भाषा में रूपांतरित किया जाता है। यह कार्य सुनने में सरल लगता है, लेकिन वास्तव में अत्यंत जटिल है क्योंकि हर भाषा की अपनी ध्वनि, संस्कृति, अनुभव, भाव और अभिव्यक्ति होती है। इसलिए अनुवादक का कार्य केवल … Read more

अनुवाद में संदर्भ (Context) की अनुपस्थिति से होने वाली हानि

अनुवाद केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह अर्थ, भाव, परिस्थिति और सांस्कृतिक संकेतों का स्थानांतरण भी है। किसी भी वाक्य का सही अर्थ तभी समझा जा सकता है जब उसके पीछे की परिस्थिति, उद्देश्य, वक्ता की मनःस्थिति, श्रोता की स्थिति और सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि समझ में आए। इन सबको मिलाकर संदर्भ (Context) कहा जाता … Read more

अनुवाद कला में ‘डोमेस्टिकेशन’ (Domestication) और ‘फॉरेनाइजेशन’ (Foreignization) की रणनीतियाँ

अनुवाद एक ऐसी कला है जिसमें दो भाषाओं और दो संस्कृतियों के बीच सेतु का निर्माण किया जाता है। जब किसी लेखक की रचना एक भाषा से दूसरी भाषा में अनूदित होती है, तो केवल शब्दों का स्थानांतरण नहीं होता, बल्कि भाव, संवेदना, सांस्कृतिक संकेत और शैली भी साथ चलती है। इसलिए अनुवादक को यह … Read more

लेखक और दुभाषिया ( Interpreter ) के बीच अनुवादक की भूमिका

भाषा मनुष्यों के बीच संवाद का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। मनुष्य अपने विचार, भावनाएँ, अनुभव और ज्ञान को भाषा के द्वारा ही व्यक्त करता है। लेकिन दुनिया में सैकड़ों भाषाएँ हैं और प्रत्येक भाषा की संरचना, अभिव्यक्ति शैली, संदर्भ और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अलग होती है। ऐसे में एक भाषा में जन्मे विचारों को दूसरी भाषा … Read more

‘सुनीता’ उपन्यास के आधार पर श्रीकांत और हरिप्रसन्न के चरित्रों की तुलना

जैनेंद्र कुमार के उपन्यास ‘सुनीता’ में श्रीकांत और हरिप्रसन्न केवल दो पात्र नहीं हैं, बल्कि वे दो भिन्न मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं, दो जीवन-दर्शनों और दो परस्पर विरोधी व्यक्तित्वों के प्रतीक हैं। एक ओर श्रीकांत है—जो शांत, समृद्ध, गृहस्थ और उदार है; दूसरी ओर हरिप्रसन्न है—जो उग्र, क्रांतिकारी, संन्यासी (तथाकथित) और घोर कुंठित है। उपन्यास का पूरा … Read more

‘सुनीता’ उपन्यास के आधार पर सुनीता का चरित्र-चित्रण

जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित उपन्यास ‘सुनीता’ (1934) की केंद्रीय पात्र और नायिका ‘सुनीता’ हिंदी साहित्य के सबसे सशक्त और मनोवैज्ञानिक रूप से जटिल स्त्री चरित्रों में से एक है। वह प्रेमचंद युगीन ‘आदर्शवादी’ नारी और आधुनिक ‘यथार्थवादी’ नारी के बीच की एक ऐसी कड़ी है, जिसमें परंपरा का संस्कार भी है और आधुनिकता का निर्भीक … Read more

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