हिंदी का मानकीकरण / हिंदी वर्तनी के नियम

​हिंदी भाषा का मानकीकरण और वर्तनी के नियम

​किसी भी भाषा के विस्तृत क्षेत्र में प्रयोग, शिक्षा, प्रशासन और मुद्रण के लिए यह आवश्यक है कि उसके स्वरूप में एकरूपता हो। इसी एकरूपता को स्थापित करने की प्रक्रिया को मानकीकरण (Standardization) कहा जाता है।

​हिंदी का मानकीकरण: एक परिचय

​हिंदी एक विशाल भू-भाग में बोली जाने वाली भाषा है, जिसके कारण इसमें कई क्षेत्रीय रूप और बोलियाँ (जैसे- अवधी, ब्रज, भोजपुरी आदि) समाहित हैं। जब कोई भाषा राजकाज, शिक्षा और साहित्य के स्तर पर राष्ट्रव्यापी या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित होती है, तो उसे एक निश्चित, व्याकरण-सम्मत और सर्वमान्य रूप की आवश्यकता होती है। इसे ही ‘मानक हिंदी’ (Standard Hindi) कहा जाता है।

​भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत ‘केंद्रीय हिंदी निदेशालय’ ने विद्वानों की सहायता से हिंदी वर्तनी का मानकीकरण किया है, ताकि पूरे देश में लिखने और मुद्रण में एकरूपता बनी रहे।

​मानक हिंदी वर्तनी के मुख्य नियम

​केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा निर्धारित मानक हिंदी वर्तनी के 10-12 प्रमुख नियम निम्नलिखित हैं:

1. विभक्ति चिह्नों का प्रयोग:

  • संज्ञा के साथ: संज्ञा शब्दों के साथ कारक (विभक्ति) चिह्न हमेशा अलग लिखे जाने चाहिए। (जैसे: राम ने, सीता को, पेड़ पर)।
  • सर्वनाम के साथ: सर्वनाम शब्दों के साथ विभक्ति चिह्न मिलाकर लिखे जाते हैं। (जैसे: उसने, तुमको, आपसे)। यदि सर्वनाम के साथ दो विभक्ति चिह्न हों, तो पहला मिलाकर और दूसरा अलग लिखा जाता है (जैसे: उसके लिए, आपमें से)।

2. संयुक्त क्रियाओं का लेखन:

  • ​संयुक्त क्रियाओं के सभी अंग अलग-अलग लिखे जाने चाहिए। (जैसे: वह पढ़ चुका है; राम जा सकता है)।

3. अव्यय (निपात) का प्रयोग:

  • ​अव्यय शब्द (तक, साथ, भी, ही आदि) हमेशा मुख्य शब्द से अलग लिखे जाने चाहिए। (जैसे: आपके साथ, यहाँ तक, मैं भी)।

4. श्रुतिमूलक ‘य’ और ‘व’ का प्रयोग:

  • ​जहाँ शब्दों के अंत में स्वरात्मक ध्वनि हो, वहाँ ‘य’ और ‘व’ की जगह स्वरों (इ, ई, ए, ओ) का ही प्रयोग मानक माना गया है। (जैसे: ‘गयी’ की जगह ‘गई’, ‘नयी’ की जगह ‘नई’, ‘हुआ’ की जगह ‘हुआ’)।

5. अनुस्वार (ं) और पंचमाक्षर:

  • ​संयुक्त व्यंजनों में यदि पंचमाक्षर (ङ्, ञ्, ण्, न्, म्) के बाद उसी वर्ग का कोई व्यंजन आए, तो मुद्रण और लेखन की सुविधा के लिए अनुस्वार (ं) का प्रयोग करना चाहिए। (जैसे: गङ्गा की जगह गंगा, हिन्दी की जगह हिंदी, सम्भव की जगह संभव)।

6. अनुनासिक या चंद्रबिंदु (ँ):

  • ​जिन स्वरों की मात्राएँ शिरोरेखा (ऊपर की लाइन) के ऊपर नहीं लगतीं, वहाँ चंद्रबिंदु का प्रयोग होता है। (जैसे: चाँद, हँसना, गाँव)।
  • ​जहाँ शिरोरेखा के ऊपर कोई मात्रा (े, ै, ो, ौ) लगी हो, वहाँ स्थान की कमी के कारण अनुनासिक के स्थान पर केवल बिंदु (ं) लगाया जाता है। (जैसे: में, हैं, गोंद)।

7. योजक चिह्न (-) का प्रयोग:

  • ​द्वंद्व समास के पदों के बीच योजक चिह्न अवश्य लगाना चाहिए। (जैसे: माता-पिता, दिन-रात)।
  • ​सा, से, सी, जैसा आदि समानता वाचक शब्दों के पहले भी योजक चिह्न लगता है। (जैसे: राम-सा भाई, चाँद-सा मुखड़ा)।

8. संयुक्त व्यंजन बनाने के नियम:

  • खड़ी पाई वाले व्यंजन: खड़ी पाई (।) वाले व्यंजनों (क, ग, च, त आदि) को संयुक्त करते समय उनकी पाई हटा दी जाती है। (जैसे: पक्का, चप्पल, कुत्ता)।
  • गोल वर्ण वाले व्यंजन: जिन व्यंजनों में खड़ी पाई नहीं होती (ट, ठ, ड, ढ, द, ह), उन्हें संयुक्त करने के लिए हलंत (्) का प्रयोग किया जाता है। (जैसे: मिट्‌टी, विद्‌यालय, चिह्‌न)।

9. विदेशी ध्वनियाँ (नुक़्ता):

  • ​अरबी-फ़ारसी से आए शब्दों में ‘क़, ख़, ग़, ज़, फ़’ में नुक़्ता (नीचे लगने वाली बिंदी) लगाना तब अनिवार्य है, जब अर्थ में भ्रम होने की संभावना हो। (जैसे: राज = शासन, राज़ = रहस्य; फन = साँप का मुँह, फ़न = हुनर)।

10. अंग्रेजी की ‘ऑ’ ध्वनि:

  • ​अंग्रेजी के ऐसे शब्द जो हिंदी में प्रचलित हो गए हैं, उनमें ‘ऑ’ की ध्वनि को दर्शाने के लिए अर्द्धचंद्र (ॉ) का प्रयोग किया जाना चाहिए। (जैसे: डॉक्टर, कॉलेज, ऑफिस)।

11. ‘ए’ और ‘ये’ का प्रयोग:

  • ​जहाँ शब्द का मूल रूप ‘आ’ से अंत होता हो, वहाँ बहुवचन बनाने के लिए ‘ए’ का प्रयोग होता है। (जैसे: लड़का -> लड़के, गया -> गए)। जहाँ मूल शब्द में ही ‘य’ हो, वहाँ ‘ये’ आएगा (जैसे: दायित्व -> दायित्वों)।

12. हलंत (्) का प्रयोग:

  • ​संस्कृत के तत्सम शब्दों के अंत में हलंत का प्रयोग होता है (जैसे: जगत्, महान्, विद्वान्)। हालाँकि, आधुनिक हिंदी में यदि हलंत न भी लगाया जाए (जैसे: जगत, महान) तो उसे अशुद्ध नहीं माना जाता, परंतु अकादमिक लेखन में मूल रूप को प्राथमिकता दी जाती है।

​निष्कर्ष

​भाषा का मानकीकरण उसे बाँधने की नहीं, बल्कि सँवारने और सर्वसुलभ बनाने की प्रक्रिया है। हिंदी वर्तनी के इन नियमों का पालन करने से भाषा में न केवल एकरूपता और वैज्ञानिकता आती है, बल्कि अर्थ का अनर्थ होने से भी बचाव होता है। आधुनिक युग में, विशेषकर कंप्यूटर और इंटरनेट की दुनिया में, एक मानक वर्तनी का होना अत्यंत आवश्यक है। यह मानक रूप ही हिंदी को एक सशक्त राष्ट्रभाषा और वैश्विक संपर्क भाषा के रूप में मजबूती प्रदान करता है।

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