आत्मकथ्य ( जयशंकर प्रसाद )

( यहाँ NCERT की कक्षा 10वीं की हिंदी की पाठ्य पुस्तक 'क्षतिज भाग 2' में संकलित 'आत्मकथ्य ( जयशंकर प्रसाद )' अध्याय के मूल पाठ, व्याख्या तथा अभ्यास के प्रश्नों को दिया गया है | )

(1)

मधुप गुन – गुनाकर कह जाता कौन कहानी यह अपनी ,
मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी ।
इस गंभीर अनंत – नीलिमा में असंख्य जीवन – इतिहास
यह लो , करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य – मलिन उपहास
तब भी कहते हो – कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती ।
तुम सुनकर सुख पाओगे , देखोगे – यह गागर रीती ।
किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले –
अपने को समझो , मेरा रस ले अपनी भरने वाले

व्याख्या – कवि जयशंकर प्रसाद भौंरे के माध्यम से अपनी कथा का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि हे मन रूपी भौंरे ! गुन – गुनाकर अपनी कौन – सी कहानी कह रहा है ? कहने का तात्पर्य यह है कि जिस तरह से एक भौंरा फूलों के आसपास गुंजार करते हुए मंड़राता फिरता हैं। ठीक उसी प्रकार आज कवि का मन रूपी भँवरा भी अतीत की यादों के आसपास गुन – गुना कर गुंजार करते हुए न जाने अपनी कौन सी कहानी कहना चाह रहा है। कवि आगे कहते हैं कि उनका जीवन रूपी वृक्ष जो कभी सुख व आनंद रुपी पत्तियों से हरा भरा था। अब वो सभी पत्तियों मुरझा कर एक – एक करके गिर रही हैं। क्योंकि आज कवि के जीवन की परिस्थितियां बदल चुकी है। उनके जीवन में सुख की जगह दुख और निराशा ने ले ली है। और कवि इस वक्त अपने जीवन रूपी वृक्ष में पतझड़ का सामना कर रहे हैं।

हिंदी साहित्य रूपी इस विशाल विस्तार वाले आकाश में न जाने कितने महान् पुरुषों अर्थात लेखकों के जीवन का इतिहास उनकी आत्मकथा के रूप में मौजूद हैं। उन्हें पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि वह स्वयं अपना मजाक उड़वाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि लोग इन महान लेखकों की आत्मकथा को पढ़कर उनकी कमियों का मजाक बनाते हैं।

इस कड़वे सत्य को जानते हुए भी कि प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे की दुर्बलताओं और कमजोरियों का मजाक बनाने में लगा है। फिर भी मित्रों तुम मुझसे यह कहते हो कि मेरे जीवन में जो कमियाँ हैं , जो मेरे साथ घटित हुआ है , उसे मैं सबके सामने कह डालूँ। फिर कवि अपने दोस्तों से पूछते हैं कि क्या तुम मेरी कहानी को सुनकर सुख प्राप्त कर सकोगे ? मेरा जीवन रूपी घड़ा एकदम खाली है , जिसमें कोई भाव नहीं है।

कवि आगे कहते हैं कि अगर मैंने अपनी आत्मकथा में कुछ ऐसा लिख दिया जिसे पढ़कर तुम कही ऐसा न समझो कि मेरे जीवन रूपी गागर (घड़े) में जो सुख , खुशियों और आनंद रूपी रस थे । वो सभी तुमने ही खाली किये हैं। और उन सभी रसों को मेरे जीवन रूपी गागर (घड़े) से लेकर तुमने अपने जीवन रूपी गागर (घड़े) में भर लिया हों। और मेरा जीवन दुखों से भर दिया हो।

(2)

यह विडंबना ! अरी सरलते तेरी हँसी उड़ाऊँ मैं ।
भूलें अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैं ।
उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ , मधुर चाँदनी रातों की ।
अरे खिल – खिला कर हँसते होने वाली उन बातों की ।
मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया ।
आलिंगन में आते – आते मुसक्या कर जो भाग गया ।

व्याख्या – कवि कहते हैं कि यह तो बड़े दुर्भाग्य की बात है कि मेरे मित्र मुझे आत्मकथा लिखने को कह रहे हैं क्योंकि सरल मन वाले की मैं हँसी कैसे उड़ाऊँ। मैं तो अभी तक स्वयं दूसरों के स्वभाव को समझ नहीं पाया हूँ । मेरे सरल स्वभाव के कारण जीवन में मुझसे जो गलतियां हुई। कुछ लोगों ने जो मुझे धोखे दिए या मेरे साथ जो छल – प्रपंच किया हैं। उन सभी के बारे में लिखकर मैं अपना और उनका मजाक नहीं बनाना चाहता हूँ । कहने का तात्पर्य यह है कि कवि अपने प्रपंची मित्रों की असलियत दुनिया के सामने ला कर , उनको शर्मिंदा नही करना चाहते हैं। इसीलिए कवि अपनी आत्मकथा नहीं लिखना चाहते हैं।

कवि अपनी पत्नी के साथ बिताये गये मधुर पलों का जिक्र करते हुए कहते हैं कि चांदनी रातों में मैंने अपनी प्रेयसी ( पत्नी ) के साथ एकांत में खिलखिला कर हंसते हुए , उससे प्यार भरी मीठी बातें करते हुए , जो समय बिताया था। वही मधुर स्मृतियों ही तो अब मेरे जीवन जीने का एक मात्र सहारा है। उन निजी क्षणों का वर्णन मैं कैसे कर सकता हूँ ? उन आनंद भरे पलों की बातों को मैं दूसरों के साथ बांटना नहीं चाहता हूँ।

कवि आगे कहते हैं कि मुझे जीवन में वह सुख कहाँ मिला ,जिसका मैं स्वप्न देख रहा था। उस स्वप्न को देखते – देखते अचानक मेरी आंख खुल गई। मैं जिस सुख की कल्पना कर रहा था। वह सुख मेरी बाहों में आते-आते , अचानक मुझे धोखा देकर भाग गया। अर्थात कवि ने अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक जीवन जीने की जो कल्पना की थी , वह उनकी मृत्यु के साथ ही खत्म हो गयी। और उनका सारा जीवन दुखों से भर गया।

(3)

जिसके अरुण – कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में ।
अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में ।
उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की ।
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की ?
छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ ?
क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ ?
सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म – कथा ?
अभी समय भी नहीं , थकी सोई है मेरी मौन व्यथा ।

व्याख्या – कवि अपनी प्रिया के सौंदर्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उसके लाल गालों को देखकर ऐसा लगता था जैसे उसके लाल गालों की मदहोश कर देने वाली सुंदर छाया में प्रेम बिखेरती हुई प्रेम भरी सुबह सुहागिन की तरह उदित हो रही हो अर्थात् ऐसा लगता था जैसे सुबह भी अपनी लालिमा उसी से लिया करती थी । आज मैं उसकी ही यादों का सहारा लेकर अपने जीवन के रास्ते की थकान दूर करता हूँ अर्थात् उसी की यादें मेरे थके हुए जीवन का सहारा बनीं ।

कहने का तात्पर्य यह है कि कवि के अपनी पत्नी के साथ बिताये क्षण ही अब उनके जीने का एकमात्र सहारा हैं। इसीलिए कवि उन्हें किसी के साथ बांटना नहीं चाहते हैं। उन्हें सिर्फ अपने दिल में संजो कर रखना चाहते है।

आगे कवि पूछ रहे हैं कि मेरे अंतरमन रूपी गुदड़ी की सिलाई को उधेड़ कर उसके भीतर तुम क्या देखना चाहते हो। मेरा जीवन बहुत छोटा सा है। उसकी बड़ी-बड़ी कहानियां मैं कैसे लिखूं। अर्थात मेरे जीवन की कहानी जानकर तुम क्या करोगे। क्योंकि इस छोटे से जीवन में मैंने अभी तक सुनाने लायक कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं की हैं। जो मैं तुम्हें सुना सकूँ।

कवि आगे कहते हैं कि यह ज्यादा बढ़िया रहेगा कि मैं चुप रहकर , बड़ी शान्ति के साथ , अन्य लोगों की कहानियों या आत्मकथाओं को सुनूँ। तुम मेरी आत्मकथा सुनकर क्या प्रेरणा प्राप्त कर सकोगे ? कहने का तात्पर्य यह है कि कवि के अनुसार उनकी आत्मकथा में ऐसा कुछ भी ख़ास नहीं है। या उन्होंने अभी तक ऐसी कोई उपलब्धि हासिल भी नहीं की है जिसे पढ़कर किसी को खुशी मिलेगी या जिसे पढ़ने में किसी की कोई रूचि हो।

कवि यहाँ पर एक तर्क देते हुए कहते हैं कि वैसे भी अभी सही समय नहीं है अपने दुःख भरे क्षणों को याद करने का क्योंकि उनका दुःख इस समय शांत है। वह अभी थककर सोया है। कवि अपने दुखद क्षणों को भूलना चाहते है और इस समय वो अपने दुखद अतीत को कुछ समय के लिए भूले हैं। इसीलिए वो वापस अपने दुखद अतीत को कुरेद कर फिर से दुखी नहीं होना चाहते हैं।

अभ्यास के प्रश्न

प्रश्न 1 – कवि आत्मकथा लिखने से क्यों बचना चाहता है ?

उत्तर – कवि आत्मकथ्य लिखने से इसलिए बचना चाहते है क्योंकि उन्हें ऐसा नहीं लगता कि हिंदी साहित्य में न जाने कितने महान् पुरुषों अर्थात लेखकों के जीवन का इतिहास उनकी आत्मकथा के रूप में मौजूद हैं। लोग इन महान लेखकों की आत्मकथा को पढ़कर उनकी कमियों का मजाक बनाते हैं। कवि अपना मज़ाक नहीं बनवाना चाहते। कवि अपने प्रपंची मित्रों की असलियत दुनिया के सामने ला कर , उनको शर्मिंदा नही करना चाहते हैं। और कवि अपनी पत्नी के साथ बिताए हुए मधुर पलों को अपनी “उज्ज्वल गाथा ” के रूप में देखते हैं और उन्हें किसी के साथ बांटना नहीं चाहते हैं। कवि को यह भी लगता है कि उन्होंने अभी तक ऐसी कोई उपलब्धि हासिल भी नहीं की है जिसे पढ़कर किसी को खुशी मिलेगी या जिसे पढ़ने में किसी की कोई रूचि हो। उन्हें लगता है कि उनका जीवन केवल कष्टों से भरा हुआ है अतः वे अपने कष्टों को लोगों को बताना नहीं चाहते तथा उन्हें अपने तक ही सीमित रखना चाहते हैं। यही कारण है कि कवि अपनी आत्मकथा नहीं लिखना चाहते।

प्रश्न 2 – आत्मकथा सुनाने के संदर्भ में ” अभी समय भी नहीं ” कवि ऐसा क्यों कहता है ?

उत्तर – आत्मकथा सुनाने के संदर्भ में ‘ अभी समय भी नहीं ‘ कवि ने ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि कवि को लगता है कि उसने जीवन में अब तक कोई भी ऐसी उपलब्धि हासिल नहीं की है , जो दूसरों को बताने योग्य हो या जिससे कोई उसके जीवन से कोई प्रेरणा ले सके। तथा आत्मकथा लिखकर कवि अपने मन में दबे हुए कष्टों को फिर से याद नहीं करना चाहता है। अपनी छोटी सी कथा को बड़ा आकार देने में वह असमर्थ हैं। उसके जीवन में उसे सुख की प्राप्ति नहीं हुई है। इसीलिए कवि कहते हैं कि अभी सही समय नहीं है अपने दुःख भरे क्षणों को याद करने का क्योंकि उनका दुःख इस समय शांत है। वह अभी थककर सोया है। कवि अपने दुखद क्षणों को भूलना चाहते है और इस समय वो अपने दुखद अतीत को कुछ समय के लिए भूले हैं। इसीलिए वो वापस अपने दुखद अतीत को कुरेद कर फिर से दुखी नहीं होना चाहते हैं।

प्रश्न 3 – स्मृति को ‘ पाथेय ’ बनाने से कवि का क्या आशय है ?

उत्तर – ‘ पाथेय ’ अर्थात् सहारा। स्मृति को पाथेय बनाने से कवि का आशय अपनी प्रिय की स्मृति के सहारे जीवन जीने से है। कवि की पत्नी की मृत्यु युवावस्था में ही हो गई थी। अपनी पत्नी के साथ बिताये मधुर पलों की स्मृतियाँ ही अब कवि के जीवन जीने का एकमात्र सहारा व मार्गदर्शक हैं। इसीलिए कवि उन्हें किसी के साथ बांटना नहीं चाहते हैं। उन्हें सिर्फ अपने दिल में संजो कर रखना चाहते है। जैसे थका हुआ यात्री शेष रास्ता देखते हुए अपनी मंजिल पा जाता है वैसे ही कवि अपनी पत्नी की यादों के सहारे अपना शेष जीवन बिता लेगा। मनुष्य अपनी सुखद स्मृतियों की याद में अपना सारा जीवन व्यतीत कर सकता है।

प्रश्न 4 – भाव स्पष्ट कीजिए –
( क ) मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया।
आलिंगन में आते – आते मुसक्या कर जो भाग गया।

उत्तर – प्रस्तुत पंक्तियां कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित आत्मकथ्य कविता से ली गई है। उक्त पंक्तियों का भाव यह है कि कवि भी दूसरे लोगों के जैसा सुखमय तथा आनंदरूपी जीवन व्यतीत करना चाहता था पर उसे वह सुख नहीं मिल सका जिसकी वह कल्पना कर रहा था। उसे सुख पाने का अवसर भी मिला पर वह हाथ आते – आते चला गया अर्थात् उसकी पत्नी की मृत्यु हो जाने से वह सुखद जिंदगी अधिक समय तक व्यतीत न कर सका। मनुष्य के सपने कभी हकीकत नहीं होते। जरूरी नहीं है कि सुख के सपने पूरे साकार हों। कवि इन पक्तियों के जरिए यह बताना चाहते हैं कि जीवन में सुख क्षणिक है।

( ख ) जिसके अरुण कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।
अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।

उत्तर – प्रस्तुत पंक्तियां कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखित आत्मकथ्य कविता से अवतरित हैं। कवि ने इन पंक्तियों में जीवन के ‌सुखद क्षणो‌ की अभिव्यक्ति की है। यही सुखद क्षण उसके जीवन का सहारा है। कवि अपनी प्रेयसी के‌‌ सौंदर्य का वर्णन करते हुए कहता है कि उसकी प्रेयसी अत्यंत सुंदर थी। उसके कपोल अर्थात गाल इतने लाल , सुंदर और मनोहर थे कि प्रात:कालीन सुबह भी अपना सौंदर्य बढ़ाने के लिए लालिमा इन्हीं गालों से लिया करती थी। अर्थात् कवि कहना चाहते हैं कि उनकी पत्नी के लाल – लाल गाल सूर्य की लालिमा से भी बढ़कर सुंदर थे।

प्रश्न 5 – ‘ उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ , मधुर चाँदनी रातों की ’ – कथन के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है ?

उत्तर – कवि अपनी पत्नी के साथ बिताये गये मधुर पलों का जिक्र करते हुए कहना चाहता है कि चांदनी रातों में उन्होंने अपनी प्रेयसी ( पत्नी ) के साथ एकांत में खिलखिला कर हंसते हुए , उससे प्यार भरी मीठी बातें करते हुए , जो समय बिताया था। वे सुख के क्षण उज्ज्वल गाथा की तरह ही पवित्र है जो उसके लिए अब अपने अकेलेपन के जीवन को व्यतीत करने का एकमात्र सहारा बनकर रह गए हैं। वही मधुर स्मृतियों ही तो अब उनके जीवन जीने का एक मात्र सहारा है। उन निजी क्षणों का वर्णन वे सब के सामने कैसे कर सकते हैं ? ऐसी स्मृतियों को वह सबके सामने प्रस्तुत कर अपने आप को शर्मिंदा नहीं करना चाहते हैं। उन आनंद भरे पलों की बातों को वे दूसरों के साथ बांटना नहीं चाहते। बल्कि अपने तक ही सीमित रखना चाहते हैं।

प्रश्न 6 – ‘ आत्मकथ्य ’ कविता की काव्यभाषा की विशेषताएँ उदाहरण सहित लिखिए।

उत्तर – ‘ जयशंकर प्रसाद ’ द्वारा रचित कविता ‘ आत्मकथ्य ’ की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
( क ) कविता में हिंदी भाषा की खड़ी बोली का उपयोग किया है।
( ख ) अपने मनोभावों को व्यक्त कर उसमें सजीवता लाने के लिए कवि ने ललित , सुंदर एवं नवीन बिंबों का प्रयोग किया है। जैसे – “ जिसके अरुण – कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में। अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में। ”
( ग ) प्रस्तुत कविता में कवि ने नवीन शब्दों का प्रयोग किया है।
( घ ) मानवीकरण शैली का प्रयोग किया गया है।
( ड़ ) अलंकारों के प्रयोग से काव्य सौंदर्य बढ़ गया है।
जैसे –
खिल – खिलाकर , आते – आते – में पुनरुक्ति अलंकार है।
अरुण – कपोलों – में रुपक अलंकार है।
मेरी मौन , अनुरागी उषा – में अनुप्रास अलंकार है।

प्रश्न 7 – कवि ने जो सुख का स्वप्न देखा था उसे कविता में किस रूप में अभिव्यक्त किया है ?

उत्तर – कवि ने जो सुख का स्वप्न देखा था उसे कवि ने अपनी प्रेयसी नायिका के माध्यम से व्यक्त किया है। कवि कहता है कि नायिका स्वप्न में उसके पास आते – आते मुस्कुरा कर चली गई। कवि कहना चाहता है कि जो सपने उसने और उसकी प्रेमिका ने मिलकर देखे थे वो तो उसे कभी प्राप्त नहीं हुआ। उसने जिस सुख की कल्पना की थी वह उसे कभी प्राप्त न हुआ और उसका जीवन हमेशा उस सुख से वंचित ही रहा। इस दुनिया में सुख छलावा मात्र है। हम जिसे सुख समझते हैं वह अधिक समय नहीं रहता है , किसी स्वप्न की भांति जल्दी ही गायब हो जाता है।

यह भी पढ़ें :

▪️हिंदी ( कक्षा 10) — क्षितिज भाग 2

▪️हिंदी ( कक्षा 9) — क्षितिज भाग 1

▪️जयशंकर प्रसाद का साहित्यिक परिचय ( Jaishankar Prasad Ka Sahityik Parichay )

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