पथिक ( रामनरेश त्रिपाठी )
प्रतिक्षण नूतन वेश बनाकर रंग-बिरंग निराला | रवि के सम्मुख थिरक रही है नभ में वारिद-माला | नीचे नील समुद्र मनोहर ऊपर नील गगन है | घन पर बैठ, बीच में बिचरूँ यही चाहता मन है || 1️⃣ रत्नाकर गर्जन करता है, मलयानिल बहता है | हरदम यह हौसला हृदय में प्रिये! भरा रहता है … Read more