हिंदी का व्यावसायिक रंगमंच: अर्थ और विकास-यात्रा

कला और साहित्य के क्षेत्र में रंगमंच (थियेटर) को हमेशा एक बहुत ही पवित्र और सामाजिक बदलाव का माध्यम माना गया है। लेकिन, किसी भी कला को लंबे समय तक ज़िंदा रखने के लिए और कलाकारों को अपना जीवन चलाने के लिए आर्थिक सहारे (पैसे) की ज़रूरत होती है। यहीं से ‘व्यावसायिक रंगमंच’ (Commercial Theatre) का जन्म होता है |

1. व्यावसायिक रंगमंच का अर्थ और अवधारणा (Meaning of Commercial Theatre)

‘व्यावसायिक’ शब्द का सीधा सा अर्थ है— जो व्यवसाय (Business) या आजीविका से जुड़ा हो। अतः व्यावसायिक रंगमंच वह रंगमंच है जिसका निर्माण केवल कला की संतुष्टि के लिए नहीं, बल्कि आर्थिक लाभ (पैसा) कमाने और इसे एक पेशे (Profession) के रूप में अपनाने के लिए किया जाता है।
व्यावसायिक रंगमंच की प्रमुख विशेषताएँ:

  • टिकटों की बिक्री: इसमें नाटक देखने के लिए दर्शकों को टिकट खरीदना पड़ता है। यही कमाई का मुख्य साधन होता है।
  • कलाकारों को वेतन: इसमें काम करने वाले अभिनेताओं, निर्देशकों, लेखकों और मंच-सज्जा करने वाले तकनीशियनों को उनके काम के लिए नियमित वेतन (Salary) या फीस मिलती है। यह उनके लिए ‘नौकरी’ की तरह होता है।
  • दर्शकों की पसंद का ध्यान: चूँकि इसका उद्देश्य पैसा कमाना होता है, इसलिए इसमें अक्सर ऐसे नाटकों का चुनाव किया जाता है जो आम जनता का भरपूर मनोरंजन कर सकें (जैसे- कॉमेडी, सस्पेंस या पारिवारिक ड्रामा)।
  • भव्य प्रस्तुति: इसमें सेट, लाइट और साउंड पर बहुत पैसा खर्च किया जाता है ताकि नाटक देखने में बहुत आकर्षक लगे।
    शौकिया (Amateur) और व्यावसायिक रंगमंच में अंतर: शौकिया रंगमंच में कलाकार दिन में कोई और नौकरी करते हैं और शाम को अपने शौक के लिए मुफ़्त में नाटक करते हैं। जबकि व्यावसायिक रंगमंच ‘फुल-टाइम’ प्रोफेशन है, जहाँ कला ही रोटी कमाने का साधन है।

2. हिंदी व्यावसायिक रंगमंच का विकास (Development of Hindi Commercial Theatre)

हिंदी में व्यावसायिक रंगमंच की विकास-यात्रा बहुत ही उतार-चढ़ाव से भरी रही है। इसे हम मुख्य रूप से निम्नलिखित चरणों में बाँट सकते हैं:

पहला चरण: पारसी रंगमंच का युग (शुरुआत और स्वर्ण काल)

हिंदी में व्यावसायिक रंगमंच की वास्तविक शुरुआत 19वीं सदी के अंत में ‘पारसी थियेटर’ कंपनियों के साथ हुई। पारसी समुदाय के लोगों ने रंगमंच को पहली बार एक ‘इंडस्ट्री’ (उद्योग) के रूप में खड़ा किया।

  • ‘अल्फ्रेड थियेटर’, ‘मदन थियेटर’ और ‘कोरिंथियन थियेटर’ जैसी बड़ी कंपनियाँ बनीं।
  • इन कंपनियों ने वेतन पर लेखकों (जैसे- आगा हश्र कश्मीरी, नारायण प्रसाद बेताब) और अभिनेताओं को रखा।
  • उन्होंने भारी-भरकम टिकट बेचे और खूब पैसा कमाया। उनके नाटकों में जादुई दृश्य (हवा में उड़ते पात्र), भड़कीले कपड़े और खूब सारा संगीत होता था।
  • कमी: हालाँकि इन्होंने रंगमंच को व्यावसायिक बनाया, लेकिन पैसे के लालच में कला और कहानी का स्तर बहुत गिरा दिया।
    दूसरा चरण: पृथ्वी थियेटर का दौर (कला और व्यवसाय का बेहतरीन संतुलन)
    पारसी रंगमंच के पतन के बाद 1944 में महान अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ने अपनी ‘पृथ्वी थियेटर’ नामक पेशेवर (Professional) कंपनी बनाई।
  • पृथ्वी थियेटर ने यह साबित किया कि व्यावसायिक रंगमंच का मतलब केवल सस्ता मनोरंजन नहीं है।
  • उन्होंने ‘दीवार’, ‘पठान’ और ‘गद्दार’ जैसे बेहतरीन और साफ-सुथरे नाटक किए और उन्हें व्यावसायिक रूप से सफल भी बनाया।
  • उनकी कंपनी में 100 से अधिक कर्मचारी (राज कपूर, शम्मी कपूर आदि) थे, जिन्हें नियमित वेतन मिलता था। वे पूरे भारत में घूम-घूम कर शो करते थे। यह हिंदी व्यावसायिक रंगमंच का एक बहुत ही सम्मानजनक दौर था।
    तीसरा चरण: पतन और ठहराव का दौर (सिनेमा और टीवी का प्रभाव)
    1960 के दशक के बाद हिंदी व्यावसायिक रंगमंच को बहुत बड़ा झटका लगा।
  • जब भारत में सिनेमा का विस्तार हुआ और बाद में घरों में रंगीन टेलीविज़न (TV) आ गया, तो लोगों ने नाटक देखने के लिए घर से बाहर निकलना और टिकट खरीदना कम कर दिया।
  • इसके कारण व्यावसायिक नाटक कंपनियाँ बंद होने लगीं। कलाकारों को टीवी और फिल्मों की तरफ भागना पड़ा। यह वह दौर था जब हिंदी रंगमंच पूरी तरह से ‘शौकिया कलाकारों’ या सरकार से मिलने वाले अनुदान (Grant) पर निर्भर हो गया।
    चौथा चरण: समकालीन व्यावसायिक रंगमंच (नया उदय)
    आज के समय (20वीं सदी के अंत और 21वीं सदी) में हिंदी व्यावसायिक रंगमंच ने एक बार फिर से करवट ली है और इसका नया स्वरूप सामने आया है:
  • एनएसडी (NSD) की रेपर्टरी: ‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय’ (दिल्ली) ने अपनी ‘रेपर्टरी कंपनी’ (Repertory Company) बनाई, जो पूरी तरह से व्यावसायिक तर्ज़ पर काम करती है और जहाँ कलाकारों को वेतन मिलता है।
  • कॉर्पोरेट स्पॉन्सरशिप: आज बड़ी-बड़ी कंपनियाँ (जैसे महिंद्रा, टाटा) नाटकों को ‘स्पॉन्सर’ (प्रायोजित) करती हैं, जिससे नाटकों में पैसा आया है।
  • स्टार वैल्यू: जब परेश रावल, अनुपम खेर, पीयूष मिश्रा, या मकरंद देशपांडे जैसे मशहूर फिल्मी कलाकार मंच पर नाटक करते हैं (जैसे ‘किशन कन्हैया’ या ‘मेरा वो मतलब नहीं था’), तो दर्शक 1000-2000 रुपये का महँगा टिकट खरीदकर भी नाटक देखने आते हैं। मुंबई के पृथ्वी थियेटर (जिसे अब शशि कपूर के परिवार ने पुनर्जीवित किया है) में आज भी व्यावसायिक रूप से सफल नाटक होते हैं।

निष्कर्ष

निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि किसी भी कला को जीवित रखने के लिए उसका व्यावसायिक होना बहुत ज़रूरी है। “खाली पेट कला नहीं होती”—यह कहावत रंगमंच पर बिल्कुल सटीक बैठती है। हिंदी व्यावसायिक रंगमंच ने पारसी थियेटर से शुरुआत करके आज के कॉर्पोरेट-समर्थित (Corporate Backed) नाटकों तक का सफर तय किया है। आज ज़रूरत इस बात की है कि नाटकों में कलात्मक गहराई (अच्छी कहानी और अभिनय) और व्यावसायिकता (पैसा कमाना) के बीच एक सही संतुलन बना रहे, ताकि हिंदी रंगमंच फले-फूले और रंगकर्मियों को एक सम्मानजनक आजीविका मिल सके।

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