श्रद्धा सर्ग ( कामायनी ) : जयशंकर प्रसाद ( भाग 5)
(1) किंतु जीवन कितना निरुपाय!लिया है देख नहीं संदेह निराशा है जिसका परिणामसफलता का वह कल्पित गेह। प्रसंग : प्रस्तुत अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धा’ सर्ग से अवतरित है जिसमें श्रद्धा के सौंदर्य और जलप्रलय के बाद चिंता-निमग्न मनु और श्रद्धा के मिलन और वार्तालाप का वर्णन किया गया है | … Read more