फिर आई फ़स्ल-ए-गुल फिर ज़ख़्म-ए-दिल रह रह के पकते हैं ( भारतेन्दु हरिश्चन्द्र )
ज़ख़्म-ए-दिल रह रह के पकते हैंमगर दाग़-ए-जिगर पर सूरत-ए-लाला लहकते हैं नसीहत है अबस नासेह बयाँ नाहक़ ही बकते हैंजो बहके दुख़्त-ए-रज़ से हैं वो कब इन से बहकते हैं कोई जा कर कहो ये आख़िरी पैग़ाम उस बुत सेअरे आ जा अभी दम तन में बाक़ी है सिसकते हैं न बोसा लेने देते हैं … Read more